ब्रह्मांड एवं सौरमंडल (Universe and Solar System )

ब्रह्मांड एवं सौरमंडल (universe and solar system )

भूगोल से संबंधित रचनाएँ

रचना

रचनाकार

आर्यभट्टीयम्

आर्यभट्ट 

सिद्धांत शिरोमणि 

भास्कराचार्य 

(भास्कर द्वितीय)

इलियड एवं ओडिसी

होमर

ज्योग्राफिका

स्ट्रैबो

किताब-उल-हिंद (भारत का भूगोल)

अलबरूनी

नेचुरल हिस्ट्री/ हिस्टोरिया नेचुरलिस

प्लिनी द एल्डर

द ज्योग्राफी ऑफ द पीस

निकोलस जॉन स्पाइकमैन 

कॉसमॉस

cosmos

अलेक्जेंडर वॉन हंबोल्ट

Alexander von Humboldt

डाई एर्डकुंडे

Die Erdkunde

कार्ल रिटर

Carl Ritter’s

द ज्योग्राफी 

the geography

टॉलेमी

किताब सूरत-अल-अर्द

अल-ख्वारिज्मी 

एंथ्रोपोज्योग्राफी

Anthropogeography

फ्रेडरिक रेटजेल

Friedrich Ratzel

पॉलिटिक्स

अरस्तु

अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य 

  • एनेक्ज़ीमेंडर ने सर्वप्रथम मापक के आधार पर विश्व का मानचित्र बनाया था। 
  • भूगोलवेत्ता ‘कार्ल रिटर’ ने पृथ्वी तल का अध्ययन मानव को केंद्र में रखकर किया। इन्हें ‘आराम कुर्सी वाला भूगोलवेत्ता’ कहा जाता है। 
  • टॉलेमी ने सर्वप्रथम विश्व मानचित्र पर भारत को दर्शाया था।
  • सर्वप्रथम औद्योगिक स्थानीकरण सिद्धांत का प्रतिपादन – वेबर ने
  • ‘पारिस्थितिक तंत्र’ (Ecosystem) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग – ए.जी. टांसले 
  • हृदय स्थल सिद्धांत (Heartland Theory) – एच. मैकिंडर 
  • समताप रेखाओं का जन्मदाता – हंबोल्ट 
  • सौर मंडल की संकल्पना – कॉपरनिकस
  • ‘पारिस्थितिकी’ (Ecology) शब्द का प्रथम प्रयोग – अर्नेस्ट हैकल 
  • पथ्वी के भूगर्भिक इतिहास की सर्वप्रथम व्याख्या – कास्ते-द-बफन 
  • आधुनिक भू-विज्ञान(geology) का पिता – जेम्स हटन
  • आधार तल की संकल्पना – पावेल
  •  ‘भू-संतुलन’ शब्द का प्रयोग – क्लैरेंस डटन
  • भौगोलिक चक्र का प्रतिपादन – डेविस 
  • ‘पैंजिया’ शब्द का प्रयोग – वेगनर
  • आधुनिक भूगोल का जनक- अलेक्जेंडर वॉन हंबोल्ट
  • सर्वप्रथम भूगोल शब्द का प्रयोग – इरेटोस्थनीज
  • भूगोल का पिता – इरेटोस्थनीज (हिकेटियस को भी)
  • भूगोल में नव नियतिवाद का सिद्धांत का प्रतिपादन – जी टेलर

 (General Introduction) 

