पादप ऊतक (Plant Tissue)

उत्तक (Tissue) 

  • सर्वप्रथम Tissue शब्द का प्रयोग फ्रांस के शल्य चिकित्सक Bichat (बाइचैट) ने किया जिसका विकास एक Latin शब्द Texer से हुआ है। Texer का अर्थ बुनना (Weave) होता है।
  • उत्तक शब्द N. Grew ने दिया था।
  • उत्तक के अध्ययन करने वाले विज्ञान को Histology कहते हैं। Histology से संबंधित अध्ययन की शुरूआत सर्वप्रथम इटली के वैज्ञानिक Marcello Malpighi ने की, इसलिए इन्हें Father of Histology कहा जाता है।

उत्तक (Tissue) 

  • समान कोशिकाओं का वह समूह जो किसी एक काम को करते हों उसे उत्तक (Tissue) कहा जाता है। 
  • जब कोशिकाएँ समूह में होती हैं, तो उसे उत्तक कहा जाता है। समूह में मौजूद कोशिकाओं के बीच जो स्थान होता है उसे अर्न्तकोशिकीय स्थान (Intercellular Space) कहा जाता है। इस स्थान में विशेष प्रकार का द्रव भरा रहता है, जिसे अर्न्तकोशिकीय द्रव (Intercellular fluid) कहा जाता है, जिसे Common रूप में या सामूहिक रूप में Matrix कहते हैं।
  • उत्तक दो प्रकार के होते हैं:
    • (A) पादप उत्तक (Plant Tissues) 
      • A. विभाज्योतिकी ऊतक (Meristematic tissue)
      • B. स्थायी ऊतक (Permanent tissue) – यह दो प्रकार का होता है।
        • (a)सरल उत्तक (Simple Tissues) : (i) मृदु उत्तक (Parenchyma) , (ii) स्थूल कोण उत्तक ( Collenchyma) , (iii) दृढ़कोण उत्तक (Sclerenchyma)
        • (b) जटिल उत्तक (Complex Tissue) : (i) Xylem , (ii) Phloem
    • (B) जन्तु उत्तक (Animal Tissues)

 पादप ऊतक (plant tissue) 

  • समान उत्पत्ति तथा समान कार्यों को सम्पादित करने वाली कोशिकाओं के समूह को ऊतक (Tissues) कहते हैं । 
  • ऊतक का अध्ययन जीव विज्ञान की जिस शाखा के अन्तर्गत किया जाता है, उसे औतिकी (Histology) कहते हैं । 
  • Histology नामकरण मायर (1819 ई०) नामक वैज्ञानिक के द्वारा किया गया। 
  • ‘ऊतक’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम बिचट (1771-1802 ई०) ने किया था।
  • पादप ऊतक के प्रकार : ऊतक के कोशिकाओं की विभाजन क्षमता के आधार पर पादप ऊतक दो प्रकार के होते हैं
    • A. विभाज्योतिकी ऊतक (Meristematic tissue) – विभाजन की क्षमता
    • B. स्थायी ऊतक (Permanent tissue) – विभाजन की क्षमता नहीं

A. विभाज्योतिकी ऊतक (Meristematic tissues): 

  • इस उत्तक में शामिल कोशिकाएं विभाजन करती हैं। जिससे पौधों के शरीर का आकार बढ़ता है
  • ऐसी कोशिकाओं में बार-बार सूत्री विभाजन (Mitosis division) करने की क्षमता होती है। 
  • यह ऊतक अवयस्क (Immature) जीवित कोशिकाओं का बना होता है। 
  • इस ऊतक की भित्ति सैल्यूलोज की बनी होती है। 
  • प्रत्येक कोशिका कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) से भरी रहती है। 
  • इन कोशिकाओं में प्रायः रसधानी अनुपस्थित रहती है। 
  • इसमें एक  केन्द्रक होता है तथा कोशिकाओं के बीच अंतरकोशिकीय स्थान (Inter cellular space) नहीं पाया जाता है।
  • यह ऊतक स्थिति (Position) के आधार पर निम्नलिखित तीन प्रकार का होता है
    • (a) शीर्षस्थ विभाज्योतिकी ऊतक (Apical Meristematic)
    • (b) पार्श्वस्थ विभाज्योतिकी ऊतक (Lateral Meristematic)
    • (c) अन्तर्वेशी विभाज्योतिकी ऊतक (Intercalary Meristematic)

