प्राचीन भारत में धार्मिक आंदोलन : जैन धर्म

 

 जैन धर्म

  • जैन शब्द संस्कृत के ‘जिन’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ विजेता होता है अर्थात् जिन्होंने अपने मन, वाणी एवं काया को जीत लिया हो। 
  • जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए, परंतु इनमें से पहले 22 तीर्थंकरों की  ऐतिहासिकता संदिग्ध है।
  • जैन धर्म की स्थापना का श्रेय जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ को जाता है, जिन्होंने छठी शताब्दी ई.पू. जैन आंदोलन का प्रवर्तन किया।

जैनधर्म के तीर्थंकर एवं उनके प्रतीक

जैनधर्म के तीर्थंकर एवं उनके प्रतीक

1.ऋषभदेव (आदिनाथ)

सांड /वृषभ

13.विमलनाथ

वराह/सुकर

2.अजितनाथ 

  गज /हाथी 

14.अनंतनाथ

बाज/श्येन 

3.संभवनाथ

  अश्व

15.धर्मनाथ          

वज्र

4.अभिनंदन नाथ

कपि

16.शांतिनाथ         

मृग

5.सुमतिनाथ

सारस/क्रौंच

17.कुंथुनाथ     

अज/बकरा 

6.पद्मप्रभु  

  पद्म/कमल

18.अरनाथ  

मीन 

7.सुपार्श्वनाथ

  स्वास्तिक

19.मल्लिनाथ

(only female) 

कलश

8.चंद्रप्रभु

    चंद्र 

20.मुनिसुव्रत 

कूर्म 

(कछुवा )

9.सुविधिनाथ 

मकर

21.नेमिनाथ

नीलोत्पल (नीलकमल )

10.शीतलनाथ

  श्रीवत्स

22.अरिष्टनेमि

शंख

11.श्रेयांसनाथ

गैंडा

23.पार्श्वनाथ

सर्प फण 

12.वसुपूज्य

महिष/भैंस

24.महावीर

सिंह

  •  ऋषभदेव (प्रथम तीर्थंकर)अरिष्टनेमि (22वें तीर्थंकर) का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। 
  • जैनधर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे, जो काशी के इक्ष्वाकु वंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे। इनका काल महावीर से 250 ई.पू. माना जाता है। इनके अनुयायियों को ‘निग्रंथ’ कहा जाता था। 
  • पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित चार महाव्रत इस प्रकार हैं
    1. सत्य
    2. अहिंसा
    3. अपरिग्रह (धन संचय का त्याग) 
    4. अस्तेय (चोरी न करना)। 
  •  पार्श्वनाथ ने नारियों को भी अपने धर्म में प्रवेश दिया क्योंकि जैन ग्रंथ  में स्त्री संघ की अध्यक्षा ‘पुष्पचुला’ का उल्लेख मिलता है। 
  •  पार्श्वनाथ को झारखंड के गिरिडीह जिले में ‘सम्मेद पर्वत‘ पर निर्वाण प्राप्त हुआ।
  • जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर महावीर ने स्वामी थे

 महावीर स्वामी जीवन परिचय 

  • मूल नाम -बर्द्धमान
  •  जन्म – 599 ई.पू. अथवा 540 ई.पू. में ,कुंडग्राम (वैशाली), बिहार 
  • मृत्यु (निर्वाण)- 527 ई.पू. अथवा 468 ई.पू. पावापुरी, राजगीर में मल्ल राजा सुस्तपाल के यहा,72 वर्ष
  • पिता – सिद्धार्थ (वज्जि संघ के ज्ञातृक कुल के प्रधान)
  •  माता – त्रिशला (लिच्छवी शासक चेटक की बहन) ।
  •  पत्नी – यशोदा (कुंडिंय गोत्र की कन्या) 
  •  पुत्री – प्रियदर्शना (अणोज्जा) 
  •  दामाद – जामालि (प्रथम शिष्य)
  • गृहत्याग – 30 वर्ष की आयु में बड़े भाई नंदिवर्धन की आज्ञा से
  •  शिष्य – मक्खलि पुत्र गोशाल (आजीवक संप्रदाय/भाग्यवादी के संस्थापक)
    • मत-नियतिवाद
  • ज्ञान प्राप्ति (कैवल्य)12 वर्ष की तपस्या के पश्चात् 42 वर्ष की आयु में  जृम्भिक ग्राम ,ऋजुपालिका नदी के तट पर ,साल वृक्ष के नीचे। 
  • उपाधियाँ 
    1.  केवलिन
    2. जिन (विजेता)
    3. अर्ह (योग्य)
    4. निग्रंथ (बंधन रहित) 
  • महावीर ने अपने जीवन काल में ही एक संघ की स्थापना की  जिसमें 11 अनुयायी सम्मिलित थे। ये‘गणधर कहलाए।
  • 1.इंद्रभूति  2.अग्निभूति 3.वायुभूति 4.व्यक्त  5.मंडित  6.मोरियपुत  7.प्रभास  8.मेतार्थ  9.अचलभ्रता  10.अंकपित  11.सुधर्मन 