  • ब्रह्मांड (आकाशगंगाओं का समूह)–>आकाशगंगा (तारो का समूह )–>सौरमंडल ( सूर्य एवं 8 ग्रहो का समूह)
  •  ‘पृथ्वी’, ‘सौरमंडल’ का एक भाग है और सौरमंडल आकाशगंगा का एक भाग है, तथा आकाशगंगाओं का समूह ‘ब्रह्मांड’ कहलाता है। 
  • सूक्ष्म अणुओं से लेकर विशालकाय आकाशगंगाओं तक के सम्मिलित रूप को ‘ब्रह्मांड’ कहते हैं। 
  • सौरमंडल की रचना ‘निहारिका’ नामक एक विशाल गैसीय पिंड से हुई है। सौरमंडल का लगभग 99 प्रतिशत से भी अधिक द्रव्यमान सूर्य में निहित है, जबकि सारे ग्रह मिलकर शेष द्रव्यमान से बने हुए हैं। 

अवधारणाएँ (Conceptions)

टॉलेमी का भूकेंद्री अवधारणा(Ptolemy’s Geocentric Concept)

कॉपरनिकस का सूर्यकेंद्री अवधारणा(Copernicus’s heliocentric concept)

  • ब्रह्मांड के केंद्र मेंसूर्य है तथा पृथ्वी एवं अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। 
  • कॉपरनिकस को ‘आधुनिक खगोलशास्त्र का जनक’ कहा गया। 

कैपलर ग्रहीय ग्रहीय गति के नियम(Kepler’s laws of planetary motion)

  • कैपलर ने सूर्य को ग्रहीय कक्षा का केंद्र माना। 
  • सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने वाले ग्रहों का पथ  दीर्घवृत्तय या अंडाकार(elliptical) है

गैलीलियो (Galileo)

  • 1609 ईस्वी में गैलीलियो ने अपवर्तक दूरबीन(Refractor telescope) का आविष्कार किया 
  • गैलीलियो ने सूर्य कलंक या सूर्य धब्बे का पता लगाया 
  • इन्होंने ही बताया कि सूर्य का निकटवर्ती तारा प्रॉक्सिमा सैंटोरी है

न्यूटन

‘हर्शल'(Harschel) 

एडविन हबल का आकाशगंगाओं के प्रतिसरण का नियम(The law of Recession of Galaxies) 

  • एडविन हब्बल ने प्रमाण दिया कि ब्रह्मांड का विस्तार अभी भी जारी है, जिसको उन्होंने आकाशगंगाओं के बीच बढ़ रही दूरी के आधार पर सिद्ध किया। 
  • 1925 ईस्वी में हबल ने बताया कि विश्व में हमारी आकाशगंगा “दुग्ध मेखला (Milkyway)” की तरह लाखों अन्य आकाशगंगा  हैं 
  • ये  आकाशगंगा अंतरिक्ष में स्थिर नहीं है बल्कि वे एक दूसरे से दूर होती जा रही है जैसे-जैसे आकाशगंगाओं के बीच में दूरी बढ़ती जाती है उनके भागने की गति भी तीव्र होती जाती है इसे आकाशगंगाओं के प्रतिसरण का नियम कहते हैं
  • आकाशगंगा दूर भाग रही है और विश्व का लगातार विस्तार हो रहा है यह डॉप्लर प्रभाव द्वारा ज्ञात किया गया है

ब्रह्मांड की उत्पत्ति (The Origin of the Universe) 