(a) शीर्षस्थ विभाज्योतिकी ऊतक (Apical Meristematic) :

  • यह ऊतक जड़ एवं तने के शीर्ष भाग में उपस्थित होता है तथा लम्बाई में वृद्धि करता है। 
  • यह ऊतक प्राथमिक विभाज्योतिकी से बनता है।
  • इससे कोशिकाएँ विभाजित एवं विभेदित (differentiated) होकर स्थायी ऊतक (Permanent.tissue) बनाते हैं। 
  • इससे पौधों में प्राथमिक वृद्धि होती है। 

(b) पार्श्वस्थ विभाज्योतिकी ऊतक (Lateral Meristematic) :

  • यह ऊतक जड़ तथा तने के पार्श्व भाग में (किनारे में) होता है एवं द्वितीयक वृद्धि (Secondary growth) करता है। 
  • इससे संवहन ऊतक (Vscular tissues) बनते हैं, जो भोजन संवहन का कार्य करते हैं एवं संवहन ऊतको के कारण तने की चौड़ाई में या गोलाई में वृद्धि होती है। 
  • संवहन ऊतक में अवस्थित कैम्बियम (Cambium) एवं वृक्ष के छाल के नीचे का कैम्बियम पार्श्वस्थ विभाज्योतिकी का उदाहरण है।
  •  पार्श्वस्थ विभाज्योतिकी ऊतक ही द्वितीयक विभाज्योतिकी है।

(c) अंतर्वेशी या अंतर्विष्ट विभाज्योतिकी ऊतक (Intercalary Meristematic) :

  • यह ऊतक स्थायी ऊतक के बीच-बीच में पाया जाता है। 
  • ये पत्तियों के आधार में या टहनी के पर्व (Internode) के दोनों ओर पाए जाते हैं। 
  • यह वृद्धि करके स्थायी ऊतकों में परिवर्तित हो जाते हैं।
  • इसके द्व ारा पौधे की शाखाओं की लम्बाई में वृद्धि होती है।

स्थायी ऊतक (Permanent tissue)

  • विभाज्योतकी ऊतक (अस्थायी ऊतक) की वृद्धि के बाद  स्थायी ऊतक (Permanent tissue) का निर्माण होता है जिसमें विभाजन की क्षमता नहीं होती है लेकिन कोशिका का रूप एवं आकार निश्चित रहता है। 
  • ये मृत या सजीव होते है 
  • कोशिका भित्ति पतली या मोटी होती है। 
  • कोशा द्रव्य में रसधानी रहती है।
  • उत्पत्ति पर स्थायी ऊतक दो प्रकार के होते हैं  – 1. प्राथमिक (Primary) , 2. द्वितीयक(secomdary )
  • संरचना के आधार पर स्थायी ऊतक दो प्रकार के होते हैं
    • 1. सरल ऊतक (Simple tissue) 
    • 2. जटिल ऊतक (Complex tissue)।

1.सरल स्थायी ऊतक (Simple permanent tissue):

  • यह ऊतक समरूप कोशिकाओं का (एक ही प्रकार की कोशिकाओं द्वारा) बना होता है।
  • यह 3 प्रकार का होता है
    • (i) मृदु ऊतक (Parenchyma),
    • (ii) स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma
    • (iii) दृढ़ ऊतक (Sclerenchyma)।

(i) मृदुतक (Parenchyma): 

  • इन ऊतकों को हरित ऊतक या क्लोरेनकाइमा (Chlorenchyma) कहते हैं। 
  • जलीय पौधों में तैरने के लिए गुहिकाएँ (Cavities) रहती हैं, जो मृदुतक के बीच पायी जाती है। 
  • इस प्रकार के मृदुतक को वायुतक या ऐरेनकाइमा (Aerenchyma) कहते हैं।
  • यह एपिडर्मिस के रूप में पौधों का संरक्षण करता है।
  • पौधे के हरे भागों में, खासकर पत्तियों में यह भोजन का निर्माण करता है।
  • यह ऊतक संचित क्षेत्र (Storage region) में भोजन का संचय करता है । यह उत्सर्जित पदार्थों, जैसे—गोंद, रेजिन, टेनिन आदि को भी संचित करता है। 
  • यह ऊतक भोजन के पार्श्व चालन में सहायक होता है।
  • इनमें पाए जाने वाले अंतरकोशिकीय स्थान गैसीय विनिमय में सहायक होते हैं।
  • एक ही प्रकार के उत्तक में कोशिकाएँ समव्यासी होती हैं। 
  • इस प्रकार के उत्तक में कोशिकाएँ स्पर्श करने वाले Cell Wall पर किसी भी यौगिक का जमाव नहीं होता है। 
  • यह पौधों के भोजन संग्रह करने वाले भागों में (जड़ एवं तना) पाया जाता है। जैसे-आलू, मूली, शलजम

