मृदा (Soil )

मृदा (soil)

  • मृदा (मिट्टी) कई ठोस, तरल और गैसीय पदार्थों का मिश्रण है।
  • यह भूपर्पटी के सबसे ऊपरी भाग में पाई जाती है। 
  • धरातलीय चट्टानों के अपक्षय, जलवायु, पौधों और करोड़ों भूमिगत कीटाणओं तथा कृमियों के बीच होने वाले आपसी क्रिया-कलाप का अंतिम परिणाम ही मिट्टी है।
  • मृदा महत्त्वपूर्ण क्षयशील संसाधन है ,क्योंकि एक बार नष्ट हो जाने पर इसकी स्थानापूर्ति नहीं की जा सकती है।
  • मृदा निर्माण प्रक्रिया की दर अत्यंत मंद होने के कारण मृदा को अनवीकरणीय संसाधन भी माना जाता है। 
  • मृदा के अलग-अलग प्रकारों के अपने खास रासायनिक गुण होते हैं।
    • अम्लीय मृदा‘ – मृदा में चूने की मात्रा कम
    • ‘क्षारीय मृदा’ – मृदा में चूने की मात्रा ज़्यादा
  • वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ‘अंतर्राष्ट्रीय मृदा वर्ष’ घोषित किया गया था।
  • 5 दिसंबर- ‘विश्व मृदा दिवस‘ मनाया जाता है। 
  • मृदा का रंग जीवांश की मात्रा पर भी निर्भर करता है।
  • मृदा की संरचना एवं उसके घटकों को इडेफिक कहा जाता है।

 

मृदा की संरचना और संघटन (Structure and Composition of Soil) 

  • मृदा की गठनता एवं संरचना इसकी सरंध्रता एवं पारगम्यता (porosity and permeability) को निर्धारित करती हैं।
  • अत्यंत बारीक कणों से निर्मित चीका युक्त मृदा
    • छिद्रों का आकार छोटा और संख्या अधिक होती है
    • जल को अवशोषित करने की क्षमता अर्थात् सरंध्रता अधिक हो जाती है
    • चीका युक्त मृदा आर्द्र होने पर चिपचिपी हो जाती है और शुष्क होने के बाद इनमें बड़ी-बड़ी दरारें बन जाती हैं। 
  • बड़े आकार के कणों से निर्मित रेतीली मृदा
    • छिद्रों का आकार बड़ा होने के कारण सरंध्रता कम हो जाती है और पारगम्यता अधिक हो जाती है
    • जल का रिसाव ऊपर की परतों से नीचे की परतों में अधिक होता है। यही कारण है कि रेतीली मृदा शुष्क होती है। 
  •  ‘दोमट मृदा’ में रेत, शिल्ट और चीका का अनुपात लगभग एक समान होता है। इस कारण इसकी सरध्रता और पारगम्यता में एक प्रकार का संतुलन बना रहता है, फलतः कृषि की दृष्टि से ‘दोमट मृदा’ सर्वाधिक उपजाऊ होती है। 
  • मृदा कीजल धारण क्षमता का घटता हुआ क्रम – मृतिका (clay) >गाद(silt) >बालू(sand)
    • मृतिका मिट्टी के कणों का व्यास छोटा होने के कारण इसमें जल धारण क्षमता अधिक होती है।
  • केसीका क्रिया (Capillary) चिकनी मिट्टी (clay soil) में सर्वाधिक होती है जबकि बलुई मिट्टी में सबसे कम होती है।

 

मृदा निर्माण को प्रभावित करने वाले कारक  (Factors Affecting Soil Formation) 

  1. चट्टानी संरचना (Rocky Structure) 
  2. जलवायु (Climate) 
  3. वनस्पति (Vegetation) 
  4. जीवाणु (Bacteria
  5. स्थलीय उच्चावच (Terrestrial Topography) 
  6. मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile)

चट्टानी संरचना (Rocky Structure) 

  • मृदा के नीचे स्थित चट्टान ‘मृदा जनक पदार्थ‘ हैं, क्योंकि इसी से मृदा का निर्माण होता है।
    • ग्रेनाइट चट्टान के टूटने से बालू मिश्रित चिकनी मृदा बनती है
    • बेसाल्ट चट्टान के अपक्षय से महीन कणों की उपजाऊ काली मृदा बनती है।

 

जलवायु (Climate) 

