राज्य विधान मंडल state legislature : SARKARI LIBRARY

राज्य विधान मंडल (State legislature )

  • संविधान के छठे भाग,अध्याय -3  में अनुच्छेद 168 से 212 तक राज्य विधान मंडल के बारे में बताया गया है। 

राज्य विधानमंडल का गठन 

  • राज्य विधानमंडल एकसदनीय व्यवस्था या द्विसदनीय हो सकता है।

एकसदनीय व्यवस्था

द्विसदनीय व्यवस्था

  1. विधानसभा 
  1. विधानसभा 
  2. विधान परिषद् 

22 राज्यों में एकसदनीय व्यवस्था है। 

केवल सात राज्यों में दो सदन हैं

  1. आंध्र प्रदेश 
  2. तेलंगाना 
  3. उत्तर प्रदेश 
  4. बिहार 
  5. महाराष्ट्र 
  6. कर्नाटक 

 

  • राज्य विधानमंडल में शामिल होते हैं

एकसदनीय राज्य विधानमंडल

द्विसदनीय राज्य विधानमंडल

राज्यपाल +विधानसभा

राज्यपाल+विधानपरिषद्+विधानसभा

विधान परिषद

विधानसभा

उच्च सदन

द्वितीय सदन या वरिष्ठों का सदन

निचला सदन 

पहला सदन या लोकप्रिय सदन

विधानपरिषद के गठन एवं विघटन करने की व्यवस्था

  • संसद द्वारा  एक विधानपरिषद को (यदि यह पहले से है) विघटित कर सकती है और (यदि पहले से नहीं है) इसका गठन कर सकती है। लेकिन इसके लिए राज्य की विधानसभा को प्रस्ताव पारित करना होगा । 
  • इस तरह का कोई विशेष प्रस्ताव राज्य विधानसभा द्वारा पूर्ण बहुमत से पारित होना जरूरी है। यह बहुमत कुल मतों एवं उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई से कम नहीं होना चाहिए। 
  • इसे अनुच्छेद 368 के तहत  संविधान का संशोधन नहीं माना जाएगा और सामान्य विधान की तरह (अर्थात् साधारण बहुमत से) पारित किया जायेगा।

दो सदनों का गठन

विधानसभा का गठन 

संख्या : 

  • विधानसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 500 और निम्नतम 60 तय की गई है। यह संख्या राज्य की जनसंख्या एवं इसके आकार पर निर्भर है। 
  • कुछ राज्यों में विधानसभा की कुल संख्या 60 से कम है

अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम एवं गोवा

30 

मिजोरम

40

नागालैंड

46

  • विधानसभा के सदस्यों को प्रत्यक्ष मतदान से वयस्क मताधिकार के द्वारा निर्वाचित किया जाता है। लेकिन सिक्किम और नागालैंड विधानसभा के कुछ सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से भी चुने जाते हैं।

नामित सदस्यः 

  • विधानसभा में राज्यपाल के द्वारा  एक आंग्ल-भारतीय सदस्य को नामित कर सकता था । यदि इस समुदाय का प्रतिनिधि विधानसभा में पर्याप्त नहीं हो। 
  • मूलतः यह उपबंध दस वर्षों (1960 तक) के लिए था, लेकिन इसे हर बार 10 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया। इसे संविधान का 104वां संसोधन द्वारा समाप्त किया गया। 

संविधान का 104वां संसोधन 

  • इसके तहत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 334 में संशोधन किया गया और लोकसभा और विधानसभाओं में SC & ST के लिए आरक्षण की अवधि को 10 वर्ष(January 25, 2030) तक  बढा दिया गया । इससे पहले इस अरक्षण की सीमा 25 जनवरी 2020 थी।
  • साथ ही लोकसभा और विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीय सदस्य के लिए आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया । 

क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र : 

  • विधानसभा के लिए हर राज्य को क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र में बांट दिया गया है। 
  • इन चुनाव क्षेत्रों/निर्वाचन क्षेत्र का निर्धारण, जनसंख्या के अनुपात से तय कया जाता है। 

प्रत्येक जनगणना के बाद पुनर्निर्धारण: 

प्रत्येक जनगणना के बाद पुनर्निर्धारण होगा 

  • विधानसभा में कुल सीटों का निर्धारण 
  • निर्वाचन क्षेत्रों विभाजन या सीमांकन  । 
  • इसी उद्देश्य के तहत 1952, 1962, 1972 और 2002 में संसद ने परीसीमन आयोग अधिनियम पारित किये।

42वें संशोधन 1976 

  • विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों की कुल संख्या का पुनर्निर्धारण को 1971 के आधार पर वर्ष 2000 तक के लिए निश्चित कर दिया गया था  

84वें संशोधन 2001

  • विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों  का पुनर्निर्धारण वर्ष 2000  के बाद अगले 25 वर्षों 2026 तक बढ़ा दिया गया। 
  • निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण 1991 की जनसंख्या के आधार पर होगा । 

87वें संशोधन 2003

  • निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण 2001 की जनसंख्या के आधार पर होगा । 

अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए स्थानों का आरक्षण 

  • राज्य की जनसंख्या के अनुपात के आधार पर विधानसभा के लिए SC & ST के लिए सीटों की आरक्षण की व्यवस्था की गई है। 
  • मूल रूप से यह आरक्षण 10 वर्ष (1960 तक) के लिए था 
  • लेकिन इस व्यवस्था को हर बार दस वर्ष के लिए बढ़ा दिया । 
  • 95वें संशोधन अधिनियम, 2009 द्वारा इसे 2020 के लिए बढ़ा दिया गया । 
  • इसे संविधान का 104वां संसोधन 2019 द्वारा SC & ST के लिए आरक्षण की अवधि को 10 वर्ष(January 25, 2030) तक  बढा दिया गया ।

परिषद का गठन 

संख्या : 

  • विधानपरिषद के अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होते हैं। 
  • परिषद में  अधिकतम संख्याविधानसभा कीएक तिहाई और न्यूनतम 40 निश्चित है। 
  • इसका मतलब संबंधित राज्य में परिषद सदस्य की संख्या, विधानसभा के आकार पर निर्भर है। इसकी वास्तविक संख्या का निर्धारण संसद द्वारा किया जाता है। 

निर्वाचन पद्धति 

विधानपरिषद के कुल सदस्यों में से

1/3 सदस्य

स्थानीय निकायों, जैसे-नगरपालिका, जिला बोर्ड आदि के द्वारा

1/12 सदस्य

3 वर्ष से राज्य में रह रहे स्नातक

1/12 सदस्य

3 वर्ष से अध्यापन कर रहे लोग

(माध्यमिक स्कूलों से कम के नहीं)

1/3 सदस्य

विधानसभा के सदस्यों द्वारा

1/6 बाकी बचे हुए सदस्यों

नामांकन राज्यपाल द्वारा

(साहित्य, ज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा का विशेष ज्ञान )

  • इस तरह विधानपरिषद के कुल सदस्यों में से 5/6 सदस्यों का अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव होता है और 1/6 को राज्यपाल नामित करता है। 
  • सदस्य, एकल संक्रमणीय मत के द्वारा समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से चुने जाते हैं। 
  • राज्यपाल द्वारा नामित सदस्यों को किसी भी स्थिति में अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। 
  • विधानपरिषद के गठन की यह प्रक्रिया संविधान में अस्थायी है यानि संसद इस नियम को बदल और सुधार सकती है, हालांकि अभी तक संसद ने ऐसी कोई विधि बनाई नहीं है।

दोनों सदनों का कार्यकाल 

विधानसभा का कार्यकाल

विधानपरिषद का कार्यकाल

अस्थायी अंग जो विघटित होता

सतत सदन 

(स्थायी अंग जो विघटित नहीं होता)

कार्यकाल –  पांच वर्ष 

  • इसके पांच वर्ष पूरे होने के पहले भी राज्यपाल इसे विघटित कर सकता है

कार्यकाल –   छह वर्ष

  • इसके एक-तिहाई सदस्य, प्रत्येक दूसरे वर्ष में सेवानिवृत्त होते रहते हैं।

राष्ट्रीय आपातकाल के समय 

  • संसद द्वारा विधानसभा का कार्यकाल एक समय में एक वर्ष तक के लिए (कितने भी समय के लिए) बढ़ाया जा सकता है, हालांकि यह विस्तार आपातकाल खत्म होने के बाद छह महीने से अधिक का नहीं हो सकता है। 
  • खाली पदों को नये चुनाव और नामांकन(राज्यपाल द्वारा) द्वारा हर तीसरे वर्ष के प्रारंभ में भरा जाता है। 
  • सेवानिवृत्त सदस्य भी पुनर्चुनाव और दोबारा नामांकन हेतु योग्य होते हैं।

राज्य विधानमंडल की सदस्यता के लिए अर्हता(Qualification)

  • भारत का नागरिक
  • शपथ -चुनाव आयोग द्वारा अधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष
  • आयु- 25 वर्ष  (विधान सभा)
  • आयु- 30 वर्ष  (विधान परिषद)

जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम (1951) के तहत अर्हता

  • विधानसभा सदस्य बनने वाला व्यक्ति उसी राज्य का मतदाता
  • विधानपरिषद में राज्यपाल द्वारा नामित होने के लिए संबंधित राज्य का निवासी
  • SC & ST सीट के चुनाव के लिए  SC & ST का सदस्य होना चाहिए । लेकिन SC & ST का सदस्य उस सीट के लिए भी चुनाव लड़ सकता है, जो उसके लिए आरक्षित न हो। 

राज्य विधानमंडल की सदस्यता  के लिए निरर्हता(Disqualification) 

  • यदि वह केंद्र या राज्य सरकार के तहत किसी लाभ के पद पर है।  
  • यदि वह दिवालिया हो। 
  • यदि वह भारत का नागरिक न हो 
  • यदि उसने विदेश की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित कर ली हो 
  • यदि संसद द्वारा निर्मित किसी विधि द्वारा अयोग्य कर दिया जाता है। 

जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम (1951) के तहत निरर्हताएं 

  • वह चुनाव में भ्रष्ट आचरण अथवा चुनावी अपराध का दोषी पाया गया हो। 
  • उसे किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो जिसके लिए उसे दो या अधिक वर्षों की कैद की सजा मिली हो।
  • वह निर्धारित समय के अन्दर चुनावी खर्च विवरण प्रस्तुत करने में विफल रहा हो। 
  • उसका किसी सरकारी ठेके, कार्य अथवा सेवाओं में न कोई रुचि हो। 
  • वह किसी निगम में लाभ के पद पर कार्यरत हो अथवा उसका निदेशक या प्रबंधकीय एजेन्ट हो, जिसमें सरकार की कम से कम 25% हिस्सेदारी हो।
  • वह भ्रष्टाचार अथवा सरकार के प्रति विश्वासघात के कारण सरकारी सेवा से हटाया गया हो। 
  • उसे विभिन्न समूहों के बीच नफ़रत बढ़ाने अथवा घूसखोरी के अपराध में दोषी ठहराया गया हो। 
  • उसे अस्पृश्यता, दहेज तथा सती प्रथा आदि जैसे सामाजिक अपराधों में संलिप्तता अथवा इन्हें बढ़ावा देने के लिए दण्डित किया गया हो
  • निरर्हताओं के संबंध में किसी सदस्य के प्रति राज्यपाल का निर्णय अंतिम होगा। हालांकि इस मामले में वह चुनाव आयोग की सलाह लेकर काम करता है। 

दल-बदल के आधार पर निरर्हताः 

  • कोई व्यक्ति दसवीं अनुसूची के उपबंधों के अंतर्गत दल-परिवर्तन के आधार पर अयोग्य होता है तो वह राज्य विधानमण्डल के दोनों सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य रहेगा।
  • 10वीं अनुसूची(दल-परिवर्तन के आधार पर) के तहत निरर्हता का फैसला विधान परिषद के मामले में सभापति फैसला करेगा।
  • 10वीं अनुसूची(दल-परिवर्तन के आधार पर) के तहत निरर्हता का फैसला विधानसभा के मामले में अध्यक्ष फैसला करेगा।
  • 1992 में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है की सभापति/अध्यक्ष का फैसला न्यायिक समीक्षा की परिधि में आता है। 

शपथ या प्रतिज्ञान 

  • विधानमंडल के दोनों सदनों के सदस्य राज्यपाल या उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ या प्रतिज्ञान लेगा। 
  • बिना शपथ लिए कोई भी सदस्य सदन मत नहीं दे सकता है और कार्यवाही में भाग भी नहीं ले सकता है।
  • बिना शपथ लिए एक व्यक्ति यदि सदन में सदस्य की तरह बैठता है और मतदान करता है तो उस पर प्रतिदिन पांच सौ रुपये जुर्माना लगेगा:
  • विधानमंडल के सदस्यों का  वेतन एवं भत्ते विधानसभा द्वारा पर निर्धारित होता हैं। 

स्थानों का रिक्त होना 

निम्नलिखित मामलों में विधानमंडल का सदस्य पद छोड़ता है:

दोहरी सदस्यता

  • एक व्यक्ति एक समय में विधानमंडल के दोनों सदनों का सदस्य नहीं हो सकता। यदि कोई व्यक्ति दोनों सदनों के लिए निर्वाचित होता है तो एक सदन से उसकी सीट रिक्त हो जाएगी। 

त्यागपत्र : 

  • विधान परिषद सदस्य  – सभापति 
  • विधानसभा सदस्य – अध्यक्ष 

अनुपस्थिति : 

  • यदि कोई सदस्य बिना पूर्व अनुमति के 60 दिन तक बैठकों से अनुपस्थित रहता है तो सदन उसके पद को रिक्त घोषित कर सकता

अन्य मामले : 

(i) यदि न्यायालय द्वारा उसके निर्वाचन को अमान्य ठहरा दिया जाए, 

(ii) यदि उसे सदन से निष्काषित कर दिया जाए,

(ii) यदि वह राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हो जाए और 

(iv) यदि वह किसी राज्य का राज्यपाल निर्वाचित हो जाए। 

विधानमंडल के पीठासीन अधिकारी 

  • विधानसभा – अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष 
  • विधानपरिषद – सभापति एवं उप सभापति 

विधानसभा अध्यक्ष 

  • विधानसभा के सदस्य अपने सदस्यों के बीच से ही अध्यक्ष का निर्वाचन करते हैं। 
  • अध्यक्ष का कार्यकाल – विधानसभा के कार्यकाल तक 
  • वह निम्न तीन मामलों में अपना पद रिक्त करता है:

1. यदि उसकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो जाए।

2. त्यागपत्र – उपाध्यक्ष 

3. यदि विधानसभा के सदस्यों के द्वारा बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाया जाए। 

  • इस तरह का कोई प्रस्ताव 14 दिन की पूर्व सूचना के बाद ही लाया जा सकता है। 

अध्यक्ष की निम्नलिखित कार्य होते हैं: 

