क्रिया ,क्रिया की परिभाषा , क्रिया के भेद

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 क्रिया की परिभाषा

  • जिस शब्द के द्वारा किसी कार्य का करना या होना या किसी प्रक्रिया की स्थिति में होने का ज्ञान होता है, उसे क्रिया कहते हैं। 
  • जैसे खाना, जाना, पीना, पढ़ना आदि। क्रिया के रूप लिंग, वचन और पुरूष के अनुसार बदलते हैं।

धातु की परिभाषा 

  • क्रिया का मूल अंश या मूल रूप धातु है। 
  • क्रिया जिस मूल अंश या मूल शब्द से बनती है, उसे धातु कहते हैं। 
  • जैसे – पढ़ना शब्द में ‘ना’ प्रत्यय लगा हुआ है- पढ + ना = पढ़ना, अतः पढ़ धातु है। इसे क्रियामूल भी कहते हैं। प्रायः धातु में ‘ना’ लगाकर क्रिया बनाया जाता है। जैसे-लिखना,चलना आदि।

धातु की पहचान 

  • मूल धातु की पहचान- मूल धातु का प्रयोग आज्ञार्थक रूप में ‘तू’ के साथ किया जाता है। जैसे- तू खा, तू पढ़ आदि।

धातु के भेद 

  • धातु के निम्नलिखित पाँच भेद माने जाते हैं
    • (1) सामान्य (मूल) धातु 
    • (2) व्युत्पन्न धातु 
    • (3) नाम धातु 
    • (4) सम्मिश्र धातु
    • (5) अनुकरणात्मक धातु। 

1. सामान्य (मूल) धातु

  • मूल धातु स्वतंत्र होती है, जो भाषा में रूढ़ शब्द के रूप में प्रचलित हैं। मूल धातु में ‘ना’ प्रत्यय जोड़कर जो शब्द बनाया जाता है, उसे सामान्य धातु कहा जाता है। 
  • जैसे- सो + ना = सोना, लिख + ना = लिखना आदि। 

2. व्युत्पन्न धातु या यौगिक धातु

  • व्युत्पन्न धातु किसी प्रत्यय के योग से बनाई जाती है। अतः वे धातुएँ जो किसी मूल धातु में प्रत्यय लगाकर बनाई जाती है, व्युत्पन्न धातु कहलाती है। 
  • जैसे- खाना से खिलाना, देखना से दिखाना आदि।

3. नाम धातु 

  • संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण शब्दों में प्रत्यय लगाकर जो धातुएँ बनाई जाती है उन्हें नामधातु कहते हैं। नामधातु ‘आ’ प्रत्यय के योग से बनती है। 
  • जैसे- 
    • संज्ञा शब्दों से 
    • शर्म – शर्माना। 
    • हाथ – हथियाना 
    • लालच – ललचाना। 
    • बात – बतियाना 
    • सर्वनाम शब्दों से 
      • अपना – अपनाना 
    • विशेषण शब्दों से 
      • गर्म – गर्माना। 
      • चिकना – चिकनाना।

4. सम्मिश्र धातु

  • जंहा संज्ञा , विशेषण और क्रिया-विशेषण शब्दों के बाद दो अलग-अलग धातुएँ एक साथ आए वहाँ सम्मिश्र धातु होता है। 
  • जैसे संज्ञा शब्दों से – काम करना/ काम होना। विशेषण शब्दों से – अच्छा लगना/ अच्छा होना। क्रिया-विशेषण शब्दों से – ऊपर होना/ ऊपर करना। 

5. अनुकरणात्मक धातु

  • ध्वनि के अनुकरण पर जो धातु बनती है, उन्हें अनुकरणात्मक धातु कहते हैं। जैसे 
  • खटखट – खटखटाना। टनटन – टनटनाना। गुनगुन – गुनगुनाना।

क्रिया के भेद 

  • कार्य के आधार पर क्रिया के दो भेद होते हैं
    • (1) अकर्मक क्रिया 
    • (2) सकर्मक क्रिया। 

1. अकर्मक क्रिया

  • जिस क्रिया में कर्म की आवश्यकता नहीं होती है, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं। 
  • जैसे- उठना, रोना आदि । वाक्यों में अकर्मक क्रिया का फल कर्त्ता पर पड़ता है। जैसे- पुजारी आता है। इस वाक्य में ‘आता’ क्रिया का फल सीधे कर्ता पुजारी पर पड़ रहा है, अतः क्रिया अकर्मक है। 