  • एक ही जलवायु वाले क्षेत्र में दो विभिन्न प्रकार के जनक पदार्थ एक ही प्रकार की मदा का निर्माण कर सकते हैं
  • एक ही तरह के जनक पदार्थ दो भिन्न जलवायु प्रदेशों में दो भिन्न प्रकार की मृदा का निर्माण कर सकते हैं।
    • ‘रवेदार ग्रेनाइट चट्टाने’
      • मानसूनी प्रदेश के आर्द्र भागों में ‘लैटेराइट मृदा‘ का निर्माण करती हैं
      • मानसूनी प्रदेश के शुष्क भागों पर लैटेराइट से भिन्न प्रकार की मृदा का निर्माण करती हैं
    • ग्रेनाइट चट्टान
      • स्टेपी जलवायु में काली मृदा निर्माण करती हैं।
      • टैगा जलवायु में भूरी मृदा का निर्माण करती हैं।
  • आर्द्र जलवायु प्रदेश की मृदा क्षारीय नहीं होती है। 
    • आर्द्र जलवायु प्रदेशों में, वर्षा की मात्रा, वाष्पीकरण की दर से अधिक होती है
      • वहाँ क्षारीय तत्त्व जल के साथ घुलकर निक्षालन (leaching) द्वारा मृदा के नीचे की परतों में चले जाते हैं
  • अर्द्ध-शुष्क एवं शुष्क जलवायु प्रदेश में मृदा अधिक क्षारीय हो जाती है।
    • वाष्पीकरण की दर, वर्षा की मात्रा से अधिक होती है
      • मृदा की ऊपर की परतें शुष्क हो जाती हैं, वहाँ केशिकत्व क्रिया के द्वारा जल के साथ घुले हुए क्षारीय तत्त्व नीचे की परतों से ऊपर की परतों में आ जाते हैं, जिसके कारण मृदा अधिक क्षारीय हो जाती है।
  • क्षारीय मृदा में सोडियम (सोडियम कार्बोनेट) की बहुलता होती है। 
    •  निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर जाने पर मृदा की अम्लीयता में वृद्धि होती  है। 
    • मैदानी प्रदेश से पर्वतीय क्षेत्रों की ओर जाने पर तापमान में कमी आने के साथ मृदा की अम्लीयता में वृद्धि होती  है। 
  • मृदा की अम्लीयता एवं क्षारीयता को pH मान द्वारा व्यक्त किया जाता है, इस मान का विस्तार 0 से 14 तक होता है। 
    • pH मान 7 –  मृदा तटस्थ
    • pH मान 7 से कम –  मृदा अम्लीय
    • pH मान 7 से अधिक –  मृदा क्षारीय 

 

वनस्पति (Vegetation) 

  • उच्च अक्षांशों से निम्न अक्षांशों की ओर जाने पर वनस्पति की सघनता में वृद्धि के बावजूद ह्यूमस की मात्रा में पहले वृद्धि, फिर कमी होती जाती है। 
  • वनस्पतियों के पत्तों तथा जड़ों के सड़ने से ‘ह्यूमस’ का निर्माण होता है जो मृदा की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ मृदा के विकास में भी सहायक होता है। 

 

जीवाणु (Bacteria

  • जीवाणुओं को भोजन मृदा में उपस्थित ह्यूमस से प्राप्त होता है । 
  • उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु प्रदेशों में जीवाणु अधिक सक्रिय अवस्था में रहते हैं जो मृदा से ह्यूमस को ग्रहण कर लेते हैं,फलतः इन प्रदेशों की मृदाओं में ह्यूमस अपेक्षाकृत कम हो जाती है। 
  • इसके विपरीत ठंडे जलवायु प्रदेशों में जीवाणु कम सक्रिय रहते हैं, जिसके कारण इन प्रदेशों की मृदाओं से ह्यूमस की क्षति कम होती है। 

 

स्थलीय उच्चावच (Terrestrial Topography) 

  • तीव्र ढाल वाली चट्टानी सतह पर जल बहाव अधिक तीव्र होने के कारण मृदा निर्माणकारी पदार्थों का जमाव कम होता है। फलतः यहाँ मृदा की  पतली परत का ही निर्माण हो पाता है, जिसे ‘अवशिष्ट मृदा’ कहते हैं। 
  • ऐसे क्षेत्रों में भू-संरक्षण ‘परिरेखा बंधन विधि‘ (Contour Banding) द्वारा किया जाता है, जिससे मृदा अपरदन कम होता है।  
    • इसका प्रयोग पहाड़ी ढलान क्षेत्रों में किया जाता है
    • इसके तहत पहाड़ी ढलान ऊपर मेड़बंदी करके खेती की जाती है

