Organic Chemistry
  • कार्बनिक रसायनशास्त्र (Organic Chemistry) जिसमें हम कार्बन के यौगिकों का अध्ययन करते हैं 
  • जीवन-शक्ति के सिद्धान्त (Vital Force Theory) : स्वीडेन के रसायनशास्त्री बर्जीलियस (Berzelius) ने यह कल्पना की कि ऑरगेनिक पदार्थ एक महान् शक्ति के प्रभाव से बनते हैं और उस शक्ति के योगदान के बिना वे पदार्थ नहीं बन सकते, अर्थात् उन्हें प्रयोगशाला में नहीं बनाया जा सकता है ।
  • 1828 ई० में जर्मनी के रसायनशास्त्री वोहर (Wohler) ने प्रयोगशाला में यूरिया (Urea ) का संश्लेषण (Synthesis) दो अकार्बनिक यौगिकों अमोनियम सल्फेट  तथा पोटैशियम सायनेट के मिश्रण को गर्म करके किया । 
  • वोह्वर के इस आविष्कार से ‘जीवन – शक्ति के सिद्धान्त’ को काफी धक्का लगा।
  • 1844 में कोल्वे (Kolbe) ने ऐसीटिक अम्ल का संश्लेषण कार्बन, हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन से किया।
  • 1856 में बर्थेलोट (Berthelot ) ने मिथेन का संश्लेषण किया । 

कार्बनिक यौगिकों का वर्गीकरण 

ऐलीफैटिक या खुली श्रृंखला वाले यौगिक (Aliphatic or Open Chain Compounds ) :

  • वैसे कार्बनिक यौगिक जिनमें कार्बन के सभी परमाणु एक खुली श्रृंखला में जुड़े रहते हैं, ऐलिफैटिक यौगिक कहलाते हैं ।
  • इनमें कार्बन परमाणु Straight or Branched chains में जुड़े रह सकते हैं।
  •  सभी ऐलिफैटिक यौगिकों का जन्मदाता – मिथेन 

बंद शृंखला वाले या चक्रीय यौगिक (Closed Chain or Cyclic Compounds ) : 

  • वे यौगिक, जिनमें कार्बन परस्पर संयुक्त होकर एक बन्द शृंखला या चक्र बनाते हैं, बन्द श्रृंखला वाले या चक्रीय यौगिक कहलाते है ।
  • शृंखला की रचना के आधार पर चक्रीय यौगिकों को पुनः दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है- 
  • (a) कार्बन-चक्रीय या सम चक्रीय योगिक (Carbocyclic or Homoyclic Compounds ): वे चक्रीय यौगिक जो केवल कार्बन परमाणुओं के संयोग से बने होते हैं कार्बन-चक्रीय या सम-चक्रीय यौगिक कहलाते हैं ।
  • कार्बन-चक्रीय यौगिक पुनः दो वर्गों में बाँटे जाते हैं- 
    • (i) ऐरोमैटिक यौगिक (Aromatic Compounds ) :
      • इस वर्ग के यौगिकों की बन्द श्रृंखला कार्बन के छह परमाणुओं से बनी होती है।
      • सभी ऐरोमैटिक यौगिकों का जन्मदाता  – बेंजीन
      • बेंजीन, फिनॉल, ऐनिलीन आदि ऐरोमैटिक यौगिक हैं । 
    • (ii) ऐलिसाइक्लिक यौगिक (Alicyclic Compounds ) :
      • कुछ चक्रीय यौगिकों के गुण बन्द श्रृंखला होने पर भी ऐरोमैटिक यौगिकों की अपेक्षा ऐलिफैटिक यौगिकों से अधिक मिलते-जुलते हैं ।
      • इनमें ऐरोमैटिक यौगिकों की अपेक्षा हाइड्रोजन परमाणु अधिक होते हैं ।
      • इनमें ऐरोमैटिक यौगिकों की भाँति चक्र में एकान्तर (Alternate) से एक-बन्धन और द्वि-बन्धन नहीं होते हैं ।
      • साइक्लोब्यूटेन, साइक्लोपेन्टेन, साइक्लोहेक्सेन आदि ऐलिसाइक्लिक यौगिक हैं । 
  • (b) विषम चक्रीय यौगिक (Heterocyclic Compounds ) : वे चक्रीय यौगिक जिनकी बन्द शृंखला कार्बन के अतिरिक्त अन्य तत्वों के परमाणुओं से भी मिलकर बनी होती है, विषम चक्रीय यौगिक कहलाते हैं ।
    • उदाहरणार्थ – पाइरौल, फ्यूरान, थायोफिन, पिरीडीन आदि विषम चक्रीय यौगिक हैं, जिनमें क्रमशः नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, गन्धक एवं नाइट्रोजन विषम परमाणु हैं । 

अभिक्रियाशील मूलक (Functional Group)

  • किसी कार्बनिक यौगिक में उपस्थित मूलक जिनके ऊपर उस यौगिक के मुख्य गुण निर्भर करते हैं, अभिक्रियाशील मूलक (Functional Group) कहलाते हैं ।
  • उदाहरणार्थ, इथाइल ऐल्कोहॉल दो मूलकों, इथाइल (—C2H5) एवं हाइड्रॉक्सिल (—OH) से मिलकर बना है परन्तु इसके मुख्य गुण हाइड्रॉक्सिल मूलकों पर निर्भर करते हैं । अतः – OH मूलक इथाइल ऐल्कोहॉल का अभिक्रियाशील मूलक है ।
Functional Group
Functional Group

 

सजातीय श्रेणी (Homologous Series) :

  • कार्बनिक यौगिकों की वह श्रेणी जिसके सभी सदस्यों में एक ही क्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, जिसके सदस्यों के रासायनिक गुणों एवं संरचना में परस्पर समानता पायी जाती है, और जिसके किसी भी दो क्रमागत सदस्यों के बीच सदैव –CH2— अंतर रहता है, सजातीय श्रेणी कहलाता है, तथा इसके सदस्य परस्पर समजात (Homologous) कहलाते हैं ।
  • कार्बनिक रसायन में पायी जाने वाली यह घटना सजातीयता (Homology) कहलाती है । 
  • ऐल्केन भी एक सजातीय श्रेणी है ।
  • ऐल्कोहॉल भी एक सजातीय श्रेणी की रचना करते हैं ।
    • उदाहरणार्थ, मिथाइल ऐल्कोहॉल (CH3OH),
    • इथाइल ऐल्कोहॉल (C2H5OH)
    • प्रोपाइल ऐल्कोहॉल (C3H7OH), इत्यादि ।
  • इस प्रकार की अनेक श्रेणियाँ कार्बनिक रसायन में पायी जाती हैं। इन सजातीय श्रेणी के सदस्यों को एक सामान्य सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है, जैसे—ऐल्कोहॉल— CnH2n+1OH, ऐल्डिहाइड CnH2n+1CHO इत्यादि । 

