जितिया(Jitiya) पर्व क्यों मनाया जाता है ? Jivitputrika Vrat katha: जीवित्पुत्रिका व्रत,जिउतिया व्रत
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 Jivitputrika Vrat katha /Jivitputrika Vrat ki Kahani /Jitiya

BY: MANANJAY MAHATO

जिउतिया व्रत की पौराणिक कथाः

जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जिउतिया व्रत भी कहा जाता है। 

जीवित्पुत्रिका व्रत महिलाओ के द्वारा संतान की दीर्घायु की कामना और उसकी रक्षा व सफलता के लिए के लिए किया जाता है जिसमे महिलाए निर्जला उपवास रखती हैं ,जीमूतवाहन देवता की पूजन करती हैं और जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनती हैं। तीन दिन तक चलने वाले इस उपवास में महिलाएं जल नहीं पीती हैं. 

जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनने के बाद गले में जिउतिया बांधने के बाद ही अगले दिन दूध से व्रत का पारण (भोजन करके व्रत का समापन करना) किया जाता है। 

जिउतिया पर्व कब मनाया जाता है ?

हिन्दू पंचांग के अनुसार  जितिया व्रत अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से लेकर नवमी तिथि तक मनाया जाता है। 


जिउतिया क्यों मनाया जाता है ?

Jivitputrika Vrat katha: जिउतिया व्रत की पौराणिक कथाः

प्रथम कथा :  जीमूतवाहन और गरुड़ की कथा 

जीवित्पुत्रिका  व्रत की कथा जीमूतवाहन देवता से जुड़ी हुयी है। 

एक बार नैमिषारण्य के निवासी ऋषियों ने संसार के कल्याण हेतु सूतजी  से पूछा हे सूतजी , कराल कली काल में लोगों के बालक किस तरह दीर्घायु होंगे। जवाब में सूतजी ने कहा, जब द्वापर युग का अंत और कली युग का आरंभ था ,उसी समय बहुत सी  शोकाकुल स्त्रियों ने आपस में सलाह की की , कि क्या इस कलयुग में माता के जीवित रहते पुत्र मर जाएंगे, जब वह आपस में कुछ निर्णय नहीं कर सके, तब वे ऋषि गौतम जी के पास पूछने के लिए गयी। 

जब सभी महिलाएं ऋषि गौतम जी के पास पहुंचती है, तो उस समय गौतम जी आनंद के साथ बैठे थे।  उनके सामने जाकर उन्होंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया फिर स्त्रियों ने पूछा, है प्रभु, इस कलयुग में लोगों के पुत्र किस तरह जीवित रहेंगे। इसके लिए कोई व्रत या तप  हो तो कृपा करके बताइए। इस तरह उनकी बात सुनकर ऋषि गौतम जी बोले आपसे मैं वही बात कहूंगा जो पहले से सुन रखा हूं।  गौतम जी ने कहा जब महाभारत युद्ध का अंत हो गया और द्रोणपुत्र अश्वत्थामा के द्वारा अपने बेटों को मरा देखकर सब पांडव बड़े दुखी हुए ,तो उस पुत्र के शोक से व्याकुल होकर द्रोपदी अपनी सखियों के साथ ब्राह्मण श्रेष्ठ धौम्य के पास गई और उसने  धौम्य से कहा – है भूपेंद्र ,कौन सा उपाय करने से बच्चे दीर्घायु हो सकते हैं, वह आप कृपा करके ठीक ठीक बताइए। 

धौम्य बोले सतयुग में सत्य वचन बोलने वाला, सत्याचरण करने वाला समदर्शी जीमूतवाहन नामक एक राजा था एक बार वह अपनी पत्नी के साथ अपना ससुराल गया और वहीं रहने लगा। एक  दिन आधी रात के समय पुत्र के शौक से कोई स्त्री जोर जोर से रो रही थी, हाय मुझ बूढ़ी माता के सामने मेरा बेटा मरा जा रहा है, उसका रुदन सुनकर जीमूत वाहन का तो मानव हृदय विदीर्ण हो, गया वह तत्काल उस स्त्री के पास गया और पूछा तुम्हारा बेटा कैसे मरा है, बूढ़ी मां ने कहा पक्षीराज गरुड़ पक्षी प्रतिदिन आकर गांव के लड़कों को खा जाता है. इस पर दयालु राजा ने कहा माता अब तुम शोक मत करो ,आनंद से बैठो, मैं तुम्हारे बच्चे को बचाने का पूरा प्रयत्न करता हूं।  ऐसा कह कर राजा उस स्थान पर गया, जहां गरुड़ आकर प्रतिदिन मांस खाया करता था. उसी समय गरुड़ जीमूतवाहन उस पर टूट पड़ा और उसका मांस खाने लगा।  जब गरुड़ ने राजा का बाया अंग खा लिया, तो झटपट राजा ने अपना दाहिना अंग फिर गरुड़ के सामने रख दिया।  यह देखकर गरुड़ जी ने कहा, तुम कोई देवता हो, कौन हो तुम ? मनुष्य तो नहीं जान पड़ते ,अच्छा अपना जन्म और कुल बताओ।  पीड़ा से व्याकुल राजा जीमूत वाहन ने कहा है – पक्षीराज इस तरह के प्रश्न करना व्यर्थ है, तुम अपनी इच्छा भर मेरा मांस खा लो ,यह सुनकर गरूर रुक गए हैं और बड़े आदर से राजा के जन्म और कुल की बात पूछने लगे। 