 

मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile) 

  • ‘मृदा परिच्छेदिका’ – मृदा की ऊपरी सतह से आधारभूत चट्टान तक के ऊर्ध्वाधर काट (Vertical Cross-section) को
    • अपवहन /अपछालन (Eluviation)- ऊपरी संस्तर से पदार्थों का नीचे की ओर गमन
    • विनिच्छेपन (Illuviation)कार्बनिक पदार्थों को गहरे क्षितिज में जमाव
    • केसिका क्रिया (Capillary Action)
  • ‘मृदा संस्तर’ – मृदा की क्षैतिज परतों को ‘
    • संस्तर की भौतिक और रासायनिक विशेषताओं के आधार पर ही मृदा की पहचान की जाती है
  • o-संस्तर’
    • मृदा के सबसे ऊपरी जैविक परत
    • पौधों एवं जंतुओं से प्राप्त जैविक पदार्थों के संचयन से  
  • ‘A-संस्तर’
    •  ‘o-संस्तर’ के नीचे पाया जाता है।
    • इसको कई उपभागों में विभाजित किया जाता है।
      • ‘A1-उपसंस्तर’
        • ह्यूमस की मात्रा अधिक
        • रंग गाढ़ा
        • पोषक तत्त्वों की अधिकता
      •  A2-उपसंस्तर’ (अपवहन क्षेत्र’ (Zone of Eluviation))
        • अपवाहन की दर अधिक
        • पोषक तत्त्वों का अभाव
        • रंग हल्का
      • A3 -उपसंस्तर’
  •  ‘B-संस्तर’
    • B1-उपसंस्तर
    • B2-उपसंस्तर (विनिक्षेपण क्षेत्र’ (Zone of Illuviation)
      • विनिक्षेपण की दर सर्वाधिक
      • पोषक तत्त्वों का जमाव
      • रंग ‘A1,-उपसंस्तर’ से हल्का तथा ‘A2,-उपसंस्तर’ से गाढा होता है। 
      • B3-उपसंस्तर
  •  A3, B1, तथा B3,-उपसंस्तरों को ‘संक्रमण संस्तर’ कहते हैं, क्योंकि यहाँ एक साथ दो संस्तरों की विशेषताएँ देखने को मिलती हैं। 
  • मृदा की सबसे निचली परत को ‘c-संस्तर’ कहते हैं
    • मृदा निर्माणकारी प्रक्रिया का  प्रभाव
    • मृदा का पूर्णतः विकास नहीं हो पाता है
    • कालांतर में ‘c-संस्तर’, ‘B-संस्तर’ में परिवर्तित हो जाता है। 

 

मृदा का वर्गीकरण (Classification of Soil) 

  • मृदा के वर्गीकरण का सर्वप्रथम प्रयास रूसी विद्वान ‘वी.वी.डोकुचायेव’ द्वारा किया गया। 
  •  1938 में संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि विभाग द्वारा वैश्विक मृदा का वर्गीकरण किया गया, जिसे ‘USDA System’ नाम दिया गया।
    • इस वर्गीकरण के आधार पर मृदा को वर्गीकरण
      • मंडलीय मृदा
      • अंत: क्षेत्रीय/अंतः प्रादेशिक मृदा
      • अमंडलीय या अप्रादेशिक मृदा  
  • 1975 में संयुक्त राज्य अमेरिका की ‘मृदा संरक्षण सेवा’ के मृदा सर्वेक्षण विभाग द्वारा ‘वृहद् मृदा वर्गीकरण योजना’ (CSCS) प्रस्तुत किया गया।
    • इसके द्वारा वैश्विक मृदा को उनके परिच्छेदिका के विभिन्न लक्षणों के आधार पर 12 वर्गों में विभाजित किया गया है

मृदा का वैश्विक वितरण

मृदा

विश्व का भू-क्षेत्र (लगभग प्रतिशत में)

एरिडीसॉल्स

12

इनसेप्टीसॉल्स

17

अल्फीसॉल्स

10

एंटीसॉल्स

16

ऑक्सीसॉल्स

8.0

मोलीसॉल्स

7.0

अल्टी-सॉल्स

8.0

स्पोडोसॉल्स

4.0

वर्टीसॉल्स

2.0

एंडीसॉल्स

1.0

हिस्टोसॉल्स

1.0

जेलीसॉल्स

9.0

www.nrcs.usda.gov

 

मृदा का सामान्य वर्गीकरण (General Classification of Soil) 

