मराठा साम्राज्य Maratha Empire : SARKARI RESULT

मराठा साम्राज्य

शिवाजी ( मराठा साम्राज्य का संस्थापक) 

 

  • शिवाजी ने सर्वप्रथम पूना की जागीर का कार्यभार स्वयं संभाला। 
  • 1646 ई. में शिवाजी ने स्थित तोरण के किले को जीता। 
  • 1648 ई. में पुरंदर के किले को जीता। 
  • 1656 ई. में मराठा सरदार चंद्रराव मोर से जावली का किला जीता। 
  • शिवाजी ने बीजापुर के सेनापति अफज़ल खाँ की हत्या कर दी और बीजापुर के कई क्षेत्रों को भी जीत लिया जैसे- ‘पन्हाला का किला’, ‘कोल्हापुर’ और ‘उत्तरी कोंकण‘। 
  • औरंगजेब ने मुगल गवर्नर शाइस्ता खाँ को भेजा । 
  • शाइस्ता खाँ ने पूना, कल्याण और चाकन इत्यादि के किले पर अधिकार कर लिया। 
  • शिवाजी ने शाइस्ता खाँ के शिविर पर छापामार हमला किया तथा शाइस्ता खाँ को घायल कर दिया। 
  • फिर औरंगज़ेब ने शाइस्ता खाँ को वापस बुला लिया और आमेर के जयसिंह को भेजा । 
  •  1665 में शिवाजी को पुरंदर में घेर लिया गया। 
  •  शिवाजी को 1665 में पुरंदर की संधि करनी पड़ी। 

         पुरंदर की संधि

  • शिवाजी को अपने 23 किले, मुगलों को सौंपने थे। 
  • 12 किले, शिवाजी को अपने पास रखने थे। 
  • शिवाजी के पुत्र शंभाजी को मुगल दरबार में रहना होगा । उसे 5 हज़ार का मनसब प्रदान किया गया। 

 

  • जयसिंह ने शिवाजी को औरंगजेब से मिलने  के लिये आगरा भेजा, किंतु वहाँ शिवाजी को कैद कर लिया गया। 
  • 1666 में वे औरंगज़ेब की कैद से फरार हो गए। 
  • शिवाजी ने सूरत को तीन बार लूटा-1664,1670,1672
  • शिवाजी ने 1674 में अपना राज्याभिषेक रायगढ़ के किले में किया। 
  • राज्याभिषेक की प्रक्रिया काशी के पंडित गंगा भट्ट द्वारा संपन्न की गई। इस अवसर पर शिवाजी ने ‘छत्रपति’, ‘हैंदव धर्मोद्धारक’, गौ-बाह्मण प्रतिपालक की उपाधि धारण की तथा अपने को ‘सूर्यवंशी क्षत्रिय‘ घोषित किया।

 

  •  1677 में गोलकुंडा की सहायता से शिवाजी ने अपना अंतिम अभियान कर्नाटक में किया तथा जिंजी, वैल्लोर इत्यादि के क्षेत्र को जीता। 
  • 1680 में शिवाजी की मृत्यु हो गई।

 

शिवाजीकालीन प्रशासनिक व्यवस्था 

केंद्रीय शासन 

  • शिवाजी के केंद्रीय प्रशासन में  ‘अष्टप्रधान’ आठ मंत्रियों का समूह था 
  • ये सभी मंत्री केवल व्यक्तिगत रूप से शिवाजी के प्रति उत्तरदायी थे तथा उनकी भूमिका सलाहकारी थी। 

पेशवा 

(प्रधानमंत्री)

प्रशासन से  संबंधित सभी सैनिक एवं असैनिक कार्य

सर-ए-नौबत 

सैन्य विभाग का प्रमुख

अमात्य/मजमुआदार

आय-व्यय का लेखा-जोखा

सचिव/शुरु-नवीस/चिटनिस

राजकीय पत्राचार का कार्य

सुमंत/दबीर

विदेशी मामलों

वाकिया-नवीस/मंत्री

राजा के दैनिक कार्यों को

पंडित राव

धार्मिक मामलों

न्यायाधीश

न्याय से संबंधित

 

नोट : पंडित राव एवं न्यायाधीश के अतिरिक्त सभी को सैन्य-सेवा देनी होती थी।

 