विशेषता  

  •  ईश्वर को नहीं स्वीकारता है। 
  • प्रत्येक वस्तु में आत्मा है
  •  जैन धर्म पुनर्जन्म एवं कर्मवाद् में विश्वास करता है, उनके अनुसार कर्मफल ही जन्म तथा मृत्यु का कारण है। 
  •  जैन धर्म में युद्ध और कृषि दोनों वर्जित है, क्योंकि दोनों में जीवों की हिंसा होती है।
  •  आरंभ में जैन धर्म में मूर्ति पूजा का प्रचलन नहीं था, किंतु बाद में महावीर सहित सभी पूर्व तीर्थंकरों की मूर्ति पूजा आरंभ हो गई।
  • जैन धर्म में 18 पापों की कल्पना की गई है।
  • कर्म आत्मा का विनाशकहै कर्म को नष्ट करनेका मार्ग तपस्याहै

जैन धर्म की प्रमुख शिक्षाएँ

  • पंच महाव्रत/अणुव्रत 
    •  अहिंसा – जीव की हिंसा हत्या न करना 
    •  सत्य – सदा सत्य बोलना 
    •  अपरिग्रह – संपत्ति इकट्ठा न करना
    • अस्तेय – चोरी न करना 
    •  ब्रह्मचर्य – इंद्रियों को वश में करना 
  •  नोट: इन पाँच व्रतों में ऊपर के चार पार्श्वनाथ ने दिये थे जबकि पांचवा व्रत ‘ब्रह्मचर्य’ महावीर ने जोड़ा। 
  • उपर्युक्त पाँच महाव्रत/अणुव्रतों के अतिरिक्त तीन गुणव्रत भी बताए हैं
    • 1. दिग्व्रत :  दिशाओं में भ्रमण की मर्यादा बांधना; 
    • 2. अनर्थ दण्डवत्ः प्रयोजन हीन, पाप उत्पादक वस्तुओं का परित्याग करनाः 
    • 3. भोगोपभोगः परिमाण अर्थात् भोग्य पदार्थों का परिमाण-निर्धारण 
  • जैन धर्म में सात शील व्रतों का उल्लेख है
    • 1. दिग्व्रत – अपनी क्रियाओं को विशेष परिस्थिति में नियंत्रित रखना 
    • 2. देशव्रत – अपने कार्य कुछ विशिष्ट प्रदेशों तक सीमित रखना 
    • 3. अनर्थदण्ड व्रत – बिना कारण अपराध न करना; 
    • 4. सामाजिक – चिंतन के लिये कुछ समय निश्चित करना;
    • 5. प्रोषधोपवास – मानसिक एवं कायिक शुद्धि के लिये उपवास करना.
    • 6. उपभोग-प्रतिभोग परिणाम – जीवन में प्रतिदिन काम आने वाली – वस्तुओं व पदार्थों को नियंत्रित करना; 
    • 7. अतिथि संविभाग – अतिथि को भोजन कराने के उपरांत भोजन करना।
  • जैन धर्म में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं, ये इस प्रकार हैं
    • 1. उत्तम क्रमाः क्रोधहीनता
    •  2. उत्तम मार्दवः अहंकार का अभाव 
    • 3. उत्तम मार्जवः सरलता एवं कुटिलता का अभाव 
    • 4. उत्तम सोच :  सांसारिक बंधनों से आत्मा को परे रखने की सोच 
    • 5. उत्तम सत्य : सत्य से गंभीर अनुरक्ति
    •  6. उत्तम संयमः सदा संयमित जीवन-यापन
    • 7. उत्तम तपः जीव को आजीव से मुक्त करने के लिये कठोर तपस्या 
    • 8. उत्तम अकिंचन : आत्मा के स्वाभाविक गुणों में आस्था
    • 9. उत्तम ब्रह्मचर्य : ब्रह्मचर्य व्रत का कड़ाई से अनुपालन 
    • 10. उत्तम त्यागः त्याग की भावना को सर्वोपरि रखना 
  • त्रिरत्न
    •  कर्मफल से मुक्ति के लिये त्रिरत्न का अनुशीलन आवश्यक है
    • 1. सम्यक् दर्शन – वास्तविक ज्ञान 
    • 2. सम्यक् ज्ञान – सत्य में विश्वास
    • 3. सम्यक् आचरण – सांसारिक विषयों से उत्पन्न सुख-दुःख के प्रति समभाव।
  • दर्शन
    • अनेकांतवाद – बहुरूपता का सिद्धांत 
    • सप्तभंगीनय/स्याद्-वाद  – सापेक्षता का सिद्धांत
    • नवावद – आंशिक दृष्टिकोण के सिद्धांत । 
  • अनंत चतुष्टय 
    •  जब जीव से कर्म का अवशेष बिल्कुल समाप्त हो जाता है तब वह मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। मोक्ष के पश्चात् जीवन के आवागमन के चक्र से मुक्ति मिल जाती है 
    • अनंत ज्ञान, 
    • अनंत दर्शन, 
    • अनंत वीर्य तथा 
    • अनंत सुख की प्राप्ति कर लेता है। 
    • इसे ही जैन शास्त्रों में ‘अनंत चतुष्टय’ की संज्ञा दी गई है। 

