मैं क्यों लिखता हूँ – अज्ञेय 

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन – अज्ञेय 

  • सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्म सन् 1911 में उ.प्र. के देवरिया जिले के कसिया (कुशीनगर) इलाके में हुआ ।
  • प्रारंभिक शिक्षा जम्मू-कश्मीर में हुई और बी.एस.सी. लाहौर से की।
  • क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेने के कारण अज्ञेय को जेल भी जाना पड़ा। 
  • साहित्य एवं पत्रकारिता को पूर्णतः समर्पित अज्ञेय ने देश-विदेश की अनेक यात्राएँ कीं। उन्होंने कई नौकरियाँ कीं और छोड़ीं। आज़ादी के बाद की हिंदी कविता पर अज्ञेय का व्यापक प्रभाव है। कविता के अलावा उन्होंने कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृत्तांत, निबंध, आलोचना आदि अनेक विधाओं में भी लेखन किया है। 
  • उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं-
    • भग्नदूत, चिंता, अरी ओ करुणा प्रभामय, इंद्रधनु रौंदे हुए ये, आँगन के पार द्वार (काव्य-संग्रह), शेखर: एक जीवनी, नदी के द्वीप (उपन्यास), विपथगा, शरणार्थी, जयदोल (कहानी-संग्रह), त्रिशंकु, आत्मनेपद (निबंध), अरे यायावर रहेगा याद (यात्रा-वृत्तांत) ।
  • अज्ञेय द्वारा संपादित तार सप्तक सहित चार सप्तकों का समकालीन हिंदी कविता के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है।
  • साहित्य अकादेमी एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार सहित अज्ञेय को अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी पुरस्कृत किया गया। सन् 1987 में उनका देहावसान हो गया। 
  • बौद्धिकता की छाप अज्ञेय के संपूर्ण लेखन में मिलती है। उनके लेखन के मूल में वैयक्तिकता की पहचान की समस्या है। 

 

मैं क्यों लिखता हूँ? – अज्ञेय 

हिंदी में एक समय इस पर चर्चा हुई थी कि लेखक क्यों लिखता है, किसके लिए लिखता है, उसके लेखन का प्रयोजन क्या है? अज्ञेय का यह निबंध भी उसी बहस से जुड़ा है। 

अज्ञेय ने अपने इस छोटे से निबंध में यह बताया है कि रचनाकार की भीतरी विवशता ही उसे लेखन के लिए मजबूर करती है और लिखकर ही रचनाकार उससे मुक्त हो पाता है। अज्ञेय का मानना है कि प्रत्यक्ष अनुभव जब अनुभूति का रूप धारण करता है तभी रचना पैदा होती है। अनुभव के बिना अनुभूति नहीं होती परंतु जरूरी नहीं कि हर अनुभव अनुभूति बने। अनुभव जब भाव – जगत और संवेदना का हिस्सा बनता है तभी वह कलात्मक अनुभूति में रूपांतरित होता है। अज्ञेय ने हिरोशिमा कविता के उदाहरण द्वारा अपनी बात स्पष्ट की है। 

 

मैं क्यों लिखता हूँ? – अज्ञेय 

मैं क्यों लिखता हूँ? यह प्रश्न बड़ा सरल जान पड़ता है पर बड़ा कठिन भी है। क्योंकि इसका सच्चा उत्तर लेखक के आंतरिक जीवन के स्तरों से संबंध रखता है। उन सबको संक्षेप में कुछ वाक्यों में बाँध देना आसान तो नहीं ही है, न जाने सम्भव भी है या नहीं? इतना ही किया जा सकता है कि उनमें से कुछ का स्पर्श किया जाए – विशेष रूप से ऐसों का जिन्हें जानना दूसरों के लिए उपयोगी हो सकता है। 

एक उत्तर तो यह है कि मैं इसीलिए लिखता हूँ कि स्वयं जानना चाहता हूँ कि क्यों लिखता हूँ-लिखे बिना इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल सकता है। वास्तव में सच्चा उत्तर यही है। लिखकर ही लेखक उस आभ्यंतर (भीतर का, अंदरुनी) विवशता को पहचानता है जिसके कारण उसने लिखा- और लिखकर ही वह उससे मुक्त हो जाता है। मैं भी उस आंतरिक विवशता से मुक्ति पाने के लिए, तटस्थ होकर उसे देखने और पहचान लेने के लिए लिखता हूँ। मेरा विश्वास है कि सभी कृतिकार – क्योंकि सभी लेखक कृतिकार नहीं होते; न उनका सब लेखन ही कृति होता है – सभी कृतिकार इसीलिए लिखते हैं। यह ठीक है कि कुछ ख्याति मिल जाने के बाद कुछ बाहर की विवशता से भी लिखा जाता है – संपादकों के आग्रह से, प्रकाशक के तकाजे से, आर्थिक आवश्यकता से। पर एक तो कृतिकार हमेशा अपने सम्मुख ईमानदारी से यह भेद बनाए रखता है कि कौन-सी कृति भीतरी प्रेरणा का फल है, कौन-सा लेखन बाहरी दबाव का, दूसरे यह भी होता है कि बाहर का दबाव वास्तव में दबाव नहीं रहता, वह मानो भीतरी उन्मेष ( प्रकाश, दीप्ति) का निमित्ति‘ (कारण ) बन जाता है। 

