झारखण्ड में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

1857 का विद्रोह

झारखण्ड में 1857 के आंदोलन का प्रसार के कारण

  • अंग्रेजों के प्रति क्षेत्रीय शासकों में अविश्वास की भावना
  • झारखण्ड के जनजातियों में अंग्रेजी सरकार, जमींदार, साहूकार आदि के प्रति असंतोष
  • अंग्रेज अधिकारियों में जनजातीय समस्याओं की समझ का अभाव तथा प्रशासनिक सुधारों की कमी
  • अंग्रेज सरकार द्वारा आदिवासी क्षेत्रों का निर्वासन स्थल के रूप में प्रयोग
  • बाबू कुंवर सिंह के नेतृत्व में बिहार में 1857 के विद्रोह से प्रेरणा 

 

  • झारखण्ड में 1857 के विद्रोह की शुरूआत 12 जून, 1857 को , रोहिणी गाँव (देवघर) से,
    • यह गाँव अजय नदी के किनारे अवस्थित है।
    • मेजर मैक्डोनाल्ड के नेतृत्व में पदस्थापित 32वीं रेजिमेंट के सैनिकों द्वारा
      • लेफ्टिनेंट नॉर्मन लेस्ली की हत्या के बाद यह विद्रोह प्रारंभ हुआ।
      • मेजर मैकडोनाल्ड तथा सर्जन डॉ. ग्रांट घायल हो गये।
  • इमाम खाँ नामक व्यक्ति पहचाने गए हमलावरों पर मुकदमा चलाकर उन्हें फाँसी दी गयी
  • रेजीमेंट का मुख्यालय रोहिणी से भागलपुर स्थानांतरित कर दिया गया।
  • विद्रोह का प्रसार

हजारीबाग में विद्रोह का प्रसार 

  • 25 जुलाई, 1857 को दानापुर रेजिमेंट के सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया। इसकी सूचना पाकर हजारीबाग स्थित रामगढ़ बटालियन के सैनिक उत्साहित हो गए तथा 30 जुलाई, 1857 को इन्होनें भी विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह के समय रामगढ़ बटालियन का मुख्यालय राँची में अवस्थित था। 
  • हजारीबाग में सैनिकों के विद्रोह के पश्चात् मेजर सिम्पसन (उपायुक्त) सहित विभिन्न अंग्रेज अधिकारी कलकत्ता भाग गए तथा विद्रोहियों ने अंग्रेज अधिकारियों के बंगलों व दफ्तरों को जलाकर सरकारी खजाने को लूट लिया। 
  • रामगढ़ के राजा शम्भू नारायण सिंह द्वारा तार के माध्यम से इस विद्रोह की सूचना गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग को भेजी गयी। 
  • विद्रोहियों ने जेल से कैदियों को भी छुड़ा लिया तथा संबलपुर के सुरेन्द्र शाही के नेतृत्व में ये कैदी राँची की ओर चले गये। 
  • राँची  के कमिश्नर ने विद्रोह को दबाने हेतु लेफ्टिनेंट ग्राहम के नेतृत्व में सैनिकों के एक दल को रामगढ़ भेजा, परंतु रामगढ़ के जमादार माधव सिंह एवं डोरंडा के सूबेदार नादिर अली खाँ व सूबेदार जयमंगल पाण्डेय ने विद्रोह कर दिया जिसके बाद लेफ्टिनेंट ग्राहम अपनी जान बचाने हेतु भाग गया। 

राँची में विद्रोह का प्रसार

  •  2 अगस्त, 1857 को हजारीबाग के विद्रोही सैनिक राँची आ गये तथा जमादार माधव सिंह, सूबेदार नादिर अली व जयमंगल पाण्डेय के नेतृत्व में यहाँ के सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया। इन सैनिकों ने राँची में अधिकारियों की कोठियाँ जला दी, गोस्सनर चर्च को तोप के गोले से उड़ा दिया तथा जेल से कैदियों को छुड़ा लिया।
  • विद्रोह के प्रसार को देखते हुए राँची के कमिश्नर डाल्टन की सलाह पर अगस्त में पूरे छोटानागपुर में मार्शल कानून लागू कर दिया गया। 
  • विद्रोहियों ने बढ़कागढ़ के नागवंशी ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव (विद्रोहियों के नेता) के नेतृत्व में डोरंडा स्थित अंग्रेज अधिकारियों के सभी बंगले व कचहरी को जला दिया तथा खजाना लूट लिया। साथ ही इन्होनें जेल से सभी कैदियों को भी छुड़ा लिया। इसमें पाण्डेय गणपत राय (विद्रोहियों के सेनापति), टिकैत उमरांव सिंह, शेख भिखारी, रामरूप सिंह, जगन्नाथ शाही तथा दुखु ने विद्रोहियों का भरपूर साथ दिया। 
  • विश्वनाथ शाहदेव (झारखण्ड में 1857 के विद्रोह के प्रेरक) ने मुक्तवाहिनी सेना की स्थापना की और इस सेना ने 1857 के विद्रोह में अविस्मरणीय योगदान दिया। विश्वनाथ शाहदेव के अतिरिक्त गणपत राय (सेनापति) व शेख भिखारी इस सेना के प्रमुख सैनिक थे। 
  • मुक्तवाहिनी सेना को 1857 के विद्रोह में बाबू कुंवर सिंह का मार्गदर्शन प्राप्त था जो बिहार में 1857 के विद्रोह को नेतृत्व प्रदान कर रहे थे। 