  • जैन धर्म के ज्ञान
    • मति  इंद्रिय जनित ज्ञान 
    •  श्रुति – श्रवण ज्ञान 
    • अवधि – दिव्य ज्ञान 
    • मन:पर्याय – दूसरे के मन को जान लेना
    •  कैवल्य – सर्वोच्च ज्ञान
  • जैन धर्म अनुसार ज्ञान के तीन स्रोत हैं
    • 1. प्रत्यक्ष
    • 2. अनुमान 
    • 3.तीर्थंकरों के वचन 
  • सल्लेखना /संथारा प्रथा-उपवास द्वारा प्राण त्याग
  • जैन साहित्य 
    •  प्रारंभिक जैन साहित्य अर्द्ध-मागधी भाषा में लिखा गया
    •  जैन साहित्य प्राकृत एवं संस्कृत भाषा में मिलते हैं।  
    • कालांतर में जैनियों ने . शौरसेनी, संस्कृत और कन्नड़ भाषा में भी साहित्य लिखा
    • जैन साहित्य को ‘आगम’ कहा जाता है, जिसमें 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र, 1 नंदी सूत्र एवं 1 अनुयोगद्वार हैं।
    • आचारांगसूत्र’ -जैन भिक्षुओं के आचार-नियम व विधि-निषेधों का विवरण,
    • भगवती सूत्र’ -में महावीर के जीवन,16 महाजनपदों का उल्लेख
    • न्यायधम्मकहासुत्त’ -में महावीर की शिक्षाओं का संग्रह 
    • उवासगदसाओं‘ -में हूण शासक तोरमाण 
    • भद्रबाहुचरित‘ -चंद्रगुप्त मौर्य के राज्य काल की घटनाओं पर प्रकाश पड़ता है। 
    • भद्रबाहु ने ‘कल्पसूत्र’ को संस्कृत में लिखा है, जिसमें तीर्थंकर का जीवन 

 

जैन संगीतियाँ

जैन संगीतियाँ 

वर्ष

शासक 

स्थान

अध्यक्ष

विशेषता

प्रथम-(322 /300 ई.पू.)

