ग्रंथियां या अंतः स्रावी तंत्र (Glandular or Endocrine system )

ग्रंथियां(Glands) 

  • ये मानव शरीर के ऐसे अंग हैं जो स्रावी कोशिकाओं से बने होते हैं तथा विभिन्न प्रकार के तरल पदार्थो का स्राव करते हैं। 
  • अंत:स्रावी विज्ञान (Endocrinology) के जनक ‘थॉमस एडीसन’ हैं। 
  • अंतःस्रावी तंत्र से संबंधित सर्वप्रथम ज्ञात रोग एडिसन रोग है जो एड्रीनल ग्रंथि से संबंधित है। 

तीन प्रकार की ग्रंथियाँ 

1.बहिःस्रावी ग्रंथियाँ (Exocrine Gland)

  • ये नलिकायुक्त ग्रंथियाँ होती हैं। 
  • इनके द्वारा स्रावित तरल नलिकाओं द्वारा संबंधित अंग में पहुँच जाता है। जैसे- लार ग्रंथि, स्वेद ग्रंथि, तेल ग्रंथि आदि। 

2.अंतःस्रावी ग्रंथियाँ (Endocrine Glands)

  • ये नलिकाविहीन होती हैं। 
  • इनके द्वारा स्रावित तरल ‘हार्मोन्स’ कहलाता है जो रक्त द्वारा वितरित होता है। थाइरॉइड, पीयूष ग्रंथि आदि अंत:सावी ग्रंथियाँ हैं।

3.मिश्रित ग्रंथियाँ (Mixed Glands)

  • ये वाहिकायुक्त ग्रंथियाँ हैं
  • इनका एक भाग अन्तःस्रावी तथा दूसरा भाग बहिःस्रावी होता है। जैसे- अग्नाशय। 

 

हार्मोन

  • हार्मोन शब्द का विधिवत् उपयोग ‘स्टारलिंग (Ernest H. Starling 1905)‘ ने किया था। 
  • हक्सले ने इन्हें ‘रासायनिक संदेशवाहक’ कहा था। 
  • सर्वप्रथम खोजा गया हार्मोन “सिक्रीटीन’ था।

 

 

एंजाइम्स तथा हार्मोन्स (Enzymes and Hormones) 

  • हार्मोन सूक्ष्म मात्रा में उत्पन्न होने वाले वैसे रसायन हैं जो अंतरकोशकीय संदेशवाहक के रूप में कार्य करते हैं। जबकि एंजाइम्स जैविक उत्प्रेरक होते हैं जो जैव रासायनिक अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं।

हार्मोन्स

एजाइम्स

इनका आणविक भार कम होता है।

इनका आणविक भार बहुत अधिक होता है।

ये अंत:स्रावी ग्रंथियों द्वारा उत्पादित होते हैं और रक्त के माध्यम से अपने कार्यकारी अंग तक पहुँचते हैं। 

इनका उत्पादन और स्रवण बहिःस्रावी ग्रंथियों द्वारा होता है तथा ये नलिकाओं द्वारा कार्यकारी अंग तक पहुँचते हैं या उसी स्थान पर कार्य करते हैं। 

रासायनिक रूप से ये प्रोटीन्स,  पेप्टोन्स, पेप्टाइन्स, अमीनो अम्ल, स्टेरॉयड प्रकृति के होते हैं 

रासायनिक रूप से एंजाइम कोलाइडी प्रोटीन्स ही होते हैं। (राइबोजाइम को छोड़कर; क्योंकि यह RNA का बना होता है) 

ये एक बार रासायनिक क्रियाओं में भाग लेकर विघटित हो जाते  हैं तथा इनका पुनः प्रयोग नहीं  किया जा सकता।

ये रासायनिक क्रियाओं के पश्चात् | पूर्ववत बचे रहते हैं। अतः इनका पुनः प्रयोग किया जा सकता है।

ये उपापचयी क्रियाओं में सीधे भाग नहीं लेते

ये रासायनिक क्रियाओं में सीधे भाग तो नहीं लेते बल्कि उन्हें उत्प्रेरित करते हैं।

इनका स्रवण केवल अंत:स्रावी ग्रंथियों से होता है।

एंजाइम का संश्लेषण शरीर की प्रत्येक कोशिका में होता है।

 

 

