ब्रिटिश भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन

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ब्रिटिश भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन

  • 1813 के चार्टर एक्ट के तहत ईसाई मिशनरियों का भारत में आगमन हुआ। 

 ब्रह्म समाज/राजा राममोहन राय

  • राजा राममोहन राय को  आधुनिक भारत का पिता/निर्माता, भारतीय पुनर्जागरण का जनक,नवप्रभात का तारा एवं भारतीय पत्रकारिता का जनक कहा जाता है। 
  • 1814  में ‘आत्मीय सभा‘ (मित्रों का समाज) का गठन कलकत्ता में किया। 
  • अगस्त ,1828 में राजा राममोहन राय ने ब्रह्म सभा की स्थापना कलकत्ता में की, जिसे बाद में ‘ब्रह्म समाज‘ कहा गया। यह हिंदू धर्म का पहला सुधार आंदोलन था
  • ब्रह्म समाज के मुख्य उद्देश्य 
    • ‘हिंदू धर्म’ में सुधार लाना, 
    • सभी धर्मों की अच्छाइयों को अपनाना, 
    • मूर्ति पूजा का विरोध
    • एक ब्रह्म(एकेश्वरवाद) की पूजा 
  • ब्रह्म समाज के सिद्धांतों और दृष्टिकोण के मुख्य आधार थे

मानव विवेक(तर्क-शक्ति), वेद व उपनिषद् 

  • सामाजिक क्षेत्र में राजा राममोहन राय हिंदू समाज की कुरीतियों सती प्रथा. बहुपत्नी प्रथा, वेश्यागमन, स्त्री शिक्षा को बढ़ावा,स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार देना,जातिवाद, बाल विवाह,विधवा पुनर्विवाह का समर्थन आदि के घोर विरोधी थे। 
  • इन्होंने कर्मकांड का विरोध किया तथा धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या के लिये पुरोहित वर्ग को अस्वीकार किया। 
  • 1818 में सती विरोधी अभियान शुरू किया
  • इनके प्रयासों से 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया गया
  • इन्होंने बंगाल के जमीदारों द्वारा किसानों पर की गई उत्पीड़न का विरोध किया
  • राजा राममोहन राय ने डच घड़ीसाज डेविड हेयर के सहयोग से 1817 में कलकत्ता में ‘हिंदू कॉलेज’ की स्थापना की। 
  • कलकत्ता यूनिटेरियन कमेटी का गठन 1823 में राजा राममोहन राय, द्वारकानाथ टैगोर और विलियम एडम द्वारा किया गया। 
  • 1825 में उन्होंने कलकत्ता में ‘वेदांत कॉलेज‘ की स्थापना की।
  • राजा राममोहन राय ने 1826 के जूरी अधिनियम का घोर विरोध किया था। 
  • मुगल बादशाह अकबर द्वितीय ने राममोहन राय को ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की थी।
  • राजा राममोहन राय की मृत्यु 1833 में ब्रिटेन के ब्रिस्टल में हुई।

राजा राम मोहन राय द्वारा लिखे गए पुस्तक

  • 1809 मेंफारसी भाषा में ‘तोहफत-उल-मुवाहीदीन’ (एकेश्वरवादियों को उपहार)
  • वेद एवं उपनिषदों का बंगला अनुवाद
  • 1820 में प्रिसेप्स ऑफ जीसस
  • 1821 में बांग्ला भाषा में ‘संवाद कौमुदी‘ पत्रिका
  • 1822 में फारसी भाषा में उन्होंने मिरात-उल-अखबार (मिरातुल अखबार)
  • बांग्ला व्याकरण की रचना

महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर

  • 1863 में  देवेंद्र नाथ टैगोर ने शांति निकेतन आश्रम की स्थापना की
  • रविंद्र नाथ टैगोर के पिता
  • अपनी दानशीलता के कारण उन्हें ‘प्रिंस’ की उपाधि प्राप्त थी. 
  • देवेंद्रनाथ टैगोर का जन्म 15 मई 1817 में हुआ था 
  • राजा राममोहन राय के मृत्यु पश्चात् देवेंद्रनाथ टैगोर ने ब्रह्म समाज का नेतृत्व किया। 
  • 1839 में उन्होंने ‘तत्त्वबोधिनी सभा‘ की स्थापना की। 
  • तत्त्वबोधिनी सभा ने बांग्ला भाषा में ‘तत्त्वबोधिनी पत्रिका‘ का प्रकाशन किया। 
  • ब्रह्म समाज की शाखाएँ संयुक्त प्रांत, पंजाब तथा मद्रास में खोली गई। 

रविंद्र नाथ टैगोर(गुरुदेव/विश्वकवि)