यहाँ पर कृतिकार के स्वभाव और आत्मानुशासन का महत्त्व बहुत होता है। कुछ ऐसे आलसी जीव होते हैं कि बिना इस बाहरी दबाव के लिख ही नहीं पाते इसी के सहारे उनके भीतर की विवशता स्पष्ट होती है- यह कुछ वैसा ही है जैसे प्रातःकाल नींद खुल जाने पर कोई बिछौने पर तब तक पड़ा रहे जब तक घड़ी का एलार्म न बज जाए। इस प्रकार वास्तव में कृतिकार बाहर के दबाव के प्रति समर्पित नहीं हो जाता है, उसे केवल एक सहायक यंत्र की तरह काम में लाता है जिससे भौतिक यथार्थ के साथ उसका संबंध बना रहे। मुझे इस तो सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती लेकिन कभी उससे बाधा भी नहीं होती । उठने वाली तुलना को बनाए रखूँ तो कहूँ कि सबेरे उठ जाता हूँ अपने आप ही, पर अलार्म भी बज जाए कोई हानि नहीं मानता। 

यह भीतरी विवशता क्या होती है? इसे बखानना बड़ा कठिन है। क्या वह नहीं होती यह बताना शायद कम कठिन होता है। या उसका उदाहरण दिया जा सकता है – कदाचित् वही अधिक उपयोगी होगा। अपनी एक कविता की कुछ चर्चा करूँ जिससे मेरी बात स्पष्ट हो जाएगी। 

मैं विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ, मेरी नियमित शिक्षा उसी विषय में हुई। अणु क्या होता है, कैसे हम रेडियम- धर्मी तत्वों का अध्ययन करते हुए विज्ञान की उस सीढ़ी तक पहुँचे जहाँ अणु का भेदन संभव हुआ, रेडियम-धर्मिता के क्या प्रभाव होते हैं इन सबका पुस्तकीय या सैद्धांतिक ज्ञान तो मुझे था। फिर जब वह हिरोशिमा में अणु बम गिरा, तब उसके समाचार मैंने पढ़े; और उसके परवर्ती प्रभावों का भी विवरण पढ़ता रहा। इस प्रकार उसके प्रभावों का ऐतिहासिक प्रमाण भी सामने आ गया। विज्ञान के इस दुरुपयोग के प्रति बुद्धि का विद्रोह स्वाभाविक था, मैंने लेख आदि में कुछ लिखा भी पर अनुभूति के स्तर पर जो विवशता होती है वह बौद्धिक पकड़ से आगे की बात है और उसकी तर्क संगति भी अपनी अलग होती है। इसलिए कविता मैंने इस विषय में नहीं लिखी । यों युद्धकाल में भारत की पूर्वीय सीमा पर देखा था कि कैसे सैनिक ब्रह्मपुत्र में बम फेंक कर हज़ारों मछलियाँ मार देते थे। जबकि उन्हें आवश्यकता थोड़ी-सी होती थी, और जीव के इस अपव्यय से जो व्यथा भीतर उमड़ी थी, उससे एक सीमा तक अणु बम द्वारा व्यर्थ जीव-नाश का अनुभव तो कर ही सका था। 

जापान जाने का अवसर मिला, तब हिरोशिमा भी गया और वह अस्पताल भी देखा जहाँ रेडियम- पदार्थ से आहत लोग वर्षों से कष्ट पा रहे थे। इस प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव भी हुआ – पर अनुभव से अनुभूति गहरी चीज़ है, कम-से-कम कृतिकार के लिए। अनुभव तो घटित का होता है, पर अनुभूति संवेदना और कल्पना के सहारे उस सत्य को आत्मसात् कर लेती है जो वास्तव में कृतिकार के साथ घटित नहीं हुआ है। जो आँखों के सामने नहीं आया, जो घटित के अनुभव में नहीं आया. वही आत्मा के सामने ज्वलंत प्रकाश में आ जाता है, तब वह अनुभूति प्रत्यक्ष हो जाता है। 

तो हिरोशिमा में सब देखकर भी तत्काल कुछ लिखा नहीं, क्योंकि इसी अनुभूति प्रत्यक्ष की कसर थी। फिर एक दिन वहीं सड़क पर घूमते हुए देखा कि एक जले हुए पत्थर पर एक लंबी उजली छाया है-विस्फोट के समय कोई वहाँ खड़ा रहा होगा और विस्फोट से बिखरे हुए रेडियम-धर्मी पदार्थ की किरणें उसमें रुद्ध’ हो गई होंगी- जो आस-पास से आगे बढ़ गई उन्होंने पत्थर को झुलसा दिया, जो उस व्यक्ति पर अटकीं उन्होंने उसे भाप बनाकर उड़ा दिया होगा। इस प्रकार समूची ट्रेजडी जैसे पत्थर पर लिखी गई। 

उस छाया को देखकर जैसे एक थप्पड़-सा लगा। अवाक् इतिहास जैसे भीतर कहीं सहसा एक जलते हुए सूर्य-सा उग आया और डूब गया। मैं कहूँ कि उस क्षण में अणु-विस्फोट मेरे अनुभूति प्रत्यक्ष में आ गया- एक अर्थ में मैं स्वयं हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता बन गया। 

इसी में से वह विवशता जागी। भीतर की आकुलता बुद्धि के क्षेत्र से बढ़कर संवेदना के क्षेत्र में आ गई… फिर धीरे-धीरे मैं उससे अपने को अलग कर सका और अचानक एक दिन मैंने हिरोशिमा पर कविता लिखी-जापान में नहीं, भारत लौटकर, रेलगाड़ी में बैठे-बैठे। 

यह कविता अच्छी है या बुरी; इससे मुझे मतलब नहीं है। मेरे निकट वह सच क्योंकि वह अनुभूति – प्रसूत है, यही मेरे निकट महत्त्व की बात है। 

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