Khortha Lekhako Ki Jivani

भुवनेश्वर दत्त शर्मा व्याकुल

दू डाइर परास फूल 

परितोष कुमार प्रजापति 

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  • जनम – 02 फरवरी 1954 
  • जनम थान ग्राम – गांगजोरी, जिला – बोकारो (झारखण्ड) 
  • माँयेक नाम – मांदू देवी 
  • बापेक नाम – गुचन महतो 
  • सिक्छा – बी0ए0, कार्यालयीय हिन्दी में डिप्लोमा
  • पेशाबोकारो इस्पात संयंत्रे ऑपरेटर रूपें 
  • रचना – जिनगीक भेउ (कबिता संग्रह) छपल हे। खोरठाक आरो पत्र-पत्रिकाञ इनखर रचना छपल हे।
  • प्रजापति जी खोरठा साहित्य-संस्कृति परिषदेक सचिव ओर बोकारो खोरठा कमिटीक अध्यक्ष पदें रइह के खोरठा साहितेक बिकास में जोगदान देल हथ । नव दस कलासेक किताब दू डाइर परास फूल आर दू डाइर जिरहुल फूल छपवे में इनखर महत्वपूर्ण जोगदान हे। हर भावेक कबिता इनखर कबिता संग्रहे है।

भुनेश्वर दत्त शर्मा ‘व्याकुल’ की जीवनी

जखन खोरठा भाषा आर साहितेक बात उठे हे तो हठात् भुनेश्वर दत्त शर्मा ‘व्याकुल’ जी क खेयाल आइ जा हे। साहित जगतें खोरठाक नाँव संगाठे में ऊ पेठु नाञ हलथ। जे सँवइ लोक घरेक बाहरें बा सभा-सोसाइटीं खोरठा बोले में लजा हलथ, ऊ आपन माँइकोरवा भासा, खोरठे गीत-कबिता लिख-हलथ आर गइबो कर-हलथ। बेसी भामें तखन, उनखर गीत-कबिता किसानी आर उलगुनानेक लेताइर केरे सुनल जा हलइ। ऊ एगो चनफनिया कलाकार, गवइया आर बजवइया हलथ । व्याकुल जी पुरना परियाक साहितकार लागथ । उनखर सँवइ खोरठाक कोन्हों साहितिक रूप नाञ हेल मेंतुक खोरठा बोली गीत–नादें, झुमइर, डोहा, जान-कहनी आर सुन–कहनी रूपी हल, जेटा परियाक-परिया चलले आव हलइ। एकरा ऊ साहितेक रूपे ढारेक चेस्टा करल हलथ। उनखर रचना सवइ-सँवये बिस्नगढ़ेक ‘सुखद खोरठा साहित कुटीर’ बाट ले बाहराइल हइ। उनखर रचने परेम, बिरह गियान, माँयेक माहातम आर दुलारेक भाव भरल हइ।

एगो ‘छउआ दुलार’ कवितें व्याकुल जी समाजेक बिकास खारित गाँवेक छउआ सभक बड़ाइ की रंग करल हथिन, जे सब हाँथें पिलसिन आर काँखे पोथी लइ इस्कल जा हथ, उनखर परगतिसील बिचार के पटतइर देखा –

हामर बाबू, हामर सोना 

हामर सुगा पढे ले गेल। 

सुन अकली ! सुन गे खगिया 

ऊँच करेजर आइझे भेल ||

व्याकुल जीक कबिता खोरठाहीं नाँइ हिन्दी आर उर्दू हुँ लिख हलथ। आपन गीतेक आर कबिताक दाराँइ समाज के जगवेक काम कर हला। उनखर मनें आपन माटी आर मानुस के परति परेम आर दरद हलइ । से-ले जखन सोंवसे देसे बिरतानी. सासन के खिलाफ उलगुनान सुरू भेलइ, ओहो उलगुलालेक डहरें डहराइ गेला । सेले कई धाव जेलेक खिचरियो खाइ भेलइ। सइ लेताइरें 1930 ईस्वी हजारीबाग जेले हिंदीक नाम जइजका साहितका रामवृक्ष बेनीपुरी जीक संगे देखा भेलइन । बेनीपुरीजीक संगे किछु काल काटला जकर परभाव उपखरे पर परलइ। बेनीपुरीजी जेलें ‘कैदी’ नाँवक एगो हाथ लिखा पतरिका बहरवइला।

एहे पतरिके उनखर पहिल रचना ‘कवि व्याकुल’ के नाँवे परकासित भेलइन । एकर बादें उनखर लिखल कबिता लगस्तर प्रताप, वर्तमान, कर्मवीर, लोकमान्य, विश्वमित्र, हिन्दु, पंच, हिन्दुस्तान, बालक, जनता आर जागृति जइसन दोसर-तेसर हिंदी-उर्दू पतर-पतरिकाञ परकासित होते रहल।

एक ठीन माखन लाल चतुर्वेदी जी लिखल हथ – ” ‘व्याकुल’ उपनाम से उर्दू भाषा में लिखी गयी भुनेश्वर दत्त जी की राष्ट्रीय कविताएँ सुन कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। ये कवि हैं और राष्ट्रीयता इनमें कूट-कूट कर भरी है।”

हजारीबागेक पहिल सांसद और नाँव करा स्वतंत्रता सेनानी बाबु राम नारायण सिंह इनका राष्ट्रीय कवि कइह के डाक-हलथिन।

व्याकुल जीक पहिल किताब ‘कलाम-ए-व्याकुल’ 1939 ईस्वीं बिसुनगढ़, हजारीबाग बाट ले परकासित भेल हलइ। ई कितापेक कबिताक किछु लाइन देखा –

नौ जवाँ ! या तो गुलामी को 

मिटाकर दम ले, 

वर्ना अच्छा है कि बस सर को 

कटा कर दम ले।

ई कबितवें उनखर मनेक आयाँ गुलामिक दरद आर आजादीक तड़प बुझल जाइ पारे।

व्याकुल जी कबिता पांठ तो कर कर हलथ, एगो बेस वक्ता हलथ। से ले राम नारायण बाबु उनखा बड़ी सम्मान दे हलथिन । राम नारायण बाबुक टान देइख ऊ उनखर संगे रइह के कांगरेस पाटिक काम देख हलथ। रामगढ़ेक कांगरेस अधिबेसन के सफल बनवे में उनखर बड़ी जोगदान हलइन ।