  • पेडोकल मृदा – शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों की मृदा
  • पेडल्फर  मृदा –  अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों की मृदा

 

पेडल्फर वर्ग की मृदा (pedelfer soil)

  • स्थान – वार्षिक वर्षा 63.5 सेमी. से अधिक होती है। 
    •  निम्न अक्षांशों में उच्च तापमान एवं आर्द्र मौसमी दशा वाले क्षेत्रों में –  ‘लाल’ और ‘पीले’ रंग 
  • जैविक पदार्थों की अधिकता होने पर भी जीवाणुओं की अधिक क्रियाशीलता के कारण जीवाणुओं द्वारा ह्यूमस का उपभोग कर लिया जाता है. जिसके कारण ह्यूमस की बहत कम मात्रा बच पाती है फलतः उर्वरकों के अभाव में यह जल्द ही अनुपजाऊ हो जाती है। 
  • पेडल्फर वर्ग में शामिल मृदा 
    • टुंड्रा मृदा
    • पोडज़ोल मृदा
    • लैटेराइट मृदा  

 

लैटेराइट मृदा (laterite soil)

  • स्थान – उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु प्रदेशों में
    • सदाबहार वन मिलते हैं।
    • तापमान अधिक होने के कारण सिलिकेट खनिज तत्त्व विघटित होकर सिलिका में परिवर्तित हो जाते हैं, जल के साथ सिलिका  नीचे की परतों में चली जाती है। 
    • क्षारीय तत्त्व और ह्यूमस भी जल के साथ घुलकर नीचे की परतों में चले जाते हैं
    • इस मृदा के ऊपर की परतों में सिलिका, क्षारीय तत्त्व और ह्यूमस का अभाव रहता है। 
  • इस मृदा में एल्युमीनियम तथा आयरन के ऑक्साइड की अधिकता होती है, इसीलिये इस मृदा का रंग लाल होता है। 
  • इस मृदा में बॉक्साइट, लिमोनाइट तथा मैग्नेटाइट आदि खनिज पाये जाते हैं।
  • यह मृदा कृषि के लिये अपेक्षाकृत उपयुक्त नहीं होती है। 
  • इस मृदा में कठोर लकड़ी के वृक्ष तथा काँटेदार झाड़ियाँ उगती हैं, जैसे- जायरे (कांगो) बेसिन, अमेज़न बेसिन इत्यादि।
  • भारत में लैटेराइट मृदा –  तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशाअसम के पहाड़ी क्षेत्र और केरल में  

 

पोडज़ोल मृदा (podzol soil)

  • स्थान – शीत-आर्द्र जलवायु प्रदेश में (शीत समसीतोष्ण ) 
    • शंकुधारी वन मिलते हैं
    • मृदा का विकास पोडज़ोलाईजेशन के द्वारा होता है । 
  •  पोडज़ोलाइजेशन प्रक्रिया
    •  शीत-आर्द्र जलवायु प्रदेश में अत्यंत कम तापमान होने के कारण सिलिकेट खनिज तत्त्वों का विघटन नहीं हो पाता है, जिस कारण इस मृदा के ऊपर की परतों में ‘सिलिका’ की अधिकता होती है
    • कार्बनिक पदार्थों का विघटन नहीं होने के कारण ‘ह्यूमस’ का अभाव होता है।
    • अम्ल की मात्रा अधिक होने के कारण इस मृदा में जीवाणुओं की अनुपस्थिति पाई जाती है। 

 

टुंड्रा मृदा (tundra soil)

  • स्थान – टुंड्रा जलवायु प्रदेश में
    • टुंड्रा मृदा का विकास ‘ग्लेईकरण’ (Gleyization) के द्वारा होता है।
      • इस प्रक्रिया में अत्यंत कम तापमान होने के साथ बर्फ पिघलने  के कारण जल का भराव हो जाता है, जिससे सूक्ष्म जीवों की गतिविधियाँ भी कम हो जाती हैं और ऑक्सीजन का स्तर भी निम्न होता है। 
  • मुख्य वनस्पति- ‘काई’ (Lichen) तथा ‘मॉस’ (Moss) है। 

 

पेडोकल वर्ग की मृदा (Pedocal grade soil)