अकर्मक क्रिया के भेद

  • अकर्मक क्रिया के दो भेद होते हैं
    • (क) पूर्ण अकर्मक क्रिया 
    • (ख) अपूर्ण अकर्मक क्रिया। 

क. पूर्ण अकर्मक क्रिया

  • जो अकर्मक क्रियाएँ अपने में ही पूर्ण होती हैं, उन्हें पूर्ण अकर्मक क्रिया कहते हैं। इस क्रिया के द्वारा कर्त्ता की स्थिति, स्थान, गति, अस्तित्व, और अवस्था का ज्ञान होता है। इसी कारण इसे स्थिव्यर्थक या गव्यर्थक पूर्ण अकर्मक क्रिया भी कहा जाता है। जैसे- वाययान पटना जा रहा है। इस वाक्य में ‘जाना’ क्रिया स्वयं पूर्ण है। अतः क्रिया पूर्ण अकर्मक क्रिया है, जो पटना स्थान का बोध करा रहा है। 

ख. अपूर्ण अकर्मक क्रिया 

  • जो अकर्मक क्रियाएँ अपने में ही पूर्ण नहीं होती हैं, उन्हें अपूर्ण अकर्मक क्रिया कहते हैं। अपूर्ण अकर्मक क्रिया में कर्त्ता से संबंध स्थापित करने के लिए संज्ञा या विशेषण शब्द की आवश्यकता होती है। जैसे- राजेश डॉक्टर बनेगा। इस वाक्य में ‘बनेगा’ अपूर्ण अकर्मक क्रिया है। कर्त्ता से संबंध बताने के लिए डॉक्टर शब्द का प्रयोग किया गया है। 

2. सकर्मक क्रिया

  • जिस क्रिया में कर्म की आवश्यकता होती है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे-मदन ने गणित पढ़ाया। इस वाक्य में गणित कर्म है तथा पढ़ाना क्रिया जिसका फल कर्म पर पड़ रहा है। अतः क्रिया सकर्मक है। सकर्मक क्रिया में फल कर्म पर पड़ता है। 

सकर्मक क्रिया के भेद

  • सकर्मक क्रिया के तीन भेद हैं
    • (क) एककर्मक सकर्मक क्रिया 
    • (ख) द्विकर्मक सकर्मक क्रिया 
    • (ग) अपूर्ण सकर्मक क्रिया। 

क. एककर्मक सकर्मक क्रिया 

  • जिस सकर्मक क्रिया में एक कर्म होता है, उसे एककर्मक सकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे- गुणगुण ने पुस्तकें खरीदीं। इस वाक्य में ‘खरीदी’ क्रिया का एक ही कर्म है, पुस्तकें। 

ख. द्विकर्मक सकर्मक क्रिया

  • जिस सकर्मक क्रिया में दो कर्म होता है, उसे द्विकर्मक सकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे- रमेश ने सुरेश को गणित पढ़ाया। इस वाक्य में पढ़ाया के दो कर्म सुरेश और गणित हैं। द्विकर्मक क्रिया में एक कर्म सजीव और दूसरा निर्जीव होता है, जिसमें निर्जीव कर्म प्रमुख तथा सजीव कर्म गौण होता है। 

ग. अपूर्ण सकर्मक क्रिया 

  • जिस सकर्मक क्रिया में कर्म होता है, परन्तु अर्थ स्पष्ट नहीं होता, वहाँ अपूर्ण सकर्मक क्रिया होती है। ऐसी क्रियाओं के लिए कर्म से संबंधित एक पुरक शब्द की आवश्यकता होती है जैसे राधा तारा को नहीं समझती। राधा तारा को बहन नहीं समझती। इस वाक्य में पहला वाक्य अपूर्ण सकर्मक क्रिया है, जिसमें पूरक का अभाव है। दूसरे वाक्य में बहन (पूरक) शब्द से स्पष्ट होता है कि अपूर्ण सकर्मक क्रिया में अर्थ को स्पष्ट करने के लिए पूरक शब्द की आवश्यकता होती है।

अकर्मक और सकर्मक क्रिया में अंतर 

  • वाक्य में जो क्रिया होती है, उसके साथ ‘क्या’ प्रश्न करने पर अगर उत्तर मिलता है, तो क्रिया सकर्मक होगी, अगर उत्तर नहीं मिलता है, तो क्रिया अकर्मक होगी। 

संरचना के आधार पर क्रिया के भेद 

  • संरचना के आधार पर क्रिया के तीन भेद होते हैं
    • (1) प्रेरणार्थक क्रिया 
    • (2) संयुक्त क्रिया 
    • (3) समापिका-असमापिका क्रिया। 