विस्तारित ब्रह्मांड परिकल्पना/बिग बैंग सिद्धांत

  • ब्रह्मांड की उत्पत्ति के विषय में चार सिद्धांत प्रमुख हैं जिसमें ‘बिग बैंग सिद्धांत’ सर्वाधिक मान्य है। इसे ‘विस्तारित ब्रह्मांड परिकल्पना‘(Expanding Universe Hypothesis) भी कहा जाता है। 
  • इस सिद्धांत का प्रतिपादन 1925  में ‘जॉर्ज लेमैत्रे’ (Georges Lemaitre) ने किया एवं बाद में रॉबर्ट वेगनर ने 1967 में इस सिद्धांत की व्याख्या प्रस्तुत की। 
  • बिग बैंग सिद्धांत की Confirmation ‘डॉप्लर प्रभाव/doppler effect’ से भी की जा चुकी है।
  • इस सिद्धांत के अनुसार, ब्रह्मांड लगभग 13.7 अरब वर्ष पूर्वभारी पदार्थों से निर्मित एक गोलाकार सूक्ष्म पिंड था, जिसका आयतन अत्यधिक सूक्ष्म और ताप व घनत्व अनंत था, बिग बैंग की प्रक्रिया में इसके अंदर महाविस्फोट हुआ और ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। 
  • विस्फोट के फलस्वरूप अनेक पिंड अंतरिक्ष में बिखर गए जो आज भी गतिशील अवस्था में हैं। इसके साथ ही, समय, स्थान एवं वस्तु की व्युत्पत्ति हुई। 
  • कुछ अरब वर्ष बाद हाइड्रोजन एवं हीलियम के बादल संकुचित होकर तारों एवं आकाशगंगाओं का निर्माण करने लगे। 
  • बिग बैंग घटना के पश्चात् आज से लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व सौरमंडल का विकास हुआ, जिससे ग्रहों तथा उपग्रहों का निर्माण हुआ।

स्थिर अवस्था संकल्पना’ (Steady State Theory)

  • ‘होयल’ ने इस परिकल्पना के विपरीत ‘स्थिर अवस्था संकल्पना’ (Steady State Theory) के नाम से नवीन परिकल्पना प्रस्तुत की। 
  • इसके अनुसार ब्रह्मांड का विस्तार लगातार हो रहा है लेकिन इसकाः स्वरूप किसी भी समय एक ही जैसा रहा है। लेकिन वर्तमान में  ‘बिग बैंग सिद्धांत’ को ही सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है। 

आकाशगंगा (Galaxy) ,निहारिका(Nebula) 

  • आकाशगंगा के निर्माण की शुरुआत हाइड्रोजन गैस से बने विशाल बादलों के संचयन से होती है। इसे ‘निहारिका’ कहा जाता है। 
  • इस बढ़ती हुई निहारिका में गैस के झुंड विकसित हुए, झुंड बढ़ते-बढ़ते घने गैसीय पिंड बने जिनसे तारों का निर्माण हुआ। 
  • गुरुत्वाकर्षण बल के अधीन बंधे तारों, धूलकणों एवं गैसों के तंत्र को ही ‘आकाशगंगा’ कहते है। 
  • आकाशगंगा से विभिन्न प्रकार के विकिरण निकलते रहते हैं, 
    • इनमें अवरक्त(Infrared) किरणें, गामा किरणें, रेडियो तरंगें, X-किरणें, दृश्य प्रकाश(Visible) एवं पराबैंगनी(Ultraviolet) तरंगें आदि शामिल हैं। 

मंदाकिनी

  • हमारा सौरमंडल जिस आकाशगंगा में स्थित है उसे मंदाकिनी कहते हैं। 
  • यह सर्पिलाकार(spiral) है
  • इसमें तीन घूर्णनशील भुजायें एवं एक केंद्र है। केंद्र को ‘बल्ज’ कहा जाता है, जिसमें एक ‘ब्लैक होल’ पाया जाता है। 

‘स्वर्ग की गंगा’ या ‘मिल्की वे’ (‘Ganges of Heaven’ or ‘Milky Way’)

तारे का जन्म तथा विकास (Origin and Evolution of Star) 

  • तारों का जीवनकाल अत्यधिक लंबा होता है एवं विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरता है। तारे के जीवन चक्र की अवस्थाएँ निम्न हैं
  • ब्रह्मांड में उपस्थित गैसों एवं धूल के कणों/बादलों का गुरुत्वाकर्षण के कारण आकाशगंगा के केंद्र में नाभिकीय संलयन शुरू हो जाता है एवं हाइड्रोजन, हीलियम में बदलने के कारण नवीन तारों का  निर्माण होता है। इन्हीं बादलों को ‘स्टेलर नर्सरी’ कहा जाता है।