चतरा में विद्रोह का प्रसार 

  • राँची के बाद विद्रोही चतरा पहुँच गए जहाँ 2 अक्टूबर, 1857 को मेजर इंग्लिश, मेजर सिम्पसन, लेफ्टिनेंट अर्ल, सार्जेट डाइनन आदि के नेतृत्व वाले अंग्रेज सैनिकों व जयमंगल पाण्डेय के नेतृत्व वाले विद्रोहियों के बीच चतरा का ऐतिहासिक युद्ध हुआ। इस लड़ाई में सूबेदार नादिर अली खाँ घायल हो गए तथा जमादार माधव सिंह भाग गया। अंग्रेजों ने जमादार माधव सिंह पर 1,000 रुपये इनाम की घोषणा की। 
  • 3 अक्टूबर, 1857 को सूबेदार नादिर अली खाँ व जयमंगल पाण्डेय को गिरफ्तार कर लिया गया तथा कमिश्नर सिम्पसन के आदेश पर 4 अक्टूबर को उन्हें चतरा के ‘पंसीहारी तालाब’ के निकट आम के पेड़ से लटकाकर फाँसी दे दी गयी।
  • विद्रोहियों के नेता ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव एवं सेनापति पाण्डेय गणपत राय भागकर लोहरदगा के जंगलों में छिप गए तथा वहीं से अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध छापामार युद्ध करते रहे। 
  • रांची का कमिश्नर डाल्टन ओरमांझी के 12 गाँवों के जमींदार उमराव सिंह एवं उसके दीवान शेख भिखारी का गिरफ्तार कर राँची ले आया तथा 8 जनवरी, 1858 को टैगोर हिल के पास इन्हें फाँसी दे दी। इस फाँसी स्थल को ‘टुंगरी फाँसी’ के नाम से जाना जाता है। 
  • बाद में विश्वनाथ दुबे तथा महेश नारायण शाही नामक व्यक्तियों की गद्दारी से कैप्टन ओक्स ने कैप्टन नेशन के  साथ मिलकर विद्रोह के प्रमुख नेता विश्वनाथ शाहदेव एवं गणपत राय को गिरफ्तार कर लिया। 
  • 16 अप्रैल 1858 को विश्वनाथ शाहदेव और 21 अप्रैल 1858 को गणपत राय को राँची जिला स्कूल के मुख्य द्वार के समीप कदम्ब के पेड़ पर छोटानागपुर के आयुक्त कमिश्नर डाल्टन के आदेशानुसार फाँसी दे दी गई।

मानभूम में विद्रोह का प्रसार 

  • 5 अगस्त, 1857 ई. को सैनिकों ने पुरूलिया में भी विद्रोह कर दिया जिससे घबराकर उपायुक्त जी. एन. ओकस समेत कई अंग्रेज अधिकारी रानीगंज भाग गये। इसके बाद विद्रोहियों ने पूरे जिले पर कब्जा कर भारी लूटपाट मचाया व कैदियों को जेल से छुड़ा कर राँची की ओर जाने लगे। 
  • मानभूम के संथाल भी इस विद्रोह में शामिल हो गये तथा आसपास के गाँवों में लूटपाट करने लगे। पुरुलिया के असिस्टेंट कमिश्नर ओक्स को सितंबर में वापस लौटने पर इसकी जानकारी मिली। 
  • ओक्स ने विद्रोहियों को नियंत्रित करने हेतु पंचेत के राजा नीलमणि सिंह से मदद मांगी। परंतु नीलमणि सिंह सरकार की मदद करने के बजाय संथालों को ही भड़काने लगा।
  • ओक्स ने कैप्टेन माउंट गोमरी के नेतृत्व में सैनिकों का एक दल संथालों को नियंत्रित करने हेतु भेजा तथा संथालों पर कार्रवाई के बाद अक्टूबर तक पुरूलिया में शांति स्थापित हो गयी। 
  • पुलिस कार्रवाई के बाद संथाल विद्रोही मानभूम से हजारीबाग की ओर चले गये। इसी बीच नवंबर में राजा नीलमणि सिंह को अंग्रेजों ने गिरफ्तार करके अलीपुर जेल भेज दिया जिसके बाद मानभूम में विद्रोह समाप्त हो गया। 