  • रविंद्र नाथ टैगोर(गुरुदेव/विश्वकवि) को उनकी पुस्तक गीतांजलि के लिए 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले गैर यूरोपीय बने
  • उन्हें बंगाल का बार्ड  के रूप में जाना जाता है
  • विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना 1921 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने पश्चिम बंगाल के शान्तिनिकेतन नगर में की। 
  • रविंद्र नाथ टैगोर की अन्य प्रसिद्ध पुस्तक- द क्रिसेंट मून, द पोस्ट ऑफिस

सत्येंद्रनाथ टैगोर

  • इंडियन सिविल सर्विसेज एक्ट 1861 के तहत भारतीय सिविल सेवा का गठन किया गया था।

  • जून 1863 में इंडियन सिविल सर्विस के लिए चुने जाने वाले पहले भारतीय हैं। 

  • कवि रबींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे।

 

केशवचन्द्र सेन (19 नवम्बर 1838 – 8 जनवरी 1884)

  • केशवचंद्र सेन का जन्म 19 नवम्बर 1838 को कलकत्ता में हुआ।
  • 1858 में केशव चंद्र सेन ब्रह्मा समाज से जुड़े
  • महर्षि ने उचित ही उन्हें ‘ब्रह्मानंद’ की संज्ञा दी तथा उन्हें समाज का आचार्य बनाया।
  • इनके द्वारा संगत सभा का गठन 1860  में किया गया
  • भारतीय ब्रह्मसमाज की स्थापना 1866 में की

 

ब्रह्म समाज का प्रथम विभाजन

  • ब्रह्म समाज के विचारों को लेकर 1865 में केशवचंद्र सेन व देवेंद्रनाथ टैगोर के बीच विवाद हुआ, जिसके कारण केशवचंद्र सेन मूल ब्रह्म समाज से अलग हो गए और 1866 में भारतीय ब्रह्म समाज की स्थापना की। 
  • देवेंद्रनाथ टैगोर ने मूल ब्रह्म समाज का नाम परिवर्तित करके आदि ब्रह्म समाजकर दिया। 

 

देवेंद्रनाथ टैगोर

केशवचंद्र सेन

आदि ब्रह्म समाज

भारतीय ब्रह्म समाज

 

  • 1868 में केशव चंद्र सेन ने ‘टेबरेनेकल ऑफ न्यू डिस्पेंसेशन’ नामक संघ की स्थापना की। 
  • 1870 में उन्होंने हिंदू पुनरुद्धार(revival) के प्रवक्ता के रूप में इंग्लैंड की यात्रा की।
  • उन्होंने ‘भारतीय सुधार संगठन’(1870)  नामक संस्था का गठन किया। 
  • 1872 में आचार्य केशव चंद्र सेन ने सरकार को ब्रह्म विवाह अधिनियम को कानूनी दर्जा दिलवाने हेतु तैयार कर लिया। 
  • 1872 में ब्रह्म विवाह अधिनियम पास किया गया, जिसमें 14 वर्ष से कम आयु की बालिकाओं तथा 18 वर्ष से कम आयु के बालकों का विवाह वर्जित कर दिया गया। 

ब्रह्म समाज का द्वितीय विभाजन 

  • आचार्य केशव चंद्र सेन ने ब्रह्म विवाह अधिनियम-1872 का उल्लंघन करते हुए अपनी 13 वर्ष की पुत्री का विवाह कूचबिहार के राजा से कर दिया, जो ब्रह्म समाज के द्वितीय विघटन का कारण बना। 
  • 15 मई 1878 में ब्रह्म समाज से अलग ‘साधारण ब्रह्म समाज‘ की स्थापना शिवनाथ शास्त्री, आनंद मोहन बोस द्वारकानाथ गांगुली और उमेश चंद्र दत्ता द्वारा किया गयाकी ।

नोट 

  • राधाकांत देव ने ब्रह्म समाज के सिद्धांतों का विरोध करने के लिए धर्म सभा का गठन 1830 में किया
  • उन्होने ‘शब्दकल्पद्रुम’ नामक संस्कृत के आधुनिक महाशब्दकोश की रचना की। 

परमहंस मंडली/सभा  

  •  1849 में दुर्गाराम मेहताजी एवं दादोबा पांडुरंग द्वारा शुरू किया गया था।
  • परमहंस सभा का विभाजन 1860 में हो गया इसी का संशोधित रूप प्रार्थना समाज था 