आदि तारा’ (Protostar)

    • आकाशगंगा में हाइड्रोजन का बादल बड़ा होता है तो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से गैसीय पिंड सिकुड़ने लगता है जो तारे के जन्म का प्रारंभिक स्वरूप होता है। यह आदि तारा’ (Protostar) कहलाता है। 

‘पूर्ण तारा’

  • आदि तारा के सिकुड़ने पर गैस के बादलों में परमाणुओं की टक्करों की संख्या बढ़ने से हाइड्रोजन के हीलियम में बदलने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। इस अवस्था में आदि तारा ‘पूर्ण तारा’ बन जाता है। 
  • तारा प्रकाश उत्पन्न करने वाला खगोलीय पिंड होता है, जो अपने द्रव्यमान के अनुरूप छोटा या बड़ा हो सकता है। 
  • तारे के केंद्र में चलने वाली निरंतर नाभिकीय संलयन अभिक्रिया के फलस्वरूप कुछ समय बाद उसके क्रोड में हीलियम की मात्रा ज्यादा हो जाती है तथा नाभिकीय संलयन की अभिक्रिया रुक जाती है। इससे क्रोड में दबाव कम हो जाता है तथा तारा सिकुड़ने लगता है।

‘लाल दानव तारा’ (Red Giant Star)

  • पुनः तारे की बाह्य कवच के हाइड्रोजन का हीलियम में परिवर्तन होने से ऊर्जा विकिरण की तीव्रता घट जाती है एवं इसका रंग बदलकर लाल हो जाता है। इस अवस्था के तारे को ‘लाल दानव तारा’ (Red Giant Star) कहा जाता है। 
  • यदि किसी तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से कम अथवा बराबर (चंद्रशेखर सीमा) है तो वह लाल दानव से ‘श्वेत वामन’ (White Dwarf) और अंततः ‘काला वामन’ (Black Dwarf) में परिवर्तित हो जाता है। 

‘सुपरनोवा विस्फोट’ (Supernova Explosion)

  • यदि तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से अधिक या कई गुना अधिक है तो तारे की मध्यवर्ती परत गुरुत्वाकर्षण के कारण तारे के केंद्र में ध्वस्त हो जाती है। इससे निकली ऊर्जा तारे के ऊपरी परत को नष्ट कर देती है और भयानक विस्फोट होता है जिसे ‘सुपरनोवा विस्फोट’ (Supernova Explosion) कहते हैं। 
  • सुपरनोवा विस्फोट के बाद वह तारा ‘न्यूट्रॉन तारा’ तथा इसके पश्चात् ‘ब्लैक होल’ में बदल जाता है।

तारों का रंग, तापमान एवं उम्र 

  • तारों के रंग से उसके तापमान को ज्ञात किया जाता है। 
  • तारों द्वारा मुक्त ऊष्मा के आधार पर उनकी उम्र ज्ञात की जा सकती है, जैसे
    • नीला व सफेद – युवा (आद्य तारा) 
    • नारंगी – प्रौढ़(mature) 
    • लाल – वृद्ध
  • विस्फोट के बाद तारे की मृत्यु हो जाती है या वह ‘कृष्ण विवर’ (Black Hole) बन जाता है।

चंद्रशेखर सीमा (Chandrasekhar Limit) 

  • एस. चंद्रशेखर भारतीय मूल के अमेरिकी खगोल भौतिकविद् थे।जिन्होंने श्वेत वामन तारों के जीवन अवस्था के बारे में सिद्धांत प्रतिपादित किया। 
  • इसके अनुसार, 1.44 सौर द्रव्यमान ही श्वेत वामन के द्रव्यमान की ऊपरी सीमा है। इसे ही ‘चंद्रशेखर सीमा’ कहते हैं। 
  • एस. चंद्रशेखर को संयुक्त रूप से नाभिकीय खगोल भौतिकी में ‘डब्ल्यू. ए. फाउंलर’ के साथ 1983 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। 