  • विधानसभा की कार्यवाही के लिए वह व्यवस्था एवं शिष्टाचार बनाए रखता है। 
  • वह अंतिम व्याख्याकर्ता है 
    • (अ) भारत के संविधान का 
    • (ब) विधानसभा के कार्य संचालन की नियमों का 
    • (स) विधानसभा की पूर्व परंपराओं/उपबंधों 
  • वह विधानसभा की बैठक को स्थगित या निलंबित कर सकता है।(कोरम की अनुपस्थिति में) 
  • विधानसभा में वह मत नहीं देता लेकिन बराबर मत होने की स्थिति में वह निर्णायक मत दे सकता है।
  • सदन के नेता के आग्रह पर वह गुप्त बैठक को अनुमति प्रदान कर सकता है। 
  • कोई विधेयक वित्त विधेयक है या नहीं। इस बात का निर्णय करता है 
  • दसवीं अनुसूची के आधार पर सदस्य की निरर्हता का फैसला देता है। 
  • वह विधानसभा की सभी समितियों के अध्यक्ष की नियुक्ति है और उनके कार्यों का पर्यवेक्षण करता है। 
  • वह स्वयं कार्य मंत्रणा समिति, नियम समिति एवं सामान्य उद्देश्य समिति का अध्यक्ष होता है। 

विधानसभा उपाध्यक्ष 

  • विधानसभा के सदस्य उपाध्यक्ष का चुनाव भी अपने बीच से ही करते हैं 
  • विधानसभा के अध्यक्ष का चुनाव करने के बाद उपाध्यक्ष का चुनाव किया जाता है।
  • विधानसभा के उपाध्यक्ष का कार्यकाल – विधानसभा के कार्यकाल तक 
  • वह समय से पूर्व भी निम्न तीन मामलों में पद छोड़ सकता है: .
    • यदि उसकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो जाए।
    • इस्तीफा – अध्यक्ष 
    • यदि विधानसभा सदस्य बहुमत के आधार पर उसे हटाने का संकल्प पास कर दे। यह संकल्प 14 दिन की पूर्व सूचना के बाद ही लाया जा सकता है। 

उपाध्यक्ष के कार्य 

  • अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष उसके सभी कार्यों को करता है। 

अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में

  • विधानसभा अध्यक्ष सदस्यों के बीच से सभापति पैनल का गठन करता है, उनमें से कोई भी एक अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में सभा की कार्यवाही संपन्न कराता है। 

विधान परिषद का सभापति 

  • विधान परिषद के सदस्य अपने बीच से ही सभापति को चनते हैं। 

सभापति निम्नलिखित तीन मामलों में पद छोड़ सकता हैं:

  • यदि उसकी सदस्यता समाप्त हो जाए। 
  • त्यागपत्र – उप सभापति को 
  • यदि विधानपरिषद में उपस्थित सदस्य बहमत से उसे हटाने का सकल्प पास कर दें। इस तरह का प्रस्ताव 14 दिनों की पूर्व सूचना के बाद ही लाया जा सकता है। 

विधानसभा अध्यक्ष/विधानपरिषद सभापति का वेतन व भत्ते

  • विधानमंडल तय करता है। 
  • इन्हें राज्य की संचित निधि पर भारित किया जाता है और इसलिए इन पर राज्य विधानमण्डल द्वारा वार्षिक मतदान नहीं किया जा सकता।

विधान परिषद का उपसभापति 

  • उप सभापति को भी परिषद के सदस्य अपने बीच से चुनते हैं।
  • उप-सभापति निम्नलिखित तीन मामलों में अपना पद छोड़ सकता हैं:
    • 1. यदि उसकी परिषद् से सदस्यता समाप्त हो जाए, 
    • 2. त्यागपत्र -सभापति 
    • 3. परिषद के तत्कालीन सदस्य उसके खिलाफ बहुमत से संकल्प पास कर दें, इस तरह का संकल्प 14 दिन का पूर्व सूचना पर ही लाया जा सकता है। 

उपसभापति के कार्य 

  • सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति उसके सभी कार्यों को करता है। 

सभापति एवं उपसभापति की अनुपस्थिति में

  • सभापति, सदस्यों के बीच से ही उप-सभाध्यक्षों की सूची जारी करता है। सभापति और उप-सभापति की अनुपस्थिति उनमें से कोई भी कार्यभार संभालता है। 

राज्य विधानमंडल सत्र

आहूत करना(summoning ) 

  • राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन की बैठक के लिए राज्यपाल बैठक का बुलावा भेजता है। 
  • दोनों सत्रों के बैठक के बीच छह माह से अधिक का समय नहीं होना चाहिए। 
  • राज्य विधानमंडल को कम से कम एक वर्ष में दो बार मिलना चाहिए। 
  • एक सत्र में विधानमंडल की कई बैठकें हो सकती हैं।

स्थगन/विलंबन(adjournment) 