प्रार्थना समाज 

  • प्रार्थना समाज की स्थापना के प्रेरणा स्रोत केशव चंद्र सेन थे।
  • बॉम्बे ,महाराष्ट्र में 1867 में ‘प्रार्थना समाज’ की स्थापना डॉ. आत्माराम पांडुरंग ने की। 
  • बाद में आर.जी. भंडारकर तथा महादेव गोविंद रानाडे इस संगठन में शामिल हुए। इस समाज को प्रसिद्धि दिलाने का श्रेय महादेव गोविंद रानाडे को ही जाता है। इस संगठन का उद्देश्य हिंदू धर्म तथा समाज में सुधार लाना था।

महादेव गोविंद रानाडे

  • 1867 में रानाडे ने सार्वजनिक सभा की स्थापना की। 
  • इन्हें ‘महाराष्ट्र का सुकरात’ भी कहा जाता था। 
  • महादेव गोविंद रानाडे गोपाल कृष्ण गोखले के गुरु थे एवं गोपाल कृष्ण गोखले महात्मा गांधी के गुरु थे
  • रानाडे द्वारा महाराष्ट्र विधवा पुनर्विवाह एसोसिएशन की स्थापना की गई। 
  • महाराष्ट्रविधवा पुनर्विवाह हेतु प्रथम अभियान का नेतृत्व विष्णु परशुराम पडिंत ने किया। उन्होनें वर्ष 1850 मे ‘ विडो रिमैरिज ‘ सोसाईटी की स्थापना की 

धोंडो केशव कर्वे

  • धोंडो केशव कर्वे को महर्षि कर्वे के नाम से भी जाना जाता है।
  • उनके द्वारा 1916 में मुंबई में स्थापित श्रीमती नत्थीबाई दामोदर ठाकरसी (SNDT)महिला विश्वविद्यालय भारत का प्रथम महिला विश्वविद्यालय है।
  • 1893 में उन्होंने ‘विधवा विवाह संघ’ की स्थापना की
  • 1955 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया। 
  • 1958 में उन्हें भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया था।

दक्कन एजुकेशन सोसायटी 

  • विष्णुशास्त्री चिपलूनकर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और गोपाल गणेश आगरकर ने पुणे में न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना की, जो पश्चिमी शिक्षा प्रदान करने वाले पहले देशी स्कूलों में से एक है। 
  • 1884 में उन्होंने डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना की।

पंडिता रमाबाई

  • 1881 में महिलाओं के कल्याण के लिये ‘आर्य महिला समाज’ की स्थापना पंडिता रमाबाई ने की थी। 

गोपाल कृष्ण गोखले

  • रानाडे के शिष्य गोपाल कृष्ण गोखले ने ‘सर्वेट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ (1905) की स्थापना की। 

आर्य समाज 

  • 1875 में दयानंद सरस्वती ने बंबई में आर्य समाज की स्थापना की। 
  • 1877 में आर्य समाज का मुख्यालय लाहौर में स्थापित किया गया। 
  • आर्य समाज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य 
    • हिंदू धर्म में व्याप्त दोषों को उजागर कर उसे दूर करना, 
    • वैदिक धर्म को पुनः शुद्ध रूप में स्थापित करना, 
    • भारत को सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक रूप से एक सूत्र में बांधना  
  • दयानंद सरस्वती ने ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा दिया हैं। 
  • दयानंद ने पुराणों जैसे हिंदू धर्म ग्रंथों की प्रामाणिकता को अस्वीकार किया।
  •  आर्य समाज द्वारा ‘शद्धि आंदोलन’ चलाया गया। इसके अंतर्गत किसी कारणवश अन्य धर्म अपनाने वाले हि को पुनः हिंदू धर्म में वापसी के लिये प्रोत्साहित किया गया। 
  •  ‘स्वेदशी व हिंदी’ का समर्थन करने वाला यह प्रथम संगठन था। इसका मानना था कि “भारत भारतीयों के लिये है।”
  •  दयानद सरस्वती ने ‘गो रक्षा आंदोलन‘ चलाया। गायों की रक्षा हेतु  ‘गो रक्षा समिति‘ की स्थापना की। 
  • दयानंद सरस्वती ऐसे प्रथम समाज सुधारक थे, जिन्होंने शूद्रों व स्त्री को वेद पढ़ने, उच्च शिक्षा प्राप्त करने, यज्ञोपवीत धारण करने के पक्ष में आंदोलन चलाया। 
  • 1863 में उन्होंने हरिद्वार के कुम्भ मेले के शुभावसर पर बाह्य आंडबरों और झूठे धर्मों का खंडन करते हुए ‘पाखंड-खंडिनी पताका’ लहराया,जिसका मुख्य उद्देश्य ‘जनता को पाखण्डों से घिरे अन्धकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में लाना था।
  • दयानंद सरस्वती के विचार उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में वर्णित हैं। 
  • दयानंद सरस्वती ने सर्वप्रथम ‘स्वराज’ शब्द का प्रयोग किया तथा हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया। 
  • राजनीति के क्षेत्र में उनका मत था कि “बुरे से बुरा देशी राज्य अच्छे से अच्छे विदेशी राज्य से अच्छा है” 
  • वेलेंटाइन शिरोल (चिरोल) ने इस संगठन (आर्य समाज) को ‘भारतीय अशांति का जन्मदाता’ कहा था। 
  • दयानंद सरस्वती के सहयोगी लाला हंसराज ने 1886 में दयानंद एंग्लो -वैदिक स्कूल (लाहौर) तथा स्वामी श्रद्धानंद ने 1902 में हरिद्वार के निकट कांगड़ी नामक स्थानपर गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना की।