सिंहभूम में विद्रोह का प्रसार 

  • सिंहभूम में यह विद्रोह भगवान सिंह एवं रामनाथ सिंह ने प्रारंभ किया गया, परंतु संपूर्ण सिंहभूम क्षेत्र में क्रांतिकारियों का नेतृत्व राजा अर्जुन सिंह ने किया। 
  • 3 सितंबर, 1857 को चाईबासा के सैनिकों ने भगवान सिंह एवं रामनाथ सिंह के नेतृत्व में विद्रोह करके सरकारी खजाने को लूट लिया तथा कैदियों को जेल से छुड़ा लिया। 
  • सिंहभूम का असिस्टेंट कमिश्नर मेजर शिशमोर विद्रोह के प्रारंभ होने से पूर्व ही अंग्रेज समर्थक सरायकेला नरेश चक्रधर सिंह को चाईबासा का दायित्व सौंपकर कलकत्ता भाग गया। 
  •  लूटपाट करने के बाद विद्रोही राँची की ओर रवाना हो गये, परंतु संजय नदी के पास सरायकेला नरेश चक्रधर सिंह एवं खरसावां नरेश हरि सिंह ने विद्रोहियों को रोक दिया।
  • इस स्थिति में अंग्रेज विरोधी पोरहाट नरेश अर्जुन सिंह ने विद्रोहियों की सहायता करने का निर्णय लिया तथा अपने दीवान जग्गू की सहायता से विद्रोहियों को 7 सितंबर, 1857 को संजय नदी पार करवाया। 
  •  अर्जुन सिंह के प्रति विद्रोहियों के मन में शंका थी जिसके बाद अर्जुन सिंह द्वारा पौरी देवी को साक्षी मानकर विश्वासघात नहीं करने की कसम खाने पर विद्रोहियों ने अर्जुन सिंह को नेतृत्व सौंपना स्वीकार कर लिया। 
  •  13 सितंबर, 1857 को आर. सी. बर्च ने सिंहभूम के नये जिलाधीश के रूप में कार्यभार संभाला तथा 16 सितंबर, 1857 को कैप्टन ओक्स की सेना ने चाईबासा शहर पर अधिकार कर लिया। 
  •  आर. सी. बर्च ने अर्जुन सिंह को चाईबासा आकर आत्मसमर्पण करने का संदेश भेजा जिसे अस्वीकृत करते हुए अर्जुन सिंह ने स्वयं को ‘सिंहभूम का राजा’ घोषित कर दिया। बर्च द्वारा अर्जुन सिंह को बागी करार देते हुए उसके राज्य पर कब्जा करने तथा उसकी गिरफ्तारी पर 1,000 रुपये इनाम की घोषणा की गयी। 
  •  अर्जुन सिंह राँची के कमिश्नर डाल्टन के समक्ष आत्मसमर्पण करना स्वीकार करते हुए अपने समर्थकों के साथ राँची आ गया। परंतु 17 अक्टूबर, 1857 को अर्जुन सिंह के साथ राँची पहुँचे विद्रोहियों को कमिश्नर डाल्टन के आदेशानुसार गिरफ्तार करके जेल में बंद कर दिया गया। 
  •  इन गिरफ्तार सैनिकों पर कोर्ट मार्शल चलाकर उनकी सजा तय की गयी तथा 20 अक्टूबर, 1857 को ‘शहीद चौक’ के पास फांसी की सजा प्राप्त विद्रोहियों को फांसी पर लटका दिया गया। 
  • अर्जुन सिंह विद्रोहियों की फांसी से अत्यंत दुखी हो गया तथा पोरहाट आकर फिर से अंग्रेजों के विरूद्ध अभियान प्रारंभ कर दिया। 
  •  20 नवंबर, 1857 को अंग्रेज अधिकारी कैप्टन हेल ने चक्रधरपुर पर कब्जा कर लिया तथा अर्जुन सिंह के दीवान जग्गू को गिरफ्तार कर उसी दिन फांसी पर लटका दिया। 
  •  21 नवंबर, 1857 को आर. सी. बर्च ने पोरहाट पर कब्जा करके राजा अर्जुन सिंह के महल को जला दिया। परंतु अर्जुन सिंह यहाँ से बचकर भाग गया। 
  •  अर्जुन सिंह ने अंग्रेजों के विरूद्ध अपना अभियान तेज कर दिया। उसने पहले मुण्डा-मानकी को तथा दिसंबर, 1857 तक लगभग सभी-जनजातियों को अपने साथ विद्रोह में शामिल कर लिया। 
  •  इसके बाद विद्रोहियों ने जमकर उत्पात मचाना शुरू कर दिया तथा आसपास के बाजारों को लूटने के अलावा अंग्रेजी सैनिकों पर हमला करने लगे। विद्रोहियों के ऐसे ही एक हमले में कई अंग्रेज अधिकारी घायल हो गये जिसके बाद कर्नल फास्टर ने विद्रोहियों को दबाने हेतु शेखावती बटालियन को रानीगंज से चाईबासा भेजा। 
  •  17 जनवरी, 1858 को चाईबासा पहुँचने पर शेखावती बटालियन ने चक्रधरपुर को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया तथा कई विद्रोहियों को मार दिया। 
  •  अंग्रेजों के दमनपूर्वक किए गए कार्रवाई से विद्रोह को कमजोर पड़ गया। लगभग एक वर्ष तक विद्रोह को शांत देख अर्जुन सिंह ने मयूरभंज के राजा (अर्जुन सिंह के ससुर) की सलाह पर राँची के कमिश्नर डाल्टन के समक्ष 16 फरवरी, 1859 को आत्मसमर्पण कर दिया। 