व्याकुल जी 17 मार्च 1908 ईस्वीं गिरिडीहेक पासें महथडीह गाँवे जनमल हला। मेंतुक उनखर पइरवार हजारीबागेक बिसुनगढ़े रह हला। एखुन उनखर घर हुआ हइ। जखन व्याकुल जी छ महीनाक हला, तखनी उनखर बाप पंडित बलदेव प्रसाद उपाध्याय सिराय गेला। से ले उनखर देखभाल उनखर आजा पं0 अयोध्या प्रसाद उपाध्याय करलथिन । आपन आजा से ही ऊ पहिल भासा बेयाकरनेक गियान आर सिखा पइला । 

घरें उनखर मन नाइँ लागे; से ले ऊ 11 बछरेक उमइरहीं घर से भाइग के कांशी चइन गेल रहथ आर किछु दिन पर घर घुरियो अइला।

जखन ऊ घर से बाहर हला, देस दुनियाक बड़ी नझिक से देखे आर बुझे पइला | से सँवइ गाँधी जी जनजागरण के काम कर हला, देइख के कइसें गुलामी से छुटकारा हता, ओकर उंतजोगें लागल हला। 1925 ईसवी व्याकुल जी गाँधीजीक संगतें अइला आर आजादीक उलगुनाने लाइग गेला। से सँवइ भारतीय समाजें जाइत-पाँइत, ऊँच-नीच, छुआ-छुतेक बड़ी जोर हलइ । गाँधीजीक सिख पाइके हरिजन उत्थानेक कामें लाइग गेला आर आपने ‘अतर्जातीय’ बिहा करला । तकर खातिर समाजें कते बिरोध सहे परलइन । तावों कविक मनें जाँइत-पाँइत, ऊँच-नीचेक परति बिरोधक भाव बाढले गेइल।

व्याकुल जी 17 सितंबर 1984 ईसवीं सिराइ गेला, मेंतुक उनखर देखावल डहर आइझो जगजगाइ रहल हे।

 

भुनेश्वर दत्त शर्मा “व्याकुल”

  • जन्म – 1895, बिशुनगढ़, हजारीबाग जिला (अन्य – जन्म – 17 मार्च 1908, गिरिडीह,महथडीह  )
  • मृत्यु – 17 सितम्बर , 1984 
  • कृतियाँ 
    • छउआ दुलार (कविता )
    • इनकी रचनाएं ज्यादातर हजारीबाग के विशुनगढ़ स्थित सुखद खोरठा साहित्य कुटीर की ओर से प्रकाशित होती थी
  • इनके पिता का मृत्यु 8 वर्ष की आयु में ही हो गया था इसलिए इनका देखभाल उनके दादाजी पंडित अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने किया
  • 11 वर्ष की आयु में वे काशी  चले गए थे 
  • 1925 में गांधी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े 
  • उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए क्रांतिकारी गीत खोरठा भाषा में लिखे हैं जिसे अंग्रेजों ने जला दिया था

श्रीनिवास पानुरी

प्रदीप कुमार ‘दीपक’ 

  • जनम24 जनवरी 1964 
  • जनम थान ग्राम – भेंडरा, जिला – बोकारो (झारखण्ड) 
  • माँयेक नाम – सुमित्रा देवी 
  • बापेक नाम – फिरंगी विश्वकर्मा 
  • सिक्छा – बी०ए०
  • पेशा – 1988 से डाकघर सहायक रूपें 
  • सम्मान – खोरठा रत्न 
  • गाँवेक इस्कुले सुरूक पढ़ाइ कइर के गाँवेक हाई इस्कूल से मेट्रिक 1981 में आर बी0ए0 प्राइवेट से 1998 में झारखंड कॉलेज, डुमरी से करलहथ।
  • इनखर किताब रूपे कोनो छपल नखे मगुर आकाशवाणी आर दूरदर्शन केन्द्र, राँची से इनखर गीत-कबिता प्रसारित हेवइत रहहे। कइगो पत्र-पत्रिका में इनखर रचना छपल हे। इनखर गीत सब ऑडियो सी0डी0 रूपें बजारें बिकहे।
  • विस्थापनेक दर्द, सोसनेक बिरूध आवाज, सामाजिक-राजनीतिक फिंगाठी इनखर गीत-कबिता से झलके हे। ई सबद आर स्वर दुइयो में धनी लागथ। झारखंड बनल बादें राँची में आयोजित कइगो ‘झारखंड महोत्सव’ में आपन टीमेक संग भाग लइकें खोरठा भासा आर संस्कीरति के नाँव उँचा करला।

 

श्री निवास पानुरी 

झारखंडेक धरती 25 दिसम्बर 1920 ई0 के कधियो नाञ बिसरती काहे कि एहे दिन खोरठाक महाकवि श्रीनिवास पानुरी जीक जनम भेल हलइन । धनबाइदेक करिया कोयलाक बीच पानुरी जी एगो हीरा बइन बहराइला आर चाँतल-चीपल, गँजाइल लोकेक राव बइन, चेतनाक लहर उठाइ, जनभासा खोरठाञ रचना कइर, मानुसेक दिले आलो बारे में सफल भेला।

कहल जा हइन जे पानुरी जीक बाबा (दादा) नवादा जिलाक मँझवे तुंगीक बेलदारी से आइल हला। ओखिन तीन भाइ हला। एक भाइ कतरासें बास करला, बाकी दू भाइ कल्याणपुर, बरवाअड्डाञ बंइस गेला। इनखर बापेक नाम शालीग्राम पानुरी आर माँय दुखनी देवी । इनखर जेठा बिसेसर पानुरीक चाउर-दाइलेक दोकान हलइ। किन्तु इनखर बाप खेती-बारी कर हला। इनखर बड़ भाइकेक नाम राम खेलावन पानुरी आर एगो बहिन सावित्री देवी हली जकर बिहा मनई टाँड़े भेल हलइन ।