 

बहुलीकरण (Polymerisation) :

  • जिसमें किसी यौगिक के दो या दो से अधिक गुण मिलकर एक बड़े अणु का निर्माण करते हैं।
  • इस प्रतिक्रिया के फलस्वरूप बने यौगिक ‘बहुलीकृत यौगिक’ या ‘बहुलक’ कहलाते हैं।
  • उदाहरणार्थ- ऐसीटिलीन गैस यदि लाल-तप्त ताँबे की नली में प्रवाहित की जाय तो ऐसीटिलीन (C2H2) के तीन अणु बहुलीकृत होकर बेंजीन (C6H6) बनाते हैं । 
  • बहुलीकरण एक उत्क्रमणीय (Reversible) क्रिया है । 
  • बहुलीकरण में एक ही प्रकार के अणु परस्पर संयोग करते हैं । 
  • बहुलीकरण में कार्बन परमाणु नया बन्धन नहीं बनाते हैं ।
Polymer Monomer Uses
पॉली स्टाइरीन
पॉली प्रोपाइलीन
पॉली विनाइल क्लोराइड (PVC) विनाइल क्लोराइड
नॉयलॉन  वस्त्र उद्योग में
टैफ्लॉन
टेट्रा-फ्लुओरो-एथिलीन नॉन-स्टिक कुकिंग बर्तन बनाने में
टेरेलीन वस्त्र उद्योग में
पॉलीथीन
एथिलीन

कार्बनिक यौगिकों के सामान्य सूत्र

कार्बनिक यौगिक सूत्र Examples
Alkane CnH2n+2  
Alkene CnH2n एथिलीन (C2H4
Alkyne CnH2n-2 ऐसीटिलीन या एथाइन (C2H2)

 

  • हाइड्रोकार्बन : कार्बन एवं हाइड्रोजन के संयोग से बनने वाले कार्बनिक यौगिक
  • पेट्रोलियम, हाइड्रोकार्बन का प्रमुख प्राकृतिक स्रोत है ।
  • हाइड्रोकार्बन को दो वर्गों में विभाजित किया गया है- 
    • Aliphatic Hydrocarbons – खुली शृंखला वाले हाइड्रोकार्बन
      • संतृप्त हाइड्रोकार्बन या ऐल्केन या पैराफिन (Saturated Hydrocarbons or-Alkane or Paraffin )
        • सभी कार्बन परमाणु एक-दूसरे के साथ एकल बंधन ( Single Bond) द्वारा जुड़े रहते हैं
        • मिथेन, इथेन, प्रोपेन, ब्यूटेन, पेन्टेन, हेक्सेन, हेप्टेन, ऑक्टेन, नोनेन, डीकेन प्रथम 10 संतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं ।
      • असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (Unsaturated Hydrocarbons) :
        • दो कार्बन परमाणुओं के बीच द्विबंधन (Double Bond), अथवा त्रिबंधन (Triple Bond) होता है,
        • असंतृप्त हाइड्रोकार्बन भी दो प्रकार के होते हैं—
          • Alkene or Olefin – दो कार्बन परमाणुओं के बीच द्विबंधन (Double Bond)
          • Alkyne or Acetylenic– दो कार्बन परमाणुओं के बीच त्रि-बंधन
    • Aromatic Hydrocarbons  : बन्द श्रृंखला वाले हाइड्रोकार्बन 
      • बेंजीन के समान श्रृंखला पायी जाती है,
      • इसका सामान्य सूत्र CnH2n–6 होता है।
      • बेंजीन सबसे सरलतम ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन है ।
      • टॉल्वीन (Toluene), नैप्थेलिन (Napthalene), एन्थ्रासिन (Anthracene) आदि
      • ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन में विशेष प्रकार की गंध होती है एवं बेंजीन के समान वलय संरचना पायी जाती है।
      • ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन को एरीन (Arenes) भी कहा जाता है ।
      •  एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन में विशेष प्रकार का गंध पाया जाता है, जबकि ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बन गंधहीन होता है । 

ऐल्कोहॉल (Alcohols) :

  • ये कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बने सरल यौगिक होते हैं।
  • किसी ऐल्केन से एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणुओं को उतने ही हाइड्रॉक्सिल मूलकों (OH) द्वारा प्रतिस्थापित करने पर जो यौगिक प्राप्त होते हैं, उन्हें ऐल्कोहॉल कहा जाता है ।
  • जिन ऐल्कोहॉल के अणुओं में केवल एक हाइड्रोक्सिल मूलक रहता है, वे मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल कहलाते हैं । जैसे—मिथेनॉल, एथेनॉल, इत्यादि ।
  • जिन ऐल्कोहॉल अणुओं में दो हाइड्रॉक्सिल मूलक रहते है, वे डाइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल कहलाते हैं । जैसे— ग्लाइकॉल
  • सभी ऐल्कोहॉल में —OH अभिक्रियाशील समूह पाया जाता है ।

ऐल्डिहाइड (Aldehydes) :

  • जिन कार्बनिक यौगिकों में में –CHO अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, उन्हें ऐल्डिहाइड कहा जाता है,
  • प्रमुख ऐल्डिहाइड कार्बनिक यौगिक : (Formaldehyde), ऐ(Acetaldehyde), (Propionaldehyde) आदि   

कीटोन (Ketones) :

  • जिन कार्बनिक यौगिक में > C = O अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, उन्हें कीटोन कहा जाता है ।
  • ऐसीटोन या डाइमिथाइल कीटोन, मिथाइल इथाइल कीटोन, डाइइथाइल कीटोन आदि प्रमुख कीटोन हैं । 