1. प्रेरणार्थक क्रिया 

  • जहाँ कर्ता कार्य को स्वयं न करके किसी दूसरे से कराता है या करने की प्रेरणा देता है, उसे प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं। जैसे – श्याम ने चौकीदार से द्वार खुलवाया। इस वाक्य में कर्ता श्याम ने स्वयं द्वार नहीं खोलकर चौकीदार से खुलवाया अतः यहाँ प्रेरणार्थक क्रिया है। 

प्रेरणार्थक क्रिया के भेद 

  • प्रेरणार्थक क्रिया के दो भेद होते हैं
    • (क) प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया 
    • (ख) द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया 

क. प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया

  • जिस क्रिया में कर्ता स्वयं काम करते हुए दुसरो को कार्य करने की प्रेरणा देता है उसे प्रथाम प्रेरणार्थक क्रिया कहते है। 
  • जैसे- दिव्यता आराध्या को पढ़ाती है। इस वाक्य में कर्त्ता दिव्यता स्वयं कार्य करते हुए आराध्या को कार्य करने की प्रेरणा दे रही है अतः यहाँ प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया है। प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया के धातु में ‘आ’ प्रत्यय जोड़ा जाता है। जैसे पीना-पीलाना, करना- कराना। 

ख. द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया

  • जहाँ कर्ता स्वयं काम न करना दूसरों को काम करने की प्रेरणा देता है, उसे द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया कहते है। इसे द्विकर्मक क्रिया भी कहते है। जैसेअध्यापक तेजस्विनी से कहानी सुनवाता है। इस वाक्य में कर्ता अध्यापक स्वयं काम न कर तेजस्विनी को काम करने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए यहाँ द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया है। द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया में धातु के बाद ‘वा’ जोड़ा जाता है। जैसे करना-करवाना। खिलाना-खिलवाना। 

2. संयुक्त क्रिया

  • जब क्रिया दो या दो से अधिक धातुओं के मेल से बनती है, तो उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं। संयुक्त क्रिया में मुख्य क्रिया और रंजक क्रिया के रूप में दो स्वतंत्र अर्थ देने वाली क्रियाओं का योग होता है। जैसे- चल पड़ा। यहाँ चल क्रिया मुख्य क्रिया है तथा पड़ा रंजक क्रिया। रंजक क्रिया- जो क्रिया मुख्य क्रिया के प्रभाव में वृद्धि करती है वह रंजक क्रिया कहलाती है। रंजक क्रिया का अपना अर्थ नहीं होता तथा यह मुख्य क्रिया के बाद आती है। जैसे- अध्यापिका ने कहानी पढ़ा दी। इस वाक्य में ‘दी’ रंजक क्रिया है, जो ‘पढ़ा’ को प्रभावशाली बनाता है। 

संयुक्त क्रिया के 11 भेद होते हैं

 

  1. आरम्भ बोधक
  2. समाप्ति बोधक
  3. अवकाशबोधक
  4. अनुमतिबोध
  5. नित्यता बोधक
  6. आवश्यकता बोधक
  7. निश्चय बाधक
  8. इच्छा बोधक
  9. अभ्यास बोधक
  10. शाक्ति बोधक
  11. पुनरूक्त बोध । 

3. समापिका क्रिया और असमापिका क्रिया

समापिका क्रिया

  • जो क्रिया वाक्य को समाप्त करती है, उसे समापिका क्रिया कहते हैं। यह प्रायः वाक्य के अंत में रहती है। जैसे- मैं पत्र लिखूगा। इस वाक्य में “लिखूगा’ समापिका क्रिया है, जो वाक्य के अंत में आया है तथा वाक्या को समाप्त करती है। 

असमापिका क्रिया 

  • जो क्रिया वाक्य के अन्त में न आकर कहीं और आती हैं, उसे असमापिका क्रिया कहते हैं। जैसे- लड़के खेलते-खेलते थक गए। इस वाक्य में ‘खेलते-खेलते’ क्रिया वाक्य के अंत में न आकर मध्य में आया है। अतः असामापिका क्रिया है।

कृदंत क्रिया 

  • क्रिया या धातु के अन्त में जो प्रत्यय लगाकर क्रिया बनती है, उसे कृदंत क्रिया कहते हैं। 
  • जैसे- बैठ + आ = बैठा चढ + ओ = चढो 