1930 ई० लोअर प्राइमरी करल बादें पानुरी जीक सिक्छा जिला स्कुल धनबाइद में परा भेलइन। गरीबक कारन मेटरिक से आगु नाञ पढ़े पारला। किन्तु ताव-लें इनखर भीतरें साहितिक चेठा जाइग गल हलइ। इनखर बिहा मूर्ति देवी संग भेलइन । बापेक मिरतु 4 सितम्बर 1939 सालें भेल । 1944 सालें माँयेक मिरतुक बादें पानुरीजीक धियान आपन रोजी-रोजगार बाटे गेलइ । 1946 इसवीं पानुरी जी पुरना बाजार धनबाइदें एगो पान-गुमटी

खोला। पान कत्था से हाँथ रंगाइ लागलइ आर उनखर कलम से कबिता-कहना कागज रंगाइ लागलइ। लोक पानेक संगे-संग उनखर कबितों के आनन्द उठव-हला।

किन्तु  आपन फक्कड़ सभाव के कारने उनखर आरथिक दसा ठीक नाम रह लागइल। पानुरी जी सेसें लिखल हला जे हाम चाकरी नाइ कइर के आइझ पछताइ रहल हों। हित-हामरा बेस सुझाव नाइ देला आर ससुराइर बाट से कोन्हों मदइत नाइ मिलला

किन्तु आरथिक अभावेंक माँझे इनखर लेखनी आर जगमाइ जागलइ। एगो बड़ पइरबार, बेटा भगवानदास, राज किशोर पानुरी, ध्रुव पानुरी, अर्जुन पानुरी (जे एखन खोरठाक सेवाञ लागल हथ) आर अरूण लाल पानुरी। बेटी – निर्मला देवी, रेखा देवी आर आशा देवी, सोभीन के दायित्व उठइते.परों, साहित सेवाञ तनिको कमी नाइ अइलइ।

1950 साल से खोरठाञ गंभीर भइ रचना सुरू करला | 1954 सालें खोरठाक पहिल कबिता संगरह ‘बाल किरिन’ परकासित भेलइन। 1957 सालें खोरठा भासाञ ‘मातृभाषा’ नाम से एगो पतरिकाक परकासन करला आर एहे बछर आकाशवाणी राँची से खोरठाक पहिल कबिताक परकासन भेलइ।

ताव ले पानुरीज नाम चाइरो बाटे पसइर चुकल हलइ। हिन्दीक नामजइजका साहितकार, बुइधजीवी नेता सोभीन इनखर परतिभाक लोहा मान हला। पानुरीजी खोरठा कबिताक पाइ बड़-बड़ कवि सम्मेलने करला जेकर कारन इनखर परिचइ हरिवंश राय बच्चन, राहुल सांकृत्यायन, श्याम नारायण पाण्डेय, बेधड़क बनारसी, रामदयाल पाण्डेय, शिवपूजन सहाय, जानकी बल्लभ शास्त्री, भवानी प्रसाद मिश्र, रामजीवन शर्मा, राधाकृष्ण, वीर भारत तलवार जइसन साहितकार संग भेलइ।

‘राष्ट्रवाणी’ (दैनिक) में उनखर संपादक श्यामकृष्ण बक्सी ‘बाल किरिन’ पर फरनाइ के समीक्षा छापला। महापंडित राहुल सांकृत्यायन उनखा चिट्ठी लिखला – “मातृभाषाओं का अधिकार कोई छीन नहीं सकता, न ही लोक कविता को आगे बढ़ने से कोई रोक सकता है। हाँ, कविता करने में आप साहित्यिक कवियों की कविताओं का अनुकरण हर्गिज न करें। उसके लिए आदर्श है लोककवि और उनकी अछुती भाषा ।’

पानुरी जी मेघदुते काइब के अनुबाइ खोरठात्र कइर गोटे साहित जगतें हलचल मचाइ देला। साहितकार राधाकृष्ण उनखर बिसइयें लिखला – ”छोटानागपुरी भाषाओं में सर्वप्रथम खोरठा भाषा में श्रीनिवास पानुरी ने मेघदूत का अनुवाद करने का श्रेय पाया है। अनुवाद में पानुरी जी ने मुक्त छंद का प्रयोग किया है और वह भी अपने आप में एक नई चीज है। श्री पानुरी जी की तपस्या अनुकरणीय है। उनकी तपस्या के सम्मुख आदर से सिर झुक जाता है।”  

डा0 वीर भारत तलवार ‘मेघदूत’ के बारे में लिखला, “कहना न होगा कि श्रीनिवास पानुरी ने मेघदूत को उसकी उचित जमीन पर उतार दिया है। लोक भाषा का सहारा पाकर जनपद की कथा जनपद वासियों तक पहुंच गई है। इस अनुवाद से खोरठा भाषा की भावाव्यक्ति की क्षमता सिद्ध होती है।’ पं0 हंस कुमार तिवारी लिखला – “किसी भी कलावस्तु को एक आकार से दूसरे आकार में ढालना, एक भाषा से दूसरी भाषा में उतारना काठन काम है। फिर मेघदूत का बड़ा ही कठिन परन्तु खोरठा भाषा के कवि पानरी जी ने उसके अनुवाद की स्तुत्य चेष्टा की है। भूल के गाढ़े ऐश्वर्य में सादी छटा देखते ही बनती है। बड़े ही सरल, किन्तु उपयुक्त शब्द, निरलंकार श्रृंगार और सीधा ढंग ।’

महान कवि सह लेखक राम दयाल पाण्डे जी पानुरी जी के चिट्ठी में लिखला “खोरठा नामक जनपदीय भाषा में काव्य निर्माण का काम आप सफलता से कर रहे हैं। आज जो प्रयास प्रारंभिक मालूम पड़ रहा है, वह कभी बहुत विकसित होगा और भारतीय भाषाओं के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण स्थान होगा। मैं इसे वैसा ही प्रयास मानता हूँ जैसा बाल्मिकी ने संस्कृत के लिए अथवा सिद्ध कवियों ने हिन्दी के लिए किया।”