मनुष्य में पाई जाने वाली मुख्य अंतःस्रावी ग्रंथियाँ निम्नलिखित हैं

  • 1.पीयूष ग्रंथि (pituitary gland)
  • 2. थायरॉइड ग्रंथि (thyroid gland)
  • 3. पैराथायरॉइड ग्रंथि (Parathyroid Gland)
  • 4. अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal Gland)
  • 5. पीनियल ग्रंथि(Pineal Gland)
  • 6. थाइमस ग्रंथि (Thymus gland)
  • 7. अग्न्याशय(Pancreas)
  • 8. जनन अंग (Genital organs)

पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland

  • यह मानव शरीर की सबसे छोटी अंतःस्रावी ग्रंथि होती है। 
  • पीयूष ग्रंथि कपाल की स्फीनॉएड हड्डी की ‘सेला टर्सिका’ नामक अस्थिगुहा में स्थित होती है, जो हाइपोथैलेमस से एक वृंत (Stalk) द्वारा जुड़ी रहती है। 
  • पीयूष ग्रंथि, अन्य अंतःस्रावी ग्रंथियों के स्रावण को, व्यक्ति की वृद्धि, स्वास्थ्य, लैंगिक विकास आदि को नियंत्रित करती है, अतः इसे ‘मास्टर ग्रंथि’ कहते हैं।

 

पीयूष ग्रंथि द्वारा स्रावित प्रमुख हार्मोन्स

बद्धि हार्मोन/सोमेटोट्रोपिक हार्मोन (Growth Hormone or Somatotropic Hormone)

  • शरीर की सामान्य व संतुलित वृद्धि करना इस हार्मोन का कार्य है। 
  • थाइरॉक्सिन (थायरॉइड ग्रंथि से स्रावित हार्मोन) की उपस्थिति में वृद्धि हार्मोन अधिक प्रभावी होता है। 

अल्पस्रवण (Hyposecretion) 

  • बच्चों में वृद्धि हार्मोन के अल्पस्रवण से ‘बौनापन’ (Dwarfism or Midgets) हो जाता है। 
  • वयस्कों में वृद्धि हार्मोन के अल्पस्रवण से ‘साइमंड रोग’ हो जाता है। जिसमें रोगी पतला व उम्र से अधिक वयस्क दिखने लगता है। 

अतिस्रवण (Hypersecretion) 

  • बाल्यावस्था तथा किशोरावस्था में वृद्धि हार्मोन’ के अतिस्रवण से ‘अतिकायिकता’ (Gigantism) हो जाती है। इसमें सभी अंगों का विकास सामान्य से अधिक होता है तथा शरीर भीमकाय हो जाता है। 
  • वयस्कों में वृद्धि हार्मोन’ के अतिस्रवण से “एक्रोमिगेली’ (Acromegaly) हो जाता है।
  • एक्रोमिगैली रोग में व्यक्ति की टाँगें तथा हाथ लंबे हो जाते हैं और चेहरा गोरिल्ला की तरह दिखाई देता है। 

थायरॉइड प्रेरक हार्मोन (Thyroid Stimulating Hormone-TSH) 

  • यह थाइरॉइड ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन के स्रवण को प्रेरित करता है। 
  • यह ग्लाइकोप्रोटीन होता है। 

एड्रीनोकॉर्टिकोट्रॉपिक हार्मोन (ACTH) 

  •  यह पोलीपेप्टाइड हार्मोन है जो एड्रीनल ग्रंथि से हार्मोन्स के स्राव को प्रेरित करता है। 
  • इसका स्रवण तब होता है, जब रक्त में ग्लूकोज की कमी या सदमावस्था में मैक्रोफेज कोशिकाओं, जैसे- WBCs. द्वारा इंटरल्यूकिन-1 (Interleukin-I) स्रावित होता है। 

पुटिका प्रेरक हार्मोन (Follicle Stimulating Hormone) 

  • महिलाओं में यह अंडाशय पुटिकाओं के विकास का व अंडाशय से  निकलने वाले ‘एस्ट्रोजन’ हार्मोन का नियंत्रण करता है। 
  • पुरुषों में यह हार्मोन वृषणों में शुक्राणु निर्माण को प्रेरित करता है। 

लुटिनाइजिंग हार्मोन (LH) 

  • महिलाओं में यह ‘ल्युटियोट्रॉपिन (Luteotropin)’ कहलाता है। 
  • महिलाओं में यह ‘एस्ट्रोजन’ के साथ मिलकर अंडाशय को अंडाणु मुक्त करने के लिये, कॉर्पस ल्युटियम (Corpus Luteum) के निर्माण के लिये तथा गर्भाशय को निषेचित अंडा को ग्रहण करने के लिये तैयार करने हेतु प्रेरित करता है। 
  • पुरुषों में यह वृषणों के विकास तथा टेस्टोस्टीरॉन के स्रवण को प्रेरित करता है।