  •  विकास – अर्द्ध-शुष्क एवं शुष्क जलवायु प्रदेश में ‘कैल्सीकरण’ के द्वारा होता है। 
    • कैल्सीकरण प्रक्रिया के अंतर्गत ‘केशिकत्व क्रिया’ (Capillary Process) के द्वारा जल के साथ घुले हुए क्षारीय तत्त्व, मृदा के नीचे की परतों से ऊपर की परतों में आ जाते हैं, जिसके कारण मृदा की क्षारीयता में वृद्धि हो जाती है। 
  • शुष्कता में वृद्धि के साथ वनस्पति की सघनता में कमी आती है, इसलिये ‘ह्यूमस’ की मात्रा में भी कमी आती है। 
  • पेडोकल वर्ग में शामिल मृदा
    • प्रेयरी मृदा
    • चरनोज़म मृदा 
    • चेस्टनट मृदा
    • काली मृदा  

 

  • पोडज़ोल मृदा – शीत समसीतोष्ण
  • चरनोज़म मृदा – समसीतोष्ण शीत स्टेपी
  • स्पॉडजोलस – आद्र शीत समसीतोष्ण
  • चेस्टनट मृदा – शुष्क प्रदेश में
  • लेटेराइट – उष्ण एवं आद्र प्रदेश में
  • सिरोजेम – मध्य अक्षांशीय शुष्क मरुस्थलों में  में

चरनोज़म मृदा (Charnozem Soil)

  • स्थान – स्टेपी तुल्य जलवायु प्रदेश में ( समसीतोष्ण शीत स्टेपी )
    • कम वर्षा एवं अधिक वाष्पीकरण के कारण वृक्ष रहित घास के मैदान पाये जाते हैं। 
  • चरनोज़म मृदा में कैल्सीफिकेशन और निक्षालन में संतुलन बना रहता है।
  • इस मृदा में कैल्शियम तत्त्वों की प्रचुर मात्रा होती है। 
  • ह्यूमस की मात्रा अधिक पाई जाती है, इसलिये इसे ब्लैक अर्थ सॉयल’ (Black Earth Soil) भी कहते हैं। 
  • अत्यधिक उपजाऊ होने के साथ-साथ चरनोज़म मृदा भुरभुरी होती है जो भारत में ‘रेगुर (Regur) या काली कपासी मृदा’ कहलाती है। 
  • काली मृदा में केशिका (कैपिलरी) क्रिया सबसे अधिक प्रभावशाली होती है। 
  • चरनोज़म मृदा में आर्द्रता ग्रहण करने की क्षमता अत्यधिक होती है
    • सिंचाई की आवश्यकता कम पड़ती है। 
  • यह मृदा गेहूँ की कृषि के लिये अनुकूल होती है।
  • स्थान – यूक्रेन, संयुक्त राज्य अमेरिका का मध्य क्षेत्र, मध्य अफ्रीका, मध्य भारत तथा भारत के यह दक्षिणी पठारी क्षेत्र इत्यादि में 

 

प्रेयरी मृदा (Prairie soil)

  • इसे भी पेडोकल मृदा के ही अंतर्गत रखा जाता है।
  • इसमें चरनोज़म की अपेक्षा चूने की मात्रा कम पाई जाती है।
  • इसकी संरचना भुरभुरी होने के कारण मक्के की कृषि हेतु अधिक उपजाऊ मानी जाती है। 
  • स्थान – संयुक्त राज्य अमेरिका व पूर्वी यूरोप के कुछ क्षेत्रों में  

चेस्टनट मृदा (Chestnut soil)

  •  इस मृदा में ह्यूमस की कमी पाई जाती है।
  • इस पर निर्मित घास के मैदान पशुओं के चारागाह हेतु उपयुक्त माने जाते हैं। 
  • स्थान – एशिया के अर्द्धशुष्क क्षेत्रों व उत्तरी अमेरिका में  

 

मरुस्थलीय मृदा (desert soil)

  • स्थान – कम वर्षा, उच्च तापमान तथा उच्च वाष्पीकरण वाले जलवायु प्रदेशों में
    • समशीतोष्ण क्षेत्रों में – धूसर रंग की
    • उष्ण क्षेत्रों में – लाल रंग की होती है। 
  • जलाभाव के कारण खनिज तत्त्वों का नीचे की परतों में रिसाव न होने से मरुस्थलीय मृदा क्षारीय होती है। 
  • वनस्पतियों की कमी  के कारण ह्यूमस का अभाव पाया जाता है। 
  • इस मृदा में सस्तर पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाते  है।

टेरारोसा

  • टेरारोसा एक प्रकार की लाल चिकनी मृदा है जिसका निर्माण चूना पत्थर वाली चट्टानों के अक्षय से होता है।