 पलामू में विद्रोह का प्रसार 

  • भोगता जनजाति के नीलांबर-पीतांबर (दोनों भाई थे) ने पलामू क्षेत्र में 1857 के विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया। 
  •  इन्होनें चेरो, खरवार तथा भोगता को एकत्र कर सैन्य दल का गठन किया तथा स्वयं को स्वतंत्र शासक के रूप में घोषित कर दिया। 
  •  चकला के भवानी बख्श राय के नेतृत्व में 26 सितंबर, 1857 को चेरो जनजाति के लोग इस विद्रोह में शामिल हो गये। 
  •  विद्रोहियों ने 21 अक्टूबर, 1857 ई. को शाहपुर पर धावा बोल दिया तथा अंतिम चेरो राजा चूड़ामन राय की विधवा से चार तो छीन कर ले गये। 
  •  विद्रोहियों ने इस विद्रोह के दौरान शाहपुर थाना एवं लेस्लीगंज थाना के साथ-साथ चैनपुर गढ़ पर भी भीषण हमला किया परंतु चैनपुर गढ़ का रघुवर दयाल सिंह इस हमले से बचने में सफल रहा। 
  •  विद्रोह की खबर मिलने पर 5 नवंबर, 1857 लेफ्टिनेंट ग्राहम एक सैन्य दल के साथ लेस्लीगंज तथा 7 नवंबर  1857 को चैनपुर पहुँचा। परन्तु विद्रोहियों द्वारा घेरे जाने के बाद ग्राहम वहाँ से जान बचाकर भाग गया। 
  •  विद्रोहियों ने इसके बाद रंकागढ़ एवं 27 नवंबर, 1857 को बंगाल कोल कंपनी के राजहरा कोयला खान पर धावा बोल दिया। 
  •  विद्रोहियों का प्रभाव बढ़ने पर लेफ्टिनेंट ग्राहम की सहायता के लिए 8 दिसंबर, 1857 को मेजर काटर के नेतृत्व में एक सैन्य दल को सासाराम से शाहपुर भेजा गया जहां मेजर काटर ने एक विद्रोही नेता देवी बाणा राय को गिरफ्तार कर लिया। 
  •  राँची के कमिश्नर डाल्टन के आदेश पर ले. ग्राहम की सहायता हेतु एक सैन्य टुकड़ी के साथ मेजर मेकडोनेल पलामू पहुंचा जिसके परिणामस्वरूप विद्रोहियों को पलामू किला से भागना पड़ा। 
  • 3 फरवरी, 1858 को कमिश्नर डाल्टन खुद पलामू  आया तथा 6 फरवरी, 1858 को वापस लौटा। डाल्टन के आदेश पर विभिन्न स्थानों (पलामू किला. लेस्लीगंज. हरणामांड गाँव बाघमारा घाट आदि) से विद्रोहियों को खदेड़ने पर जोर दिया गया। 
  • नवंबर, 1858 में सीधा सिंह और राम बहादुर सिंह के नेतृत्व में विद्रोहियों की संख्या 1000 से अधिक हो गया जिसके बाद विद्रोहियों ने पलामू पर पुनः नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। 
  • जनवरी, 1859 तक विद्रोहियों ने पुनः पलामू  पर नियंत्रण स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली । इसके लिए  विद्रोहियों ने गुरिल्ला युद्ध का प्रयोग किया। 
  • लेफ्टिनेंट की सहायता के लिए जनवरी, 1859 में कैप्टेन नेशन को भेजा गया जिसके बाद विद्रोहियों के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई प्रारंभ की गयी तथा इसमें चेरो जागीरदारों का भी सहयोग लिया गया। इसके परिणामस्वरूप भोगता प्रदेश से नीलांबर-पीतांबर को भागना पड़ा। 
  • चेरो जागीरदारों द्वारा अंग्रेजों का साथ देने के कारण भोगता कमजोर पड़ने लगे जिसका फायदा उठाकर अंग्रेजों ने नीलांबर-पीतांबर को पकड़ने का भरपूर प्रयास किया। साथ ही इनको पकड़वाने पर जागीर व इनाम देने की भी घोषणा की गयी। 
  • अंग्रेजों ने एक गुप्तचर की सूचना पर नीलांबर-पीतांबर को एक गुप्त स्थान पर भोजन करते समय चारों ओर से घेर लिया तथा उन्हें आत्मसमर्पण हेतु विवश कर दिया। 
  • 28 मार्च, 1859 को नीलांबर-पीतांबर को लेस्लीगंज (पलामू) में एक आम के पेड़ पर फाँसी दे दी गई।

अन्य तथ्य 

  • 1857 के विद्रोह के दौरान नागवंशी राजा जगन्नाथ शाहदेव, पाण्डेय गणपत राय को पकड़वाने वाले विश्वनाथ दुबे तथा नारायण शाही, जगतपाल सिंह (पिठोरिया), जनक सिंह, शिवचरण राय (नावागढ़), कुंवर भिखारी सिंह (मनिका) आदि प्रमुख थे।
  • अंग्रेजों की सहायता हेतु ‘रायबहादुर’ की उपाधि प्रदान की गयी।
    • किशनु दयाल सिंह (रंका)
    • रघुवर दयाल सिंह (चैनपुर) को
  •  अंग्रेजी सेना में शामिल कुछ भारतीय सैनिकों को उनकी सेवा हेतु ‘ऑर्डर ऑफ मेरिट’ दिया गया।
    • चतरा की लड़ाई में शामिल
      • सूबेदार शेख पंचकौड़ी
      • हवलदार आरजू
      • नायक तारा
  • ‘विक्टोरिया क्रॉस’ से सम्मानित
    • लफ्टिनेंट डौंट
    • सार्जेन्ट डाइनन (मरणोपरांत)
  • सैन्य व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए छोटानागपुर के कोल, संथाल आदि लोगों को सेना में शामिल किया गया। 
  • रामगढ़ बटालियन में गोरखा एवं सिक्खों के साथ-साथ दुसाधों की भी भर्ती की जाने लगी।

1857 के विद्रोह का प्रारंभ – प्रमुख स्थान

स्थान

विद्रोह  आरंभ की तिथि

नेतृत्वकर्ता

रोहिणी (देवघर)

12 जून, 1857

हजारीबाग

30 जुलाई, 1857

माधव सिंह व नादिर अली

राँची

2 अगस्त, 1857

डोरंडा (राँची)

जयमंगल पाण्डेय

मानभूम

5 अगस्त, 1857

संथालों द्वारा 

सिहभूम

3 सितम्बर, 1857

अर्जुन सिंह

पलामू 

सितम्बर, 1857

नीलांबर-पीतांबर

झारखण्ड में वहाबी आंदोलन 

  • झारखण्ड में वहाबी आंदोलन का प्रसार – शाह मोहम्मद हुसैन ने
    • राजमहल में वहाबी आंदोलन की शाखा खोली गयी थी। 
  •  संथाल परगना क्षेत्र में पीर हुसैन ने वहाबी आंदोलन का प्रचार-प्रसार किया। 
  • पाकुड़ क्षेत्र के इब्राहिम मंडल को वहाबी आंदोलन के दौरान आजीवन कारावास की सजा दी गयी थी।