प्रांतीय प्रशासन 

 शिवाजी ने साम्राज्य को 3 भागों में बाँटा था।

  • उत्तरी प्रांत- सूरत से पूना तक। इसके प्रमुख मोरोपंत पिंगले थे 
  • दक्षिणी प्रांत– इसमें समुद्र तटीय क्षेत्र एवं दक्षिणी कोंकण शामिल था। इसके प्रमुख अन्नाजी दत्तो थे 
  • क्षिणी-पूर्वी प्रांत- इसमें सतारा, कोल्हापुर, इत्यादि आते थे। इसके प्रमुख दत्ताजी पंत थे। 

नोट :  शिवाजी के क्षेत्र को ‘स्वराज‘ भी कहा जाता था। 

 

 प्रांत का प्रशासनिक विभाजन

  • महाल राज्य
  • परगनाप्रांत 
  • तरफ ज़िला (गोलकुंडा और बीजापुर में) 
  • मौजागाँवों को समूह 

 

नोट: ग्रामीण स्तर पर पटेल, कुलकर्णी के अतिरिक्त 12 अलूटे (सेवक), 12 बलूटे (शिल्पी) होते थे। 

 

सैन्य व्यवस्था 

  •  शिवाजी की सेना के प्रमुख अंग- पैदल सेना(‘पायक/पाइक’),अश्व सेना एवं नौसेना थे। 
  • अश्व (घुड़सवार) सेना
    • पागा (शाही घुड़सवार सेना)/बारगीर- नियमित घुड़सवार 
    •  सिलहदार-अनियमित सैनिक 

 

पागा (शाही घुड़सवार सेना)/बारगीर- नियमित घुड़सवार

  • 25 घुड़सवार को 1 हवलदार नियंत्रित करता था। 
  • 5 हवलदार को 1 जुमलादार नियंत्रित करता था। 
  • 10 जुमलादार को एकहज़ारी नियंत्रित करता था। 
  • 5 एकहज़ारी को पंचहज़ारी नियंत्रित करता था।
  • ‘सर-ए-नौबत’ सेना का सर्वोच्च अधिकारी होता है।  
  • हवलदार < जुमलादार < एकहज़ारी< पंचहजारी< सर-ए-नौबत 
  •  ‘हवलदार’ और ‘सर-ए-नौबत’ पद मराठों को दिया जाता था। 
  • ‘सबनिस’ का पद ब्राह्मणों को दिया जाता था।

 

सिलहदार– ये अनियमित सैनिक थे। । 

 

नौसेना

  • 1658 में कल्याण विजय के बाद नौसैनिक अड्डा स्थापित किया गया। 
  • कोलाबा शिवाजी की नौसेना का मुख्य केंद्र बन गया। 
  • उनकी नौसेना में सबसे प्रमुख भूमिका आंग्रियों की थी। 
  • उस समय उस क्षेत्र में सबसे प्रमुख नौसैनिक शक्ति जंजीरा के सीदियों की थी। 

 

भू-राजस्व व्यवस्था 

  • शिवाजी ने अन्नाजी दत्तो से भूमि सर्वेक्षण कराया तथा भू-राजस्व व्यवस्था को अहमदनगर के मलिक अंबर की व्यवस्था पर आधारित मापन प्रणाली को अपनाया। 
  • मापन की इकाई काठी/मूठा थी।
    • 20 काठी = 1 बीघा 
    • 120 बीघा = 1 चावर 
  • भू-राजस्व की दर 33 प्रतिशत थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दिया गया। 
  • राजस्व अनाज एवं नकद दोनों ही रूपों में लिया जाता था। 
  • शिवाजी ने लगान वसूली के लिये रैय्यतवाड़ी व्यवस्था को अपनाया। इसमें किसानों के साथ सीधी लगान वसूली की । 
  • शिवाजी के समय देशमुखों (जमींदारों) के अधिकारों को समाप्त कर दिया। 
  • ग्रामीण स्तर पर भू राजस्व वसूली में पाटिल (पटेल) एवं कुलकर्णी थे । 
  • पटेल का कार्य भू राजस्व की वसूली था।  
  • कुलकर्णीभूमि की माप एवं लेखे जोखे से संबंधित था। 

चौथ 

सरदेशमुखी

  • पड़ोसी राज्यों से
  • आय का 1/4 हिस्सा
  • स्वयं के राज्यों से
  • आय का 1/10 हिस्सा

 

मोकासा ( सरंजाम) 

  • ये जागीरें थीं, जो कि प्रमुख मराठा सरदारों को दिया जाता था। कुछ मराठा सरदारों को नकद में भी वेतन दिया जाता था।

 

शिवाजी के उत्तराधिकारी 

शंभाजी (1680-89 ई.) 