कार्बोक्सिलिक अम्ल (Carboxylic acids) :

  • जिन कार्बनिक यौगिकों – COOH अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित होता है, उन्हें कार्बोक्सिलिक अम्ल कहा जाता है ।
  • फॉर्मिक अम्ल, ऐसीटिक अम्ल, प्रोपायोनिक अम्ल, ब्यूटिरिक अम्ल आदि कुछ प्रमुख कार्बोक्सिलिक अम्ल हैं । 

ऐसिड ऐन्हाइड्राइड (Acid Anhydrides ) :

  • जिन कार्बनिक यौगिकों में R-COOCOR अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, उन्हें ऐसिड ऐन्हाइड्राइड कहते हैं । 
  • ऐसीटिक ऐन्हाइड्राइड, प्रोपायोनिक ऐन्हाइड्राइड आदि कुछ प्रमुख एसिड ऐन्हाइड्राइड हैं । 

एस्टर (Esters) :

  • जिन कार्बनिक यौगिकों में – COOR अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, उन्हें एस्टर कहते हैं । 
  • मिथाइल फॉर्मेट, इथाइल फॉर्मेट, मिथाइल ऐसीटेट, इथाइल ऐसीटेट आदि कुछ प्रमुख एस्टर हैं ।
  • कृत्रिम सुगन्धित पदार्थ बनाने में इथाइल एसीटेट का प्रयोग किया जाता है । 

ईथर (Ethers) :

  • जिन कार्बनिक यौगिकों में रहता है, उन्हें ईथर कहते है ।
  • डाइमिथाइल ईथर, डाइइथाइल ईथर आदि कुछ प्रमुख ईथर यौगिक हैं ।
  • डाइइथाइल ईथर का उपयोग निश्चेतक के रूप में किया जाता है । इसे सिर्फ ईथर भी कहा जाता है ।

 

कार्बनिक यौगिक 

मिथेन (Methane ) : CH4

  • यह ऐल्केन श्रेणी का प्रथम सदस्य है । यह एक कार्बनिक गैस है।
  • इसे मार्श गैस के नाम से भी जाना जाता है ।
  • प्राकृतिक रूप से यह सब्जियों के विघटन से प्राप्त की जाती है।
  • प्रयोगशाला में यह सोडियम ऐसीटेट को सोडालाइम के साथ गर्म करके प्राप्त किया जाता है ।
  • ऐल्युमिनियम कार्बाइड पर जल की प्रतिक्रिया से व्यापारिक स्तर पर मिथेन प्राप्त किया जाता है ।
  • यह प्राकृतिक गैस का प्रमुख अवयव है ।
    • उसमें यह 90% मात्रा में मौजूद रहता है।
  • हवा के साथ यह विस्फोटक मिश्रण बनाता है, जिस कारण कोयले की खानों में प्रायः भयानक विस्फोट हुआ करते हैं ।
  • इसका उपयोग गैसीय ईंधन के रूप में, कार्बनिक यौगिकों के निर्माण में, कार्बन ब्लैक बनाने में, हाइड्रोजन के औद्योगिक उत्पादन आदि में होता है ।
  • इसकी आकृति समचतुष्फलकीय (Tetrahedral) होती है तथा बंधनों के बीच का कोण 109° 28′ होता है । 
  •  सैप्टिक टैंक से निकलने वाली गैस
  • जुगाली करने वाले पशुओं से
  • धान के खेतों से  मुक्त होती है
  • आर्द्र भूमि से  मुक्त होती है
  • जैव गैस में मुख्यतः  होता है
  • प्राकृतिक गैस का मुख्य अवयव है
  • हवा के साथ मिथेन के मिश्रण से खदानों में अधिकांश विस्फोट होते हैं

एथीलिन (Ethylene ) :

  • यह ऐल्कीन श्रेणी का प्रथम सदस्य है ।
  • प्रयोगशाला में एथीलिन बनाने के लिए इथाइल ऐल्कोहॉल तथा अधिक मात्रा में सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल को 170°C पर गर्म किया जाता है। इसका उपयोग पॉलीथीन प्लास्टिक बनाने, मस्टर्ड गैस बनाने, निश्चेतक के रूप में, ऑक्सी एथीलिन ज्वाला उत्पन्न करने आदि में होता है । 

ऐसीटिलीन (Acetylene ) :

  • यह ऐल्काइन श्रेणी का प्रथम सदस्य है । इसे प्रयोगशाला में कैल्सियम कार्बाइड पर जल की प्रतिक्रिया द्वारा बनाया जाता हैं । इसका उपयोग प्रकाश उत्पन्न करने, कपूर बनाने, निश्चेतक के रूप में, धातुओं को काटने जोड़ने में, बेजीन के संश्लेषण में, कच्चे फलों को कृत्रिम रूप से पकाने आदि में होता है। इसकी खोज अमेरिकी वैज्ञानिक विल्सन ने की थी । 

सी० एफ० सी० (C.F.C.) :

  • सी०एफ० सी० का पूरा रूप क्लोरो फ्लोरो कार्बन (Chloro fluoro carbon) होता है । यह क्लोरीन, फ्लोरीन तथा कार्बन परमाणुओं के यौगिकों का संघटन है । यह ओजोन परत के क्षरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । सी०एफ० सी० को फ्रिऑन (Freon) भी कहा जाता है । 

फ्रिऑन (Freon):

  • इसका रासायनिक नाम क्लोरो फ्लोरो कार्बन (CFC) है। इसका उपयोग विलायक, प्रशीतक व परिक्षेपक के रूप में होता है। 

इथाइल ऐल्कोहॉल (Ethyl Alcohol) :

  • यह एक रंगहीन द्रव है, जो अत्यधिक ज्वलनशील होता है। इसके पीने से मानव शरीर में उत्तेजना पैदा होती है। इस कारण इसका उपयोग मादक द्रव या शराब (Wine ) के रूप में किया जाता है। यह फलों व स्टार्चयुक्त अनाजों से प्राप्त किया जाता है । औद्योगिक दृष्टि से इसका उत्पादन किण्वन विधि द्वारा किया जाता है। इसका उपयोग मोटर व हवाई जहाजों में ईंधन के रूप में, पारदर्शक साबुन बनाने में, इत्र व अन्य सुगन्धित पदार्थ बनाने में, शराब आदि के निर्माण में किया जाता है । 