न्यूट्रॉन तारा (Neutron Star)

  • सुपरनोवा विस्फोट से बचे हुए केंद्रीय भाग, जो कि अत्यधिक घनत्व वाला होता है, से न्यूट्रॉन तारों का निर्माण होता है।
  • अधिक गति से चक्कर लगाने वाले न्यूट्रॉनों से बने तारों को ‘न्यूट्रान तारा’ कहते हैं। 
  •  न्यूट्रॉन तारे के सभी अंश न्यूट्रॉन के रूप में संगठित रहते हैं। 
  • यह तीव्र रेडियो तरंगें उत्सर्जित करते हैं। 
  • न्यूट्रॉन तारे को ‘पल्सर’ भी कहा जाता है। 

कृष्ण विवर (Black Hole)

  • कृष्ण विवर अंतरिक्ष में स्थित ऐसा स्थान है जहाँ गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक होता है कि प्रकाश का परावर्तन या किसी भी वस्तु का वहाँ से पलायन नहीं हो सकता। 
  •  इसे दूरबीन से भी नहीं देखा जा सकता। 
  • कृष्ण विवर की पुष्टि प्रकाश के अपने पथ के विचलन के द्वारा की जाती है। 
  • कृष्ण विवर का निर्माण तब हो सकता है जब न्यूट्रॉन तारे में द्रव्यमान एक ही स्थान पर संकेद्रित हो जाए अथवा उसकी मृत्यु हो रहा है।”
  • ब्लैक होल आकार में बड़ा या छोटा हो सकता है। छोटे ब्लैक होल एक परमाणु  जितने छोटे हो सकते हैं लेकिन उनका द्रव्यमान बहुत अधिक होता है।
  • जिन तारों का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के तीन गुने से अधिक होता है वे विघटित होकर अंततः ब्लैक होल में transform हो जाते हैं।

नक्षत्र (Asterism) 

  • एक निश्चित आकृति में व्यवस्थित तारों के समूह को ‘नक्षत्र’ कहा जाता है। इनकी संख्या 27 मानी जाती है। 
  • भारतीय मनीषियों ने एक 28वें नक्षत्र ‘अभिजीत’ की भी परिकल्पना की है। 
  • यह आकाश में रात में दिखाई पड़ते हैं। 
  • कुछ प्रमुख नक्षत्र हैं- 

चित्रा, हस्त, विशाखा, श्रवण, धनिष्ठा, मघा, आर्द्रा, अनुराधा, रोहिणी इत्यादि। 

  • नक्षत्र दिवस
    • किसी नियत नक्षत्र के मध्याह्न रेखा के ऊपर से उत्तरोत्तर दो बार गुजरने के बीच के समय को नक्षत्र दिवस कहते हैं। 
    • यह दिवस 23 घंटे, 56 मिनट का होता है। 

तारा मंडल (Constellation) 

  • आकाश में तारो के समूह जो आकृतियों के रूप में व्यवस्थित होते हैं। इन आकतियों को ‘तारामंडल’ कहते हैं। 
  • इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन (IAU) के अनुसार इनकी संख्या 88 मानी गई है। 
  • सबसे बड़ा तारामंडल  सेन्टारस (Centaurus)-जिसमे 94 तारे  है 
  • प्रमुख तारामंडल
    • सप्तर्षि (Ursa Major-Great Bear)
    • ध्रुव मत्स्य (Ursa Minor-Little Bear)

ध्रुव तारा (Pole Star) 

  • उत्तरी ध्रुव पर स्थित तारे को ही ‘ध्रुव तारा’ कहते हैं। यह आकाश में हमेशा एक ही स्थान पर रहता है। यह ‘लिटिल बियर तारा समूह’  का  सदस्य है।
  • सप्तर्षि मंडल की सहायता से ध्रुव तारे की स्थिति को जान सकते हैं अर्थात् सप्तर्षि मंडल के संकेतक तारों को आपस में मिलाते हुए एक काल्पनिक रेखा खींची जाए एवं उसे आगे की ओर बढ़ाया जाए तो यह ध्रुव तारे को दर्शाता करेगी।