झारखण्ड में उग्र राष्ट्रीयता का प्रसार 

देवघर

  • उग्र राष्ट्रवाद के दौर में झारखण्ड में क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्रदेवघर
    • देवघर में ‘शीलेर बाड़ी’ मकान में 1908 के अलीपुर बम कांड से जुड़े कई बंगाली क्रांतिकारी छुपकर रहते थे
    • इस मकान का प्रयोग बन बनाने एवं प्रशिक्षण हेतु किया जाता था।
    • 1915 ई. में देवघर के ‘शीलेर बाड़ी’ नामक मकान से बम बनाने की सामग्रियां प्राप्त की गयी थी। 
  • वारीन्द्र कुमार घोष द्वारा देवघर में स्वर्ण संघ (गोल्डन लीग) का गठन किया गया था।
  • देवघर में स्थित मित्रा उच्च विद्यालय के प्राचार्य शांति कुमार बख्शी द्वारा युवाओं को क्रांतिकारी प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था।
  • वर्ष 1927 ई. में देवघर षड़यंत्र केस में वीरेन्द्र नाथ भट्टाचार्य के घर छापा मारकर हथियार तथा क्रांतिकारी साहित्य बरामद किया गया था।
    • देवघर षड्यंत्र केस में 20 व्यक्तियों की गिरफ्तारी
      • वीरेन्द्र नाथ भट्टाचार्य, सुरेन्द्र नाथ भट्टाचार्य तथा तेजेश चंद्र घोष आदि
  • दुमका के प्रभुदयाल हिम्मद सिंह एवं बैद्यनाथ विश्वास को ‘रोड्डा आर्म्स  केस’  में अभियुक्त बनाया गया था।
    • यह कलकत्ता के रोड्डा एंड कंपनी नामक बंदूक निर्माण कंपनी की दुकान से माउजर पिस्तौल की चोरी से संबंधित मामला था।

राँची

  • राँची में क्रांतिकारियों का नेतृत्व – गणेश चंद्र घोष ने
  • हावड़ा के बेलूर मठ के शचिन्द्र कुमार सेन डोरंडा आकर अपने पिता के पास ठहरे थे।
  • नवंबर 1913 में हेमंत कुमार बोस (अंग्रेजों के संदिग्ध) राँची आकर पी. एन. बोस के घर रूके थे।

हजारीबाग 

  • निर्मल बनर्जी ने 1913 ई. में हजारीबाग जिले के गिरिडीह नगर में एक खंभे पर ‘आवर स्वाधीन भारत’ शीर्षक से परचे चिपकाए थे। 
    • ये पर्चे चौबीस परगना के क्रिस्टो राय बंगाल से लेकर आये थे। 
  • गिरिडीह के मनोरंजन गुहा (उपनाम – ठाकुर दा) तथा दुमका के हेमेन्द्र नाथ घोष द्वारा क्रांतिकारियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराया जाता था।
  • राम विनोद सिंह को ‘हजारीबाग का जतिन बाघा’ कहा जाता है। 
    • हजारीबाग के संत कोलंबा महाविद्यालय के छात्र
    •  राम विनोद सिंह को 14 सितंबर, 1918 को गिरफ्तार किया गया था
      • जिसके खिलाफ हजारीबाग में छात्रों द्वारा प्रदर्शन किया गया था।

सिंहभूम 

  •  ढाका, मैमनसिंह तथा कलकत्ता से कई क्रांतिकारी आकर सिंहभूम के जमशेदपुर एवं चाईबासा में छुपते थे तथा क्रांति का गुप्त प्रचार करते थे। 
  • 1908 ई. में टाटा कंपनी के कर्मचारी गिरीन्द्र नाथ मुखर्जी ने न्यूयॉर्क से घोषणा की थी कि ‘रक्तरंजित क्रांति से ही भारत को मुक्त किया जा सकता है।’ इनके भाई अमरनाथ मुखर्जी भी क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल थे। 
  •  क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल दुर्गादास बनर्जी, सुरेंद्र कुमार राय आदि का संबंध टाटा कंपनी से है।
  • सुधांशु भूषण मुखर्जी अप्रैल, 1916 में अलीपुर जेल से रिहा होने के बाद सिंहभूम के सोनुआ ग्राम में रहने लगे तथा बाद में हजारीबाग चले गये। 
  • आनंद कमल चक्रवर्ती ने चाईबासा से प्रकाशित ‘तरूण शक्ति’ नामक क्रांतिकारी पत्रिका का संपादन किया था। इस पत्रिका में ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध लिखने हेतु उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था।

अन्य तथ्य 

  •  काकोरी कांड के मुख्य आरोपी अशफाक उल्ला खाँ, कलकत्ता के प्रफुल्ल चंद्र घोष व ज्योति पंत राय जैसे क्रांतिकारियों ने भी कुछ दिनों तक छुपने हेतु झारखण्ड में शरण ली थी। 
  • छोटानागपुर क्षेत्र डॉ. यदुगोपाल मुखर्जी एवं बसावन सिंह के नेतृत्व में 1931-32 के आसपास भी क्रांतिकारी आंदोलन संचालित था। 
  • बिहार के गया में राजनैतिक डकैती के मामले में गिरफ्तार 18 क्रांतिकारियों में डाल्टनगंज के परमथ नाथ मुखर्जी तथा गणेश प्रसाद वर्मा भी शामिल थे।