  • बैठक को कुछ समय के लिए स्थगित भी किया जा सकता है। यह समय घंटों, दिनों या हफ्तों का भी हो सकता है।
  • अनिश्चित काल स्थगन का मतलब है कि चालू सत्र को अनिश्चित काल तक के लिए समाप्त कर देना। 
  • इन दोनों तरह के स्थगन का अधिकार सदन के पीठासीन अधिकारी को है।

सत्रावसान(Prorogation) 

  • पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष या सभापति) कार्य संपन्न होने पर सत्र को अनिश्चित काल के लिए स्थगन की घोषणा करते हैं। 
    • अनिश्चित काल स्थगन का मतलब है कि चालू सत्र को अनिश्चित काल तक के लिए समाप्त कर देना। 
  • इसके कुछ दिन बाद राज्यपाल सत्रावसान की अधिसूचना जारी करता है।
  • सत्र के बीच में भी राज्यपाल सत्रावसान की घोषणा कर सकता है। 
  • स्थगन के विपरीत सत्रावसान सदन के सत्र को समाप्त करता है।

विघटन (Dissolution)

  • एक स्थायी सदन के होने के नाते विधानपरिषद कभी विघटित नहीं हो सकती। 
  • सिर्फ विधानसभा ही विघटित हो सकती है । 
  • सत्रावसान के विपरीत विघटन से वर्तमान सदन का कार्यकाल समाप्त हो जाता है और आम चुनाव के बाद नए सदन का गठन होता है। 

विधानसभा के विघटित होने पर विधेयकों के खारिज होने को हम इस प्रकार समझ सकते हैं: 

  1. विधानसभा में सभी लंबित विधेयक समाप्त हो जाता है।
    • (चाहे यह विधानसभा द्वारा प्रारंभ किया गया हो या फिर इसे विधान परिषद द्वारा भेजा गया हो)। 
  1. विधानसभा द्वारा विधेयक पारित लेकिन विधानपरिषद में लंबित है। तब भी विधेयक समाप्त हो जाता है।
  2. विधानपरिषद में विधेयक लंबित हो लेकिन विधानसभा द्वारा पारित न हो,को खारिज नहीं किया जा सकता। 
  3. विधानसभा द्वारा विधेयक पारित हो (एकसदनीय विधानमंडल) लेकिन राज्यपाल या राष्ट्रपति की स्वीकृति के कारण रुका हुआ हो, को खारिज नहीं किया जा सकता। 
  4.  दोनों सदनों द्वारा पारित हो (बहुसदनीय व्यवस्था वाले राज्य में) लेकिन राज्यपाल या राष्ट्रपति की स्वीकृति के कारण रुका हुआ हो, को खारिज नहीं किया जा सकता। 
  5. विधानसभा द्वारा विधेयक पारित हो (एकसदनीय विधानमंडल) या दोनों सदनों द्वारा पारित हो (बहुसदनीय व्यवस्था) ,लेकिन राष्ट्रपति द्वारा सदन के पास पुनर्विचार हेतु लौटाया गया हो को समाप्त नहीं किया जा सकता। 

कोरम (गणपूर्ति) 

  • किसी भी कार्य को करने के लिए उपस्थित सदस्यों की एक न्यूनतम संख्या को कोरम कहते हैं। 
  • यह सदन में दस सदस्य या कुल सदस्यों का दसवां हिस्सा (पीठासीन अधिकारी सहित) होता है, इनमें से जो भी ज्यादा हो। 
  • यदि सदन की बैठक के दौरान कोरम न हो तो यह पीठासीन अधिकारी का कर्तव्य है कि सदन को स्थगित करे या कोरम पूरा होने तक सदन को स्थगित रखे। 

सदन में मतदान 

  • सदन की सभी मामलों को उपस्थित सदस्यों के बहुमत के आधार पर तय किया जाता है और इसमें पीठासीन अधिकारी का मत सम्मिलित नहीं होता है। 
  • केवल कुछ मामले जिनका विशेष रूप से संविधान में उल्लेख किया गया है, जैसे-विधानसभा अध्यक्ष को हटाना या विधानपरिषद के सभापति को हटाना इनमें सामान्य बहुमत की बजाय विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। 
  • पीठासीन अधिकारी पहले मामले में मत नहीं दे सकते, लेकिन बराबर मतों की स्थिति में निर्णायक मत दे सकते हैं

विधानमंडल में भाषा 

  • संविधान विधानमंडल की कार्यालयी भाषा के रूप में उस राज्य के लिए हिंदी अथवा अंग्रेजी की घोषणा करता है। 
  • पीठासीन अधिकारी किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकता है। 
  • राज्य विधानमंडल यह निर्णय लेने को स्वतंत्र है कि सदन में अंग्रेजी भाषा को जारी रखा जाए या नहीं, ऐसा वह संविधान के प्रारंभ होने के 15 वर्ष बाद (1965 से) तक के लिए कर सकता है। 
  • हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा के मामले में यह समय सीमा 25 वर्ष है और अरुणाचल प्रदेश, गोवा और मिजोरम के मामले में 40  वर्ष। 