रामकृष्ण मिशन 

  • रामकृष्ण परमहंस के शिष्य विवेकानंद द्वारा रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 में कलकत्ता के समीप बारानगर में की गई। 
  • स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। 
  • 1893 में अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित प्रथम विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने भारत का नेतृत्व किया। 
  • इस सम्मेलन में जाने से पूर्व ही नरेंद्रनाथ दत्त का नाम बदलकर महाराज खेतड़ी के सुझाव पर स्वामी विवेकानंद रख दिया गया। 
  • विवेकानंद ने शिकागो में संपन्न ‘विश्व धर्म सम्मेलन (1893)’ में सभी धर्मों की एकता के विषय में कहा। 
  • विवेकानंद का कहना था कि “धर्म न पुस्तकों में है, न बौद्धिक विकास में और न तर्क में; तर्क, सिद्धांत, पुस्तकें और धार्मिक क्रियाएँ आदि केवल धर्म के सहायक हैं, धर्म आत्म-ज्ञान में है।” 
  • विवेकानंद ने कहा कि “जब तक करोड़ों व्यक्ति भूखे और अज्ञानी हैं तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को देशद्रोही मानता हूँ जो उन्हीं के खर्चे पर शिक्षा ग्रहण करता है परंतु उनकी परवाह बिल्कुल नहीं करता।” 
  • स्वामीजी को 19वीं शताब्दी के नव हिंदू जागरण का संस्थापक भी कहा जाता है। 
  • सुभाष चंद्र बोस ने स्वामी विवेकानंद को “आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन का आध्यात्मिक पिता” कहा। 
  • स्वामी विवेकानंद ने प्रबुद्ध भारत (अंग्रेज़ी), उदबोधन (बंगाली) नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। 
  • राजयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग व वेदांत फिलॉसफी उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं।
  •  विवेकानंद से प्रभावित होकर सिस्टर निवेदिता (मार्गरेट नोबल) इनके साथ भारत आई.

नोट: रामकृष्ण परमहंस ने चिंतन, संन्यास, भक्ति के परंपरागत तरीकों से धार्मिक मुक्ति प्राप्त करने का प्रयत्न किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इन मार्गों से सर्वश्रेष्ठ मार्ग मानव सेवा है। मानव सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है।

थियोसोफिकल सोसायटी 

  • थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना 1875 में न्यूयॉर्क में मैडम हेलना पेट्रोवना ब्लावात्स्की तथा कर्नल हेनरी स्टली ऑल्कॉट ने की थी। 
  • भारत में 1882 में थियोसोफिकल सोसायटी का अड्यार (मद्रास)  में कार्यालय खोला गया। 
  •  1889 मेंएनी बेसेंट इस सोसायटी की इंग्लैंड में सदस्या बनी। 
  • एनी बेसेंट1893 में भारत आई और सोसायटी का कार्यभार अपने हाथ में ले ली। 
  • थियोसोफिकल सोसायटी पुनर्जन्म व कर्म के सिद्धांत को मान्यता देती थी। 
  • भारत में शिक्षा के क्षेत्र में विकास के लिये एनी बेसेंट ने  1898 में सेंटल हिंदू कॉलेज की स्थापना की जो 1916 में मदनमोहन मालवीय जी के प्रयासों से ‘बनारस हिंदू विश्वविद्यालय‘ बना। 
  • एनी बेसेंट ने आयरलैंड की होमरूल के तर्ज पर भारत में होमरूल लीग आंदोलन का नेतृत्व किया और 1917 में कॉन्ग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं

यंग बंगाल आंदोलन

  • वर्ष 1828 मेंयंग बंगाल आंदोलन के प्रवर्तक हेनरी लुइस विवियन डेरोजियो थे। 
  • डेरोजियो फ्रांस की क्रांति से बहुत प्रभावित थे। 
  • समाज सुधार के लिये डेरोजियो ने ‘एकेडमिक एसोसिएशन‘ और ‘सोसायटी फॉर द एक्वीजीशन ऑफ जनरल नॉलेज’ जैसे संगठनों की स्थापना की। 
  • हेनरी डेरेजियो को “To India – My Native Land” रचना के लिए जाना जाता है
  • यंग बंगाल आंदोलन की स्थापना करने वाले हेनरी डेरेजियो इस आंदोलन की शुरुआत के समय हिन्दू  कॉलेज में कार्यरत थे 
  • डेरोजियो के मुख्य शिष्यों में रामगोपाल घोष, कृष्ण मोहन बनर्जी एवं महेशचंद्र घोष थे। 
  •  सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने डेरोजियो के अनुयायियों को ‘बंगाल में आधुनिक सभ्यता के अग्रदूत’, ‘हमारी जाति का पिता‘ कहा। 
  •  डेरोजियो को आधुनिक भारत का प्रथम राष्ट्रवादी कवि‘ भी कहा जाता है।
  • डेरोजियो स्वयं फ्रांस की क्रांति के सिद्धांतों से प्रभावित थे, साथ ही बंगाल के नौजवानों पर इटली के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रभाव था।

मुस्लिम धर्म सुधार आंदोलन 

 अलीगढ़ आंदोलन 

  • अलीगढ़ आन्दोलन की शुरुआत अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) से हुई थी। 
  • इस आन्दोलन के संस्थापक सर सैय्यद अहमद ख़ाँ थे। 
  • उन्होंने ‘पीरी-मुरीदी प्रथा’ एवं ‘दास प्रथा‘ को समाप्त करने का प्रयत्न किया।  
  • यह अंग्रेज़ी शिक्षा व ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग के पक्ष में सबसे असरदार आंदोलन रहा। 
  • 1864 मेंकलकत्ता में सर सैय्यद अहमद खाँ द्वारा ‘साइंटिफिक सोसायटी’ की स्थापना की गई। 
  • ब्रिटिश सरकार से संबंध सुधारना एवं मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रचार करना, सर सैय्यद अहमद खाँ का मुख्य उद्देश्य था। 
  • इस दिशा में इन्होंने 1875 में ‘मोहम्मडन एग्लो ओरियंटल स्कूल’ की स्थापना अलीगढ़ में की, जो 1920 में ‘अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय‘ में परिवर्तित हो गया। 
  • सर सैय्यद अहमद खाँ व बनारस के राजा शिव प्रसाद सिंह (सितारे-हिंद) ने कॉन्ग्रेस की स्थापना के विरोध में ‘यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन‘ की स्थापना की। 
  • सर सैय्यद अहमद खाँ के द्वारा  ‘United Indian Patriotic Association(1888 )’ की स्थापना किया गया था। 
  •  अलीगढ़ आंदोलन में उनके सहयोगी चिराग अली, अल्ताफ हुसैन हाली, नजीर अहमद, मौलाना शिवली नोमानी आदि थे। 
  •  सर सैय्यद अहमद की मुख्य पत्रिका- तहज़ीब-उल-अख़लाक़ (सभ्यता और नैतिकता) थी। 
  • इनका एक महत्त्वपूर्ण कार्य ‘कुरान पर टीका’ लिखना भी था। 
  • अलीगढ़ आंदोलन का उद्देश्य इस्लामी समाज का आधुनिकीकरण करना था। 

अहमदिया आंदोलन 

  • अहमदिया आंदोलन 23 मार्च, 1889 में मिर्जा गुलाम अहमद द्वारा प्रारंभ किया गया। इसकी शुरुआत पंजाब के गुरुदासपुर जिले में ‘कादियान’ नामक स्थान से की गई, इसीलिये इसे ‘कादियानी आंदोलन‘ भी कहा जाता है। 
  • इस आंदोलन ने जिहाद का विरोध किया। 
  • गुलाम अहमद पश्चिमी उदारवाद, ब्रह्म विद्या तथा हिंदुओं के धार्मिक सुधार आंदोलन से प्रभावित थे। 
  • गुलाम अहमद ने अपनी पुस्तक ‘बहरीन-ए-अहमदिया’ में अहमदिया आंदोलन के सिद्धांतों की व्याख्या की। 
  • गुलाम अहमद ने स्वयं को मुहम्मद साहब के बाद ‘एक और पैगंबर’ व ‘कृष्ण का अवतार’ बताया। 
  • 1974 में अहमदिया संप्रदाय के मानने वाले लोगों को पाकिस्तान में एक संविधान संशोधन के जरिए गैरमुस्लिम करार दे दिया गया।

वहाबी आंदोलन/Wahhabism (1830-60) 