चन्द्रगुप्त मौर्य 

पाटलिपुत्र 

स्थूलभद्र

जैन धर्म का दो

संप्रदायों में विभाजन मान

  1. श्वेतांबर
  2. दिगंबर

द्वितीय- 513/526 ई 

कुमारगुप्त-||

वल्लभी

gujrat

देवर्धि क्षमाश्रमण

  • महावीर के समकालीन शासक बिम्बिसार,  अजातशत्रु, उदायिन ,चंडप्रद्योत,, दधिवाहन एवं चेटक थे। ये सभी जैन धर्म के अनुयायी थे।
  •  चंद्रगुप्त मौर्य , कलिंग नरेश खारवेल,राष्ट्रकूट- राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष जैन धर्म का अनुयायी था, इसने ‘रत्नमालिका’ नामक ग्रंथ की रचना की
  • गंग-गंग वंश के राजाराजमल चतुर्थ का मंत्री एवं सेनापति चामुंड राय ने 974 ई. में एक बाहुबली जिन की मूर्ति (गोमतेश्वर) का निर्माण श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में करवाया। यहाँ पर प्रत्येक 12 वर्ष में ‘महामस्तकाभिषेक’ किया जाता है।

प्रसिद्ध जैन मंदिर 

  • कुषाण काल में मथुरा जैन कला का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। गुप्त काल में जैन कला की मथुरा शैली उन्नत अवस्था में थी।
  •  प्रमुख जैन मंदिर हैं 
    1. ऋषभनाथ मंदिर
    2.  जलमंदिर
    3. दिलवाड़ा का जैन मंदिर,mt abu,RJ
    4.  पारसनाथ का जैन मंदिर
    5.  मेगुती जैन मंदिर
    6.  कुमारग्राम प्राचीन मंदिर
    7.  दिगंबर जैन मंदिर
    8. पार्श्वनाथ का मंदिर
    9. रणकपुर जैन मंदिर
    10. शोभनाथ मंदिर
    11.  श्री नाकोड़ा पार्श्वनाथ 
    12. जैन श्वेतांबर-त्रिलोकपुर तीर्थ

 

मतभेद तथा विभाजन

  श्वेतांबर (तेरापंथी)

दिगंबर (समैया)

संस्थापक -स्थूलभद्र 

भद्रबाहु 

सफेद वस्त्र धारण करने वाले 

नग्न रहने वाले

मोक्ष प्राप्ति के लिये वस्त्र मोक्ष प्राप्ति के लिये वस्त्र त्यागना आवश्यक नहीं

त्यागना आवश्यक

स्त्रियाँ निर्वाण की अधिकारी

स्त्रियों का निर्वाण संभव नहीं

कैवल्य प्राप्ति के बाद भोजन

को भोजन की आवश्यकता

की आवश्यकता नहीं

उदार वृत्ति वाले

परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन

यह कट्टरपंथी जैनियों

नियमों का पालन बड़ी कठोरता से

उपसम्प्रदाय 

  • स्थानकवासी 
    • मूर्तिपूजा एवं मंदिर के आचार को अस्वीकार करते हैं।
  • तेरापंथी
  • थेरापंथी
  • विसपंथी

 

  • जैन धर्म ग्रंथों के टीकाकार है – नेमिचंद्र सूरि।
  • जैन मठों को क्या कहा जाता ह- बसदि।
  • जैन धर्म में इंद्रिय जनित ज्ञान को क्या कहा जाता है- मति ज्ञान।
  • किस अभिलेख से पता चलता है कि भद्र नामक व्यक्ति ने 5 जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों की स्थापना कराई थी – कहौम का अभिलेख।
  • किस गुप्तकालीन महिला का मथुरा अभिलेख के अनुसार जैन मंदिर को दान देने का जिक्र हुआ है- हरिम्वामिनी।
  • गुप्तोत्तर काल में वह कौन जैन आचार्य था जिसने जैन धर्म का भरपूर प्रचार प्रसार किया- हरिभद्र सूरि
  • प्रसिदध आचार्य हरिभद्र सूरि कि रचना का नाम क्या है- अनेकांत विजय एवं धर्मबिन्दु।
  • प्रसिद्ध आचार्य जिनसेन किसके गुरु थे- अमोघवर्ष।
  • दसवीं शताब्दी  के बाद किन राजवंशों ने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया- पश्चिमी चालुक्यों एवं होयसल राज्यों ने।
  • प्रशस्ति संग्रह किस धर्म से संबंधित है- जैन धर्म से।

 