 सौरमंडल की संरचना (The Structure of the Solar System) 

  •  ‘सौरमंडल’ सूर्य, ग्रहों, विभिन्न उपग्रहों तथा अन्य खगोलीय पिंडों का एक परिवार है, जिसमें सूर्य एक तारा है तथा इसके आठ ज्ञात ग्रहों में क्रमशः बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुणवरुण हैं। 
  • ये ग्रह परवलयाकार(parabolic) मार्ग में सूर्य की परिक्रमा करते हैं। 
  • सूर्य हमारे सौरमंडल के केंद्र में स्थित है, जो सौर परिवार के लिए ऊर्जा एवं प्रकाश का प्रमुख स्रोत है। 
  • इस आधार पर खगोलीय पिंडों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है- 
    • ऐसे खगोलीय पिंड जिनके पास अपनी ऊष्मा तथा प्रकाश होता है, जैसे-तारे। 
    • ऐसे खगोलीय पिंड जिनके पास अपनी ऊष्मा तथा प्रकाश नहीं होता, ये प्रकाश के लिए सूर्य समान तारों पर निर्भर रहते हैं, जैसे- ग्रह। 

खगोलीय इकाई (Astronomical Unit): 

  • सूर्य से दूरी खगोलीय इकाई(AU) में है। 
  • 1 AU = 14 करोड़ 95 लाख 98 हजार 5 सौ  किलोमीटर । 
  • # = भूमध्यरेखीय अर्द्धव्यास 6378.137 किमी. = 1 है।

ग्रह

सूर्य से दूरी 

AU में   

घनत्व

(gm/cm3)

अर्द्धव्यास

#

उपग्रहों की सख्या

बुध

0.387

5.44

0.383

0

शुक्र

0.723

5.245

0.949

0

पृथ्वी 

1.000

5.517

1.000

1

मंगल

1.524

3.945

0.5333

2

बृहस्पति 

5.203

1.33

11.19

79

शनि

9.539

0.70

9.460

82

यूरेनस (अरुण)

19.182

1.17

4.11

27

नेप्च्यून (वरुण)

30.058

1.66

3.88

13

माप इकाइयाँ 

प्रकाश वर्ष (Light Year): 

पारसेक (Parsec): 

ब्रह्मांड वर्ष (Cosmic Year): 

  • सूर्य सौरमंडल के अन्य सदस्यों सहित, मंदाकिनी/आकाशगंगा की एक परिक्रमा लगभग 25 करोड़ वर्ष में पूरी करता है, इस अवधि को ही ब्रह्मांड वर्ष’ कहते हैं। 

खगोलीय इकाई (Astronomical Unit): 

सूर्य (Sun)

  • सूर्य एक मध्यम आयु का मध्यम तारा है। 
  • इसका व्यास लगभग 13.9 लाख किमी. है। 
  • सूर्य की वर्तमान आयु लगभग 4.7 अरब वर्ष है।
  • सूर्य के द्रव्यमान का 70.6 प्रतिशत भाग हाइड्रोजन और 27.4 प्रतिशत भाग हीलियम से बना है। 
  • सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर लगभग 8 मिनट में पहुँचता है। 
  • सूर्य अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमता है। इसकी घूर्णन अवधि भूमध्य रेखा पर 25 पृथ्वी दिवस है। 
  • सूर्य का अपना कोई चंद्रमा नहीं है। साथ ही, सूर्य पर किसी छल्ले की भी विद्यमानता नहीं है। 
  • सूर्य की संरचना को छः क्षेत्रों में वर्गीकृत किया जा सकता है
  • केंद्र/क्रोड (Core) 
  • विकिरण क्षेत्र (Radiation zone) 
  • संवहनी क्षेत्र(Convective Layer)
  • प्रकाशमंडल (Photosphere)
  • सौर वायुमंडल(solar atmosphere)
    • वर्णमण्डल (Chromosphere) 
    • कोरोना (Corona)
  • सूर्य कलंक /सौर धब्बे (sun  spots)