  • यह मुस्लिम सुधारवादी धार्मिक आंदोलन था, जो उत्तर-पश्चिम, पूर्वी तथा मध्य भारत में सक्रिय रहा।
  • वहाबी संप्रदाय इस्लाम की एक शाखा है वहाबी संप्रदाय के लोग पुराने इस्लाम धर्म में विश्वास रखते हैं। वह परिवर्तनों और सुधारों का विरोध करते हैं।विश्व के अधिकांश वहाबी कतर, सउदी अरब और यूएई के निवासी हैं।  
  • वहाबी आंदोलन शाह वली उल्लाह ने शुरू किया था।
  • बाद में रायबरेली के सैयद अहमद बरेलवी ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। जो अरब के अब्दुल वहाब व दिल्ली के संत शाह वली-उल्लाह से प्रभावित थे। 
  • इसका उद्देश्य देश को ‘दार-उल-हर्ब’ (काफिरों का देश) से ‘दार-उल-इस्लाम’ में बदलना था इसलिये प्रारंभ में पंजाब में सिखों के विरुद्ध जिहाद की घोषणा की गई, बाद में अंग्रेजों द्वारा सिख राज्य को समाप्त करने पर आंदोलन अंग्रेज़ विरोधी हो गया। 
  • यह आंदोलन 1828 ई० से 1888 ई० तक चला। 
  • पटना इस आंदोलन का मुख्य शक्ति केंद्र था। 
  •  पटना के विलायत अली और इनायत अली इस आन्दोलन के प्रमुख नायक थे।
  • 1857 में वहाबी विद्रोह का नेतृत्व कर रहे पीर अली को कमिश्नर टेलबू ने वर्तमान एलिफिन्सटन सिनेमा के सामने  पर लटकवाकर फाँसी दिलवा दी

देवबंद आंदोलन 

  • मुहम्मद कासिम ननौतवी तथा रशीद अहमद गंगोही ने 1866 में देवबंद (सहारनपुर, उ.प्र.) में इस्लामी मदरसे की स्थापना की। 
  • दारुल उलूम देवबंद भारत में एक इस्लामिक स्कूल है जहां देवबंदी इस्लामिक आंदोलन शुरू हुआ। 
  • यह एक पुनरुद्धार आंदोलन(revival movement) था 
  • देवबंद आंदोलन, अलीगढ़ आंदोलन के अंग्रेज़ी शिक्षा एवं पाश्चात्य संस्कृति का पूर्ण विरोधी था। इसने अलीगढ़ आंदोलन का विरोध किया। 
  • इसने सर सैय्यद अहमद खाँ के ‘United Indian Patriotic Association(1888 )’ के विरुद्ध फतवा जारी किया था। 
  • इस आंदोलन द्वारा कॉन्ग्रेस की स्थापना का समर्थन किया गया।

दलित सुधार आंदोलन 

सत्यशोधक समाज 

  • ज्योतिराव गोविंदराव फूले (ज्योतिबा फूले) ने निम्न जातियों के कल्याण के लिये 1873 में ‘सत्यशोधक समाज‘ की स्थापना की। 
  • ज्योतिबा फूले ने पुस्तक ‘गुलामगिरी’ को लिखा  ।
  • महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे में हुआ था। 
  • उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए भारत की पहला विद्यालय खोला। 
  • 1888 में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी गई थी। 

आत्मसम्मान आंदोलन  

  • आत्मसम्मान आन्दोलन वर्ष दिसंबर 1925  में वी. रामास्वामी नायकर उर्फ पेरियार ने इस  आंदोलन को प्रारंभ किया। 
  • आत्मसम्मान आंदोलन में ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को चुनौती दी गई तथा लोगों से ब्राह्मणवाद का विरोध करने को कहा गया।
  •  ब्राह्मणों की सहायता के बिना विवाह, मंदिरों में जबरन प्रवेश तथा मनुस्मृति को जलाने आदि के लिये आंदोलन किये गए। 
  • पेरियार द्वारा तमिल भाषा में रामायण की रचना की जिसे ‘सच्ची रामायण’ कहा गया।