मंत्रियों एवं महाधिवक्ता के अधिकार 

  • प्रत्येक मंत्री एवं महाधिवक्ता को यह अधिकार है कि वह सदन की कार्यवाही में भाग ले, बोले एवं सदन से संबद्ध समिति जिसके लिए वह सदस्य रूप में नामित है, वोट देने के अधिकार के बिना भी भाग ले। 
  • एक मंत्री उस सदन की कार्यवाही में भी भाग ले सकता है जिसका वह सदस्य नहीं है। 
  • एक मंत्री जो सदन का सदस्य नहीं है, दोनों सदनों की कार्यवाही में भाग ले सकता है

विधानमंडल में विधायी प्रक्रिया 

साधारण विधेयक 

विधेयक का प्रारंभिक सदन : 

  • एक साधारण विधेयक विधानमंडल के किसी भी सदन में प्रारंभ हो सकता है 
  • साधारण विधेयक को सदन का कोई भी सदस्य या मंत्री द्वारा पुरः स्थापित किया जाएगा। 
  • विधेयक प्रारंभिक सदन में तीन स्तरों से गुजरता है:
    • एक सदन से विधेयक को पारित होने के बाद इसे दूसरे सदन में पारित करने हेतु भेजा जाता है, जब विधानमंडल के दोनों सदन इसे इसके मूल रूप में या संशोधित कर पारित करते हैं तो इसे पारित माना जाता हैं। विधानमंडल में इसे पारित कर सीधे राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। 

विधानसभा —> विधानपरिषद —->  राज्यपाल 

विधानपरिषद —->विधानसभा —–>राज्यपाल 

विधानसभा —–>राज्यपाल 

  • जब कोई विधेयक विधानसभा से पारित होने के बाद विधानपरिषद में भेजा जाता है, तो वहां तीन विकल्प होते है.
    • 1. उसी रूप में (बिना संशोधन के) पारित कर दिया जाए। 
    • 2. कुछ संशोधनों के बाद पारित कर विचारार्थ इसे विधानसभा को भेज दिया जाए। 
    • 3. विधेयक को अस्वीकृत कर दिया जाए। 
    • 4. इस पर कोई कार्यवाही न कर विधेयक को लंबित रखा जाए। 
  • यदि विधानपरिषद बिना संशोधन के विधेयक को पारित कर दे तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है
  • यदि विधानपरिषद संशोधन के साथ विधेयक को पारित कर दे या विधानसभा उसके संशोधनों को मान ले तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है 
    • जिसे राज्यपाल के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।

विधानसभा में पारित ⇒ विधानपरिषद्

  • विधानपरिषद् स्वीकृत==>राज्यपाल के पास 
  • विधानपरिषद् अस्वीकृत ⇒ विधानसभा पुनः पारित कर विधानपरिषद को भेज सकती है==>विधानपरिषद पुनः अस्वीकृत कर दे==>तब इसे दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है क्योंकि विधानसभा ने इसे दूसरी बार पारित कर दिया। 
  • विधानपरिषद् द्वारा संशोधन ==>विधानसभा स्वीकृत==>राज्यपाल के पास
  • विधानपरिषद् द्वारा संशोधन ==>विधानसभा अस्वीकृत==>विधानसभा पुनः पारित कर विधानपरिषद को भेज सकती है ==>विधानपरिषद पुनः अस्वीकृत कर दे ==>तब इसे दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है क्योंकि विधानसभा ने इसे दूसरी बार पारित कर दिया। 
  • विधानपरिषद् द्वारा संशोधन ==>विधानसभा अस्वीकृत==>विधानसभा पुनः पारित कर विधानपरिषद को भेज सकती है ==>विधानपरिषद पुनः संशोधन के साथ पारित दे ==>तब इसे दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है क्योंकि विधानसभा ने इसे दूसरी बार पारित कर दिया। 
  • विधानपरिषद् द्वारा कोई कार्यवाही नही(तीन महीने तक)==>विधानसभा पुनः पारित कर विधानपरिषद को भेज सकती है ==>विधानपरिषद एक माह के भीतर पास न करे ==>तब इसे दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है क्योंकि विधानसभा ने इसे दूसरी बार पारित कर दिया। 

IMPORTANT NOTE :

  • विधानपरिषद एक विधेयक को अधिकतम चार माह के लिए रोक सकती है। पहली बार में तीन माह के लिए और दूसरी बार में एक माह के लिए। 
  • संविधान में किसी विधेयक पर असहमति होने के मामले में विधानमंडलों के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं रखा गया है। 
  • कोई विधयक विधानपरिषद में निर्मित हो और उसे विधानसभा अस्वीकृत कर तो विधेयक समाप्त हो जाता है।

राज्यपाल की स्वीकृतिः

दोनों सदनों में पारित(द्विसदनीय ) ==>राज्यपाल के पास (4 विकल्प )

विधानसभा में पारित(एकसदनीय ) ==>राज्यपाल के पास (4 विकल्प )

1. वह विधेयक को स्वीकृति प्रदान कर दे, 

2. वह विधेयक को अस्वीकृत

3. वह सदन या सदनों के पास विधेयक को पुनर्विचार के लिए भेज दे 

4. वह राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयक को सुरक्षित रख ले। 

