दू बिहाक दुरगति (Du Bihak Durgati )

7. दू बिहाक दुरति –श्री ए. के. झा

  • पुस्तक – खोरठा लोकसाहित्
  • प्रकाशक – झारखण्ड जनजातीय कल्याण शोध सस्थान ,मोरहाबादी ,रांची ,कल्याण विभाग झारखण्ड सरकार 
    • प्रथम संस्करण – 2012   “©www.sarkarilibrary.in”
  • संपादक – 
    • प्रधान संपादकए. के. झा
    • अन्य संपादक
      • गिरिधारी गोस्वामी आकाशखूंटी 
      • दिनेश दिनमणि
      • बी एन ओहदार
      • श्याम सुन्दर महतो श्याम 
      • शिवनाथ प्रमाणिक
      • चितरंजन महतो “चित्रा’
  • रूपांकनगिरिधारी गोस्वामी आकाशखूंटी
  • मुद्रक – सेतु प्रिंटर्स , मोरहाबादी ,रांची 

 

KeyPoints – एगो लोक, दो विवाह , बड़ी पत्नी , छोटी पत्नी (चालाक ), गुंदली तेल

एक गांव में एक आदमी था जो कि बिल्कुल अकेला था, ना ही उसका माता-पिता थे और ना ही कोई अन्य।  हालांकि उसका खेती बारी बहुत था।  वह इसीलिए जल्दी-जल्दी में शादी कर लेता है।  2 लोग हो जाते हैं फिर भी काम ठीक से हो नहीं पाता है इसीलिए वह दूसरा विवाह कर लेता है।  उसकी दोनों पत्नियां काम को आपस में बांट कर करने लगती है, थोड़े दिनों तक काम ठीक ठाक चलता है।  फिर उनके बीच मनमुटाव लड़ाई झगड़ा शुरू होता है। 

उसकी छोटी पत्नी थोड़ा ज्यादा तेज तरार और चेठगर थी इसीलिए उसके पति का लगाव छोटी से ज्यादा था।  यह सब देख कर उसकी बड़ी पत्नी को बहुत ज्यादा जलन होता था।  वह सोचने लगी कि किस तरह से वह छोटकी को  पति के नजरों में नीचा दिखाएगी।  “©www.sarkarilibrary.in”

फिर बड़की को एक उपाय सूझता  है, जब छोटकी अपने पति के साथ काम करने के लिए बाहर गई हुई थी, तो बड़की ने धान में गुंदली तेल मिला दिया।  वह सोची कि छोटकी जब तेल में सना हुआ धान को कूटेगी तो उससे चावल निकलेगा ही नहीं और इस तरह से उसे खाना (भात) बनाने में देरी हो जाएगा।  जिससे कि उसका पति उससे गुस्सा हो जाएगा और बड़ी पत्नी के तरफ आ जाएगा। 

अगले दिन छोटकी जब धान कूट रही थी तो बहुत मुश्किल से उसे चावल निकल रहा था।  वह एक चुटकी धान को मइस के देखी, तो वह समझ गई कि इसमें गुंदली तेल लगा हुआ है।  वह समझ गई कि यह बड़की का चाल है।  वह तुरंत किसी दूसरे के घर से चावल उधार ले लेती है।  और पति के आने से पहले ही खाना तैयार कर लेती है।  यह सब देखकर बड़की को और ज्यादा गुस्सा आ जाता है और वह कोई दूसरा उपाय सोचने लगती है।  “©www.sarkarilibrary.in”

अगले दिन पति जब ढोढ़ा (तालाब ) तरफ नहाने के लिए गया और छोटकी डाड़ी (कुआं) पानी के लाने के लिए गई।  तभी छोटकी का बनाया हुआ मसालेदार भूनजा सब्जी को बड़की लेकर ही एक पूरे मन से झोर  वाला सब्जी बनाती है और सोचती है कि इतना स्वादिष्ट खाना खाकर तो उसका पति उसकी तरफ हो जाएगा।  लेकिन जब उसका पति वापस नहा कर लौटता है,  तो वह कहता है कि वह झोर वाला सब्जी नहीं खाएगा।   बल्कि भूनजा हुआ सब्जी में ज्यादा स्वाद आता है यह सुनकर बड़की  आग बबूला हो जाती है और पूरा चिल्लाने लगती है, कि हां छोटकी तो तुम्हारे लिए गुड़िया है, हम तो तीता कांसा।  और छोटकी जब बड़की को मना करती है कि दीदी ऐसा मत बोलो।  तो वह हुका रख देती है और छुटकी को पकड़कर मारने पीटने लगती है।  दोनों में खूब लड़ाई होता है फिर बड़की अपने बाप घर भाग जाती है।  “©www.sarkarilibrary.in”

 

दू बीहाँइ दुरगति

एगो गाँव रह-हलक एगो लोक । ऊ एकदम एकाइ रह-हलक । ना माइ ना आर केउ। मेनेक, ओकर खेत-बारी आर टॉइड़ दमे रह-हलइ। सइले ऊ तनी चाँड़ा-चाँड़िये बीहा कइर लेलक । घरें बहु अइलइ ! तयुँ लोकेक टानाटानिये! काम बेस-से सम्हरे नाँइ ! तखन ऊ आर एगो बीहा कइर लेलक । दूइयो बहु गुलइन पारी बॉंइट के घरें आर बाहरे काम पाइट सारे लागला। थोरना दिन बेसे भाभें काम चल-लइ। मेनेक चाँढ़ी दुवे सइनिनेक मेका—मेकी, उल्खा- पँइचा सुरू भइ गेलइन ।