राजा ने कहा मेरी माता का नाम है – शैब्या और मेरे पिता का नाम शालीवाहन है, सूर्यवंश में मेरा जन्म हुआ है और जीमूतवाहन मेरा नाम है।  राजा की दयालुता देखकर गरुड़ ने कहा है महाभाग्य तुम्हारे मन में जो भी अभिलाषा हो वह मांगो।  राजा ने कहा-  है पक्षीराज यदि आप मुझे वर दे रहे हैं तो ,दीजिए कि आपने अब तक जिन प्राणियों को खाया है वे सब जीवित हो जाएं, हे स्वामी अब से आप यहां के बालको को को ना खाएं और कोई ऐसा उपाय करें कि जहां जो उत्पन्न हो वह लोग बहुत दिन दिनों तक जीवित रहे।  धौम्य ने कहा कि पक्षीराज गरुड़ राजा को वरदान देकर स्वयं अमृत के लिए नागलोक  चले गए ,वहां से अमृत लाकर उन्होंने उन मरे मनुष्यों की हड्डियों पर बरसाया, ऐसा करने से सब लोग जीवित हो गए ,जिनको कि पहले गरूर ने खाया था।  राजा के त्याग और गरुड़ की कृपा से वहां के लोगों का कष्ट दूर हो गया उस समय राजा के शरीर की शोभा दुगुनी हो गई थी।  

राजा की दयालुता देखकर फिर से  गरुड़ ने कहा मैं संसार के कल्याण हेतु तुम्हें एक और वरदान दूंगा।  आज अश्विन कृष्ण सप्तमी से रहित शुभ अष्टमी तिथि है।  आज ही तुमने यहां की प्रजा को जीवन दान दिया है, है वत्स अब से यह दिन ब्रह्मभाव हो गया है, जो मूर्तिभेद से विविध नामों से विख्यात है, वही त्रैलोक्य से पूजित दुर्ग अमृत प्राप्त करने की अर्थ में जीवित्पुत्रिका कहलाई है. सो इस स्थिति को जो स्त्रियां उस जीवित्पुत्रिका की और कुश की आकृति बनाकर तुम्हारी पूजा करेंगी , तो दिनों दिन उनका सौभाग्य बढ़ेगा और वंश की भी बढ़ोतरी होती रहेगी। हे महाभाग्य, इस विषय में विचार करने की भी आवश्यकता नहीं है।  हे राजन सप्तमी से रहित और उदया तिथि की अष्टमी को व्रत करें यानी सप्तमी विद्दय अष्टमी जिस दिन हो उस दिन व्रत ना कर शुद्ध अष्टमी को व्रत करें और नवमी में पारण करें। यदि इस पर ध्यान न दिया गया तो फल नष्ट हो जाएगा और सौभाग्य तो अवश्य नष्ट हो ही जाएगा।  जीमूत वाहन को इस तरह वरदान देकर गरुड़ वैकुंठधाम को चले गए और राजा भी अपनी पत्नी के साथ अपने नगर को वापस चले आए।  सौम्य द्रोपदी से कहते हैं –  हे देवी मैंने यह अतिशय दुर्लभ व्रत तुमको बताया है, इस व्रत को करने से बच्चे दीर्घायु होते हैं, हे देवी तुम भी पूर्वोतक विधि से यह व्रत और  माता दुर्गाजी का पूजन करो तो तुम्हें अभी लक्षित फल प्राप्त होगा। 