प्रोलैक्टिन (Prolactin-PRL) 

  • इसे ल्युटियो ट्रॉपिक हार्मोन (Luteotropic Hormone-LTH) या मैमोट्रॉपिक हार्मोन (Mammotropic Hormone-MTH) भी कहते हैं। 
  • यह स्त्रियों में दुग्ध ग्रंथियों से दुग्ध स्राव को उत्प्रेरित करता है। 

मिलैनोसाइट प्रेरक हार्मोन (Melanocyte Stimulating Hormone-MSH) 

  • मनुष्यों में यह हार्मोन त्वचा पर रंग, तिल व चकत्ते आदि बनने को प्रेरित करता है। 
  •  जंतुओं में यह त्वचा के वर्णकों (Melanin) को फैलाकर त्वचा के रंग को नियमित करता है। 

वेसोप्रेसिन (Vasopressin)/एंटी डाइयूरेटिक हार्मोन (Antidiuretic Hormone-ADH) 

  • यह हार्मोन मूत्र के सांद्रण का कार्य करता है। 
  • वेसोप्रेसिन के अल्पस्रवण से मूत्र की मात्रा तथा तनुता बढ़ जाती है।
  • यह स्थिति  मूत्राधिक्य (Diuresis or Polyurea) अथवा “डायबिटीज इन्सिपिडस’ कहलाती है। इसमें शरीर का निर्जलीकरण हो जाता है। 
  • इसके उपचार के लिये कृत्रिम ADH का उपयोग करते हैं जिसे पिट्रेसिन (Pitressin) कहा जाता है। 

ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) 

  • यह हमारे शरीर की चिकनी पेशियों पर कार्य करता है तथा उनके संकुचन को प्रेरित करता है। 
  • मादाओं में यह प्रसव (Labour Pain) के समय गर्भाशयी पेशियों के संकुचन को प्रेरित करता है, अतः इसे ‘जन्म हार्मोन’ भी कहते हैं। 
  •  शिशु के जन्म के बाद यह स्त्रियों की दुग्ध ग्रंथियों से दुग्ध के स्राव को प्रेरित करता है, अतः इसे ‘दुग्ध निष्कासन हार्मोन‘ भी कहते हैं। 
  •  गाय, भैंसों के थनों से दूध उतारने के लिये ‘ऑक्सीटोसिन’ हार्मोन का ही इंजेक्शन लगाया जाता है। 
  • माँ और शिशु के बीच, देखभाल तथा वात्सल्य एवं मानवीय संबंधों को गढ़ने में ऑक्सीटोसिन की प्रमुख भूमिका है। इसे आलिंगन या प्रेम हार्मोन भी कहते है। 

 

हाइपोथैलेमस (Hypothalamus)

  • हाइपोथैलेमस ,शरीर ताप, भूख तथा प्यास, तंत्रिका तंत्र, लैंगिक आचरण, शरीर सरक्षा आदि का नियंत्रण करता है। 
  • इसके द्वारा नौ ऐसे हार्मोन्स तत्त्व स्रावित किये जाते हैं, जो पीयूष ग्रंथि के सात हार्मोन्स के स्रवण को नियंत्रित करके शरीर की वृद्धि, विकास, समस्थैतिकता (Homeostasis) तथा उपापचय आदि सभी का नियमन और समन्वयन करते हैं। 
  • यह पीयूष ग्रंथि से स्वतंत्र कार्य कर सकती है। 

 

 

अवटु ग्रंथि/थायरॉइड ग्रंथि (Thyroid Gland

  • थायरॉइड ग्रंथि श्वास नली के दोनों ओर स्थित होती है, जो दो पालियों (Lobes) से बनी होती हैं। 
  • यह शरीर की सबसे बड़ी अंत:स्रावी ग्रंथि है। 
  • मुख्य कोशिकाएँ दो हार्मोन टेट्राआयोडोथाइरोनीन (Tetraiodothyronine) या थाइरॉक्सिन (Thyroxine-T4 ) तथा ट्राईआयोडोथाइरोनीन (Triiodothyronine-T3 ) स्रवण करती हैं।
  • थाइरॉक्सिन आयोडीन युक्त अमीनो अम्ल होता है जिसका मुख्य कार्य बुद्धि को नियंत्रित तथा शरीर का विकास करना है। 
  • थायरॉक्सिन हार्मोन स्रावित करने के लिये उत्तेजित करने वाला अंतःस्रावी हार्मोन थायरोट्रॉपिन (TSH) है। 