मृदा विछालन (soil erosion)

  • मृदा अपरदन एक क्रमिक प्रक्रिया है जो तब होती है जब पानी या हवा के प्रभाव से मिट्टी के कण अलग हो जाते हैं और हट जाते हैं, जिससे मिट्टी खराब हो जाती है।
  • यह उष्णकटिबंधीय वर्षा वन प्रदेशों की एक गंभीर समस्या है

मृदा संरक्षण का उद्देश्य

  • अपरदन को नियंत्रित करना
  • भूमि की उच्च स्तरीय उर्वरता को बनाए रखना

 

वनस्पति के प्रकार

  • हेलोफाइट (Halophyte): नमकीन मिट्टी (क्षारीय मिट्टी) में उगने वाला पौधा जैसे- मैंग्रोव वन (कच्छ का जंगल)
  • ट्रोपोफाइट (Tropophyte): उष्णकटिबंधीय वन
  • हाइड्रोफाइट (Hydrophyte) : जल भराव वाले क्षेत्रों के पौधे
  • हाइग्रोफाइट (Hygrophyte): उच्च आर्द्रता वाले क्षेत्रों की वनस्पति (भूमध्यरेखीय वन)
  • ज़ेरोफाइट्स (Xerophytes): उष्णकटिबंधीय रेगिस्तान के पौधे
  • मेसोफाइट (Mesophyte): शीतोष्ण वन (टैगा वन)
  • क्रायोफ़ाइट (Cryophyte): टुंड्रा वन (ठन्डे प्रदेशो में )
  • लिथोफाइट (Lithophyte) : कठोर एवं पथरीले चट्टानी क्षेत्रों का पौधा।
  • जियोफाइट (Geophyte): वह पौधा जिसकी कलियाँ मिट्टी को पकड़कर रखती हैं
  • सैप्रोफाइट (Saprophyte) : कवक या फफूंदयुक्त पौधा
  • ज़ोफ़ाइट (Zoophyte): पौधे जैसा जीव जैसे – (कोरल पॉलीप)

नाइट्रोजन चक्र

  • जन्तुवो के यूरिया उत्सर्जन तथा जीव एवं वनस्पतियों की मृत्यु के बाद अपघटको द्वारा इनका अपघटन किया जाता है और मृदा में भी नाइट्रोजन की मात्रा की पूर्ति होती है। इस प्रकार पेड़ पौधे इनसे पोषण प्राप्त करते हैं। इस तरह नाइट्रोजन चक्र की प्रक्रिया चलती रहती है।

मृदा के जल धारिता अथवा जल धारण क्षमता

  • गुरुत्वीय जल के रिस जाने के बाद मिट्टी में बचे हुए जल की अधिकतम मात्रा को मृदा की जल धारण क्षमता कहते हैं।

भूमि का लवणीभवन (solinization)

  • कुछ समय अवधि तक सिंचाई के कारण, लवण भूमि के सतह पर आ जाते हैं और जल के वाष्पीकरण के पश्चात इसके अपशिष्ट सतह पर ही शेष रह जाते हैं। जिसके फलस्वरूप मृदा के ऊपरी परत में लवण एकत्रित हो जाते हैं। इस प्रकार मृदा में अत्यधिक मात्रा में लवण का निर्माण होने को ही भूमि का लवणीभवन कहा जाता है।

गंधक चक्र

  • सल्फर,प्रोटीन विटामिन व अमीनो एसिड का एक प्रमुख घटक है।
  • सल्फर, सल्फेट के रूप में मिट्टी और चट्टानों में पाया जाता है
  • पादप इसे सल्फेट के रूप में ग्रहण करते हैं
  • मृत जीवो के अपघटन द्वारा h2s के ऑक्सीकरण से सल्फेट प्राप्त होते रहते हैं
  • इस प्रकार गंधक चक्र में मृदा की भूमिका प्रत्यक्ष रूप से है।

पारिस्थितिकी तंत्र का इंजीनियर : केंचुए

  • केंचुए मिट्टी के निर्माण एवं इसकी उत्पादकता में वृद्धि में विशेष योगदान देते हैं।
  • इन्हें पारिस्थितिकी तंत्र का इंजीनियर कहा जाता है।
  • यह मिट्टी में छिद्रो का निर्माण करते हैं जिनसे होकर जल एवं ऑक्सीजन अंदर तक पहुंचती है तथा कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकलती है।
  • यह मिट्टी को महीन कणों में परिवर्तित कर नरम बना देते हैं।