शैव धर्म 

  •  शिव का अर्थ है – शुभ, कल्याण, मंगल। 
  •  शिव की पूजा करने वालों को ‘शैव’ कहा जाता है, इससे संबंधित धर्म शैव धर्म कहलाया।
  • शिवलिंग उपासना का प्रारंभिक पुरातात्विक साक्ष्य हड़प्पा संस्कृति से प्राप्त अवशेषों से मिलता है। 
  • शिवलिंग (मूर्ति पूजा) का उल्लेख द्वितीय सदी ई.पू. में पतंजलि के ‘महाभाष्य’ से मिलता है। 
  •  ऋग्वेद में शिव के लिये ‘रूद्र’ नामक देवता का उल्लेख मिलता है। 
  •  अथर्ववेद में शिव को भव, शर्व, पाशुपति एवं भूपति कहा गया है। 
  •  लिंग पूजा का स्पष्ट वर्णन ‘मत्स्य पुराण‘ में मिलता है। 

प्रमुख शैव संप्रदाय 

  •  ‘वामन पुराण में शैव संप्रदाय की संख्या चार बताई गई है

पाशुपत 

  •  पाशुपत संप्रदाय शैवों का सर्वाधिक प्राचीन संप्रदाय है। 
  • इसके संस्थापक लकुलीश थे। इनको शिव के 18 अवतारों में से एक माना जाता है। इस मत के अनुयायी ‘पंचार्थिक’ कहलाए। 
  • इस संप्रदाय का प्रमुख सैद्धांतिक ग्रंथ ‘पाशुपत सूत्र‘ है। 
  •  नेपाल के काठमाण्डू का पशुपतिनाथ मंदिर इस मत का प्रमुख केंद्र है। 

कापालिक 

  • इस संप्रदाय के इष्ट देव भैरव थे। 
  • इस संप्रदाय का प्रमुख केंद्र श्री शैल नामक स्थान था। 
  • इस संप्रदाय के अनुयायी आसुर प्रवृत्ति के होते थे तथा ये लोग सुरा और नैवेद्य अर्पित कर भैरव की उपासना करते थे। 

कालामुख 

  • कापालिक संप्रदाय से ही मिलता-जुलता शैव धर्म का यह एक संप्रदाय था। 
  • इस संप्रदाय के अनुयायी भी तामसी प्रवृत्ति के थे। ये लोग नर कपाल में भोजन करते थे और शरीर पर चिता की भस्म मलते थे तथा मदिरा  का सेवन करते थे। 
  • शिव पुराण में इस संप्रदाय के अनुयायियों को ‘महाव्रतधर’ कहा गया है।

 लिंगायत अथवा वीर शैव 

  • यह संप्रदाय दक्षिण भारत ( कर्नाटक) में प्रचलित था। 
  • इन्हें  ‘जंगम’ भी कहा जाता था। 
  • इस संप्रदाय के लोग शिवलिंग की उपासना करते थे। 
  • इस संप्रदाय के अनुयायियों का विश्वास है कि भक्ति ही एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। 
  • नोट : कुषाण शासकों की मुद्राओं पर शिव एवं नंदी का एक साथ अंकन प्राप्त होता है। 
  • चोल शासक राजराज-I ने तंजौर में प्रसिद्ध राजराजेश्वर शैव मंदिर  का निर्माण करवाया, जिसे बृहदेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। 
  • एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण कृष्ण-1 (राष्ट्रकूट शासक) ने करवाया।

शाक्त धर्म 

  • इस संप्रदाय में माता दुर्गा एवं काली की उपासना की जाती है। 
  •  माता दुर्गा का सर्वप्रथम उल्लेख ‘मार्कण्डेय पुराण‘ में मिलता है। 
  • चौसठ योगिनी मंदिर (जबलपुर, मध्य प्रदेश) में शाक्त धर्म के विकास और प्रगति को प्रमाणित करने का साक्ष्य उपलब्ध है। 
  •  सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों में मातृदेवी की पूजा के प्रमाण मिले हैं। 

वैष्णव धर्म (भागवत धर्म) 