             Sun

केंद्र/क्रोड (Core)  –

  • सूर्य का सबसे आंतरिक भाग क्रोड कहलाता है। सूर्य के केंद्र का तापमान 15 मिलियन डिग्री सेल्सियस है जो नाभिकीय संलयन के अनुकूल है। 

विकिरण क्षेत्र (Radiation zone)

  • सूर्य के केंद्र में नाभिकीय संलयन से उत्पन्न ऊर्जा केंद्रीय भाग से विकिरण क्षेत्र से होता हुआ संवाहक घेरे  व वहां से प्रकाश मंडल होता हुआ बाह्य  अंतरिक्ष में पहुंच जाता है

संवहनी क्षेत्र(Convective Layer)

प्रकाशमंडल (Photosphere)

  • सूर्य का जो भाग हमें दिखाई होता है, उसे ‘प्रकाशमंडल’ (Photosphere) कहते हैं। प्रकाशमंडल में ही सौरकलंक (Sunspots) पाये जाते  है।
  • प्रकाश मंडल से ही सूर्य का व्यास निर्धारित होता है
  • सूर्य की बाह्य प्रकाशित सतह को फोटोस्फीयर कहा जाता है। यहाँ फोटॉन की अधिकता पाई जाती है। फोटोस्फीयर में अनगिनत छोटे-छोटे प्रकाशित कण होते हैं, इन्हें ‘ग्रैनूल’ कहा जाता है। 

सौर वायुमंडल(solar atmosphere)

  • वर्णमण्डल (Chromosphere)- 
    • यह हाइड्रोजन गैस से बना होता है 
    • कभी-कभी क्रोमो स्फीयर में तीव्र गहनता का प्रकाश उत्पन्न होता है, जिसे ‘सौर ज्वाला’ (Solar Flare) कहते है।
  • कोरोना (Corona)
    • प्रकाशमंडल का बाहरी भाग, जो केवल सूर्यग्रहण के समय दिखाई पड़ता है, ‘किरीट’ या ‘कोरोना’ कहलाता है।

सूर्य कलंक /सौर धब्बे (sun  spots)

  • फोटोस्फीयर में ठंडे एवं काले धब्बों को ‘सौरकलंक’ या ‘सौरधब्बा’ कहते हैं तथा गर्म एवं प्रकाशित भाग को ‘फैकुला’ कहा जाता है। 
  • सूर्य कलंक का तापमान आसपास के तापमान से 1500  डिग्री सेल्सियस कम होता है 
  • जब सौर धब्बे दिखाई देता है उस समय पृथ्वी पर चुम्बकीय झंझावात(magnetic storm) उत्पन्न होते हैं 
    • इससे रेडियो, टीवी आदि बिजली से चलने वाली मशीनों में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है 
    • चुंबक के सुई की दिशा बदल जाती है तथा नाविकों को दिशा भ्रम हो जाता है 
    • सौर धब्बे का एक पूरा चक्र 22 वर्षों का होता है जिसे सूर्य धब्बा चक्र(sun spot circle) कहते हैं 
  • सौरकलंक की सर्वप्रथम खोज ‘गैलीलियो’ ने की थी।

नोट: 

नासा के अनुसार, सौरकलंक की खोज को लेकर गैलीलियो और थॉमस हैरियट’ के नाम में अभी भी मतभेद बने हुए हैं।’ 

अम्ब्रा एवं पेनुम्बा (Umbra and Penumba)