पानुरी जी के सोभीन ‘कविजी’ कइह के डाक-हला। झारखंड आन्दोलनेक जन्मदाता विनोद बिहारी महतो, ए0के0 राय आर ‘कविजी’ में बड़ी हेलमेल रह-हलइ। दूइयो नेता जखन ऊ डहर से पार होतला, ‘कविजी’ के पान गुमटी दू चाइर कबिता बिना सुनल जाइ के नामें नाञ लेतला।

‘कविजी’ जनवादी हला । मानुस के दुःख, दरद, सोसन, सामाजिक कुरीति गुलइन पर दरदराइ के कलम चलइला आर हिआँक मानववादी संसकीरति के जगवे आर जोगवे में सउँसे जीवन समरपित कंइर देला।

‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’ के जुगेक गीता कइह सँउसे घोषणा पत्र के खोरठा में ‘काव्यानुवाद’ करला। इनखर कबिता से परभाबित भइ के कवियत्री आर मजदूर नेत्री रमणिक गुप्ता धनबादें आपन डेराञ पइत सनिचर के ‘काव्यगोष्ठी’ कर हली, जहाँ ‘कविजी’ के कबिता सुइन के सोभीन झुइम उठ हला।

पानुरी जी आपन साहित जीवनेक 40 बछरें 40 गो खोरठा किताप आर 40 गो हिन्दी कितापेक रचना करला । गरीबी के कधियो आपन साहित रचेक डहरें रोड़ा बइन खड़ा हवे नाञ देला। हामरा आइझो इयाद हे, ई कबिता जे ऊ प्राइ भेण्डरा गाँवें (जहाँ उनखर रिस्तेदार हथ) आइ सुनव हला। हामें तखन छोट गिदर हलों कि “नाच बांदर नाच रे, मोर चाहे बाँच रे।” तखन हामें ई कबिता टा के गिदराली रूपें दोहरव हलों। किन्तु बड़ भेल बादहीं उनखर ई कबिता टाक भाव बुझे पारलों। 

पानुरीजक मुइख रचना गुला खाँटे-खुंटे ई रकम हे – ‘बाल किरिन’, ‘तितकी’ (काइब संगरह), ‘मधुक देसें’ (प्रणय गीत), ‘रामकथामृत’ (काव्य एक खंड प्रकाशित), ‘मेघदूत’ (अनुवाद) – प्रकाशित । अप्रकाशित – ‘चाबी-काठी’ (नाटक), ‘आँखीक गीत’ (गीत संग्रह – 1977), ‘पारिजात’ (काव्य), ‘रक्ते भीजल पाँखा’ (कहानी संग्रह), ‘अजनास (नाटक), ‘मोतीक चुर’, ‘अगिन परीखा’ (काव्य), ‘समाधान (हिन्दी खोरठा), ‘मोह भंग’, ‘हमर गाँव’, ‘भ्रमर गीत’, ‘उदवासल कर्ण’ (नाटक), ‘जुगेक गीता’ (अनुवाद), ‘अपराजित’ (काव्य संग्रह), ‘जाँ मेरे गीत’, ‘छोटो जी’ (हास्य व्यंग्य), वामपंथी भावना। ।

पानुरी जी राँची विश्वविद्यालय सिलेबस बोर्ड के सदइस हला। संगे-संगे जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभागेक संपादक मंडल उनखा आजीवन सदइस रूपें सामिल करले रहथ ।

7 अक्टूबर 1986 सालें अचक्के हिरदय गति रूकेक कारन उनखर मिरतु भइ गेलइ। किन्तु उनखर रचना आर नाम सदाइ अमर रहथ। जे डहरें पानुरी जी एकाञ रहल-चलल हला, आइझ ऊ डहरें हामिन सैकड़ों खोरठा लेखक, कबि आर साहितकार चइल रहल ही। जखन-जखन खोरठा साहित के चरचा हतइ, पानुरी जीक नाँव मन जरूर पतर आर बेंडाइल-बेंड़ाइल साहितकार सब के ध्रुवतारा बइन आइझो डहर देखाइ रहल हथ आर माननवादी बिचार धाराञ चलेक प्रेरणा दइ रहल हथ।

श्रीनिवास पानूरी 

  • श्रीनिवास पानूरी का जन्म – 25 दिसंबर 1920  ,बरवाडा, कल्याणपुर,धनबाद
  • पिता का नाम – शालिग्राम पानूरी(मृत्यु – 1939 )
  • माता का नाम – दुखनी देवी (मृत्यु – 1944  )
  • पत्नी का नाम – मूर्ति देवी 
  • पुत्र का नाम – अर्जुन पानुरी
  • श्रीनिवास पानूरी का मृत्यु – 7 अक्टूबर 1986 (पानूरी स्मृति दिवस )
    • 1950 -1986 – पानुरी युग 
  • श्रीनिवास पानूरी का उपाधि / उपनाम  
    • बरवाडा के अक्षय बोर   
    • आधुनिक खोरठा शिष्ट साहित्य का जनक
    • खोरठा भाषा के भीष्म पितामह – विश्वनाथ दसोंधी राज 
    • खोरठा के वाल्मीकि – पंडित रामदयाल पांडे ने कहा
    • खोरठा के टैगोर – डा. चतुर्भुज साहू ने कहा
  • श्रीनिवास पानूरी द्वारा लिखित साहित्य : 
    • बाल किरण (काव्य/कविता संग्रह )
      • खोरठा भाषा का पहला कविता संग्रह
    • ऑखीक गीत(कविता संग्रह )
    • दिव्य ज्योति (कविता संग्रह )
    • तीतकी (कविता संकलन)
    • मालाक फूल (कविता संग्रह )
    • मधुक देशे (प्रणय गीत)
    • रामकथामृत (खंडकाव्य),1970 में 
    • कालिदास का मेघदूत का खोरठा अनुवाद(1968 में प्रकाशित ) 
    • चाबी काठी (नाटक)
    • उदभासल कर्ण(नाटक)
    • झींगा फूल 
    • मातृभाषा (मासिक पत्रिका )
    • खोरठा  (पत्रिका )
    • रक्ते रांगल पाँखा 
    • किसान (कविता )
    • सवले बीस (कविता संग्रह )
    • युगेक गीता ,1968  में रचना 
    • कुसमी ,कहानी 
  • श्रीनिवास पानूरी की  अप्रकाशित पुस्तकें :
    • पारिजात (काव्य)
    • रक्ते भींजल पाँखा
    • अपारिजात (काव्य)
    • समाधान (खंड काव्य)
    • मोहमंग ( काव्य)
    • अग्नि परीक्षा (खंड काव्य)
    • हमर गांव
    • भ्रमरगीत
    • युगेक गीता (कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो के खोरठा काव्यानुवाद )
    • छोटो जी (हास्य व्यंग)
    • मेरे गीत
  • 1957 में आकाशवाणी रांची की स्थापना की गई

ए.के. झा.