मिथाइल ऐल्कोहॉल (Methyl Alcohol) :

  • यह एक विषैला द्रव होता है, जिसका गंध शराब की तरह होता है। इसके सेवन से व्यक्ति अंधा हो जाता है तथा अधिक मात्रा में पी लेने से मृत्यु तक भी हो सकती है । जहरीली शराब पीने वालों की अधिकांश मृत्यु इसी मिथाइल ऐल्कोहॉल के कारण होती है। इसे सबसे पहले लकड़ी के भंजन आसवान से बनाया गया था। इसका उपयोग पेट्रोल के साथ मिलाकर ईंधन के रूप में, कृत्रिम रंग बनाने में तथा वार्निश आदि के विलायक के रूप में होता है । 

इथिलीन ग्लाइकॉल (Ethylene Glycol ) :

  • यह एक डाइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल है तथा अपने मीठे स्वाद के कारण इस नाम से पुकारे जाते हैं। ठंडे प्रदेशों में हिमांक कम करने के लिये – इसका उपयोग कारों के रेडियेटरों में किया जाता है । 

ग्लिसरौल (Glycerol) :

  • यह ट्राइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल श्रेणी का प्रमुख सदस्य है । यह प्रोपेन का ट्राइहाइड्रॉक्सी व्युत्पन्न है । इसका व्यापारिक नाम (Commercial Name) ग्लिसरीन (Glycerine) है। यह मुक्त अवस्था में शक्कर के किण्वित घोल (Fermented Sugar Solution) तथा रक्त (Blood) में अल्प मात्रा में पाया जाता है । संयुक्त अवस्था में यह वसा तथा वनस्पति तेलों में उच्च कार्बनिक अम्लों के ईस्टर (ग्लिसराइड) के रूप में पाया जाता है । यह एक अति आर्द्रताग्राही (Hygroscopic) पदार्थ है । सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में यह सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के साथ प्रतिक्रिया कर ग्लिसरिल ट्राइनाइट्रेट (ट्राइनाइटो ग्लिसरीन या TNG) बनता है | TNG एक शक्तिशाली विस्फोटक है, जिसका उपयोग डाइनामाइट (Dynamite ) एवं अन्य विस्फोटक बनाने में होता है। ग्लिसरॉल का उपयोग पारदर्शक साबुन, जूतों की पॉलिश, छापे की स्याही, शृंगार की सामग्रियाँ बनाने, अनेक कार्बनिक यौगिकों के बनाने में, शक्तिवर्द्धक दवा बनाने, स्नेहक के रूप में, परिरक्षक के रूप में, प्रतिहिमीभूत (Antifreeze) आदि के रूप में होता है । 

डाइइथाइल ईथर ( Diethyl Ether ) :

  • ईथर श्रेणी के सदस्यों में डाइइथाइल ईथर सबसे महत्वपूर्ण है। इसे सिर्फ ईथर भी कहा जाता है । जर्मनी के एक चिकित्सक बैलेरियस कोरडस ने सोलहवीं शताब्दी में इथाइल ऐल्कोहॉल को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म करके इसे बनाया था। विलियमसन -संश्लेषण विधि द्वारा इसे सर्वप्रथम विलियमसन ने संश्लेषित किया था । इसका उपयोग निश्चेतक (Anaesthetic agent) के रूप में होता है । यह क्लोरोफॉर्म से अच्छा निश्चेतक माना जाता है । 

क्लोरोफॉर्म (Chlorofrom) :

  • इसकी खोज सर्वप्रथम 1831 में लीबिग ने की । सन् 1848 में सिम्पसन ने बतलाया कि यह निश्चेतक (Anaesthetic Agent) है और उन्होंने चीड़ फाड़ के कामों (Surgery) में इसका उपयोग किया। श्वास के साथ इसका वाष्प लेने से बेहोशी होती है । यही कारण है कि इसका उपयोग निश्चेतक के रूप में होता है । 

आयोडोफॉर्म (lodoform ) :

  • यह पीले रंग का रवेदार पदार्थ है, जिसमें एक तरह की गन्ध होती है। यह जल में अघुलनशील परन्तु ऐल्कोहॉल एवं ईथर में घुलनशील है। यह उर्ध्वपातित होता । यह एक तीव्र कीटाणुनाशक (Bactericidal) पदार्थ है । अतः जीवाणुनाशक (Antiseptic) की तरह इसका उपयोग दवा में होता है । 

पायरीन (Pyrine ) :

  • कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCI) को पायरीन के नाम से जाना जात है, जो बिजली से लगी आग बुझाने के काम आता है। 

यूरिया (Urea ) :

  • यूरिया को सर्वप्रथम 1773 में मूत्र से प्राप्त किया गया था ।
  • वोहलर (Wohler) ने 1828 में इसे अमोनियम सायनेट से प्रयोगशाला में संश्लेषित किया था।
  • यह पहला कार्बनिक यौगिक था, जिसे प्रयोगशाला में संश्लेषित किया गया।
  • यूरिया में 46% नाइट्रोजन की मात्रा पायी जाती है ।
  • यह एक ठोस रंगहीन, गंधहीन पदार्थ है, जो जल में विलेय है।
  • यह जीव जन्तुओं के मूत्र में उपस्थित रहता है।
  • इसका मुख्य उपयोग उर्वरक के रूप में होता है।
  • इसके अतिरिक्त नाइट्रोजन गैस, बेरोनल दवा बनाने में, यूरिया प्लास्टिक बनाने में भी इसका प्रयोग किया जाता है। 

फॉर्मेलीन (Formalin ) :

  • फार्मल्डिहाइड का 40% तनु विलयन फॉर्मेलीन कहलाता है। यह एक उत्तम परिरक्षक (Preservatives) के रूप में प्रयुक्त होता है। 
  • फॉर्मिक अम्ल (Formic Acid): यह एक मोनो-कार्बोक्सिलिक अम्ल (Monocarboxylic Acid ) है । यह कार्बोक्सिलिक अम्ल श्रेणी का प्रथम सदस्य है । यह लाल चींटी (Red ants) तथा मधुमक्खी में पाया जाता है । सर्वप्रथम यह लाल चींटी को जल के साथ स्रावित करके बनाया गया था । इसी कारण इसे फॉर्मिक अम्ल कहा गया, क्योंकि लैटिन (Latin) भाषा में लाल चींटी का नाम फॉर्मिकस (Formicus) है। इसका उपयोग रोगाणुनाशी के रूप में, गठिया रोग की दवा के रूप में, रबड़ उद्योग, चमड़ा उद्योग, कपड़ा उद्योग आदि में होता है । 