गाँधी युग 

गाँधीजी का झारखण्ड आगमन (1917-1940 के बीच) 

  • महात्मा गाँधी 1917 से 1940 के बीच विभिन्न कारणों से कई बार झारखण्ड की यात्रा पर आए। इनमें से गाँधीजी की झारखण्ड की प्रथम 4 यात्राओं का संबंध चंपारण आंदोलन से है। 
  •  गाँधीजी पहली बार 3 जून, 1917 को झारखण्ड आए थे। गाँधीजी अंतिम बार रामगढ़ के कांग्रेस अधिवेशन के सिलसिले में झारखण्ड आए थे। 

चंपारण आंदोलन के सिलसिले में (पहली बार)

  •  महात्मा गाँधी को 29 मई, 1917 को सरकार की तरफ से एक पत्र मिला जिसमें उन्हें 4 जून को बिहार-ओडिशा के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर एडवर्ड अल्बर्ट गेट से मिलने हेतु आग्रह किया गया था। इसके अतिरिक्त श्याम कृष्ण सहाय ने भी 1917 में गाँधी जी को राँची आने का निमंत्रण दिया था। 
  • इन्हीं संदर्भों में 3 जून, 1917 को ब्रजकिशोर बाबू के साथ पहली बार महात्मा गाँधी का राँची आगमन हुआ। इस दौरान गाँधीजी श्याम कृष्ण सहाय के घर पर ही रुके। 4 जून को महात्मा गाँधी की पत्नी कस्तूरबा गाँधी तथा उनके पुत्र देवदास गाँधी भी राँची आए।
  • 4 जून से 6 जून तक तीन दिन बिहार के लेफ्टिनेंट गवर्नर अल्बर्ट गेट से उनकी वार्ता चली तथा 7 जून को वे पटना लौट गए। इस दौरान गांधीजी श्यामकृष्ण सहाय के घर पर रूके थे। 

चंपारण आंदोलन के सिलसिले में (दूसरी बार )

  • गाँधीजी 5 जुलाई को मोतिहारी से चलकर 7 जुलाई को दूसरी बार राँची पहुंचे। इस यात्रा का उद्देश्य 11 जुलाई, 1917 को चंपारण जांच समिति की एक बैठक में भाग लेना था। बैठक संपन्न होने के बाद गाँधीजी 13 जुलाई को पुनः मोतिहारी लौट गए।

चंपारण आंदोलन के सिलसिले में (तीसरी बार

  •  18 सितंबर को पूना से चलकर 22 सितंबर, 1917 को चंपारण आंदोलन के सिलसिले में पुनः राँची पहुंचे। उन्होनें ब्रजकिशोर प्रसाद को भी राँची बुला लिया। इस संदर्भ में 23 सितंबर को राँची के पते से मगनलाल गांधी को लिखा एक पत्र भी मिला है। 24 सितंबर, 1917 को राँची में चंपारण समिति की बैठक आयोजित की गयी जिसमें आंदोलन को लेकर काफी विचार-विमर्श किया गया। 
  •  गांधीजी 24 सितंबर से 28 सितंबर, 1917 तक चंपारण जांच समिति की बैठक में शामिल हुए जिसमें चंपारण आंदोलन की रूपरेखा तैयार की गयी। 
  •  3 अक्टूबर, 1917 को गांधीजी ने सरकार को चुनौती देते हुए अपनी एक रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किया तथा 4 अक्टूबर, 1917 को गांधीजी चंपारण हेतु निकल गए। 

चंपारण आंदोलन के सिलसिले में (चौथी बार)

  •  असहयोग आंदोलन (1920-21) के दौरान महात्मा गाँधी 1920 में राँची आए थे। इस दौरान वे भीमराज बंशीधर मोदी धर्मशाला में रुके थे। गांधीजी की उपस्थिति में ही इसी धर्मशाला के बाहर विदेशी कपड़ों की होली जलाई गयी थी। इस दौरान गाँधीजी टाना भगतों से भी मिले जिसके बाद टाना भगत गाँधीजी के प्रिय शिष्य बन गए।

गाँधीजी का पाँचवी बार झारखण्ड आगमन 

  •  गाँधीजी 5 फरवरी, 1921 में पहली बार धनबाद आए तथा यहाँ से झरिया गए। गाँधीजी के इस दौरे का उद्देश्य राष्ट्रीय विद्यालय हेतु कोष एकत्रित करना था। झरिया में कार्यक्रम समाप्त होने के बाद गाँधीजी पटना लौट गए। 

गाँधीजी का छठी बार झारखण्ड आगमन 

  • 8 अगस्त, 1925 गाँधीजी सी. एफ. एण्डूज के आग्रह पर गाँधीजी पहली बार जमशेदपुर आए। गाँधीजी की इस यात्रा का उद्देश्य टाटा प्रबंधन एवं मजदूर यूनियन के बीच 1921 से चल रहे हड़ताल के कारण उत्पन्न तनाव के मामले में समझौता कराना था। 
  • जमशेदपुर में आर. डी. टाटा ने गाँधीजी का भव्य स्वागत किया तथा इस प्रवास के दौरान गाँधीजी डायरेक्टर्स बंगला में रुके।
  • इसी दौरान जमशेदपुर की एक सभा में देशबंधु स्मृति कोष हेतु गाँधीजी को 5000 रुपये प्रदान किए गए। 
  •  गाँधीजी 1934 में दूसरी बार तथा 1940 में तीसरी बार जमशेदपुर आए थे।