  • मराठा सेनापति हमीर मोहिते की सहायता से शंभाजी शासक बन गया। 
  •  शंभाजी ने मुगल सूबेदार दिलेर खाँ से समझौता कर लिया जिसमें शंभाजी को 7 हज़ार का मनसब मिला । 
  •  शंभाजी ने निलोपंत को अपना पेशवा बनाया और उज्जैन/कन्नौज के कवि कलश को मुख्य सलाहकार नियुक्त कर दिया। 
  • औरंगजेब के विद्रोही पुत्र अकबर द्वितीय को शरण दी ,जो मुगलों से संघर्ष का कारण बन गया। 
  • 1689 के संगमेश्वर के युद्ध में मुगल सेनापति मुबारक खाँ ने शंभाजी की हत्या करा दी  । 
  •  शंभाजी की पत्नी येसूबाई और पुत्र शाहू को गिरफ्तार कर ली । 
  •  शंभाजी ने शिवाजी की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ ‘अष्टप्रधान’ को नष्ट कर दिया 
  • उसी के समय से मराठे युद्ध में भी स्त्रियों को साथ ले जाने लगे

 

राजाराम (1689-1700 ई.) 

  •  उसने एक नया पद ‘प्रतिनिधि’ का गठन किया और पहला प्रतिनिधि प्रह्लाद निराजी को बनाया। 
  • मुगलों के आक्रमण के डर से राजाराम इधर-उधर भागता रहा। इसलिये उसे कभी सिंहासन पर न बैठने वाला शासक कहा गया। 
  • उसने 8 वर्ष तक जिंजी (अर्काट) के किले में शरण ले रखी थी। 
  •  राजाराम ने ‘सरंजाम’ प्रथा को पुनः शुरू कर दिया। 
  •  राजाराम के पलायन का क्रम

 

शिवाजी द्वितीय तथा ताराबाई (1700-1707 ई.) 

 

शाहू (1707-1749 ई.) 

  • शाहू को मुगल कारावास में औरंगज़ेब की पुत्री जीनत-उल-निशा ने पाला था।  
  • 1707 ई. में बहादुरशाह के समय राजकुमार आजमशाह ने  शाहू को कैद से रिहा कर दिया 
  • शाहू और ताराबाई में उत्तराधिकार का संघर्ष प्रारंभ हो गया। 
  •  1707 ई. में खेड़ा  के युद्ध में ताराबाई को शाहू से पराजित होना पड़ा। 
  • कोल्हापुर में ताराबाई और उसके पुत्र का प्रभुत्व स्थापित हुआ तो सतारा में शाहू ने राज्याभिषेक करवाया। 
  • 1731 की वार्ना की संधि के द्वारा कोल्हापुर के शासक ने सतारा की अधीनता स्वीकार ली
  • 1749 में शाहूजी की मृत्यु के बाद पेशवा ही राज्य का सर्वोपरि था।

मराठा शक्ति का विस्तार और पेशवा 

बालाजी विश्वनाथ

(1713-20 ई.). 

बाजीराव प्रथम 

(1720-40 ई.) 

बालाजी बाजीराव

(1740-61  ई.)

माधव राव 

(1761- 72 ई.)

नारायण राव 

(1772-73 ई.)

रघुनाथ राव 

1773

माधव नारायण राव

(1774-95 ई.)

बाजीराव द्वितीय 

(1795-1851 ई.)

नाना  साहब (धोंधू पंत )

(1851- 58ई.)

 

बालाजी विश्वनाथ(1713-20 ई.). 