ऐसीटिक अम्ल (Acetic Acid) :

  • यह अनेक फलों के रसों में मुक्त अवस्था में पाया जाता है । यह विशेष रूप से सिरके (Vinegar) में पाया जाता है। इसे व्यापारिक स्तर पर पाइरोलिग्नियस अम्ल (Pyrolignious Acid) से प्राप्त किया जाता है। सेलुलोज ऐसीटेट के रूप में इसका उपयोग फोटोग्राफिक फिल्म तथा रेयान (Rayon) बनाने में होता है । इसका 4-6% तनु घोल सिरका (Vinegar) कहलाता है । 

ऑक्जैलिक अम्ल (Oxalic Acid) :

  • यह द्वि-कार्बोक्सिलिक अम्ल (Dicarboxylic Acid) है । यह पोटैशियम लवण के रूप में प्रायः वनस्पतियों में पाया जाता है। पोटैशियम हाइड्रोजन लवण के रूप में यह ऑक्जैलिस (Oxalis) तथा रूमेक्स (Rumex) परिवार के पौधों में पाया जाता है। कैल्सियम ऑक्जैलेट ( Calcium Oxalate) के रूप में यह प्रायः पौधों के कोशिकाओं (Cells) में पाया जाता है । थोड़ी मात्रा में यह मूत्र में भी पाया जाता है । मानव गुर्दे (Kidney) में कैल्सियम ऑक्जेलेट के एकत्रित होने के कारण ही पथरी (Stone) की बीमारी पैदा होती है। फेरस ऑक्जैलेट के रूप में इसका उपयोग फोटोग्राफी में होता है। इससे कपड़े में लगे स्याही के धब्बे दूर किये जाते हैं । 

एसीटोऐसटिक अम्ल (Acetoacetic Acid )

  • यह एक रंगहीन द्रव है । यह अपघटित होकर एसीटोन व कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित हो जाती है । मधुमेह के रोगियों के मूत्र में इसकी अधिकता पायी जाती है । 

पाइरोलिग्नियस अम्ल (Pyroligneous Acid ):

  • लकड़ी के भंजक स्रवण (Destructive Distillation) के पश्चात् पाइरोलिग्नियस अम्ल प्राप्त होता है । इसमें ऐसीटिक अम्ल, ऐसीटोन एवं मिथाइल ऐल्कोहॉल उपस्थित होता है । 

साइट्रिक अम्ल (Citric Acid ) :

  • यह एक मोनो हाइड्रॉक्सी ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल है, जो साइट्रस अर्थात् खट्टे फलों (नींबू, संतरा आदि) में पाया जाता है । 

लेक्टिक अम्ल (Lactic Acid) :

  • यह एक मोनोहाइड्रोक्सी अम्ल है, जो जल में हाइड्रोजन बंधों के कारण अधिक विलेय परन्तु कार्बनिक विलायकों में अविलेय होता है । यह खट्टे दूध उपस्थित रहता है। मांसपेशियों में इसी अम्ल के एकत्रित होने के कारण थकावट का अनुभव होता है । 

टार्टरिक अम्ल (Tartaric Acid):

  • यह डाइहाइड्रॉक्सी डाइकार्बोक्सिलिक अम्ल है जो टमली तथा अंगर में 

पायरीन (Pyrine ) :

  • कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCI) को पायरीन के नाम से जाना जाता है, जो बिजली से लगी आग बुझाने के काम आता है । 

यूरिया (Urea ) :

  • यूरिया को सर्वप्रथम 1773 में मूत्र से प्राप्त किया गया था | वोहलर (Wohler) ने 1828 में इसे अमोनियम सायनेट से प्रयोगशाला में संश्लेषित किया था। यह पहला कार्बनिक यौगिक था, जिसे प्रयोगशाला में संश्लेषित किया गया। यूरिया में 46% नाइट्रोजन की मात्रा पायी जाती है। यह एक ठोस रंगहीन, गंधहीन पदार्थ है, जो जल में विलेय है । यह जीव जन्तुओं के 
  • मूत्र में उपस्थित रहता है । इसका मुख्य उपयोग उर्वरक के रूप में होता है । इसके अतिरिक्त नाइट्रोजन गैस, बेरोनल दवा बनाने में, यूरिया प्लास्टिक बनाने में भी इसका प्रयोग किया जाता है । 15. फॉर्मेलीन (Formalin ) : फार्मल्डिहाइड का 40% तनु विलयन फॉर्मेलीन कहलाता है। यह एक उत्तम परिरक्षक (Preservatives) के रूप में प्रयुक्त होता है । 

फॉर्मिक अम्ल (Formic Acid):

  • यह एक मोनो-कार्बोक्सिलिक अम्ल (Monocarboxylic Acid) है। यह कार्बोक्सिलिक अम्ल श्रेणी का प्रथम सदस्य है । यह लाल चींटी (Red ants) तथा मधुमक्खी में पाया जाता है । सर्वप्रथम यह लाल चींटी को जल के साथ स्रावित करके बनाया गया था। इसी कारण इसे फॉर्मिक अम्ल कहा गया, क्योंकि लैटिन (Latin) भाषा में लाल चींटी का नाम फॉर्मिकस (Formicus) है । इसका उपयोग रोगाणुनाशी के रूप में, गठिया रोग की दवा के रूप में, रबड़ उद्योग, चमड़ा उद्योग, कपड़ा उद्योग आदि में होता है । 

ऐसीटिक अम्ल (Acetic Acid) :