डॉ ए.के झा

  • पूरा नाम – डॉ अजीत कुमार झा
  • उपनाम-‘झारपात’
  • जन्म- 2/2/1942 ,(अन्य – 20 जून ,1939 ), चंडीपुर गांव, पेटरवार जिला, बोकारो
  • पिता का नाम- लक्ष्मी नारायण झा(अन्य श्रोतो में – लक्ष्मीनाथ झा )
  • माता का नाम- कुसुम बाला
  • कृति
    • खोरठा-काठे पइदेक खंडी(पइद संकलन)
    • खोरठा-काठे गइदेक खंडी (गइद संकलन)
    • खोरठा सहित सदानिक व्याकरण
    • समाजेक सरजुइटेक निसन(प्रबंध काव्य)-7 खंड
    • कविता पुराण (छउवा काइब),
    • सदानिक बेयाकरन
    • मेकामेकी ना मेटमाट (नाटक)
    • सइर सरगठ(उपन्यास)
    • पुटी आर पालू (शब्द चित्र )
    • बड़का बुजरुक बिरसा (बिरसा मुंडा की जीवनी )
    • खोरठा पत्रिका तितकी का संपादन
    • चाइल चीन्हा (कविता )
    • खोरठा भासा रस छंद और अलंकार
    • खोरठा लोक गीत संग्रह
  • अन्य
    • मौसम विज्ञान के जानकार मौसम के सर्वोत्तम भविष्यवाणी मौसम विज्ञान विधवाला देश का अकेला सम्मान
      • मौसम विज्ञान के सिद्धांत : धारा गगन सिद्धांत
    • शताब्दी रत्ना सम्मान
    • राष्ट्रीय भाषा रत्ना सम्मान
    • ABI(USA) का मैन ऑफ द ईयर 1999
    • रिसर्च बोर्ड एडवाइजर (2000)
    • साहित्य में मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त
    • कृषि मंत्रालय से मौसम विद सम्मान

 

 

विश्वनाथ दसौंधी ‘राज’

दु   डायर पलाश फूल

श्याम सुन्दर केवट ‘रवि’ 

  • जनम – 08 दिसम्बर 1969 
  • जनम थान – ग्राम – बालीडीह, जिला – बोकारो (झारखण्ड) 
  • माँयेक नाम – जमुना देवी 
  • बापेक नाम – लाडुगोपाल केवट
  • इनखर सुरूक पढ़ाइ गाँवेक इस्कुल से सुरू भेल आर एस0एस0 हाई स्कूल टाँड–बालीडीह से मैट्रिक परीक्षा, 1985 में आई०कॉम० रणविजय मेमो0 कॉलेज, चास से | 1987 में आर बी0कॉम 1989 में बोकारो इस्पात कॉलेज सेक्टर IV से आर एकाउंट में आनर्स एस.एस. मेमो. कॉलेज धनबाद से करल हथ। एखन बोकारो इस्पात कारखानाम काम कइर रहल हथ। 
  • रचना – इनखर कइगो किताब छपल हे आर कइगो छपावेक उता-सुताञ हथ। छपल किताबे हे – ‘भुइँ पाठ गियान’ आर ‘करमइति’ (करम गीत संग्रह)। कइगो पत्र-पत्रिका गीत, कबिता, लेख, जीवनी आर कहनी छपइत रहहे।
  • ई लुआठी पत्रिकाक बिसेस प्रतिनिधि लागथ। बोकारो खोरठा कमिटी आर बालीडीह खोरठा कमिटी से जुड़ल रइह के खोरठाक सेवा कइर रहल हथ। इनखर भासा-सइली बड़ी सरस, सुबोध, सरल आर मनमोहक हे। छउआ कबिता ढेइर प्रभावकारी हे।
  • ‘विश्वनाथ दसौंधी राज’ नवा कलासे लेल गेल लेख में उनखर जीवन के पइत पहलु के छुवेक के प्रयास करल हथ।

विश्वनाथ दसौंधी राज का  जीवनी

खोरठा भासाक इतिहास ढेइरे पुरान। पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोक बोलले आइ रहल हथ । एकर सिस्ट साहित आजादीक पहिल से लिखाइ सुरू भेल । आइझ खोरठा पढ़ाई राँची पश्वविद्यालय में भइ रहल हे। आझुक भासाक साहित सब बिधाञ मोजुद है। सरकारी

र एकर पढाइ के सहमति (अनुमति) सरकारे देल हे। अब छोट गिदर छोट में खारठा पढ़े-लिखे पड़ता। खोरठा साहितेक थापित करे में जे सभी भगीरथ परआस करला, कर मइधे एगो झकझकिया नाम ‘राज’ जीक आवे हे। इनखर पूरा नाम श्री विश्वनाथ दसौंधी ‘राज’ लागय।

इनखर जनम 15 अप्रील 1943 सालें कतरासगढ़ेक धाइरे भटमुरना गाँवें भेल हल।. कि एखन धनबाइदं जिले पड़े हे। इनखर बाप सब दू भाइ हला। छोट भाइ मुखराम साधीक तीन गो बेटाक मइधे छोट बेटा राज जी लागथ। तकर पेछु राज जीक एगो बहिन