(ii) स्थूलकोण ऊतक (Cullenchyma) :

  • यह ऊतक पौधे के नए भागों पर पाया जाता है।
  •  यह विशेषकर तने के एपिडर्मिस के नीचे पर्णवृन्त(Leaf Petiole), पुष्पवृन्त (Pedicel) और पुष्पावली वृन्त (Peduncle) पर पाया जाता है लेकिन जड़ों में नहीं पाया जाता है। 
  • यह पौधों को यांत्रिक सहायता करता है। 
  • इनमें हरितलवक पाया जाता है, तब यह भोजन का निर्माण करता है। 
  • इस प्रकार के उत्तक में कोशिकाएँ लम्बी होती हैं। 
  • इस प्रकार के उत्तक में कोशिकाओं के स्पर्श करने वाले Cell Wall में Cellulose का जमाव पाया जाता है, जिससे Cell Wall मोटी हो जाती है। जैसे-Angiosperms (आम, कटहल, जामुन, धान) 
  • यह द्विबीजपत्री (Dicot) के तना तथा पौधों के छाल (Epidermis) में पाया जाता है।

2. दृढ़ ऊतक (Sclerenchyma) : 

  • जिन पौधों से रेशा (Fibre) उत्पन्न होता है, उनमें यह ऊतक प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। 
  • यह पौधों को यांत्रिक सहारा/सामर्थ्य, दृढ़ता एवं लचीलापन (Flexibility) प्रदान करता है। 
  • यह पौधों के आन्तरिक भागों की रक्षा करता है। 
  • पौधों के बाह्य परतों में यह रक्षात्मक ऊतक के रूप में कार्य करता है।
  • इस प्रकार के उत्तक में कोशिकाएँ लंबी तथा पतली होती है, जिसके किनारे नुकीले होते हैं। यह कोशिकाएँ दिखने में तंतु के समान होता है। 
  • कोशिकाओं को स्पर्श करने वाले Cell Wall पर Lignin का जमाव पाया जाता है जिससे वयस्क अवस्था (Adult stage) में यह कोशिका मृत हो जाती है। 
  • यह पत्तियों के Venis फलों के अवस्था तथा (भित्ती) बीज का आवरण का निर्माण करता है। 
  • यह बीज के कठोर कवच तथा Nuts में पाया जाता है।

2. जटिल ऊतक (Complex tissue) : 

  • दो या दो से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बने ऊतक जटिल स्थायी ऊतक (Complex permanent tissue) कहलाते हैं। 
  • ये एक इकाई के रूप में एक साथ कार्य करती हैं।
  • ये जल, खनिज लवणों तथा खाद्य पदार्थ को पौधे के विभिन्न अंगों तक पहुँचाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं
    • (i) जाइलम (Xylem) या दारु – जड़ से पत्ती तक
    • (ii) फ्लोएम (Phloem) या बास्ट – पत्तियों से विभिन्न भागों तक
  • जाइलम एवं फ्लोएम मिलकर संवहन बण्डल का निर्माण करते हैं । अतः इन दोनों को संवहन ऊतक (Vascular tissue) भी कहते हैं।