  • यह अनेक फलों के रसों में मुक्त अवस्था में पाया जाता है । यह विशेष रूप से सिरके (Vinegar) में पाया जाता है। इसे व्यापारिक स्तर पर पाइरोलिग्नियस अम्ल (Pyrolignious Acid) से प्राप्त किया जाता है। सेलुलोज ऐसीटेट के रूप में इसका उपयोग फोटोग्राफिक फिल्म तथा रेयान ( Rayon) बनाने में होता है । इसका 4-6% तनु घोल सिरका (Vinegar) कहलाता है । 

ऑक्जैलिक अम्ल (Oxalic Acid) :

  • यह द्वि-कार्बोक्सिलिक अम्ल (Dicarboxylic Acid) है । यह पोटैशियम लवण के रूप में प्रायः वनस्पतियों में पाया जाता है । पोटैशियम हाइड्रोजन लवण के रूप में यह ऑक्जैलिस (Oxalis) तथा रूमेक्स (Rumex ) परिवार के पौधों में पाया जाता है। कैल्सियम ऑक्जैलेट ( Calcium Oxalate) के रूप में यह प्रायः पौधों के कोशिकाओं (Cells) में पाया जाता है। थोड़ी मात्रा में यह मूत्र में भी पाया जाता है । मानव गुर्दे (Kidney) में कैल्सियम ऑक्जैलेट के एकत्रित होने के कारण ही पथरी (Stone) की बीमारी पैदा होती है । फेरस ऑक्जैलेट के रूप में इसका उपयोग फोटोग्राफी में होता है। इससे कपड़े में लगे स्याही के धब्बे दूर किये जाते हैं । 

एसीटोऐसटिक अम्ल (Acetoacetic Acid)

  • यह एक रंगहीन द्रव है । यह अपघटित होकर एसीटोन व कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित हो जाती है । मधुमेह के रोगियों के इसकी अधिकता पायी जाती है । 

पाइरोलिग्नियस अम्ल (Pyroligneous Acid) :

  • लकड़ी के भंजक सवण (Destructive Distillation) के पश्चात् पाइरोलिग्नियस अम्ल प्राप्त होता है । इसमें ऐसीटिक अम्ल, ऐसीटोन एवं मिथाइल ऐल्कोहॉल उपस्थित होता हैं

साइट्रिक अम्ल (Citric Acid):

  • यह एक मोनो हाइड्रॉक्सी ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल है, जो साइट्रस अर्थात् खट्टे फलों (नींबू, संतरा आदि) में पाया जाता है । 

लेक्टिक अम्ल (Lactic Acid) :

  • यह एक मोनोहाइड्रोक्सी अम्ल है, जो जल में हाइड्रोजन बंधों के कारण अधिक विलेय परन्तु कार्बनिक विलायकों में अविलेय होता है । यह खट्टे दूध में उपस्थित रहता है। मांसपेशियों में इसी अम्ल के एकत्रित होने के कारण थकावट का अनुभव होता है । 

टार्टरिक अम्ल (Tartaric Acid):

  • यह डाइहाइड्रॉक्सी डाइकार्बोक्सिलिक अम्ल है, जो इमली तथा अंगूर में उपस्थित रहता है । इसका उपयोग बैकिंग पाउडर बनाने में किया जाता है । 

बेंजीन (Benzene ) —

  • यह सभी ऐरोमैटिक यौगिकों का जन्मदाता माना जाता है । सबसे पहले फैराडे (Faraday) ने सन् 1825 ई० में इसका आविष्कार किया था। तत्पश्चात हॉफमैन (Hoffmann ) ने कोलतार के आंशिक स्रवण से प्राप्त अंशों में इसकी उपस्थिति का पता लगाया और बाद में बर्थेलोट (Berthelot ) ने ऐसीटिलीन गैस से इसका संश्लेषण किया। इसका उपयोग घोलक के रूप में, ऊनी कपड़ों की शुष्कं धुलाई में, पेट्रोल के साथ मिलाकर मोटर ईंधन के रूप में, अनेक एरोमैटिक यौगिकों के निर्माण में, विस्फोटकों के निर्माण आदि में होता है । 

नाइट्रोबेंजीन ( Nitrobenzene ) :

  • इसे मिरबेन का तेल (Oil of Mirbane) भी कहा जाता है । यह एरोमैटिक नाइट्रो यौगिक श्रेणी का प्रथम सदस्य है । यह बेंजीन के एक हाइड्रोजन परमाणु को नाइट्रो मूलक ( – NO 2 ) द्वारा प्रतिस्थापित करने पर बनता है । इसे सर्वप्रथम मिश्चरलिच (Mitscherlich) ने 1834 में प्राप्त किया था । इसका उपयोग ट्राइनाइट्रोबेंजीन (TNB) नामक विस्फोटक के निर्माण में होता है । 

ऐनिलीन (Aniline ) :

  • यह बेंजीन का एमिनो व्युत्पन्न ( Amino Derivative) है । इसे सर्वप्रथम अन्वरडार्बेन (Unverdorben) ने 1826 में नील (Indigo) को कली चूना के साथ स्रावित कर बनाया था । संग (Runge) ने अलकतरा (Coaltar) में 1834 में इसे प्राप्त किया था । फ्रिल्स्क (Fritsche) ने 1840 में नील को सान्द्र क्षार के घोल के साथ गर्म करके इसे बनाया तथा इसका नाम ऐनिलीन दिया। एनिलीन शब्द की उत्पत्ति पुर्तगाली (Portuguese) शब्द ऐनिल (Anil) से हुई है, जिसका अर्थ नील (Indigo) होता है । इसका उपयोग रबड़ उद्योग में, औषधियों के निर्माण में तथा अनेक रंजकों (Dyes) के उत्पादन में होता है । 

फिनॉल (Phenol ) :

  • यह बेंजीन का मोनोहाइड्रोक्सी व्युत्पन्न (Mono Hydroxy Derivative) हैं । इसे कार्बोलिक अम्ल (Carbolic Acid) भी कहा जाता है । इसे सर्वप्रथम 1834 में रूंगे (Runge) ने कोलतार (Coaltar) से प्राप्त किया था। यह बेंजीन केन्द्र के हाइड्रोजन का हाइड्रॉक्सिल मूलक द्वारा प्रतिस्थापन होने से प्राप्त होता है । इसका उपयोग पिक्रिक अम्ल ( विस्फोटक ), फिनॉल्फथैलीन, बेकेलाइट, सैलोल, एस्प्रीन, सैलिसिलिक अम्ल आदि के निर्माण में होता है । 