जखन राज जी दसवाँ कलासे पढ़ हला, तखनी बकसपुरा में जमुना प्रसाद जीक बेटी कंचन से इनखकर बिहा भइ गेल । पन्दह बछरेक भेला, तखन इनखर बाप गुजइर गेला | माँय बाँचल हली। माँयेक दुलारेक संगे बोड़ आर मांझिल दादा-भउजीक सहजोग पाइ पढ़ला-लिखला। प्राथमिक सिक्छा ‘लोवर प्रारंभिक विद्यालय’ भुटमुरना में पइला। मिडिल से आइ स्कूल तइक के पढ़ाइ ‘गंगा नारायण मेमोरियल हाइ स्कूल, कतरासगढ़’ से करला । इंटर आर बी0ए0 राजा शिव प्रसाद कोलेज, झरिया में पूरा करला। 1969 साले एम0ए0 राँची विश्वविद्यालय से करला परे शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, देवघर से डिप-इन-एड के डिग्री पइला।

राज जी बहुमुखी परतिभाक धनी मानुस रहथ। इनखन जइसन कहनी, उपनियास दमदार हवे, तइसने कबिता, गीत आर नाटक हवे। राज जी खुद नाटक लिखला तकर सेंगे निर्देशन आर भूमिका खुद करला। 70 रेक दसकें खोरठा छेतरें मनसा मंगल (बंगले) आर नाटक – हिन्दी-खोरठें बड़ी जोर रह हलइ। बेसी कइर धारमिक नाटक राजा हरिश्चन्द्र हिन्दी में करतला मकिन ओकर मांझे हँसवे ले आर खोरठा भासी लोकेक धेयान टाने ले खोरठाञ नोक-झोंकेक एकांकी करतला। ई सब आयोजन सरस्वती पूजा, काली पूजा चाहे मनसा पूजाक घरी हव हल । जइसन कि आझुक समइये गाँवे झुमइर करमा परबें हवे हे।

एक गाँवे जोदि केउ भक्ति नाटक करला, तकर आस-पासेक गाँवें सामाजिक चाहे क्रांतिकारी नाटक, प्रतिजोगिताक भावना से कर हला। एहे लेताइरे गोट 50 गो नाटक राज जी हिन्दी-खोरठा मिलाइ के लिखला आर मंचन करला । खोरठा भासी लोकेक संगे एगो अभाव टा एखन तक हइये हइ, जेइटा तखनियो हल, ‘नारी पात्र’ के। मेंतुक दसौंधी जी ई अभाव टाक पूरा करतला बंगाल के आसनसोल से आइन के। जे नारी सब नाटकेक संगे नाच-गान करतली। इनखर चर्चित नाटक हल – मजहब और इंसान, डेढ़, रोटी, रक्षा बंधन, अजगर, महुआ हेनतेन ।

राज जीक साहित बाटे लगाव गिदराली सँवइ से हल, जखन आठ कलासे पढ़ हला, सइ सँवइये पटना से बाल प्रतियोगिता हव हल, जकर में गिदर सब के कविता, गीत आर कहनी लिखे खातिर उसकवेक काम कर हल। एहें लेताइरे सइ सँवइये इनखर कबिता आर कहनी चुनाइल गेल, से बाल-पत्रिकाञ छपल ।

गिदराली से जुवान भेला, तइसने इनखर रूचि साहित बाट बाइढ़ गेल । जकर पेछु इनखर प्रेरणा स्रोत रहला श्री दिनेश प्रसाद, जे कि कतरास सेनेटरीक इंस्पेक्टर हला, श्री त्रिपुरारी सिन्हा जे कि रेलवे विभाग कतरासें कर्मचारी हला। प्रो0 रविन्द्र प्रसाद झा, जो कि कतरास कॉलेजे पोलिटिकल साइंस के प्रोफेसर आर हिन्दी साहितकार मनमोहन पाठक जी जे इनखर सहपाठी हला। पढ़े सँवइ से ही इनखर दू गो रचना आगरा के प्रगति प्रकाशन से प्रकाशित भेल । एगो उपनियास ‘ढलती साँझ का सूरज’ (हिन्दी में) आर दोसर कविता संग्रह ‘वेदना के पंख’ (हिन्दी में) तकर संगे आरो पत्र-पत्रिकाञ इनखर रचना छिट-पुट छपे लागल। एहे लेताइरे ‘आदिवासी’ पत्रिकाञ इनखर रचना प्रकाशित हवे लागल, जकर संपादक श्री राधाकृष्ण जी हला।

जखन ‘बिहार भूमि; कतरास से प्रकाशित हव हल, तखन इनखर हिन्दा र दल मेंतक खोरठाक टान टा हलइ, तकर चलते खोरठा कबिता, गीत छिटपुट लागल। संगे संग श्री निवास पानुरी, श्री विश्वनाथ नागर, श्री नरेश नीलकमल, श्रा फूलचन्द मंडल, श्री नारायण महतो जी सबके खोरठा साहिताकारेक रूपे रचना छपे लागल। एकर प्रसार ढेर हवे खातिर एखनी खोरठा साहित्य सम्मेलन के गठन करला । राज जी ‘बिहार-भूमिक’ सम्पादक – श्री दिनेश प्रसाद जी से खोरठा स्तंभ दियेक बात करला। जेकि, सइ सँवइये पंचगढ़ी रानी बजारे प्रेस टा हल आर पंचगढ़ी से भटमुरना आवा-जावा टा संभव कइर के खोरठा संपादनेक काम राज जी खुद करला आर खोरठा स्तंभ हपतहिया बहराइ लागल। बिहार भूमि प्रेस के मालिक हला श्री सत्यदेव सिंह इनखर संगे जखन उठन-बइठन हवे लागल, राज जीक तखन उनखकर से कइह के तितकी नाम से दुपनवा खोरठा पत्रिका बहरवे लगाल, जकर संपादन ऊ खुद करला।