गाँधीजी का सातवीं बार झारखण्ड आगमन 

  • 15 सितंबर, 1925 को गाँधीजी पहली बार पुरूलिया से चक्रधरपुर आए तथा यहाँ राष्ट्रीय विद्यालय में जाकर छात्रों को संबोधित किया (1934 में दूसरी बार चक्रधरपुर की यात्रा की)। 
  • चक्रधरपुर से चाईबासा व खूंटी होते हुए गांधीजी 16 सितंबर, 1925 को राँची पहुंच गए। राँची जाने के क्रम में गाँधीजी चाईबासा में हो आदिवासियों से तथा खूंटी में मुण्डाओं से बातचीत की। 
  • गाँधीजी ने राँची में 17 सितंबर, 1925 को संत पॉल स्कूल में एक सभा को संबोधित किया। इस सभा में गाँधीजी को देशबंधु स्मारक कोष हेतु 1,000 रुपये की थैली भेंट मिली। इस सभा के बाद गाँधीजी योगदा सत्संग ब्रह्मचर्य विद्यालय भी गए (1 मई, 1934 को दूसरी बार योगदा सत्संग विद्यालय आए थे)।

गाँधीजी से टाना भगतों की मुलाकात व प्रभाव

  • 1925 के राँची दौरे के समय गाँधीजी से मिलने बड़ी संख्या में झारखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों से टाना भगत राँची आए। 
  • गाँधीजी के विचारों से ही प्रभावित होकर टाना भगतों ने अहिंसा का व्रत लेकर आजादी के आंदोलन में भागीदारी की थी। टाना भगतों ने अंग्रेजों को जमीन का लगान देना बंद कर दिया था जिसके बाद इनकी जमीनें नीलाम कर दी गयी। 
  • टाना भगत गाँधी टोपी पहनते थे तथा हाथ में घंटा लेकर आजादी का प्रचार करते थे। 
  • टाना भगतों ने कांग्रेस के कई अधिवेशनों (रामगढ़ सहित) में भाग लिया था। 
  • नमक आंदोलन के दौरान नमक नहीं बना पाने के कारण इन्होनें नमक खाना ही छोड़ दिया था। 
  • 1928 ई. में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में टाना भगत एक सप्ताह की पैदल यात्रा करके कोलकाता पहुँचे थे (कारण- अंग्रेजों ने इनके कोलकाता जाने पर पाबंदी लगा दी थी)। लेकिन यहाँ डेलिगेट व्यवस्था के कारण गाँधीजी से मिलने में असफल हो गए। 
  • इसके बाद इन्होंने एक उपाय निकाला और जोर-जोर से ‘गाँधीजी की जय, भारत माता की जय, वंदे मातरम्’ जैसे नारे लगाने लगे। इन्हें विश्वास था कि गाँधीजी इनकी आवाज सुनकर इनसे जरूर मिलेंगे। 
  • कुछ लोगों द्वारा इस प्रकार नारे लगाने की सूचना गाँधीजी को दी गयी जिसके बाद गाँधीजी ने इनके लिए नि:शुल्क पास भेजकर टाना भगतों को अधिवेशन में शामिल कराया। 
  • राँची के बाद गाँधीजी रामगढ़ होते हुए 18 सितंबर, 1925 को हजारीबाग पहुँचे तथा यहाँ कर्जन ग्राउंड (वर्तमान नाम- वीर कुंवर सिंह स्टेडियम) में एक सभा को संबोधित किया। सभा में गाँधीजी को 1,300 रुपये की एक थैली भेंट की गयी। 
  • 19 सितंबर, 1925 को गाँधीजी ने हजारीबाग के संत कोलंबा महाविद्यालय में छात्रों को संबोधित किया। 
  • हजारीबाग में कार्यक्रम की समाप्ति के बाद गाँधीजी ट्रेन से पटना के लिए रवाना होगा। ट्रेन से पटना जाने के क्रम में ट्रेन जब कोडरमा स्टेशन पर रुकी तो हजारों लोगों की भीड़ गांधीजी के दर्शनार्थ खडी थी। यहाँ होरिल राम नामक एक व्यक्ति ने गाँधीजी को देशबंधु स्मारक कोष हेतु 350 रुपये की एक थैली भेंट की। 

गाँधीजी का आठवीं बार झारखण्ड आगमन

  •  3 अक्टूबर, 1925 को भागलपुर से बांका होते हुए पहली बार देवघर की यात्रा पर आए। यहाँ गाँधीजी का भव्य स्वागत किया गया। गाँधीजी इस यात्रा के दौरान देवघर में सेठ गोवर्धनदास के मकान में रुके थे। इस दौरे में गाँधीजी कुछ समय के लिए नौलखा मंदिर के पास स्थित कोलकाता व्यवसायी हरगोविंद डालमिया के मकान में भी रहे। 
  • कोलकाता उच्च न्यायालय के सॉलिसिटर कृष्ण कुमार दत्ता के आमंत्रण पर गाँधीजी देवघर के रिखिया गाँव में भी गए। (रिखिया गाँव में स्वामी सत्यानंद सरस्वती जी द्वारा निर्मित आश्रम भी है।) 
  • 7 अक्टूबर, 1925 को देवघर से खड़गडीहा जाते समय गाँधीजी गिरिडीह भी पहुंचे थे। यहाँ गाँधीजी ने एक सार्वजनिक सभा तथा महिलाओं की एक सभा को संबोधित किया। 
  • 8 अक्टूबर, 1925 को गाँधीजी गिरिडीह से मधुपुर पहुंचे। यहाँ रेलवे स्टेशन के पास ही गाँधीजी का भव्य स्वागत किया गया। मधुपुर में गाँधीजी चंपा कोठी में ठहरे थे। यहाँ गाँधीजी ने मधुपुर नगरपालिका के नये भवन का उद्घाटन भी किया (पुराने भवन का उद्घाटन 1909 में हुआ था)। इस भवन के दरवाजे पर चांदी का ताला लगा था जिसे गाँधीजी ने चाँदी की चाबी से खोला। 
  • 1925 की अपनी देवघर यात्रा के बारे में लिखते हुए गाँधीजी ने ‘यंग इण्डिया’ में देवघर के पंडों और देवघर की परंपरा की तारीफ की। गाँधीजी के अनुसार “अन्य मंदिरों के विपरीत यहां छुआछूत नहीं माना जाता है तथा मंदिर सबके लिए खुले हैं।” 