आर फइर, छोटकी बहु टी तनी बेसी चनफन आर चेठगर रह-हलइ। से-ले आपरूपी मरदवाक तनी बेसी टान भइ गेलइ छोटकिक बाटे । छोटकिक बाटें मरदेक बेसी टान टा भांइज के बड़की आरो पसपसी मोइर गेलिक । ऊ मने मन भाभे लागलइ जे कि कइर के ऊ छोटकी के मरदवाक जीहेक बइरी बनाइ देतइ । “©www.sarkarilibrary.in”

भाभइत-भाभइत ओकराँ एगो चाइल सुझलइ । एकदिन, जखन छोटकी मरद टाक संग बाहर बाटे काम करे ले गेल हलइ, तखने बड़की टी बिन चार छोड़वल गुंदली तेल मेसाइ देलइ । ऊ भाभली जे तेलें सानाइल गुंदली टा हामर सइतिन कुटेहे नाँइ पारतिक । आर चार नाँइ बहरइलें भात रांधइतें देरी भइ जितइ । बस छोटकिक उपर मरदवा राइग जितइ आर बड़की तकर पेटेक भीतर आइ जितिक ।

आगुक दिने छोटकिक पारी रह हलइ घरेक काम करइक । बड़की गेलिक मरद संग काम करेले। तो छोटकी बासी पाइट साइर भात राँधेले गुंदलीक चार छोड़वे बइसइल। मेनेक ई की। कुटते – कुटते ठाढ़ बसियान भइ अइलइ। मेंतुक गुंदली चार बहरइतें बाहराइ नाँइ खोजइ। तखन तर-हथवें उठाइके जइसीं एक चुटकी गुंदली टाके मइस के देखलइ, छोटकी बुझ गेलइ । तेल मखवल गुंदली।

छोटकिक बुझइतें देरी नाँइ लागलइ जे ओकरों साधेले ओकर सइतिने ई कुटचाइल गुलइन करल हिक । बस, चट कइर के ऊ दोसर घर ले पँइचा चार लइ आनलइ । मरदेक घर घुरेक आगवे राधा-बाँटा साइथ । राधा-राँधिक सब काम निंघरल देइख बड़की आरो लहइर उठलइ । तखन दोसर कुटचाइल चलेक बत्तर भांजे लागलइ । “©www.sarkarilibrary.in”

तनी जिराइ के मरदवा ढोढ़ा बाटे गेलक नाहाइले। छोटकी गेलिक डाड़ी बाटे ले पानी आने । तखने छोटकिक बॉटल मसालाले लुचइक के बड़की एगो झोर देल, तियन खुब मन दइके राँधाइल । तनी पालवा मेसाइ दइके भाभइल जे ओकर राँधल ई तियनवें मरदवा अबरी ओकरे भइ जितइ सुघर-सोवादेक जोरें।

नाहाइकें घुरलें छोटकी खाइक परइस देलइ आर पीर्हा-पानी कइर के खाइले देलइ । बड़की जिराइक निंग्सें तनी बीचें गड़गड़ा टाइन-टाइन के बइस रहलइ, मरदवाक बाठीं भाइल – भाइल के । खइते – खइते मरद टा बजइक उठलइ जे झोर देल तियन टा-ले तो भूंजले टा सवादगर लाग-हइ

एतना सुनबाई आर बड़किक तो एड़ीक लहइर चाँदीं चाइप गेलइ । हुँका टानते-टानथीं ऊ गरइज उठइल, ” हाँ छोटकी तो सब रकमें तोर खातिर बेसी गुड़िया लागतउ ! हामे तो तीता – काँसा ! छोटकी गुड़िया! छोटकिक काम गुड़िया । ओकर सब कुछ गुनगर आर गुड़िया । “©www.sarkarilibrary.in”

छोटकी बतवा माठेक जिगिस्तें कह-लइ, “दीदी, अइसन छोट बात करे गेलें झागरा होवे। अइसन बादा-बादिक बात नाँइ कइर के सुगुमे रहेक चाही।” बड़कीं गुरगुराइ कें अबरी छोटकिको गुड़रलइ, “तोहुँ ओकरे पीठ उपरी उठवें । थाम तो तोराँ देखहिअउ ।”

एतना कइह के हुँकवा थोसइर देलइ आर छोटकिक कसकसाइ के धइर के घिसरवे लागलइ । कहलइ जे ओकरा आइज खेदा- विदा दइए देतइ । मरदवें खइते – खइथीं माना करलइ, मेनेक ततके दुइयो सइतिन खेपचंडी! के जे आर मइ कहल सुने आर धातांग-पातांग राखे! बांधल चुइल खुइज के पाथाइर गेलइन, लुगा-फाटा फाटे-फेंकाइ लागलइन, ताव धामड़ा-धामड़ी लागले हइ। सेसें बड़की बाप घार पाराइल। हिंदे ई बात सुइन के सभिन भाभला जे एके बिहाक परथा टा तोरल के दाएँ ई नाकें नुन आर नाना-थाना ।

 

  • Q.कौन बहु टी तनी बेसी चनफन आर चेठगर रह-हलइ? छोटकी बहु टी
  • Q.तनी जिराइ के मरदवा कौन बाटे गेलक नाहाइले? ढोढ़ा बाटे  “©www.sarkarilibrary.in”
  • Q.बड़की टी बिन चार छोड़वल कौन तेल मेसाइ देलइ ? गुंदली तेल