  •  भागवत धर्म के विषय में प्रारंभिक जानकारी उपनिषदों में मिलती  है। 
  • भागवत धर्म का उद्भव मौर्योत्तर काल में हुआ। 
  •  इस धर्म के संस्थापक वासुदेव कृष्ण थे, जो वृष्णि वंशीय यादव कुल के नेता थे। इनका निवास स्थल, मथुरा था। 
  •  ‘छांदोग्य उपनिषद’ में श्री कृष्ण का उल्लेख सर्वप्रथम मिलता है। जिसमें कृष्ण को देवकी पुत्र व ऋषि  अंगिरस का शिष्य बताया गया है।
  • नोटः वासुदेव कृष्ण का प्रारंभिक अभिलेखीय उल्लेख बेसनगर स्थित गरुड स्तम्भ अभिलेख में पाया जाता है।
  •  भागवत धर्म  सूर्य पूजा से संबंधित है। भागवत धर्म का सिद्धांत ‘भगवत गीता’ में निहित है। 
  • महाभारत काल में कृष्ण का तुलना  विष्णु के रूप में  किये जाने के कारण यह वैष्णव धर्म कहलाया। 
  • मेगस्थनीज ने कृष्ण को ‘हेराक्लीज‘ नाम से उल्लेखित किया है। 
  •  जैन धर्म ग्रंथ ‘उत्तराध्ययन सूत्र‘ में वासुदेव, जिन्हें केशव नाम से भी पुकारा गया है, को 22वें तीर्थंकर अरिष्टनेमि का समकालीन बताया गया है। 
  •  विष्णु के दस अवतारों का उल्लेख ‘मत्स्य पुराण‘ में मिलता है। दस अवतार हैं- 1.मत्स्य, 2.कूर्म (कच्छप), 3.वराह, 4.नृसिंह, 5.वामन, 6.परशुराम,7. राम, 8.कृष्ण, 9.बुद्ध और 10.कल्कि (कलि)। 
  • विष्णु के अवतारों में ‘वराह अवतार’ सर्वाधिक लोकप्रिय है। वराह का प्रथम उल्लेख ‘ऋग्वेद’ में है। 
  • दक्षिण भारत में वैष्णव धर्म का विस्तार अलवार संतों ने किया, जिनकी संख्या 12 थी। इन संतों में ‘आण्डाल’ नामक महिला संत का भी उल्लेख है, जिसे ‘दक्षिण की मीरा’ कहा जाता है। 

प्रमुख संप्रदाय 

मत

आचार्य

समय

वैष्णव संप्रदाय 

विशिष्टाद्वैतवाद

रामानुजाचार्य

12वीं शताब्दी

ब्रह्म संप्रदाय

द्वैतवाद

मध्वाचार्य

13वीं शताब्दी 

सनक संप्रदाय

द्वैताद्वैतवाद

निंबार्काचार्य 

13वीं शताब्दी 

रुद्र संप्रदाय

शुद्धाद्वैतवाद

वल्लभाचार्य

15वीं-16वीं शताब्दी

  • नोट : शंकराचार्य का जन्म 788 ई. और मृत्यु 820 ई. में हुई। इन्होंने ‘अद्वैतवाद’ मत का प्रतिपादन किया। इन्होंने देश में चार  मठों की स्थापना की। 
  1. पूर्वी भारत – गोवर्धन मठ (जगन्नाथ पुरी )
  2. पश्चिमी भारत – शारदा मठ (द्वारका)
  3. उत्तर भारत – ज्योतिपीठ (बद्री का आश्रम) 
  4. दक्षिण भारत – वेदांत मठ (शृंगेरी) 
  • शंकराचार्य को कुछ विद्वान ‘प्रच्छन्न बौद्ध‘ कहते हैं। 

 

 