(i) जाइलम (Xylem) : जड़ से पत्ती तक

  • यह ऊतक पौधों के जड़, तना एवं पत्तियों में पाया जाता है। 
  • इसे चालन ऊतक (Conducting tissue) भी कहते हैं ।
  • ये पौधों को यांत्रिक सहारा प्रदान करती हैं तथा ये पौधों की जड़ से जल एवं खनिज-लवण को पत्ती तक पहुँचाते हैं।
  • इसे Wood भी कहते हैं।
  • यह नलिका के समान संरचना होती है।
  • इसका निर्माण 4 प्रकार के कोशिकाओं से होता है- Vessels, Tracheids, Xylem Parenchyma, Xylem Fibre),
  • Vessels तथा Tracheids में Lignin का जमाव होता है, जिसके द्वारा नलीनुमा संरचना का निर्माण होता है, जिसे Xylem कहा जाता है। 
  • जड़ द्वारा अवशोषित जल तथा खनिज लवण को Xylem द्वारा पत्तियों तक पहुँचाया जाता है।

ii) फ्लोएम (Phloem) : पत्तियों से विभिन्न भागों तक

  • जाइलम की भाँति फ्लोएम भी पौधों की जड़, तना एव पत्तियों में पाया जाता है। 
  • यह पत्तियों द्वारा तैयार भोज्य पदार्थ को पौधों के विभिन्न भागों तक पहँचाता है। 
  • यह एक संचयक ऊतक है जो पौधों को यांत्रिक संचयन प्रदान करता है।
  • इसका निर्माण विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं से होता है। यह भी नलिका के समान संरचना होती है, जो जीवित कोशिकाओं से बनी होती है – Sieve Tube, Companion Cell, Phloem Parenchyma, Phloem Fibers 
  • Sieve Tube में केन्द्रक नहीं पाया जाता है।

वार्षिक वलय (Annual rings): 

  • किसी स्थान पर वर्ष की विभिन्न ऋतुओं में जलवायु के क्रमिक परिवर्तन के कारण कैम्बियम की सक्रियता परिवर्तित होती रहती है। बसन्त ऋतु (Spring season) में रस के संवहन की अधिक जरूरत होती है जबकि शरद ऋतु में पौधे की सक्रियता कम रहती है। इसी कारण बसन्त ऋतु में मोटी वाहिकाएँ तथा शरद ऋतु में पतली वाहिकाएँ बनती हैं। 
  • इसके परिणामस्वरूप स्पष्ट वार्षिक वलय बनते हैं। 
  • ये वार्षिक वलय एक वर्ष की वृद्धि को प्रदर्शित करते हैं। 
  • इसके द्वारा वृक्ष में उपस्थित वार्षिक वलयों की गणना कर वृक्ष की अवस्था की सही जानकारी प्राप्त की जा सकती है। 
  • वार्षिक वलय का अध्ययन डेन्ड्रोक्रोनोलॉजी (Dendrochronology) कहलाता है।

कॉर्क (Cork): 

  • कार्क कैम्बियम द्वारा बाहर की ओर कॉर्क का निर्माण होता है। परिपक्व होने पर यह मृत हो जाती है तथा इनमें वायु भर जाती है। 
  • कॉर्क सुबेरिन (Suberin) नामक रासायनिक पदार्थ से बनती है। 
  • बोतलों में लगाया जाने वाला कॉर्क इसका उत्तम उदाहरण है जो क्यूर्कस सुबर (Quercus suber) नामक पौधे से प्राप्त होता है। 

 द्वितीयक वृद्धि (Secondary growth): 

  • अधिकांश द्विबीजपत्रियों में स्तम्भ (तना) एवं जड़ों में मोटाई में वृद्धि होती है।
  •  यह वृद्धि एधा (Cambium) तथा कॉर्क कैम्बियम (Cork cambium) की क्रियाशीलता के कारण होती है। 
  • अतः एधा (Cambium) एवं कॉर्क कैम्बियम (Cork cambium) की क्रियाशीलता के कारण स्तम्भ या जड़ के रंभीय (Stelar) एवं एक्स्ट्रा स्टीलर (Extra stelar) भागों में हुई मोटाई में वृद्धि द्वितीयक वृद्धि कहलाती है। 
  • कुछ एकबीजपत्री पौधे जैसे ड्रेसिना (Dracena), एलो, युक्का (Yucca) आदि में भी द्वितीयक वृद्धि देखने को मिलती है। 

 

जन्तु ऊत्तक (Animal Tissue) 

जन्तुओं के शरीर का निर्माण 4 प्रकार के उत्तकों के द्वारा होता है जो निम्नलिखित इस प्रकार है- 

  • उपकला उत्तक (Epithelial Tissue) 
  • संयोजी उत्तक (Connective Tissue) 
  • पेशी उत्तक (Muscular Tissue)
  • तंत्रिका उत्तक (Nervous Tissue) 