बेंजाल्डिहाइड (Benzaldehyde ) 

  • यह एक रंगहीन बादाम की गंध वाला कार्बनिक यौगिक है। इसका उपयोग स्वादिष्ट मसाला बनाने व रासायनिक क्रियाओं में किया जाता है । 

बेन्जोइक अम्ल (Benzoic Acid) :

  • यह एक ऐरोमैटिक कार्बोक्सिलिक अम्ल है । इसका प्रयोग खाद्य पदार्थों के संरक्षण में किया जाता है । 

सैलिसिलिक अम्ल (Salicylic Acid) :

  • यह एक श्वेत क्रिस्टलीय एरोमैटिक अम्ल है। इसका उपयोग दर्द निवारक दवाओं के निर्माण में होता है । 

टॉलूईन (Toluene ) :

  • इसे सर्वप्रथम टॉलू बाल्सम (Tolu Balsam) नामक एक रेजिन (Resin) के शुष्क स्राव द्वारा प्राप्त किया गया था । इसी आधार पर इसका नामकरण किया गया । इसका व्यापारिक नाम टॉलूऑल (Toluol) हैं । इसका उपयोग टी० एन० टी० (TNT) विस्फोटक के निर्माण में, घोलक के रूप में, शुष्क धुलाई (Dry Cleaning) में, सैकरीन ( Saccharin) एवं क्लोरामिन टी० (Chloramine – T) नामक दवाओं के निर्माण में तथा पेट्रोल एवं बेंजीन के साथ प्रतिहिमीभूत (Antifreeze ) के रूप में होता है । 

सैकरीन (Sacchrin ) :

  • टॉल्वीन (CH, CH) के ऑक्सीकरण से बनाया जाने वाला आर्थोसल्फाबेंजामाइड (CH, SO, CONH) चीनी से 550 गुना मीठा होता है, जिसका प्रयोग शर्बतों में तथा मधुमेह (डायबिटीज) के रोगियों के लिये चीनी की जगह किया जाता है। इसका भोज्य मान (Caloric Value) कुछ भी नहीं होता है । 

नैप्थेलीन (Naphthalene ) :

  • यह एक पॉलीन्यूक्लियर हाइड्रोकार्बन है, जिसकी गोलियाँ कीड़ों को कपड़े से दूर रखने में उपयोगी होती है। 

कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates) :

  • यह वनस्पतियों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है । ये कई प्रकार के होते हैं, जैसे: मोनोसैकराइड, डाइसैकराइड, ट्राइसैकराइड, ऑलिगो सैकराइड आदि । ये तुरन्त ऊर्जा प्रदान करने वाले कार्बनिक यौगिक होते हैं । ग्लूकोज, शर्करा, स्टार्च आदि कार्बोहाइड्रेट के प्रमुख उदाहरण है । 

नायलॉन (Nylon ) :

  • यह एक पॉलिएमाइड रेशा है । ऐडिपिक अम्ल का संघनन हेक्सामेथिलीन डाइऐमीन के साथ कराने पर नायलॉन प्राप्त होता है । इसका उपयोग मछली पकड़ने बैक्टीरिया वाली जाल, रस्सियां आदि बनाने में होता है । प्राकृतिक रेशे से भिन्न यह कवक, एवं कीड़ों का प्रतिरोधी है । यह बहुत कम जल अवशोषित करता है, जिससे इसके भींगे कपड़े आसानी से सूखते हैं । 

थाईकॉल (Thiokol) :

  • यह दूसरा कृत्रिम रबर है, जो डाइक्लोरो इथेन (Dichloro Ethane) को पॉलीसल्फाइड (Polysulphide ) के प्रतिक्रिया से बनाया जाता है । इसका उपयोग खनिज तेल ले जाने वाले पाइप बनाने में, विलायक जमा करने वाला टैंक (Solvent Storage Tank) आदि बनाने में किया जाता है । थाईकॉल रबर को ऑक्सीजन मुक्त करने वाले रसायनों के साथ मिलाकर रॉकेट इंजनों में ठोस ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है । 

बैकेलाइट (Bakelite) :

  • यह फिनॉल तथा फॉर्मेल्डिहाइड को सोडियम हाइड्रॉक्साइड की उपस्थिति में गर्म करके प्राप्त किया जाता है । इसका उपयोग रेडियो, टेलीविजन आदि के केस, बाल्टी आदि बनाने में किया जाता है । 

पॉलीथीन (Polythene ) :

  • यह एक थर्मोप्लास्टिक है, जो एथिलीन के बहुलीकरण से प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग पाइप, तार के ऊपर आवरण, पैकिंग थैलियाँ आदि बनाने में किया जाता है । 

रैक्सिन (Rexin ) :

  • यह एक कृत्रिम चमड़ा है। इसका निर्माण सेल्यूलोज नामक वनस्पति से होता है। अच्छे रैक्सिन मोटे केनवास पर पाइरोक्सिलिन का लेप देकर बनाया जाता है । 

टेफ्लॉन (Teflon ) :

  • एथिलीन के चारों हाइड्रोजन परमाणुओं को फ्लोरीन द्वारा प्रतिस्थापित करने पर टेट्राफ्लोरो एथिलीन (CF4) बनता है, जिसके बहुत से अणु बहुलीकृत होकर टेफ्लॉन नामक प्लास्टिक का निर्माण करते हैं । यह एक अदहनशील पदार्थ है । इस पर सान्द्र अम्लों एवं क्षारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । यह एक अन्यंत उपयोगी प्लास्टिक है । इसका उपयोग अनेक उपकरणों एवं यंत्रों के निर्माण में होता है । 

पॉलीविनाइल क्लोराइड (Polyvinyl Chloride) :

  • यह विनाइल क्लोराइड के बहुलीकरण से प्राप्त होता है । इसका उपयोग पतली चादरें, फिल्म, बरसाती, हवा या पानी से फूलने वाले खिलौने आदि बनाने में किया जाता है । 

नियोप्रीन (Neoprene ) :