जखन खोरठाक लोकेक माँझे प्रचार हवे लागल, तखन एक विस्तार खातिर श्री काशीनाथ सिंह, बेहराकुदर, श्री विनोद तिवारी, तोपचांचीक आस-पासेक, श्री परीक्षित सिंह चौधरी, कतरास कॉलेज सबेक संग मिइल के ‘खोरठा साहित्य परिषद’ के गठन करला, जकर में समइ-समइ पर खोरठा गोस्ठी हव हल।

आकाशवाणी राँची स्थापित भेल बाद खोरठा कबिता आर वार्ता खातिर राज जीक हकवल जाइ लागल आर उनखर आवाज गोटे झारखंडे गूंजे लागल।

पढ़ल-लिखल परें लोक कमाँयेक काम खोज हथ, सेहे लेताइरे राज जी काम खोजे बोकारो स्टील सिटी, माराफारी गेला। तखन स्टील प्लांट स्थापित करने खातिर लेबलिंग के काम चल हला। राज जी मनसा जीक हियाँ सुपरवाइजर के काम करला. मेंतुक हियाँक लोकेक उपर जे सोसन हवे लागल, सइटा देइख के इनखाँ ई नउकरी रास नाइ अइलइ आर छोइड़ के भुटमुरना घुइर अइला । ऊ समये पढ़ल-लिखल लोकेक अभाव रह हलइ जखन कतरासगढ़ेक राजा साहेक के मालूम भेल, तखन इनखाँ हँकाइ के आपने स्कूल राजा पुरनेन्दु नारायण सिंह विद्यालये सिक्छक राखला। संजोगेक बात हे जे कागज-कलमेंक लड़नीहार के सिक्छेक नउकरी पावा टा। एकर से इनखर लेखनी आरो बाढ़ल तकर संगे खोरठा पत्रिका सबके संपादन करेक मउका पइला। ई बात टा 1966  के लागइ। 1980 इसवी इनखर स्कूल श्री गंगा नारायण मेमोरियल उच्च विद्यालय राजकीय भेल । तखन ऊ स्कूले जतना सिक्छक हला, सभिन सरकारी सिक्छक भइ गेला।

1996 इसवीं बिजुलिया उच्च विद्यालये ट्रांसफर भइ गेल आर हियाँ से द हतार तीन में रिटायर भेला। इनखर रचना राँची विश्वविद्यालय के एम0ए0 आर बी0ए0 के कोर्से राखल गेल हइ।

जइसन कि सुरूआवे हाम कइह चुकल हों जे राज जी बहुमुखी प्रतिभाक धनी मानुस लागथ। सेटा फुरछवे खातिर इनखर साहित के अलावा एगो भिनु आयाम टा बतवब । जइसन साहितें इनखाँ बेस से जानला तइसने तंत्र-मंत्र विद्या में निपुन । तंत्र के बेस साधक रहथ । तंत्रे राज जी शोध करल हथ आर एहे लेताइरे तांत्रिक सबके राष्ट्रीय सम्मेलन कतरासें कइर चुकल हथ। इनखर संयोजनें गोटे देसेक तांत्रिक आइल हला। मेंतुक इनखर में एगो खुबी देखे पइभा जे ढोंग-ढोंगी आर आडम्बर करवइयाक सख्त

बिरोध करथ। इनखर तंत्र पर एगो रचना प्रकाशित हइ ‘शक्तिरूपेण संस्थिता’ (हिन्दी में)। तत्र जगतें इनखाँ स्वामी विश्वनाथानन्द आर गुरूजी के नामों से जान हथ।

इनखर एहे रूपेक चलते कुछ तथाकथित मानववादी खोरठा विद्वान इनखाँ पागल करार दइ खोरठा साहित से छिनगाइ देल हला। एतने नाञ, बाँचले में इनखाँ मोराइ देला । मेंतुक जखन हाम आर ‘आकाशझूटी’ इनखर से मिलेले इनखर घर गेलों तो राज जी ऊ सब खोरठा विद्वान के कुट चाइल बतवला जो यूनिवर्सिटी में आपन बर्चस्व राखे खातिर पानुरी जी, नरेश नीलकमल, नागर जी के संगे-संग राज जी को दरकिनार करेक चेस्टा करला। राज जी एगो बेस बात एहे दरमियान कहला जे “सुना केवट बाबू, केव कतनो दर किनार करेक चेस्टा करे, जोदि तोहर लेखनी में दम हतो तो एक दिन खुद ऊ सब के माने हतइ आर खुद आपने कुटचाइल लोक एक धाइर भइ जिता।”

राज जीक कुछ रचना हाम आर आकाशझूटी जी सम्पादन कइर के खोरठा भासीक बीच आनल हो, जेइटा बड़ी बात लागे काहे कि, हमनी उनखाँ ओहे विधा में लिखेक नेहोर करलो, जे विधाञ खोरठा रचनाक अभाव हल।

अइसने इनखर भिनु-भिनु विधा में भिनू-भिनू रचना हे। भगजोगनी (उपनियास), अजगर (नाटक), पुटुस आर परास (कविता संग्रह), आर घुइर मुँडरी बेल तर (लघुकथा संग्रह) खोरठा में प्रकाशित हे। समइ-समइ पर इनखर लेख भिनु-भिनु पतरिका आर दइनिक पत्रे छपते रहल हे। इनखर रचना हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण आर प्रभात खबर पत्रे छपे हे। तकर संगे नवों झारखंडी भासाक प्रतिनिधित्व करवइया पतरिका अखड़ा में, इंजोर (देवघर-मधुपुर से प्रकाशित) में, सहिया (खोरठा दू महीनवा) में, तितकी (खोरठा-हिन्दी) आर लुआठी (खोरठा) छप रहल हे।

आइझ खोरठा गीतेक ऑडिया वीडियो कैसेट के दउर चइल रहल हे। हियाँ तइक कि बम्बइया निर्माता निर्देशक सब खोरठाञ फीचर फिल्म बनाइ रहल हथ। इनखर चर्चित रचना ‘महुआ’ उपरे टेली फिल्म बनल हे। 