उपकला उत्तक (Epithelial Tissue) 

  • यह शरीर के खुली सतहों (Open Surface) को सुरक्षा प्रदान करने का कार्य करता है। 
  • यह शरीर के उन सभी जगहों पर पाया जाता है, जिसकी सतह खुला हो, तथा जिसे बाहरी पदार्थों द्वारा नुकसान पहुँच सकता है। त्वचा के बाहरी परत को Epidermis कहते हैं। जैसे-आहार नली (Food Pipe), त्वचा का बाहरी आवरण, श्वसन नली, वायु कोष्ठ (Airsacs) ग्रंथियाँ (जनन….), अंडवाहिनी (Fallopian Tube), वृक्क नलिका (Kidney Tubules) etc… 

संयोजी उत्तक (Connective Tissue) 

  • संयोजी उत्तक शरीर के विभिन्न भागों को जोड़ने का कार्य करता है। Histamine स्राव कोशिकाएँ संयोजी उत्तक में पायी जाती है । यह उत्तक शरीर में सबसे अधिक मात्रा में पाया जाता है। इस उत्तक के Matrix में लसिका (Lymph) तथा तंतु (Fibre) पाए जाते हैं। 
  • Connective Tissue चार प्रकार के होते हैं- 
    • (a) Areolar Connective Tissue :
      • (i) कण्डरा (Tendon)
      • (ii) स्नायु (Ligament)
    • (b) कंकाल संयोजी ऊत्तक (Skeletal Connective Tissue)
    • (c) वसीय उत्तक (Adipose Tissue)
    • (d) तरल संयोजी उत्तक (Fluid Connective Tissue)

(a) Areolar Connective Tissue : इसके Matrix में दो तरह के तंतु पाए जाते हैं, जिसके द्वारा दो प्रकार के संरचनाओं का निर्माण होता है- (i) कण्डरा (Tendon) , (ii) स्नायु (Ligament) 

  • (i) कण्डरा (Tendon) : इसका निर्माण श्वेत तंतु (White Fibre) के द्वारा होता है, जो Collagen Protein से निर्मित होते हैं। यह प्रोटीन एक कठोर संरचना का निर्माण करता है जिसे Tendon कहा जाता है। Tendon के द्वारा हड्डियाँ माँसपेशियों से जुड़ी रहती हैं।
  • (ii) स्नायु (Ligament) : इसका निर्माण पीला तंतु (Yellow Fibre) के द्वारा होता है, जो Elastin Protein से निर्मित होते हैं। Ligament एक प्रत्यास्थ (Elastic) तथा लचीली (Flexible) संरचना होती है। Ligament के द्वारा हड्डियाँ हड्डियों से जुड़ी रहती है

(b) कंकाल संयोजी ऊत्तक (Skeletal Connective Tissue) :

  • हड्डियों का निर्माण एक विशेष प्रकार की कोशिका द्वारा होता है जिसे Oestiocyte कहा जाता है। 
  • Skeletal Tissue (Bone ) के बाहर एक आवरण पाया जाता जिसे Periosteum कहा जाता है। 
  • हड्डी एक छिद्रनुमा Structure है। 
  • छिद्रों के द्वारा रक्त वाहिनी (Blood Vessels) तथा तंत्रिका Nerves हड्डी के अन्दर प्रवेश करते है, जिससे तंत्रिका आवेग (Nerve Impulse) तथा रक्त का बहाव होता है। 
  • हड्डियों का निर्माण एक विशेष प्रकार के Protein द्वारा होता जिसे Eosin Protein कहा जाता है। 
  • हड्डियों का निर्माण कैल्शियम फॉस्फेट नामक यौगिक से होता है, इसलिए हड्डियों को कैल्शियम तथा फॉस्फोरस के जमा होने वाले अंग के रूप में माना जाता है। 
  • हड्डियों के द्वारा शरीर के महत्तवपूर्ण अंगों को सुरक्षा प्रदान की जाती है। जैसे- हृदय, फेफड़ा, मस्तिष्क इत्यादि
  • हड्डियों के बीच में एक छिद्रनुमा संरचना / नलीनुमा संरचना पायी जाती है, जिसे Haversian Canal कहते हैं। 
  • हड्डियों के बीच मौजूद छिद्र में कुछ विशेष प्रकार के उत्तक पाए जाते हैं, जिसे Bone Marrow (अस्थिमज्जा) कहा जाता है।
  • Bone Marrow दो प्रकार के होते हैं- 
    • (i) पीला अस्थिमज्जा (Yellow Bone Marrow)
    • (ii) लाल अस्थिमज्जा (Red Bone Marrow) :