 

अल्पस्राव (Hyposecretion) से रोग

क्रिटिनिज्म (Cretinism): 

  • बच्चों में थाइरॉक्सिन के अल्पस्राव से यह रोग उत्पन्न होता है। इसके कारण मंदबुद्धि तथा बौनापन हो जाता है। 

मिक्सोडीमा (Myxoedema): 

  • वयस्कों में थाइरॉक्सिन के अल्पस्राव से यह रोग उत्पन्न होता है। इसमें रोगी में धीमी हृदय धड़कन, निम्न शरीर ताप, पेशीय थकान आदि रहती हैं। 

घेघा रोग (Goitre): 

  • यह रोग भोजन में आयोडीन की कमी से हो जाता है। इसमें गर्दन में उपस्थित थायरॉइड ग्रंथि फूल जाती है। 
  • खाने वाले नमक में उचित मात्रा में आयोडीन लेने पर घेघा रोग का निदान हो जाता है।

अतिस्राव (Hyperthyroidism) से  रोग

  • थाइरॉक्सिन के अतिस्राव (Hyperthyroidism) से ग्रेब्स या एक्सआप्थैल्मिक घेंघा  रोग हो जाता है जिसमें आँखें बाहर की ओर उभर आती हैं तथा उपापचय दर बढ़ जाती है। 
  • पैरापुटिकीय कोशिकाएँ (C-Cells) एक ‘आयोडीन रहित’ हार्मोन ‘कैल्सिटोनिन’ या थाइरोकैल्सिटोनिन (Thyrocalcitonin-TCT) का स्रवण करती हैं। 
  • कैल्सिटोनिन हार्मोन रुधिर में कैल्शियम तथा फॉस्फेट की मात्रा का नियमन करता है। 

हाशीमोटो रोग (Hashimoto’s Disease)

  • आनुवंशिक कारणों, लिंग हार्मोन्स, आयोडीन के अत्यधिक सेवन तथा संक्रमण आदि के कारण थाइरॉइड ग्रंथि से स्रावित हार्मोन्स की मात्रा इतनी कम हो जाती है कि शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र इन्हें शरीर के पदार्थ न मानकर विष पदार्थ या बाहरी एंटीजन मानने लगता है। परिणामस्वरूप शरीर में ऐसे एंटीबॉडीज बनने लगते हैं, जो इन हार्मोन्स के साथ-साथ थाइरॉइड ग्रंथि को भी नष्ट कर देते हैं। इस प्रकार हाशीमोटो रोग को थायरॉइड की आत्महत्या भी कहा जाता है।  
  • थायरॉइड संबंधी अनियमितताएँ पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में अधिक होती हैं।

 

अवटु उद्धर्ध (एडम्स ऐप्पल/Adams Apple) 

  • तकनीकी रूप से स्वरयंत्र (Laryngeal Prominence) के नाम से भी जाना जाता है। 
  • यह पुरुष एवं स्त्री दोनों में पाया जाता है परंतु पुरुषों में यह काफी स्पष्ट होता है। यह थायराइड उपास्थि जो गर्दन को घेरे रहता है, के ऊपर एक उभार है। 

 

परावटु/पैराथायरॉइड ग्रंथि (Parathyroid Gland) 

  • यह पैराथायरॉइड हार्मोन (PTH) या कॉलिप हार्मोन का स्रवण करती हैं, जिनका मुख्य कार्य रक्त में कैल्शियम की मात्रा का नियमन करना होता है।

 अल्पस्रवण (Hyposecretion): 

  • पैराथायरॉइड हार्मोन के अल्पस्रवण से कंकाल पेशियों (यथा- बाँह, पैर आदि) में ऐंठन, जकड़न एवं कंपन होने लगता है अर्थात् कंकाल पेशियों में फैलाव की क्षमता कम हो जाती है, जिसे “टिटेनी’ कहते हैं।
  • यह शरीर में रक्त में कैल्शियम के निम्न स्तर के कारण होता है। 

अतिस्रवण (Hypersecretion): 

  • पैराथारॉइड हार्मोन के अतिस्रवण से हड्डियों से कैल्शियम का निष्कासन होने लगता है। जिससे हड्डियाँ पतली एवं कमजोर हो जाती हैं। यह रोग ऑस्टिओपोरोसिस (Osteoporosis) कहलाता है। 