  • राज्यपाल विधेयक को स्वीकृति प्रदान कर दे तो विधेयक फिर अधिनियम बन जाएगा 
  • यदि राज्यपाल विधेयक को अस्वीकृत कर देता है तो विधेयक समाप्त हो जाता है 
  • यदि राज्यपाल विधेयक को पुनर्विचार के लिए भेजता है और दोबारा सदन या सदनों द्वारा इसे पारित कर दिया जाता है एवं पुनः राज्यपाल के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है तो राज्यपाल को उसे मंजूरी देना अनिवार्य हो जाता है। 

राष्ट्रपति की स्वीकृतिः 

  • यदि कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रखा जाता है तो 
    • राष्ट्रपति या तो अपनी स्वीकृति दे देते हैं 
    • उसे अस्वीकृत कर  सकते हैं  
    • विधानमंडल के सदन या सदनों को पुनर्विचार हेतु भेज सकते हैं। 
      • 6 माह के भीतर इस विधेयक पर पुनर्विचार आवश्यक है। 
      • यदि विधानमंडल विधेयक को उसके मूल रूप में या संशोधित कर दोबारा राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है तो संविधान में इस बात का उल्लेख नहीं है कि राष्ट्रपति इस विधेयक को मंजूरी दे या नहीं

 धन विधेयक 

  • धन विधेयक विधानपरिषद में पेश नहीं किया जा सकता। 
  • यह केवल विधानसभा में ही राज्यपाल की सिफारिश के बाद पुरः स्थापित किया जा सकता है 
  • धन विधेयक को सिर्फ एक मंत्री द्वारा ही पुरःस्थापित किया जा सकता है। 
  • विधानसभा द्वारा पारित होने के बाद एक धन विधेयक को विधानपरिषद को विचारार्थ भेजा जाता है। 
  • विधानपरिषद न तो धन विधेयक को अस्वीकार कर सकती है, न ही इसमें संशोधन कर सकती है। वह केवल संशोधन की सिफारिश कर सकती है और 14 दिनों में विधेयक को लौटाना भी होता है। विधानसभा इसके सुझावों को स्वीकार भी कर सकती है और अस्वीकार भी। 
  • यदि विधानसभा किसी सिफारिश को मान लेती है तो विधेयक पारित मान लिया जाता है। यदि वह कोई सिफारिश नहीं मानती है तब भी इसे मूल रूप में दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है। 
  • यदि विधान परिषद 14 दिनों के भीतर विधानसभा को विधेयक न लौटाए तो इसे दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है। 
  • इसका मतलब विधान परिषद इस विधेयक को अधिकतम 14 दिन तक रोक सकती है।
  • जब एक धन विधेयक राज्यपाल के समक्ष पेश किया जाता है तब वह 
    • इस पर अपनी स्वीकृति दे सकता है 
    • इसे रोक सकता है या 
    • राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रख सकता है 
    • लेकिन राज्य विधानमंडल के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता। 
  • जब कोई धन विधेयक राष्ट्रपति के विचारार्थ के लिए सुरक्षित रखा जाता है तो 
    • राष्ट्रपति या तो इसे स्वीकृति दे देता है  
    • इसे रोक सकता है 
    • लेकिन इसे राज्य विधानमंडल के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता है। 

राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार 

  • संविधान ने राज्य विधानमण्डल के विशेषाधिकारों को उन व्यक्तियों को भी विस्तारित किया है, जो राज्य विधानमण्डल के सदन या इसकी किसी समिति की कार्यवाहियों में बोलने और भाषा लेने के लिए अधिकृत हैं। 
  • इसमें राज्य के महाधिवक्ता और राज्य मंत्री सम्मिलित हैं।
  • राज्य विधानमण्डल के विशेषाधिकार राज्यपाल को प्राप्त नहीं होते हैं, जोकि राज्य विधानमण्डल, का अभिन्न अंग हैं। 

सामूहिक विशेषाधिकार 

प्रत्येक सदन को मिलने वाले सामूहिक विधानमंडलीय विशेषाधिकार इस प्रकार हैं:

  • सदन अपने प्रतिवेदनों को प्रकाशित करे और यह अधिकार भी है कि अन्यों को इसके प्रकाशन से प्रतिबंधित करे। 
  • ,सभा या इसकी समितियों की जांच न्यायालय नहीं कर सकती। 
  • सभा परिसर में पीठासीन अधिकारी की अनुमति के बिना किसी व्यक्ति (सदस्य या बाह्य) को गिरफ्तार और किसी विधिक प्रक्रिया (सिविल या आपराधिक) नहीं किया जा सकता। 

व्यक्तिगत विशेषाधिकार 

सदस्य को मिलने वाले व्यक्तिगत विशेषाधिकार इस तरह .