पीला अस्थिमज्जा (Yellow Bone Marrow) :

  • यह लम्बी हड्डियों के बीच मौजूद छिद्र में पाया जाता है। 
  • इसके द्वारा WBC का निर्माण किया जाता है। 
  • Yellow Bone Marrow नवजात शिशुओं में बहुत कम पाया जाता है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ-साथ Yellow Bone Marrow की मात्रा बढ़ती जाती है। 

लाल अस्थिमज्जा (Red Bone Marrow) :

  • यह बचपन में लम्बी हड्डियों के बीच पाया जाता है। लेकिन उम्र बढ़ने पर लम्बी हड्डियों के किनारों में पाया जाता है। 
  • इसके द्वारा RBC तथा Platelets का निर्माण किया जाता है।
  • गर्भावस्था में बच्चों का RBC का निर्माण Liver (यकृत) में होता है।

उपास्थि (Cartilage) 

  • इसका निर्माण एक विशेष प्रकार की कोशिका द्वारा होता है, जिसे Chondrocyte कहा जाता है। 
  • उपास्थि के बाहर एक आवरण (Cover) पाया जाता है जिसे Perichondrium कहते है। 
  • Cartilage का निर्माण एक विशेष प्रकार के प्रोटीन के द्वारा होता है जिसे Chondrin Protein कहा जाता है। 
  • उपास्थि में छिद्र नहीं पाया जाता है जिसके कारण रक्त तथा तंत्रिका (Nerves) का प्रसार नहीं पाया जाता है। 
  • रक्त वाहिनी (Blood Vessels) तथा Nerves के नहीं होने के कारण इसे काटने पर रक्त का स्त्राव तथा दर्द का एहसास नहीं होता है। जैसे- नाक का अग्र भाग, कान का बाहरी भाग, हवा की नली 

(c) वसीय उत्तक (Adipose Tissue) :

  • इसका निर्माण शरीर को ऊष्मा प्रदान करने के लिए होता है।
  • वसा की बूँदों के आकार के आधार पर Adipose Tissue दो प्रकार के होते हैं.
    • White Adipose Tissue
    • Brown Adipose Tissue

White Adipose Tissue :

  • इसमें वसा की बूँदे बड़ी होती हैं।
  • यह त्वचा के नीचे, Yellow Bone Marrow तथा महत्त्वपूर्ण अंगों के चारों तरफ पाया जाता है। 

Brown Adipose Tissue :

  • इसमें वसा की बूँदे छोटी होती है। 
  • इस Adipose Tissue में Mitochondria अत्यधिक संख्या में पाए जाने के कारण अत्यधिक ऊर्जा का निर्माण करती है. जिससे शरीर गर्म रहता है।
  • Brown Adipsoe Tissue बच्चों में अधिक मात्रा में पाया जाता है इसलिए बच्चों को ठण्ड का एहसास कम होता है। 

(d) तरल संयोजी उत्तक (Fluid Connective Tissue) : यह द्रव अवस्था में पाया जाता है क्योंकि इसमें Matrix की मात्रा अधिक पाई जाती है। इसके Matrix को Plasma कहा जाता है।

  • यह दो प्रकार का होता है- 
    • (i) रक्त (Blood)
    • (ii) लसिका (Lymph)

(i) रक्त (Blood) :

  • इसमें 3 प्रकार की कोशिकाएँ पाई जाती हैं जिसे RBC, WBC तथा Platelets कहा जाता है।
  • RBC के कारण इसका रंग लाल होता है। यह पोषक तत्व, हार्मोन तथा O2, और CO2, को एक जगह से दूसरे जगह पहुँचाने का कार्य करता है।

(ii) लसिका (Lymph) :