 

अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal Gland)

  • ये ग्रंथियाँ दोनों किडनियों के ऊपरी सिरे पर स्थित होती हैं जिनका रंग पीला तथा आकार पिरामिड की तरह होता है। ये मानव शरीर में हार्मोन्स से संबंधित अनेक कार्यों, यथा- रक्त शर्करा को नियंत्रित करना, प्रोटीन तथा वसा को जलाना, तनाव पर प्रतिक्रिया देना, रक्तचाप को नियंत्रित करना आदि के लिये उत्तरदायी होती हैं। 
  • इसके दो मुख्य भाग होते हैं।
    • एड्रेनल कॉर्टेक्स (Adrenal Cortex) 
    • एड्रेनल मेड्यूला (Adrenal Medulla)

 

एड्रेनल कॉर्टेक्स (Adrenal Cortex) 

  • यह अधिवृक्क ग्रंथि का बाहरी भाग होता है जो तीन स्तरों से मिलकर बना होता है। विभिन्न स्तर पृथक-पृथक हार्मोन्स की आवश्यकता पड़ने पर स्राव करते हैं। 
  • कार्टेक्स द्वारा स्रावित प्रमुख हार्मोन्स निम्न हैं

एल्डोस्टेरॉन (Aldosteron) : 

  • यह हार्मोन्स रक्त दबाव को विनियमित करने की शारीरिक शक्ति को प्रभावित करता है। 

कॉर्टिसोल (Cortisol) : 

  • यह हार्मोन्स तनाव के समय स्रावित होता है तथा विषम परिस्थितियों में लड़ने या पलायन करने से संबंधित निर्णयों में  मदद करता है। 

एंड्रोजेन (Androgen) : 

  • एंड्रोजेन हार्मोन्स स्टेरॉयड हार्मोन्स होते हैं जो पुरुष विशेषताओं तथा प्रजनन के लिये ज़िम्मेदार होते हैं। 
  • DHEA (Dehydroepiandrosterone), DHEA-S (DHEA-Sulfate), एंड्रोस्टेनेडियॉन, Testosterone, DHT (Dihydrotestosterone) आदि प्रमुख एड्रेनल एंड्रोजेन हार्मोन्स हैं। 

 

एड्रेनल मेड्यूला (Adrenal Medulla) 

  • यह अधिवृक्क ग्रंथि का आंतरिक भाग होता है जो मुख्यतः शरीर के तनाव अनुक्रिया प्रबंधन से संबंधित होता है। 
  • मेड्यूला से स्रावित प्रमुख हार्मोन्स निम्न हैं- 
    • एड्रीनेलिन (Adrenaline) 
    • नॉरएड्रेनेलिन (Noradrenaline)
  • इन्हें स्ट्रेस हार्मोन्स भी कहा जाता है। 
  • इनका संबंध शरीर की उत्तेजना से होता है। ये मेड्यूला में उत्पन्न तथा संचित रहते हैं। 
  • किसी आघात या खतरे से उत्पन्न अत्यधिक तनाव के समय मस्तिष्क एड्रेनल ग्रंथि को हार्मोन्स स्राव के लिये सिग्नल भेजता है। इसलिये एड्रीनेलिन को आपातकालीन हार्मोन भी कहते है। 
  • अन्य क्रियाओं के साथ-साथ ये हार्मोन्स पाचन को धीमा कर देते हैं, जागरूकता को बढ़ा देते हैं तथा रक्त प्रवाह को मस्तिष्क एवं माँसपेशियों की ओर मोड़ देते हैं। यह रक्तचाप तथा हृदय गति दर को भी बढ़ा देता है। 
  •  “एड्रीनेलिन’ के स्रवण का नियमन, पीयूष ग्रंथि द्वारा नहीं अपितु ‘स्वायत्त तंत्रिका तंत्र‘ के द्वारा होता है। इसे लड़ों और उड़ो (Fight or Flight) हार्मोन भी कहते है। 
  • रक्तचाप कम होने पर रोगी को ‘एड्रिनेलिन ‘ दिये जाने पर आराम मिलता है।

 

विरिलिज्म (Virilism)

  • महिलाओं में पुरुषोचित लक्षणों (भारी आवाज दाढी मूंछे बढ़ना) का प्रकट होना विरिलिज्म कहलाता है। 
  • यह महिलाओं में ‘एंड्रोजन्स’ के अतिस्राव का दुष्परिणाम होता है।

गाइनेकोमास्टिया (Gynecomastia)