  • शाहू ने एक नये पद ‘सेनाकर्ते’ (सेना को संगठित करने वाला) का सृजन किया और बालाजी को पद सौंपा। 
  • मुगल शासक फर्रुखसियर के तख्त-पलट में बालाजी ने सैयद बंधुओं का साथ दिया। जिसके तहत एक संधि हुई, जिसमें प्रावधान था कि
    • शाहू को शिवाजी का ‘स्वराज’ सौंप दिया जायेगा। 
    • मराठों द्वारा जीते गये प्रदेशों को भी शाहू को दे दिया जायेगा।
    • दक्कन के क्षेत्रों में मराठों को चौथ व सरदेशमुखी का अधिकार होगा, जिसके बदले में 15000 मराठा घुड़सवार मुग़लों की सेवा में रहेंगे। 
    • कोल्हापुर में शंभु जी द्वितीय को शाहू परेशान नहीं करेंगे। 
    • मराठा प्रतिवर्ष सम्राट को 10 लाख रुपये खिराज देंगे।
    •  शाहू की माता एवं रिश्तेदारों को रिहा कर दिया जायेगा। 
  • तख्त पलट के बाद शासक रफी-उद्द-रजात ने इस संधि को स्वीकार लिया। 
  •  रिचर्ड टेम्पल ने इस संधि को ‘मराठों का मैग्नाकार्टा‘ कहा है।
  • 1720 में बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद शाहू ने उनके बड़े पुत्र बाजीराव प्रथम को पेशवा नियुक्त किया। 

 

बाजीराव प्रथम (1720-40 ई.) 

  • बाजीराव प्रथम ने शाहू से कहा कि “अब वक्त आ गया है कि जर्जर वृक्ष के तने पर प्रहार किया जाये तो हमारी सत्ता अटक से कटक तक स्थापित हो जायेगी“। 
  • इसी संदर्भ में उसने छत्रशाल बुंदेला की सहायता की और मुग़लों तथा रूहेलों द्वारा छीने गये उसके प्रदेशों को वापस दिलाया।
  • इसी समय बाजीराव की मुलाकात मस्तानीबाई नामक युवती से हुई। 
  • 1724 में निज़ाम-उल-मुल्क ने ‘शकूर खेड़ा’ के युद्ध में मुगल सूबेदार मुबारिज़ खां को शिकस्त दी। संभवतः इसमें बाजीराव ने सहायता की, क्योंकि अभी निज़ाम के प्रति उसने तटस्थता की नीति अपनाई।

 

छत्रशाल बुंदेला

  • पूरा नाम- बुंदेल केसरी महाराजा छत्रसाल बुंदेला।
  • छत्रसाल का जन्म – 4 मई 1649 को हुआ।
  • छत्रसाल की मृत्यु – 20 दिसंबर 1731 को हुई।
  • महाराजा छत्रसाल के पिता का नाम क्या था- चंपत राय बुंदेला।
  • पुत्री का नाम- मस्तानी।
  • महाराजा छत्रसाल के घोड़े का नाम- महाराजा छत्रसाल के घोड़े का नाम “भलेभाई”  था।
  • प्रतिवर्ष 20 दिसंबर को इनक पुण्यतिथि जबकि प्रतिवर्ष 4 मई को छत्रसाल जयंती मनाई जाती है।
  • Maharaja Chhatrasal Stadium उत्तरी दिल्ली में स्थित है
  • महाराजा छत्रसाल के गुरु – प्राणनाथ
  • बुंदेलखंड के शिवाजी के नाम से प्रख्यात छत्रसाल

 

 निज़ाम से संघर्ष 

  • ‘चौथ’ और ‘सरदेशमुखी‘ के प्रश्न पर हैदराबाद व बाजीराव के बीच, मुख्यत: 2 संघर्ष हुये:
    •  1728 का पालखेड़ा का युद्ध, जिसमें निज़ाम पराजित हुआ  और उसे मुंगी शिवगांव की संधि‘ करनी पड़ी। 
    • 1737-38 का भोपाल का युद्ध, यहाँ भी निज़ाम को पराजित होकर ‘दुरई-सराय’ की संधि करनी पड़ी। 

 

नोट: 1731 की वार्ना की संधि के द्वारा कोल्हापुर के शासक ने सतारा की अधीनता स्वीकार ली, जो बाजीराव-I की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। 

  •  1737 ई में बाजीराव ने बड़ी तीव्रता से मात्र 500 सैनिकों के साथ दिल्ली पर आक्रमण किया और मुहम्मद शाह रंगीला को दिल्ली छोड़नी पड़ी। गुजरात, मालवा, बुंदेलखंड पर भी मराठों ने प्रभुत्व की पताका लहराई।
  •  शिवाजी के बाद गुरिल्ला पद्धति का सर्वश्रेष्ठ संचालक। 
  •  पुर्तगालियों से सालसेट व बसीन प्राप्त किया। 
  • संघीय ढाँचे की शुरुआत इसी के समय प्रारंभ होती है।