गाँधीजी का नवीं बार झारखण्ड आगमन

  •  11 जनवरी, 1927 को गाँधीजी ने डाल्टनगंज (मेदिनीनगर) की यात्रा की। वे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के साथ काशी से रेलगाड़ी द्वारा यहां आए थे। यहाँ शिवाजी मैदान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया। इस सभा के बाद गाँधीजी मारवाड़ी सार्वजनिक पुस्तकालय भी गए। यहां के लोगों ने गाँधीजी को 525 रुपये एकत्र करके दिया। डाल्टनगंज के दौरे के बाद गाँधीजी धनबाद व झरिया के लिए रवाना हो गए। 
  • डाल्टनगंज की सभा के बाद गाँधीजी 12 जनवरी, 1927 को दूसरी बार धनबाद पहुँचे। यहाँ पहुँच कर उन्होनें खादी की दुकानों पर जाकर खादी की बिक्री का जायजा लिया। 12 जनवरी, 1927 को ही शाम में झरिया में आयोजित एक सभा को संबोधित करते हुए गाँधीजी ने खादी की कम बिक्री पर निराशा जाहिर की।
  •  13 जनवरी, 1927 को गाँधीजी कतरास आ गए। यहाँ एक विशाल पंडाल में गाँधीजी की सभा का आयोजन किया गया। इसके अलावा गाँधीजी ने यहाँ महिलाओं की एक सभा को भी संबोधित किया। 

गाँधीजी का दसवीं बार झारखण्ड आगमन

  •  1934 में गाँधीजी ने छोटानागपुर का बड़ा व लंबा दौरा किया। 26 अप्रैल, 1934 को गाँधीजी दूसरी बार देवघर आए। यहाँ जसीडीह स्टेशन पहुँचने पर ही गाँधीजी की कार पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया। इसमें कार के शीशे टूट गए परंतु गाँधीजी को स्वयंसेवकों ने बचा लिया। गाँधीजी पर इस हमले की पूरे देश में कड़ी निंदा की गयी। 
  •  28 अप्रैल, 1934 को गाँधीजी ने गोमिया के करमाटांड़ गाँव के गोबीटांड़ मैदान में एक सभा की। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संथाल आदिवासी गांधीजी को सुनने आए थे। इस सभा के आयोजन में होपन मांझी का प्रमुख योगदान था। सभा के बाद गाँधीजी होपन मांझी के घर भी गए। होपन माझी को 23 अगस्त, 1930 को 2,000 रूपया जुर्माना नहीं चुकाने के बाद हजारीबाग जेल में एक वर्ष कारावास की सजा दी गयी थी। परंतु हजारीबाग के उपायुक्त की अनुशंसा पर उसे सजा से पूर्व ही रिहा कर दिया गया था। 
  •  गोमिया की सभा के बाद गाँधीजी ने 28 अप्रैल, 1934 को ही बेरमो में एक सभा एवं महिलाओं की एक बैठक को भी संबोधित किया। यहाँ से गाँधीजी कतरासगढ़ होते हुए झरिया चले गए। यहाँ गाँधीजी ने एक सभा को संबोधित किया तथा हरिजन कल्याण कोष हेतु लोगों से सहयोग मांगा। रात्रि में गाँधीजी ने झरिया में ही विश्राम किया। 
  • 29 अप्रैल, 1934 को गाँधीजी ने जामाडोबा कोलियरी में टाटा कोलियरी वर्कर्स एवं हरिजन वर्कर्स को संबोधित किया तथा पुरुलिया व झालदा होते हुए राँची आए। इसी यात्रा के दौरान 1 मई, 1934 को गाँधीजी दूसरी बार राँची स्थित योगदा सत्संग ब्रह्मचर्य विद्यालय भी गये। 
  • 1 मई को गाँधीजी ने स्वराजवादी नेताओं के साथ बैठक किया। इस बैठक में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, अरुणा आसफ अली, सरोजिनी नायडू, भूलाभाई देसाई, जमनालाल बजाज आदि ने भाग लिया। 
  •  3 मई, 1934 को गाँधीजी ने राँची में हरिजन छात्र संघ को संबोधित किया।
  • 4 मई, 1934 को गाँधीजी राँची से कार द्वारा चक्रधरपुर होते हुए जमशेदपुर (उद्देश्य – हरिजन आंदोलन) के लिए रवाना हो गये। लेकिन इस यात्रा के दौरान चक्रधरपुर के पास गाँधीजी की कार दुर्घटनाग्रस्त हो गयी जिसमें वे बाल-बाल बच गए। 
  •  इस दुर्घटना के बावजूद गाँधीजी ने 4 मई, 1934 को चक्रधरपुर जाकर रेलवे कर्मचारियों की एक सभा एवं महिलाओं की एक सभा को संबोधित किया। 

गांधी जी का ग्यारहवीं बार झारखण्ड आगमन