  • पुरुषों में महिलाओं जैसे लक्षण (तीखी आवाज़, दुग्ध ग्रंथियों का विकास आदि) का प्रकट होना गाडनेकोमास्टिया कहलाता है। 
  • यह पुरुषों में ‘एस्ट्रोजन्स’ के अतिस्राव का दुष्परिणाम होता है। 

पिनियल ग्रंथि (Pineal Gland) 

  • इस ग्रंथि को पहले आत्मा का स्थान या ‘तीसरी आँख का अवशेष’ भी माना जाता था। यह ग्रंथि, अग्र मस्तिष्क के पृष्ठीय (ऊपरी)  भाग में स्थित होती है। 
  • पिनियल ग्रंथि निम्नलिखित तीन हार्मोन्स का स्रावण करती है
    • मेलाटोनिन  (Melatonin)
    • सेरोटोनिन (Serotonin) 
    • एड्रीनोग्लोमेरुलोट्रोपिन (Adrenoglomerulotropin)

 

मेलाटोनिन  (Melatonin) 

  • मेलाटोनिन का मुख्य कार्य त्वचा वर्णक (Skin Pigment) मेलानिन के संश्लेषण को विनियमित करना, सोने और जागने के चक्र तथा शरीर की जैविक लय (Biological Rhythms) को बनाए रखना होता है। 
  • यह पीयूष ग्रंथि द्वारा स्रावित हार्मोन (Melanocyte-Stimulating Hormone-MSH) के विपरीत कार्य करता है। 
  • मेलानिन एक वर्णक (Pigment) होता है जो त्वचा, आँख, बाल तथा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र आदि में पाया जाता है एवं इसके रंग को निर्धारित करता है। 
  • जबकि मेलाटोनिन एक हार्मोन है जो मुख्यतः रेटिना एवं पिनियल ग्रंथि से स्रावित होता है। यह शरीर की जैविक घड़ी (Biological Clock) को नियंत्रित करता है। 

 

सेरोटोनिन (Serotonin) 

  • यह एक न्यूरोट्रांसमिटर हार्मोन है जो तंत्रिका कोशिकाओं के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान तथा रक्त वाहिकाओं को सिकोड़कर (Vasoconstriction) रक्त दाब बढ़ाने का कार्य करता है। 
  • यह मानव मनोदशा को प्राकृतिक रूप से विनियमित करता है। 

 

एड्रीनोग्लोमेरुलोट्रोपिन (Adrenoglomerulotropin) 

  • यह ‘अधिवृक्क वल्कुट’ (Adrenal Cortex) से एल्डोस्टीरॉन हार्मोन के स्रवण को प्रेरित करता है। 
  • पिनियल ग्रंथि शरीर में जैविक घड़ी का नियमन करके सोने-जागने के चक्र, शरीर के तापक्रम तथा मासिक चक्र का निर्धारण भी करती है। 
  • मनुष्य में लगभग दस वर्ष की आयु के पश्चात् पिनियल ग्रंथि कैल्सियम लवणों के कण जमा होने के कारण नष्ट होने लगती है। इन कणों को मस्तिष्क की रेत (Brain Sand) कहते हैं। 

 

थाइमस ग्रंथि (Thymus Gland) 

  • यह द्विपालीय (Bilobed) लसिका अंग है, जो हृदय तथा महाधमनी के ऊपर स्थित होता है। 
  • जन्म के समय यह लगभग 10-12 ग्राम की, यौवनावस्था में 20-30 ग्राम की, वृद्धावस्था में मात्र 3-6 ग्राम की रह जाती है। स्पष्ट है कि यह युवाओं में सक्रिय रहती है किंतु लैंगिक परिपक्वता के बाद धीरे-धीरे अपघटित होती जाती है।
  • थाइमस ग्रंथि ‘थाइमोसिन’ नामक हार्मोन का स्रवण करती है, जो शरीर में ‘T लिम्फोसाइट्स’ या T-Cell निर्माण को बढ़ाकर शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र में सहायक होती है। 
  • थाइमस ग्रंथि T लिम्फोसाइट्स एंटीबॉडीज बनाती है,अतः इसे ‘T लिम्फोसाइट प्रशिक्षण विद्यालय’ भी कहा जाता है। 
  • थाइमस ग्रंथि एक अन्य हार्मोन थायमिन या थायमोपोइटिन का स्रवण भी करती है। 
  • वृद्धों में थाइमोसिन का उत्पादन घट जाता है, परिणामस्वरूप उनकी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया भी कमज़ोर पड़ जाती है। 