1. उन्हें सदन चलने के 40 दिन पहले और 40 दिन बाद तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। 

  • यह छूट केवल सिविल मामले में है और आपराधिक या प्रतिबंधिक निषेध मामलों में नहीं है। 

2. राज्य विधानमंडल में उन्हें बोलने की स्वतंत्रता है। उसके द्वारा किसी कार्यवाही या समिति में दिए गए मत या विचार को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

3. वे न्यायिक सेवाओं से मुक्त होते हैं। 

  • जब सदन चल रहा हो, वे साक्ष्य देने या किसी मामले में बतौर गवाह उपस्थित होने से इनकार कर सकते हैं।

राज्य विधायिका से सम्बन्धित अनुच्छेद, एक नजर में

अनुच्छेद

विषय-वस्तु

168

राज्यों में विधायिकाओं का गठन

169

राज्यों में विधान परिषदों का गठन अथवा उन्मूलन

170

विधान सभाओं का गठन

171

विधान परिषदों का गठन

172

राज्य विधायिकाओं का कार्यकाल

173

राज्य विधायिका की सदस्यता के लिए योग्यता

174

राज्य विधायिका के सत्र, सत्रावसान एवं उनका भंग होना

175

राज्यपाल का सदन अथवा सदनों को संबोधित करने तथा उन्हें संदेश देने का अधिकार 

176

राज्यपाल द्वारा विशेष संबोधन

177

सदनों से संबंधित मंत्रियों तथा महाधिवक्ता के अधिकार

राज्य विधायिका के पदाधिकारीगण

178

विधान सभा के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष

179

विधान सभा अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष के पदों से पदत्याग, त्यागपत्र तथा पद से हटाया जाना

180

उपाध्यक्ष अथवा अध्यक्ष का पदभार संभाल रहे व्यक्ति की शक्तियाँ

181

अध्यक्ष अथवा उपाध्यक्ष द्वारा उस समय सदन की अध्यक्षता से विरत रहना जबकि उन्हें हटाए जाने संबंधी प्रस्ताव सदन के विचाराधीन हो।

182

विधान परिषद के सभापति एवं उप सभापति

183

सभापति तथा उप सभापति के पदों से पदत्याग, त्यागपत्र तथा पद से हटाया जाना

184

उप सभापति अथवा अन्य व्यक्ति जो कि सभापति का कार्यभार देख रहा हो, को सभापति के रूप में कार्य करने की शक्ति 

185

सभापति एवं उप-सभापति द्वारा उस समय सदन की अध्यक्षता से विरत रहना जबकि उन्हें हटाए जाने संबंधी प्रस्ताव सदन के विचाराधीन हो।

186

विधानसभा अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष और विधान परिषद सभापति और उपसभापति के वेतन एवं भत्ते

187

राज्य विधायिका का सचिवालय

कार्यवाही का संचालन 

188

सदस्यों द्वारा शपथ ग्रहण 

189

सदन में मतदान, सदनों की रिक्तियों एवं कोरम का विचार किए बिना कार्य करने की शक्ति 

सदस्यों की अयोग्यता

190

सीटों का रिक्त होना

191

सदस्यता के लिए अयोग्यता

192

सदस्यों की अयोग्यता संबंधी प्रश्नों पर निर्णय

193

अनुच्छेद 188 के अंतर्गत शपथ ग्रहण के पहले स्थान ग्रहण और मतदान के लिए दंड अथवा उस स्थित लिए भी जबकि अर्हता नहीं हो अथवा अयोग्य ठहरा दिया गया हो

राज्य विधायिकाओं एवं सदस्यों की शक्तियाँ विशेषाधिकार तथा सुरक्षा

194

विधायी सदनों तथा इनके सदस्यों एवं समितियों की शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार इत्यादि 

195

सदस्यों के वेतन-भत्ते

विधायी प्रक्रिया

196

विधेयकों की प्रस्तुति एवं उन्हें पारित करने संबंधी प्रावधान

197

विधान परिषद के वित्त विधेयकों के अतिरिक्त अन्य विधेयकों के संबंध में शक्तियों पर प्रतिबंध

198

वित्त विधेयकों संबंधी विशेष प्रक्रिया 

199

वित्त विधेयक की परिभाषा

200

विधेयकों की स्वीकृति

201

बिल विचारार्थ सुरक्षित

वित्तीय मामलों संबंधी प्रक्रिया

202

वार्षिक वित्तीय विवरण

203

विधायिका में प्राक्कलनों से संबंधित प्रक्रिया

204

विनियोग विधेयक 

205

पूरक, अतिरिक्त अथवा अतिरेक अनुदान

206

लेखा, ऋण एवं असाधारण अनुदानों पर मतदान

207

वित्त विधेयकों संबंधी विशेष प्रावधान

साधारण प्रक्रिया 

208

प्रक्रिया संबंधी नियम

209

राज्य विधायिका में वित्तीय कार्यवाहियों से संबंधित प्रक्रियागत नियम

210

विधायिका में प्रयोग की जाने वाली भाषा

211

विधायिका में चर्चा पर प्रतिबंध

212

न्यायालय द्वारा विधायिका की कार्यवाहियों के संबंध में पूछताछ नहीं

राज्यपाल की विधायी शक्तियाँ

213

विधायिका की अवकाश अवधि में राज्यपाल की अध्यादेश जारी करने की शक्ति

 

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