Jivitputrika Vrat katha: जिउतिया व्रत की पौराणिक कथाः

दूसरी  कथा : चील और सियारिन की व्रत कथा

मुनिराज्  धौम्य की बात सुनकर द्रोपदी के ह्रदय में एक प्रकार का कोतुहल उत्पन्न हुआ और पुरवासिनी स्त्रियों को बुलाकर उनके साथ यह उत्तम व्रत किया, इस व्रत और इसके प्रभाव को किसी एक चील पक्षी ने सुन लिया और अपनी सखी सियारिन को बतलाया।  इसके बाद पीपल वृक्ष की शाखा पर बैठकर उस चील ने और उसी वृक्ष के खोते में बैठकर सियारिन ने भी व्रत किया। लेकिन सियारीन  ने आधी कथा सुनी थी कि उसे भूख लग गई और वह उसी समय श्मशान में पहुंची वहां उसने इच्छा भर मांस का भोजन किया और जबकि  चील बिना कुछ खाए पिए रह गई और सुबह गाय का दूध पीकर नवमी को चील ने अपना पारण (भोजन करके व्रत का समापन करना) किया। 

कुछ दिनों के बाद वे दोनों मर गई और अयोध्या में किसी धनी व्यापारी के घर में उनका पुनर्जन्म हुआ। संयोग से उन दोनों का जन्म एक ही परिवार में हुआ, जिसमें सियारिन ज्येष्ठ हुयी  और चील छोटी। एक कन्या का नाम अहिरावती (बड़ी कन्या ) और दूसरी कन्या का  नाम कपूरावती(छोटी  कन्या )  था .बड़ी लड़की  का विवाह राजा काशीराज से और छोटी का विवाह मंत्री के साथ हुआ। पूर्व जन्म के कर्मफल से सियारिन इस जन्म में रानी तो बन गयी लेकिन वह जब भी किसी संतान को जन्म देती तो उसका मृत्यु हो जाता था और पूर्व जन्म की बातों को स्मरण करने वाली चील इस जन्म में मंत्री की पत्नी बनी थी जिसने आठ   तेजस्वी बेटों को जन्म दिया था और सभी पूर्व जन्म के कर्म फल से जीवित रह गए। 

अपनी बहन के पुत्रों को जीवित देखकर सियारिन रानी ने अपने स्वामी से कहा कि यदि तुम मुझे जीवित रखना चाहते हो तो इन मंत्री के भी पुत्रों को उसी जगह भेज दो, जहां कि मेरे बेटे गए हैं अर्थात इन्हें मार डालो।  यह सुनकर राजा ने उस मंत्री के पुत्रों को मारने के लिए कई प्रकार के  प्रयत्न किए, पर मंत्री पत्नी ने जीवित्पुत्रिका के पुण्य बल से अपने बेटो को बचा लिया। एक दिन राजा ने अपने आदमियों से उन पुत्रों का सिर कटवा कर पिटारी में रखवाया और वह पिटारी उनकी माता मंत्री के पत्नी के पास भेज दिया , किंतु वे आठों सिर बेशकीमती जवाहरात हो गए और भले चंगे आठों लड़के अपनी माता के पास वापस चले गए। 

उनको जीवित देखकर राजपत्नी को बड़ा आश्चर्य हुआ, अंत में वह मंत्री की पत्नी के पास गई और उसने पूछा बहन तुमने कौन सा ऐसा पुण्य कर्म किया है जिससे बार-बार मारे जाने पर भी तुम्हारे बेटे नहीं मरते, इस पर मंत्री की पत्नी ने कहा पूर्व जन्म में वह चील  थी और तुम सियारिन।  हमने और तुमने साथ-साथ जीवित्पुत्रिका व्रत का व्रत किया था. तुमने व्रत के नियमों का भली-भांति पालन नहीं किया था और मैंने किया था।  इसी दोष से बहन तुम्हारे बेटे नहीं जीते हैं ,मर जाते है। अगर आज भी रानी तुम उस जीवित्पुत्रिका व्रत को करोगी  तो तुम्हारे बेटे दीर्घायु होंगे। मैं तुमसे सच सच कह रही हूं, उसके कथा अनुसार रानी ने व्रत किया तभी से उसके कई बेटे सुंदर और दीर्घायु होकर बड़े बड़े राजा हुए।  सूतजी कहते हैं कि सब प्रकार का आनंद देने वाला मैंने यह दिव्य व्रत बतलाया स्त्रियां चिरंजीवी संतान चाहती हो तो विधिपूर्वक व्रत करें। 

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