अन्य ग्रंथियाँ 

अग्न्याशय (Pancreas) 

  • यह मानव शरीर की दूसरी सबसे बड़ी ग्रंथि है (यकृत सबसे बड़ी ग्रंथि है) तथा एक मिश्रित (संयुक्त) ग्रंथि है, जो अंत:स्रावी तथा बहिःस्रावी दोनों रूपों में कार्य करती है। इसके रस को पूर्ण पाचक रस कहा जाता है। 
  •  ग्रंथि का अंत:स्रावी भाग (लगभग 1-2 प्रतिशत) मुख्यतः चार प्रकार की कोशिकाओं के झुंडों का बना होता है जिन्हें ‘लैंगर हैंस द्वीप’ (Islets of Langerhans) कहते हैं। लैंगर हैंस द्वीप की कोशिकाओं में 
    1. अल्फा कोशिकाएँ – ग्लूकागॉन 
    2. बीटा कोशिका – इंसुलिन 
    3. डेल्टा कोशिकाएँ – सोमेटोस्टेटीन तथा 
    4. एफ-कोशिकाएँ (F-Cells) – पैंक्रियाटिक पेप्टाइड का स्राव करती हैं। 

 

 

अल्फा कोशिकाएँ (-cells) 

  • ये ‘ग्लूकागॉन’ (Glucagon) नामक हार्मोन का स्राव करती हैं। 
  •  ग्लूकागॉन रक्त में ग्लूकोज (Glucose) की मात्रा सामान्य रखने का कार्य करता है। 
  • ग्लूकागॉन प्रोटीन एवं वसा से ग्लूकोज के संश्लेषण को प्रेरित करता है। 
  • ग्लूकागॉन यकृत में संचित ग्लाइकोजन (Glycogen) से ग्लूकोज का संश्लेषण करता है। यह प्रक्रिया ग्लाइकोजीनोलाइसिस कहलाती है। इस प्रक्रिया से रक्त में ग्लूकोज की आवश्यक मात्रा मिल जाती है। 

 

बीटा कोशिकाएँ (cells) 

  • ये ‘इन्सुलिन’ (Insulin) नामक हार्मोन का स्राव करती हैं। 
  • इन्सुलिन एक प्रोटीन श्रृंखला या पेप्टाइड हार्मोन है। इंसुलिन में जस्ता धातु उपस्थित होता है। 
  • इन्सुलिन का मुख्य कार्य रक्त के अतिरिक्त शुगर को ग्लाइकोजेन में परिवर्तित करना है। यह ग्लाइकोजन यकृत में संचित रहती है।
  • शरीर में इन्सुलिन की कमी से मधुमेह (Sugar) नामक रोग होता है। 
  • मधुमेह के रोगियों को इन्सुलिन के इंजेक्शन लगाए जाते हैं, मुख से (Oral) इन्सुलिन लेने पर इसका प्रोटीन की भाँति पाचन हो जाता है। 
  •  सूअरों की इन्सुलिन संरचना मनुष्यों से अधिक समानता रखती है जबकि भेड आदि चौपायों की इन्सुलिन मनुष्य में एलर्जी पैदा कर देती है। इंसुलिन को डहेलिया की जड़ों से भी प्राप्त किया जाता है। 
  • इन्सुलिन वह प्रथम प्रोटीन है, जिसे रिकोम्बीनेट डी.एन.ए. (Recombinant DNA) तकनीक द्वारा जीवाणु (Bacteria Escherichia Coli or E.Coli) की सहायता से व्यावसायिक स्तर पर बनाया गया था। 

 

‘फ्रेडरिक सेंगर’

  • ‘फ्रेडरिक सेंगर’ नामक वैज्ञानिक ने सर्वप्रथम गाय के इन्सुलिन (Bovine Insulin) की संपूर्ण रासायनिक संरचना की जानकारी दी। 
  •  इन्सुलिन में अमीनो अम्ल के क्रम की खोज करने के लिये सेंगर को 1958 में नोबेल पुरस्कार मिला जबकि जीन की रासायनिक संरचना संबंधी कार्य के लिये इन्हें सन् 1980 में पुनः नोबेल पुरस्कार दिया गया। 
  • सेंगर प्रथम ब्रिटिश वैज्ञानिक थे, जिन्हें नोबेल पुरस्कार दो बार प्रदान किया गया।

जनन अंग (Gonads)