  • प्रकाशमंडल में पाये जाने वाले सौरकलंक में काले केंद्र को अम्ब्रा (Umbra) कहते हैं, तथा इसके चारों ओर हल्के रंग का क्षेत्र होता है, जिसे ‘पेनुम्ब्रा’ कहते हैं। 
  • संपूर्ण सौर तंत्र से होकर प्रवाहित होने वाली पवन को ‘सौर पवन’ (Solar Wind) कहते हैं।

(ध्रुवीय ज्योति)/(Aurora) 

  • अंतरिक्ष से आने वाली ब्रह्मांड किरणों, सौर पवनों तथा पृथ्वी के चुम्बकीय प्रभावों के मध्य घर्षण के कारण ध्रुवों के ऊपर एक रंगीन चमक उत्पन्न होती है, जिसे ‘अरोरा’ कहते हैं। 
  • उत्तरी ध्रुव पर इसे ‘अरोरा बोरियालिस/aurora borealis’ एवं दक्षिणी ध्रुव पर ‘अरोरा ऑस्ट्रालिस/aurora australis‘ कहते हैं।

ग्रह (Planet) 

  • अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने वर्ष 2006 में ग्रह की नई परिभाषा दी जिसके अनुसार, ग्रह उन्हीं आकाशीय पिंडों को माना जाएगा, जो
    • ऐसे पिंड जिसमें पर्याप्त गुरुत्वाकर्षण बल हो जिससे वह गोल स्वरूप धारण कर सके 
    • वह सूर्य का परिक्रमा करता हो 
    • अपने पड़ोसी पिंडों की कक्षा को नहीं लांघता  हो।
  • ग्रहों के पास अपना कोई प्रकाश या ऊष्मा नहीं होती। ये सूर्य से ही ऊष्मा एवं प्रकाश प्राप्त करते हैं। 

‘घूर्णन’ या ‘परिभ्रमण’ (Rotation)/दैनिक गति 

  • ग्रहों का अपने अक्ष पर घूमना ‘घूर्णन’ या ‘परिभ्रमण’ (Rotation) कहलाता है 

‘परिक्रमण’ (Revolution)/वार्षिक गति 

  • उनका सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगाना ‘परिक्रमण’ (Revolution) कहलाता है। 
  •  वर्तमान समय में सौरमंडल में पृथ्वी सहित 8 ग्रह हैं, जिनका वर्गीकरण निम्न है

आंतरिक/पार्थिव ग्रह

बाह्य/जोवियन ग्रह

बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल

बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण

सूर्य से दूरी के अनुसार क्रम

आकार के अनुसार (बढ़ते क्रम में)

पार्थिव एवं जोवियन ग्रहों में अंतर

पार्थिव ग्रह(terrestrial planets)

जोवियन ग्रह(Jovian Planet) 

  • पार्थिव ग्रहों का निर्माण सूर्य के निकट हुआ। 
  • पार्थिव ग्रहों की सूर्य से निकटता के कारण यहाँ अत्यधिक तापमान है।
  • सूर्य के निकट सौर वायु अधिक शक्तिशाली होने के कारण यह पार्थिव ग्रहों से धूलकण और गैसों को उड़ाकर ले गई। अर्थात् इन ग्रहों में धूलकण और गैसों की अत्यधिक कमी पाई जाती है। 
  • पार्थिव ग्रहों के छोटे आकार के कारण इनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति कम है, जिससे यह गैसों को अपनी ओर अधिक मात्रा में आकर्षित नहीं कर पाये। इसके साथ-साथ इन ग्रहों पर बाहरी धातु, जैसे- लोहा और निकेल अत्यधिक मात्रा में हैं। 
  • पार्थिव ग्रह के उदाहरण- 
  • बुध, शुक्र, पृथ्वी तथा मंगल हैं। 
  • ये ठोस ग्रह हैं।
  • जोवियन ग्रहों का निर्माण सूर्य से अधिक दूरी पर हुआ। 
  • जोवियन