डॉ. भीमराव अंबेडकर

  •  इनका जन्म 1891 में मध्य प्रदेश के महू जिले में एक अछूत जाति महार में हुआ था। 
  • 20 जुलाई 1924 को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने मुंबई में‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ का निर्माण किया था। 
  • 1930 में अंबेडकर ने राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया। 
  • उनको लंदन में हुई तीनों गोलमेज सम्मेलनों (1930-32) में भाग लिया  था। 
  • इन्होंने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में निम्न जातियों के लिये पृथक निर्वाचन प्रणाली की मांग की जिसे मान लिया गया इससे दु:खी होकर गांधीजी ने अनशन आरंभ कर दिया। अंत में 1932 में  ‘पूना समझौता’ के साथ उपवास समाप्त किया। 
  • 1942 में “ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास फेडरेशन” की स्थापना की। 
  • संविधान सभा में प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने और बाद में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। 
  • Scheduled Castes Federation/अनुसूचित जाति संघ (SCF) , जिसकी स्थापना 1942 में B. R. अंबेडकर ने दलित समुदाय के अधिकारों के लिए अभियान चलाने के लिए की थी।
  • अम्बेडकर ने 1930 में डिप्रेस्ड क्लासेस फेडरेशन (DCF) और 1935 में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (ILP) की स्थापना की थी।
  • आंबेडकर जी की समाधि चैत्यभूमि , दादर में स्थित है।

वायकोम सत्याग्रह 

  • केरल में एझवा और पुलैया नामक अछूत जातियों को सवर्णों से क्रमशः 16 व 32 फुट की दूरी रखनी पड़ती थी। 
  • त्रावणकोर के एक गाँव वायकोम में एक मंदिर से जुड़ी सड़क को इस्तेमाल करने की अनुमति अवर्ण या दलित वर्ग को नहीं थी। 
  • वायकोग सत्यागह एक प्रकार का गांधीवादी आंदोलन था। यह आदोलन ब्राह्मणवाद के विरुद्ध तथा मदिर प्रवेश को लेकर चलाया गया था। 
  • केरल में नारायण गुरु, एन. कुमारन, टी. के. माधवन ने छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाई।
  • सन्1925 में गांधी जी ने केरल का दौरा किया तथा त्रावणकोर की महारानी से एक समझौता किया जिसमें अछूतों को मंदिर की सड़क का इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी गई थी। 
  •  ‘श्री नारायण धर्म परिपालन योगम् संगठन’ ने श्री नारायण गुरु के नेतृत्व में मंदिर में निम्न वर्ग के प्रवेश का समर्थन किया।
  •  मंदिरों में निम्न वर्ग के प्रवेश को लेकर सवर्णों के संगठन नायर सर्विस सोसायटी, नायर समाज व केरल हिंदू सभा ने आंदोलन का समर्थन किया। 
  • नंबूदरियों (उच्च ब्राहाण) के संगठन ‘योगक्षेम सभा’ ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया। 

गुरुवयूर सत्याग्रह

  • स्थानीय नेता के.केलप्पण की अपील पर केरल कांग्रेस समिति ने 1931 में मंदिर प्रवेश का मुद्दा फिर से उठाया। 
  • इस सत्याग्रह में भी दलितों से लेकर ऊँची जाति नंबूदरी तक के लोग शामिल थे। 1932 में केलप्पण अनशन पर बैठ गए। 
  • गांधी जी द्वारा स्वयं आंदोलन का नेतृत्त्व करने के आश्वासन के बाद ही केलप्पण ने अनशन तोड़ा। 
  • सत्याग्रह स्थगित कर दिया गया। उस समय तो मंदिर प्रवेश की अनुमति नहीं मिली, परंतु इस आंदोलन को मिले ज़बरदस्त समर्थन ने उस समय एक सामाजिक जागृति ला दी थी। 

सामाजिक सुधार हेतु उठाये गए कदम

सती प्रथा

  • लॉर्ड विलियम बेंटिक के समय में 1829 में सती प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया। प्रारंभ में इसे बंगाल में लागू किया गया। 
  • इस अधिनियम को पारित कराने में राजा राममोहन राय की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।

बाल विवाह

  • ईश्वरचंद्र विद्यासागर तथा उनके समर्थकों के दबाव के कारण 1860 में लड़की की विवाह की न्यूनतम आयु 10 वर्ष कर दी गई, इससे कम आयु में विवाह को अपराध घोषित कर दिया गया।
  • ब्रिटिश सरकार ने बाल विवाह को प्रतिबंधित करने के लिये तीन अधिनियम पारित किये

(i) सिविल मैरिज एक्ट (Native Marriage Act), 1872

  • इस अधिनियम के द्वारा लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 14 वर्ष तथा लड़कों की 18 वर्ष कर दी गई। 
  • इस एक्ट द्वारा बहुविवाह प्रथा को समाप्त कर दिया गया।

(ii) सम्पति आयु अधिनियम(Age Consent Act), 1891

  • यह अधिनियम प्रसिद्ध भारतीय समाज सुधारक एवं बंबई के पारसी बहरामजी मालावारी के प्रयत्नों  से पारित हुआ। 
  • इसे 1891 में सम्मति आयु एक्ट काउंसिल द्वारा पारित कर दिया गया। 
  • इस अधिनियम के द्वारा लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 12 वर्ष कर दी गई। 
  • बाल गंगाधर तिलक ने इस अधिनियम का विरोध किया।

3. बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929/शारदा अधिनियम (Sharda Act)

  • अजमेर के डॉ. हरविलास शारदा के प्रयत्न  से1930 में बाल विवाह निषेध कानून बना। उन्हीं के नाम पर यह ‘शारदा एक्ट‘ कहलाया। 
  •  इस अधिनियम द्वारा विवाह की न्यूनतम आयु लड़कियों की 14 तथा लड़कों की 18 वर्ष निर्धारित की गई। 
  •  स्वतंत्रता पश्चात भारत सरकार द्वारा 1978 में बाल विवाह निरोधक अधिनियम को संशोधित किया गया और बालक के विवाह की आयु 18 वर्ष से बढ़ाकर 21 वर्ष तथा बालिका की 14 वर्ष से बढ़ाकर 18 वर्ष निर्धारित की गई। 

विधवा पुनर्विवाह आंदोलन

  • महाराष्ट्र में विधवा पुनर्विवाह आंदोलन का नेतृत्व विष्णु परशुराम पंडित द्वारा किया गया। 
  • उन्होंने वर्ष 1850 में विडो रिमैरिज सोसायटी की स्थापना की थी। 

1856 का विधवा पुनर्विवाह अधिनियम

  • ईश्वर चंद्र विद्यासागर के प्रयासों से यह अधिनियम लॉर्ड कैनिंग के समय में 1856 में पारित हुआ। 
  • इस के तहत विधवाओं के पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता मिली ।

ठगी प्रथा

  • लॉर्ड विलियम बेंटिक ने ठगी प्रथा का उन्मूलन किया। 

शिशु वध 

  • गवर्नर जनरल जॉनशोर के समय में 1795 में तथा वेलेजली के समय 1804 में शिशु वध को साधारण हत्या के रूप में माना जाने लगा। 

नरबलि प्रथा 

  • इस प्रथा को समाप्त करने का श्रेय हॉर्डिंग प्रथम को जाता है, इसके लिये उसने कैंपबेल की नियुक्ति की। 
  • नरबलि प्रथा खोंड जनजाति में प्रचलित थी। 

दास प्रथा 

  •  गवर्नर जनरल लॉर्ड एलनबरो ने 1843 में भारत में दास प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया। 
  •  मध्यकाल मे फिरोजशाह तुगलक और अकबर ने दासों के व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया था। 

नोटः 1833 के अधिनियम में निर्देश था कि दास प्रथा को समाप्त कर दिया जाए।

पारसी धर्म सुधार आंदोलन 

  • मुंबई से पारसी धर्म सुधार आंदोलन शुरू किया गया। 
  • दादाभाई नौरोजी ने वर्ष 1851 में रहनुमा मजदायसन सभा और 1854 में पत्रिका रास्त गोफ्तार (सच बताने वाला) का प्रकाशन किया था. 

 नोटः पारसी धर्म में मनुष्य के शव की अंत्येष्टि विशेष प्रकार से की जाती है। शव को खुले आसमान में काफी ऊँचाई पर (दाख्मा में) रख दिया जाता है ताकि चील-गिद्ध उसे खा जाएँ। मान्यता है ऐसा करने से पृथ्वी, जल व अग्नि की शुद्धता बनी रहती है।

सिख धर्म सुधार आंदोलन 

  • बाबा दयाल दास द्वारा ‘निरंकारी आंदोलन’ चलाया गया। 
  • बाबा राम सिंह द्वारा ‘नामधारी आंदोलन‘ चलाया गया। 
  • 1870 में अमृतसर में सिंह सभा आंदोलन प्रारंभ हुआ। 
  • सिंह सभा द्वारा अमृतसर में खालसा कॉलेज की स्थापना में सहायता की गई और बहुत से गुरुद्वारे व विद्यालय स्थापित किये गए। 
  • 1920 में अकाली आंदोलन चलाया गया।  अकालियों का मुख्य उद्देश्य गुरुद्वारों का प्रबंधन सुधारना था। गुरुद्वारों में कार्यरत महंतों के पास अकूत मात्रा में धन और ज़मीन भक्तों से प्राप्त होती थी। महंत इस संपत्ति का प्रयोग निजी स्वार्थों की पूर्ति में करते थे। 
  • सरकार ने 1922 में सिख गरुद्वारा अधिनियम पास किया ।इस अधिनियम की सहायता से  गुरुद्वारों से भ्रष्ट महंतों को निकाल दिया।