खोरठा साहित सेवा खातिर इनखाँ बोकारो खोरठा कमिटी बाट ले श्रीनिवास पानुरी सम्मान देल गेलइ । भारतीय भाषा साहित्य न्यास बाट ले झारखंडे नवो भासाक दमगर साहितकार सबके जखन सम्मानित करेक बात भेलइ, तखन सबसे उपर राज जीक नाम अइलइ। 29 जनवरी 2006 ईसवीं के भारतीय भाषा साहित्यन्यास (राँची) बाट ले राजभवने आयोजित सम्मान समारोहे खोरठा भासा साहितेक सेवा खातिर श्री राज जी के झारखंडेक राज्यपाल सैय्यद सिबते रजी जी आपन हाथे सम्मानित करला । जे समारोहे झारखंडेक माइनगर साहितकार, शिक्षाविद आर प्रशासनिक अधिकारी हला।

राज जीक भरल-पूरल पइरबार हे। इनखर चाइर गो बेटी आर एगो बेटा हे। राज जी समाज सेवा आर साहित सेवाञ समर्पित हथ। आसा करल जाहे जे उनखर कुछ अप्रकाशित रचना सब छपत तो खोरठा साहितें उनखर कद आर ऊँचा हइ जइतइ। 

राज जी 16 अक्टूबर 2009 इसवीं बोकारो अस्पताले सिराइ गेला।

विश्वनाथ दसोंधी ‘राज’

  • जन्म- 15 अप्रैल 1943, (अन्य – 14 अप्रैल 1943 ),भटमुरना(कतरास), धनबाद
  • मृत्यु- 16 अक्टूबर 2009
  • पिता का नाम- मुखराम दसोंधी
  • माता का नाम- फूटा देवी
  • कृति
    • आगरा प्रगति प्रकाशन से (हिंदी में )
      • ढलती शाम का सूरज (उपन्यास)
      • वेदना के पंख (कविता संग्रह)
    • शक्ति रूपेण सन्सिथता (हिंदी में आध्यात्मिक निबंध पुस्तक )
    • पहला खोरठा कहानी ‘महुआ’
    • कतरासगढ़ से प्रकाशित हिंदी पत्रिका ‘बिहार भूमि’ का संपादक
    • 1977 में तितकी नामक खोरठा पत्रिका का (प्रथम संपादक )संपादन
    • ‘भागजोगनी’ उपन्यास
    • ‘अजगर नाटक
    • माटिक पुथइल(कहानी संग्रह)
    • घूइर मुंडली (लघु कथा संग्रह)
    • पुटूश आर परास (इनका पहला खोरठा कविता संग्रह) – 10 कविता
      • नूतन बसंत
      • हमर अन्तर जागल
      • देखाइ दे दुनिया देखाइ दे जगत
      • बाप रे बाप गादाक गादा सांप
      • तनी बुझ रे मानुस
      • हायरे हमर बोकारो हाय रे हमर झरिया
      • गुलाब आर परास
      • भिखमंगनी
      • उरमिलाक पिरह
      • मुक्त चौपाई
  • सम्मान
    • श्रीनिवास पानुरी स्मृति सम्मान 1992

विश्वनाथ नागर

बिस्वनाथ प्रसाद ‘नागर’

  • जन्म – 7 जनवरी 1939 ,धनबाद
  • प्रमुख कृतियां
    • सुलकसाय (खंड काव्य )
      • सुलकसाय का शाब्दिक अर्थ है अग्निपुत्र/गुदड़ी के लाल या वह ज्योतिपुंज जो किसी परिवार समाज राष्ट्रीय राष्ट्रीयता को प्रकाशित करें
      • यह रचना महाभारत के पात्र कर्ण पर आधारित है
      • यह काव्य 11 खंड अथवा परब में विभाजित है
      • 1.सन्ति परब ,2.आसीस ,3.महेन्द्रगिरि ,4.सिकार ,5.रंगभूमि ,6.सापित करन ,7.दान ,8.वरदान ,9.पांच फूल ,10.सांधार ,11अंत
      • कुंती ने कर्ण को अश्वरथी नदी में मंजूषा में बंद करके वह आया था
    • रांगालाठी (खोरठा कविता संग्रह )- 50 कविता
    • खइयाम तोर मधुर गीत – 2004 में रचित

शिवनाथ प्रमाणिक

शिवनाथ प्रमाणिक

  • जन्म – 13 जनवरी 1950, (अन्य – 13 जनवरी 1949 ), बइदमारा गांव(बाघमारा ), बोकारो जिला
  • पिता का नाम- मुरलीधर प्रमाणिक
  • माता का नाम- तिनकी
  • कृति
    • ‘दामुदेरक कोराञ्’ पहला खंड काव्या- 6 भाग
    • तातल आर हेमाल (कविता संग्रह)
    • रुसल पुटुस का संपादन (खोरठा कविता संग्रह)
    • मइछगंधा (महाकाव्य ) – 11 खंड
      • महाभारत के पत्र मत्स्यगंधा पर आधारित
    • बेलंदरी (गीत संगरह)
    • खोरठा लोक साहित्य
    • पयान गीत (कविता )
    • खोरठा एगो स्वतंत्र – समृद्ध भासा (लेख )
  • सम्मान
    • झारखण्ड सरकार से सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार पुरस्कार 2018
    • चतरा जिला की ओर से परिवर्तन विशेष पुरस्कार
    • जमशेदपुर की तरफ से काव्यभूषण उपाधि

श्याम सुंदर महतो ‘श्याम’

श्याम सुंदर महतो श्याम

  • जन्म– 5 सितम्बर 1936 खेसमी ,गोमो ,धनबाद
  • पिता– केदार नाथ महतो
  • माता– गंगामणि देवी
  • शिक्षा
    • मैट्रिक पास – 1956 , आजाद हाई स्कूल गोमो
    • BA पास 1960 में – संत कोलंबस कॉलेज, हजारीबाग
  • नौकरीबोकारो स्टील कारखाना अकाउंट सेक्शन में जहां से 1997 में सेवानिवृत्त
  • रचना
    • मुक्ति डहर (खंडकाव्य) – – 8 खंड
      • शहिद शक्ति नाथ महतो के जीवनी पर आधारित
    • चेड़राक मुंडे बेल खोरठा संग्रह
    • खोरठा लोकगीत (गीत संगरह)