इस्लाम धर्म 

  • इस्लाम एकेश्वरवादी धर्म है। 
  • इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब (570 ई.-632 ई.) थे। 
  •  इस्लाम धर्म का प्रमुख ग्रंथ ‘कुरान‘ है। 
  • हज़रत मुहम्मद साहब को 610 ई. में मक्का के पास हीरा नामक गुफा में ज्ञान की प्राप्ति हुई। 
  • 622 ई. में पैगंबर के मक्का से मदीना की यात्रा को इस्लाम जगत् में हिजरी संवत के नाम से जाना जाता है। 
  • मुहम्मद साहब ने कुरान की शिक्षाओं का उपदेश दिया। 
  • मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद इस्लाम धर्म ‘सुन्नी’ तथा ‘शिया’ नामक दो पंथों में बँट गया। 
  • सुन्नी उन्हें कहते हैं जो सुन्ना में विश्वास रखते हैं। सुन्ना मुहम्मद साहब के कथनों व कार्यों का वितरण है। 
  • शिया हजरत अली की शिक्षाओं में विश्वास रखते हैं, उन्हें मुहम्मद का उत्तराधिकारी मानते हैं। हज़रत अली मुहम्मद साहब के दामाद थे। 
  • पैगंबर मुहम्मद साहब के उत्तराधिकारी ‘ख़लीफ़ा’ कहलाए। 
  •  इस्लाम जगत् में ख़लीफ़ा पद 1924 ई. तक रहा। 1924 ई. में इसे तुर्की का शासक मुस्तफ़ा कमालपाशा ने समाप्त कर दिया। 
  • मुहम्मद साहब के जन्मदिन पर ‘मिलाद-उन-नबी’ पर्व मनाया जाता है। 
  • भारत में सर्वप्रथम इस्लाम का आगमन अरबों के जरिए हुआ। 
  • अरबों ने सिंध को जीत लिया और सबसे पहले भारत के इसी भाग में इस्लाम एक महत्त्वपूर्ण धर्म बना। 

ईसाई धर्म 

  • ईसाई एकेश्वरवादी धर्म है, लेकिन ईसाई लोग ईश्वर को त्रियक के रूप में समझते हैं- परमपिता परमेश्वर, उनके पुत्र ईसा मसीह और पवित्र आत्मा।
  • ईसा के जन्मदिन को ‘क्रिसमस‘ के रूप में मनाया जाता है। 
  • ऐसी मान्यता है कि ईसा मसीह ईश्वर के पुत्र थे, इसलिए उनका जन्म कुँवारी मरियम के गर्भ से हुआ था। 
  • ईसा ने अपने जीवन के प्रथम 30 वर्ष एक बढ़ई के रूप में बैथलेहम  के निकट नाज़रेथ में बिताए। 
  • ईसाई धर्म में बहुत से समुदाय हैं, जैसे- रोमन कैथोलिक, प्रोटैस्टैंट, आर्थोडोक्स मॉरोनी, एवनजीलक आदि। 
  •  रोमन कैथोलिक संप्रदाय के लोग मानते हैं कि वेटिकन स्थित पोप ईसा मसीह के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी हैं। 
  •  प्रोटेस्टेंट संप्रदाय से जुड़े लोग पोप की सर्वोच्च शक्ति को नहीं मानते। उनका दृष्टिकोण काफी उदार है। 
  • भारत में ईसाई धर्म का प्रचार संत थॉमस ने प्रथम शताब्दी में चेन्नई में आकर किया था।  
  • ईसाई धर्म का पवित्र चिह्न क्रॉस है। 
  • ईसाई धर्म का धर्मग्रंथ ‘न्यू टेस्टामेंट‘ है जो बाइबिल का ही अंतिम खंड है।
  •  न्यू टेस्टामेंट, ओल्ड टेस्टामेंट के विरुद्ध नहीं है। ईसा मसीह ने स्पष्ट कहा है कि “वे ओल्ड टेस्टामेंट का  बहिष्कार नहीं, बल्कि परिष्कार कर रहे हैं।”
  •  ईसा मसीह को सूली पर रोमन गवर्नर पोंटियस पिलेट ने चढ़ाया। 

पारसी धर्म

  •  पारसी धर्म के पैगंबर जरथुस्ट्र (ईरानी) थे। 
  • पारसियों का धार्मिक ग्रंथ ‘जेंद अवेस्ता‘ है। 
  • पारसियों का प्रमुख त्योहार नौरोज है। 
  • पारसी धर्म एकैकाधिदेववादी धर्म है, 
  • पारसी लोग एक ईश्वर “अहुर मज़्दा‘ में आस्था रखते हुए भी अन्य देवताओं की सत्ता को नहीं नकारते। अहुर मज़्दा उनके सर्वोच्च देवता हैं। 
  • इस धर्म में मनुष्य के शव की अंत्येष्टि एक विशेष प्रकार से की जाती है। शव को खुले आसमान में काफी ऊंचाई पर (दाख्मा में) रख दिया जाता है ताकि चील-गिद्ध उसे खा जाएँ। मान्यता है कि ऐसा करने से पृथ्वी, जल व अग्नि की शुद्धता बची रहती है।