  • यह एक संश्लिष्ट रबड़ है । यह 2 – क्लोरोब्यूटाडाइन के बहुलीकरण से प्राप्त होता है । प्राकृतिक रबड़ की तरह यह जल्दी से जलता नहीं है । इस पर तेल और विलायकों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम पड़ता है । यह उच्च ताप पर भी स्थायी होता है । इसका उपयोग विद्युत् केबुल में विद्युत् अवरोध पदार्थ के रूप में होता है । 

अश्रु गैस (Tear Gas) :

  • अश्रु गैस का प्रयोग कभी-कभी अनियंत्रित भीड़ को तीतर – बीतड़ करने के लिये किया जाता है । इस गैस के मानव नेत्र के सम्पर्क में आने से आँखों में जलन पैदा होती है, एवं अश्रु टपकने लगते हैं । एल्फा क्लोरो एसीटोफिनॉन, एक्रोलिन आदि कुछ प्रमुख अश्रु गैस हैं । इस ग्रीनस में भरकर प्रयोग किया जाता है। 

मस्टर्ड गैस ( Mustard Gas) :

  • यह एक विषैली गैस है, जिसका प्रयोग प्रथम विश्व युद्ध के समय रासायनिक हथियार (Chemical Weapons ) के रूप में किया गया । जब एथिलीन की प्रतिक्रिया सल्फर मोनोक्लोराइड के साथ करायी जाती है, तो मस्टर्ड गैस प्राप्त होती है । इसमें सरसों तेल (Mustard Oil) की तरह झांस (Smell) होती है, जिस कारण इसका यह नाम पड़ा । इसकी वाष्प त्वचा पर फफोला पैदा करती है, तथा फेफड़ों को अत्यधिक प्रभावित करती है । इसकी वाष्प रबड़ को भी पार कर जाती है । 

ल्यूइसाइट (Lewisite ) :

  • यह भी एक अत्यंत ही जहरीली गैस है, जिसका उपयोग द्वितीय विश्व युद्ध में रासायनिक हथियार (Chemical Weapons ) के रूप में किया गया था।
  • ऐसीटिलीन की प्रतिक्रिया जब आर्सेनिक ट्राइक्लोराइड (AsCI ) से निर्जल (Anhydrous) एल्युमीनियम क्लोराइड (AICI) की उपस्थिति में करायी जाती है, तो ल्यूइसाइट नामक एक विषैली गैस बनती है। 

क्लोरोपिकिन (Chloropicrin):

  • यह एक विषैली गैस है, जिसका प्रयोग युद्ध काल में किया जाता है।  

मिथाइल आइसोसायनेट ( Methyl Isocynate) :

  • यह एक विषैली गैस है।
  • भोपाल में कीटनाशक दवा बनाने वाली कम्पनी यूनियन कार्बाइड कारखाने से इसी गैस का रिसाव दुर्घटनावश हुआ था । 

मार्श गैस (Marsh Gas) :

  • मिथेन को मार्श गैस के नाम से जाना जाता है।
  • मिथेन का ऐसा नामकरण इसके दलदली जगहों में पाये जाने के कारण हुआ है ।

क्लेथरेट (Clathret ) :

  • यह समुद्र की तलहटी में भारी मात्रा में जमा ईंधन है, जो मूल रूप से पानी के अणुओं ने फँसी मिथेन  गैस है।
  • सैकड़ों वर्ष पहले जैविक प्रक्रिया से क्लैथरेट का निर्माण हुआ है।
  • इसका उपयोग रेफ्रिजरेटरों में प्रशीतक, वातानुकूलित संयंत्रों, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग, ऑप्टिकल उद्योग तथा फार्मेसी उद्योग में व्यापक रूप से होता है । 

गोबर गैस (Gobar Gas) :

  • गीले गोबर के सड़ने से ज्वलनशील मिथेन गैस बनती है, जो वायु की उपस्थिति में सुगमता से जलती है ।
  • गोबर गैस संयंत्र में गोबर से गैस बनने के पश्चात शेष बचे पदार्थ का उपयोग कार्बनिक खाद के रूप में किया जाता है । 

द्रवीभूत प्राकृतिक गैस (Liquified Natural Gas) : (LPG)

  • यह प्राकृतिक गैसों का द्रवित रूप है ।
  • इसमें मुख्यतया मिथेन रहती है, अर्थात इसका मुख्य संघटक मिथेन है । 

एल० एस० डी० (L.S.D.) :

  • इसका पूरा नाम लाइसर्जिक अम्ल डाइथाइलेमाइड है ।
  • यह एक भ्रम उत्पन्न करने वाली दवा है । 

एस्पीरिन (Aspirin ) :

  • एसीटाइल सैलिसिलिक अम्ल को एस्पीरिन कहा जाता है।
  • यह एक ज्वरनाशी तथा पीड़ानाशी दवा है । 

पैरल्डिहाइड (Paraldehyde) :

  • इसका उपयोग नींद लाने वाली दवा के रूप में होता है । 

यूरोट्रोपीन (Urotropine ) :

  • रासायनिक नाम – हेक्सामिथिलीन टेट्राऐमीन (Hexamethlene Tetramine)
  • इसका उपयोग मूत्र रोग की दवा के रूप में होता है। 

क्लोरेटोन (Chloretone) :

  • इसका उपयोग पहाड़ी यात्रा या समुद्री यात्रा में चक्कर आने से रोकने की दवा के रूप में होता है । 

गेमेक्सेन ( Gammexene) :

  • रासायनिक नाम – बेंजीन हेक्साक्लोराइड (Benzene Hexachloride या B. H. C. ) है ।
  • यह एक प्रबल कीटाणुनाशक है । 

क्लोरल (Chloral) :

  • रासायनिक नाम  : ट्राइ-क्लोरो-ऐसीटल्डिहाइड
  • मुख्य उपयोग डी० डी० टी० (D.D.T.) बनाने में किया जाता है। 

डी० डी० टी० (D.D.T.) :

  • इसका पूरा नाम डाइक्लोरो डाइफिनाइल ट्राइक्लोरोइथेन है ।
  • यह एक प्रमुख कीटाणुनाशक (Germicide) है ।
  • इसे क्लोरल से बनाया जाता है।

भंजन (Cracking) :

  • उच्च अणुभार वाले हाइड्रोकार्बन के अणुओं को ताप द्वारा निम्न अणुभार वाले अणुओं में तोड़ने की प्रक्रिया को भंजन कहते हैं ।