Bone Pakalay Saiya Koir ( बोने पाकलइ सइयाँ कोइर – दिनेश दिनमणि)

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 बोने पाकलइ सइयाँ कोइर

दिनेश दिनमणि,- बाराडीह, बोकारो

भावार्थ 👍

 इस गीत में एक झारखंडी स्त्री अपने पति से जंगल चलकर पके पके सइयाँ कोइर तोड़कर खाने का अनुरोध करती है।  पति बहाने बनाकर पत्नी को टालना चाहता है पर पत्नी हर बहाने को खारिज कर दी जाती है और अंततः पति को जंगल जाने के लिए राजी कर लेती है।  

कहती है जंगल में मीठे-मीठे सइयाँ कोइर पक गए हैं।  मन विचलित हो रहा है, चलो ना हम खोइछा  भर के बेर तोड़ेंगे और खाएंगे।  तब पति कहता है अरे जंगल क्या जाओगी जंगल का रास्ता बड़ी कठिन है जंगल के रास्ते उबड़ खाबड़ ऊंच-नीच कांटे कंकर से भरे हुए हैं।  बहुत परेशानी होगा। 

 पत्नी कहती है अरे कोई बात नहीं हंसते-हंसते कठिन रास्ते को दोनों मिलकर पार कर लेंगे।  हम मीठी-मीठी बातें करते चलेंगे रास्ते के कठिनाइयों का एहसास ही नहीं होगा। 

 चलिए बहाना मत बनाइए।  पति कहता है ठीक है चलो चलते हैं बेर तोड़ने लेकिन बेर तोड़ते अगर कांटा चुभ जाए तो ? तब पत्नी कहती है कोई दिक्कत नहीं मैं अपने दांतो से आपकी अंगुली में चुभे  कांटे को निकाल दूंगी और घायल अंगुली में जंगल की जड़ी बूटियां पीसकर लगा दूंगी, ठीक हो जाएगा। 

 सोचना नहीं है चलिए।  पत्नी को डराते हुए पति कहता है कि जंगल में कई तरह के खतरनाक जानवर होते हैं इसलिए वहां जाना खतरा से भरा हुआ है।  पत्नी कहती है अरे उससे कोई परेशानी नहीं है, जंगली जानवर तो हमारे मित्र हैं , जंगल के रखवाले हैं, वे बेवजह कुछ नुकसान पहुंचाते नहीं है।  फिर भी अगर कोई झपट  करे तो उससे हमें मुकाबला भी करना है।  मैं झारखंडी बेटी  हूं आघात करने वाले जानवर को आत्मरक्षा के पलाश की लाठी से, मार कर, डरा कर भगा देंगे।  

पति कहता है जंगल में बेर खाते खाते प्यास लग जाएगी, तो क्या करोगी।  पत्नी कहती है, अरे जंगल में उसका तो जुगाड़ बहुत बढ़िया है।  जहां तहां पहाड़ से झरने गिरते हैं, उसके पानी को सखुवा  पत्तों का दोना बनाकर प्रेम से पिलाऊंगी।  चलिए उसका टेंशन मत लीजिए।  पत्नी कहती है ,जंगल में सिर्फ बेर ही नहीं, बल्कि अलग-अलग तरह के सुंदर सुंदर मनमोहक रंग-बिरंगे फूल भी होते हैं।  फूलों से आपके लिए सुंदर सी माला बनाऊंगी और मैं भी अपने खोंपा  में खोस  कर सिंगार करूंगी।  पति तैयार हो जाता है जाने के लिए। 

 

 

(पत्नी) सइयाँ चला, चला ना हो बोने, पाकलइ सइयाँ कोइर-2

बाछी-बाछी पाकल-पाकल -2, तोरब खोइँछा भोइर

सइयाँ चाला चाला ना….

 

(पति) बड़ी कठिन धनी बोना के डहरा

(पत्नी) हाँसइते खेलइते संग बिततइ डहरा

गाला मारबइ सइयाँ-2 हामिन हिया भोइर

सइयाँ चला……..।।

 

(पति) कोइरा तोरइतें जोदि काँटा गड़ल हाथे 

(पत्नी) काँटा काढ़बो सइयाँ हमें धरी दाँते

घावें लगइबो सइयाँ-2 पीसी बोनेक जइर

सइयाँ चला……..।।

 

(पति) बाघा हुँड़ारा धनी, बोना गाजारें

(पत्नी) घात करले सइयाँ बिंधबइ काँड़े

पीटबइ कुरथीपीटा पारास ठेंगा तोइर

सइयाँ चला….।।

 

(पति) कोइरा खायलें धनी, लागतउ पियास

(पत्नी) झरना केर हेमाल पानीं मेटइबो पियास

दोना टिपी पानी देबो-2

 

सरइ पाता तोइर, सइयाँ चला….।।

 

(पत्नी) बोना माँझइरे सइयाँ, नाना लेखे फूला

तोहर लगी गाँथब पिया, अति सुंदर माला ।

हाम्हूँ गोंजब फूला, आपन खोपा भोइर, सइयाँ चला…2  

बाछी बाछी….

 

सइयाँ चला चला ना हो..

(पति) धनी चालें – चालें ना गे

बोनें तोर-बइ सइयाँ कोइर।

 

Q. बोने पाकलइ सइयाँ कोइर गीत के लिखबइया के लागथीन  ? दिनेश दिनमणि

Q. बोने पाकलइ सइयाँ कोइर गीत कौन किताब में छपल/इंजरायल  हे  ? सोहान लागे रे

Q.सोहान लागे रे के किताब के संपादक के लगे ? दिनेश दिनमणि

Q.सइयाँ कोइर क्या है ? एक प्रकार का फल 

Q. दिनेश दिनमणि के जन्मथान हकय   ? बाराडीह, बोकारो

Q.बोने पाकलइ सइयाँ कोइर किस प्रकार का रचना है ? शिष्ट गीत