  • जनन अंग उन अंगों (नर में वृषण तथा स्त्री में अंडाशय) को कहते हैं, जो प्रजनन क्रिया मे प्रत्यक्ष रूप से शामिल होते हैं। 
  • जनन अंगों का मुख्य कार्य युग्मक निर्माण (Gamete Formation) होता है किंतु ये लिंग हार्मोन्स का उत्पादन भी करते हैं। 
  • लिंग हार्मोन्स सहायक लैंगिक अंगों की वृद्धि, विकास, द्वितीयक लैंगिक लक्षण, लैंगिक व्यवहार आदि को निर्धारित करते हैं। नर व मादा में अलग-अलग लिंग हार्मोन्स होते हैं

नर हार्मोन्स (Male Hormones) 

एंड्रोजन्स 

  • नर में उदर गुहा के बाहर वृषण कोश में एक जोड़े वृषण स्थित होते हैं। 
  • नरों में वृषण प्राथमिक लैंगिक अंग होते हैं तथा यह अंतस्रावी  ग्रंथि के रूप में भी कार्य करते हैं। 
  • नर हार्मोन्स (एंड्रोजन्स) इन्हीं अंतराली कोशिकाओं (Interstitial Cells or Leyding Cells) द्वारा स्रावित होते हैं, जिनमें से प्रमुख नर हार्मोन ‘टेस्टोस्टेरॉन’ (Testosteron) होता है। 
  • टेस्टोस्टेरॉन को पौरुष-विकास हार्मोन (Masculinization Hormone) कहा जाता है। 

 

मादा हार्मोन्स (Female Hormones) 

  • मादा हार्मोन्स में दो हार्मोन्स शामिल हैं
    • (Estrogens or Follicular Hormone) 
    • (Progestational or Luteal Hormone)

 

ईस्ट्रोजेन्स या पुटिकीय हार्मोन (Estrogens or Follicular Hormone) 

  • कॉर्टेक्स में कई छोटी-छोटी अंडपुटिकाएँ (Graffian Follicle) पाई जाती हैं, जो ‘ईस्ट्रोजन्स’ का रक्त में स्रावण करती हैं। 
  • गर्भनाल (Placenta) भी एक अस्थायी अंतःस्रावी रचना होती है, जो मानव कॉरियोनिक गोनेडोट्रॉपिन (Human Chorionic Gonadotropin-HCG), लेक्टोजन, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रॉन, रिलेक्सिन आदि स्रावित करती है। 
  • यह नारी विकास हॉरमोन (Feminizing Hormone) कहलाता है क्योंकि यह मादा के लैंगिक लक्षणों तथा सहायक जननांगों के विकास को प्रेरित करता है। ईस्ट्रोजन के प्रभाव से लड़कियों में स्तनों (Breast), अंडवाहिनियों (Oviduct), गर्भाशय (Uterus) तथा योनि (Vagina) का विकास होता है। 
  • ईस्ट्रोजेन्स हार्मोन में ईस्ट्रैडिऑल (Estrodiol) हार्मोन प्रमुख है। 
  • स्त्रियों में रजोनिवृत्ति के पश्चात् हार्मोन का उत्पादन समाप्त हो जाता है। 

प्रोजेस्टेशनल हार्मोन या ल्यूटियल हार्मोन (Progestational or Luteal Hormone)

  • अंडाशय (Ovary) में पायी जाने वाली कोशिकाओं का समूह (Mass) पीत पिंड या ग्रंथि (Corpus Luteum) कहलाती है। ल्यूटीनाइजिंग हार्मोन अंडाशय से अंडोत्सर्ग को प्रेरित करता है, जिससे पित ग्रंथि का विकास होता है। 
  • इसमें प्रोजेस्ट्रॉन हार्मोन प्रमुख हैं। प्रोजेस्ट्रॉन हार्मोन का स्रवण कॉर्पस लुटियम से ही होता है। यह हार्मोन गर्भधारण के लिये आवश्यक अनेक लक्षणों के विकास को प्रेरित करता है। 
  • मादाओं में एक जोड़ा अंडाशय उदर गुहा में पाया जाता है। 
  • मादा में अंडाशय प्राथमिक लैंगिक अंग होता है, जो अंत:स्रावी ग्रंथि के रूप में भी कार्य करता है। 
  • गर्भधारण के सभी परीक्षणों का आधार स्त्री के मूत्र में HCG का उपस्थित होना है। 
  •  निषेचन (Fetilization) की क्रिया डिंबवाहिनी नली (Oviduct) में होती है।