  • यह बिल्कुल रक्त के समान होता है लेकिन इसमें RBC नहीं पाया जाता है।
  • RBC के नहीं होने के कारण इसका रंग सफेद होता है।
  • Lymph में WBC बहुत अधिक संख्या में पाए जाते हैं, जिसके द्वरा रोगों से लड़ने के लिए Antibody का निर्माण किया जाता है।
  • Blood तथा Lymph शरीर में अलग-अलग बहते हैं। Blood जिस नली के द्वारा बहता है, उसे Blood Vessels कहते हैं, जबकि Lymph के बहने वाली नली को Lymph Vessels कहते हैं।

पेशी उत्तक (Muscular Tissue) : 

  • इस उत्तक का निर्माण एक विशेष प्रकार की कोशिका से होता है, जिसे Myocyte कहा जाता है, इसलिए माँसपेशियों का अध्ययन Myology कहलाता है। 
  • इस उत्तक के द्वारा शरीर की सभी माँसपेशियाँ (639) निर्मित होते हैं। 
  • गुणों के आधार पर पेशी उत्तक 3 प्रकार के होते हैं-
    • (a) अरेखित/अनैच्छिक/चिकनी पेशी उत्तक (Unstriped or Involuntary or Smooth Muscular Tissue) :
    • (b) रेखित/ऐच्छिक/कंकालीय पेशी उत्तक (Striped/ Volountary/Skeletal Muscular Tissue) :
    • (c) हृदय पेशी उत्तक (Cardiac Muscular Tissue)

(a) अरेखित/अनैच्छिक/चिकनी पेशी उत्तक (Unstriped or Involuntary or Smooth Muscular Tissue) :

  • इस प्रकार के उत्तक में धारियाँ या रेखाएँ नहीं पायी जाती है। 
  • यह उत्तक हमारे इच्छा के नियंत्रण में कार्य नहीं करता है।
  • इस प्रकार के पेशी उत्तक का सतह चिकना (Smooth) होता है। जैसे- Food Pipe (आहार नली), Blood Vessels 

(b) रेखित/ऐच्छिक/कंकालीय पेशी उत्तक (Striped/ Volountary/Skeletal Muscular Tissue) :

  • इस प्रकार के पेशी उत्तक में रेखाएँ या धारियाँ पाई जाती है। 
  • यह उत्तक हमारी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं। 
  • इस प्रकार के पेशी उत्तक हड्डियों से जुड़े होते हैं
  • इससे माँसपेशी में थकान होती है। जैसे-हाथ-पाँव की माँसपेशियाँ, चेहरे की माँसपेशियाँ। 

(c) हृदय पेशी उत्तक (Cardiac Muscular Tissue) :

  • यह उत्तक शाखाओं में विभाजित होते हैं। 
  • इस प्रकार के पेशी उत्तक में रैखिक तथा अरैखिक दोनों प्रकार की पेशियाँ पाई जाती है। 
  • यह हमारी इच्छा के नियंत्रण में नहीं होता है। जैसे- हृदय से संबंधित माँसपेशियाँ । 

तंत्रिका उत्तक (Nervous Tissue) :

तंत्रिका उत्तक का निर्माण एक विशेष प्रकार की कोशिका द्वारा होता है, जिसे Neuron कहा जाता है।  : Axon terminal , Synapse , Dendrite , Nucleus , Cell body , Axon , Myelin sheath , Node of Ranvier 

  • Neuron का मुख्य भाग Cyton कहलाता है, जिसमें केंद्रक पाया जाता है। 
  • Cyton में दानेदार संरचना पाई जाती है, जिसे Nissil Granules कहा जाता है जिसका रंग Grey होता है। 
  • Cyton का नीचे वाला भाग Axon कहलाता है जिसका रंग सफेद होता है। 
  • Cyton के चारों तरफ धागेनुमा संरचना दिखाई देती है, जिसे Dendron कहा जाता है। Dendron जब शाखाओं में विभाजित हो जाता है, तब उसे Dendrites कहा जाता है। 
  • Dendron तथा Dendrites की मदद से Neuron सूचनाओं को ग्रहण करता है, इसलिए इसे Receptor कहा जाता है।
  • Axon के ऊपर कोशिकाओं का आवरण होता है, जिसे Medullary Sheath कहा जाता है। 
  • दो Medullary Sheath के बीच कुछ खाली जगह होती है, उसे Node of Ranvier कहते हैं। 
  • इस प्रकार की कोशिकाएँ उद्दीपन तथा चालकता में काफी विकसित होती हैं।