 

बालाजी बाजीराव (1740-61) 

  •  नाना साहब के नाम से प्रसिद्ध। 
  • 1750 की ‘संगोला की संधि‘ से पेशवा मराठा साम्राज्य का वास्तविक शक्ति बन गया। इसे पेशवाओं के लिये ‘राजनैतिक क्रांति’ कहा जाता है। 
  • यह अपनी राजधानी सतारा से पूना ले आया।
  • इसके शासनकाल में मराठा साम्राज्य का अधिकतम विस्तार हुआ। मालवा,बुंदेलखंड पर अधिकार को कायम रखते हुये इसने तंजौर को भी जीत लिया और सबसे बढ़कर राजपूत क्षेत्रों से भी चौथ वसूलने लगा। 
  •  इसने ‘हिंदू पद पादशाही’ धर्म का उल्लंघन किया। 

 

निजाम से संघर्ष 

  • 1752 में निजाम को शिकस्त दी और निजाम को ‘भलकी की संधि’ करनी पड़ी। 
  • 1757 में उसने निजाम को ‘सिंदरखेड़’ के युद्ध में हराया। 
  •  1760 में उदगीर के युद्ध में निजाम पुनः परास्त हुआ। 
  •  इसने इमाद-उल-मुल्क को वजीर बनने में सहायता की।

 

पानीपत का तृतीय युद्ध (1761 ई.) 

  • पानीपत का तृतीय युद्ध अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली एवं मराठों के बीच लड़ा गया।
  •  इस युद्ध का मुख्य कारण यह था कि अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली  ने पंजाब में राजकुमार तैमूर को अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया था। किंतु, मराठों ने उसे हटाकर अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया, जिससे असंतुष्ट अब्दाली ने पुनः आक्रमण कर दिया। 
  • इस युद्ध में मराठों की पराजय हुई। 
  • इस युद्ध का नेतृत्व पेशवा बालाजी बाजीराव का चचेरा भाई सदाशिवराव भाऊ एवं पेशवा का पुत्र विश्वास राव कर रहे थे। मराठों की ओर से तोप खाने का नेतृत्व इब्राहिम गार्दी ने किया। 
  • इस युद्ध में अहमद शाह अब्दाली के साथ शुजाउद्दौला (अवध), नजीबुझौला रूहेला, हाफ़िज़ रहमत खाँ, दुदि खाँ एवं सादुल्लाह खाँ थे। 
  • इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन काशीराज पंडित ने किया। 
  • मराठों की पराजय की सूचना पेशवा बालाजी बाजीराव को काशीराज पंडित ने इन शब्दों में भेजी, ” दो हीरे नष्ट हो गए,अर्थात् युद्ध के दौरान सदाशिवराव भाऊ एवं विश्वास राव तथा अनेक योग्य मराठा सरदार मारे गए। 

 

कामविसदार

शिवाजी के साम्राज्य के अंतर्गत छोटे प्रांतों के सूबेदार

मामलतदार 

बड़े प्रांतों के सूबेदार

(ये दोनों पद शिवाजी के समय तक स्थाई व आनुवंशिक नहीं थे, किंतु पेशवाओं के समय या शिवाजी के बाद ये पद आनुवंशिक हो गए।)

पोतनिश

शाही खजाने की आमदनी व खर्चे की देखरेख

कारखानाविस 

अन्नभंडार का प्रभारी

कुर्जापट्टी

आपातकालीन कर 

पोलपट्टी 

युद्ध में लूटा गया अंश (मुख्यतः पिंडारियों से संबंधित)

फितना

राजनैतिक फूट या मन मुटाव का लाभ उठाकर दबाव और समझौते की रणनीति। इसी प्रक्रिया के द्वारा मराठी ने अपना सर्वाधिक साम्राज्य विस्तार किया।

हजूर दफ़्तर 

पूना में पेशवा का सचिवालय 

मिरासदार

(मिरासी)

वह वर्ग जिनका भूमि पर वंशानुगत स्वामित्व होता था।

वतन

मूलतः यह अरबी शब्द है जिसका अर्थ जीविका का स्रोत होता है। मराठा साम्राज्य में किसी व्यक्ति का उसकी सेवा के बदले प्रदत्त भूमि अनुदान ‘वतन कहलाता था।