कृदंत क्रिया के भेद 

कृदंत क्रिया के के चार भेद होते हैं- 

  • (क) वर्तमान कालिक कृदंत 
  • (ख) भूतकालिक बंदत 
  • (ग) पूर्वकालिक बंदत 
  • (घ) तात्कालिक वृंदत। 

क. वर्तमानकालिक कृदत क्रिया

  • मूल क्रिया या धातु में ता, ते, ती प्रत्यय लगाकर जो क्रिया बनती है, उसे वर्तमानकालिक बंदत कहते हैं। इसके द्वारा वर्तमान काल का ज्ञान होता है। जैसेपढ़ + ता = पढ़ता पढ़ + ती = पढ़ती चढ़ + ता = चढ़ता पढ़ + ते = पढ़ते 

ख. भूतकालिक कृदत क्रिया

  • मूल क्रिया या धातु में आ, ई, ए प्रत्यय लगाकर जो क्रिया बनती है, उसे भूतकालिक बंदत क्रिया कहते हैं। इसके द्वारा पूर्ण हो गयी क्रियाओं का ज्ञान होता है। इन्हें पूर्ण बंदत क्रिया भी कहते हैं। जैसेगिर + ई = गिरी निकल + ई = निकली बैठ + आ = बैठा जाग + ए = जागे 

ग. पूर्वकालिक बंदत क्रिया

  • मूल क्रिया या धातु में ‘कर’ प्रत्यय लगाकर जो क्रिया बनती है, उसे पूर्वकालिक वृंदत क्रिया कहते है। यह मुख्य क्रिया से पहले आता है। जैसे- आराध्या पढ़कर परीक्षा देने गई। दिव्यता नहाकर पूजा करने गई। तेजस्विनी ने गाकर कविता सुनाई इन वाक्यों में पढ़कर, नहाकर, गाकर पूर्वकालिक कृदत क्रियाएँ हैं, जो मुख्य क्रिया से पहले आई है। 

घ. तात्कालिक वृंदत क्रिया

  • मूल क्रिया या धातु में ‘ते’ प्रत्यय लगाकर क्रिया के बाद ‘ही’ शब्द जोड़कर जो क्रिया बनती है, उसे तात्कालिक कृदंत क्रिया कहते हैं। जैसेमोटरसाइकिल चलाते ही हवा निकल गई। गिलास उठाते ही टूट गई। इन वाक्यों में चलाते, उठाते तात्कालिक बंदत क्रिया है। इन क्रियाओं के बाद ही शब्द का प्रयोग हुआ है।

भावसूचक क्रिया 

  • (वृत्ति, अर्थ और रीति) जिन क्रियाओं के द्वारा कार्य की संभावना, संकेत, आज्ञा निश्चय और संदेह का ज्ञान हो, उसे भावसूचक क्रिया कहते हैं। 
  • भावसूचक क्रिया को ही वृत्ति, अर्थ और रीति भी कहते हैं।

भावसूचक क्रिया के भेद 

  • भावसूचक क्रिया के पाँच भेद होते हैं। 
    • (क) निश्चयसूचक क्रिया 
    • (ख) संभावनासूचक क्रिया 
    • (ग) संकेतसूचक क्रिया 
    • (घ) संदेहसूचक क्रिया और 
    • (ड.) आज्ञा सूचक क्रिया।

क. निश्चयसूचक क्रिया

  • जहाँ कार्य के निश्चय का बोध होता है, उसे निश्चय सूचक क्रिया कहते हैं। जैसे-पटना से आने वाली रेलगाड़ी राँची पहुंच गई। 

ख. संभावनासूचक क्रिया

  • जहाँ कार्य के होने की संभावना का ज्ञान होता है, उसे संभावनासूचक क्रिया कहते हैं। जैसे- हम संभवतः दिल्ली जाएँ। 

ग. संकेतसूचक क्रिया

  • जहाँ कार्य-कारण में संबंध होने का ज्ञान होता है, उसे संकेतसूचक क्रिया कहते है। जैसे- पुष्पा तबला बजाएगी तो सीता नाचेगी। 

घ. संदेहसूचक क्रिया

  • जहाँ कार्य के होने में संदेह होता है, उसे संदेह सूचक क्रिया कहते हैं। जैसे- दवाई की दुकान खुल चुकी होगी। अनुष्का ने नई फ्रांक पहनी होगी। 

ड़. आज्ञा सूचक क्रिया

  • जहाँ कार्य में आज्ञा, चेतावनी, इच्छा, अनुरोध और उपदेश आदि का ज्ञान होता है, उसे आज्ञासूचक क्रिया कहते है। 
  • जैसे- कलम रखकर चले जाओ।