Optics

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Table of Contents

प्रकाश (Light) 

  • प्रकाश, वैद्युतचुंबकीय तरंग रूप में संचारित होने वाली ऊर्जा है, जो वस्तुओं को दृश्यमान बनाती है। 
  • प्रकाश स्पेक्ट्रम (तरंगदैर्ध्य 400 से 700 nm) किसी वस्तु का रंग क्या होगा, यह वस्तु द्वारा परावर्तित प्रकाश स्पेक्ट्रम के भाग पर निर्भर करता है। 
  • पत्तियों का हरा दिखाई पड़ना और गुलाब का लाल दिखना इसलिये होता है, क्योंकि पत्तियाँ अपने पर पड़ने वाले प्रकाश के सभी भाग को अवशोषित कर केवल हरे रंग को, जबकि गुलाब केवल लाल रंग के प्रकाश को परावर्तित करता है।
प्रकाश स्पेक्ट्रम
रंग तरंगदैर्ध्य (nm में)
V-VOILET (बैंगनी) 380-450
B-BLUE (नीला) 450-495
G-GREEN (हरा) 495-570
Y-YELLOW (पीला) 570-590
O-ORANGE (नारंगी) 590-620
R-RED (लाल) 620-750

 

  • यदि वस्तु द्वारा प्रकाश स्पेक्ट्रम का सभी भाग अवशोषित कर लिया जाए और कोई भी भाग परावर्तित न हो तो वस्तु काली दिखाई पड़ती ह। 
  • यही कारण है कि जब हम किसी वस्तु पर उसके रंग के अलावा अन्य किसी रंग का एक वर्णी प्रकाश डालें तो वह काली दिखाई पड़ती ह
    • जैसे-पीले प्रकाश से पत्तियाँ काली दिखाई पड़ती हैं। 
  • वास्तव में ‘काला’ कोई रंग नहीं है बल्कि यह रंगों की अनुपस्थिति को इंगित करता है। इसी प्रकार ‘सफेद’ सभी रंगों की उपस्थिति को दर्शाता है।
  • लाल, हरे व नीले रंग  (RGB) के प्रकाश के मिश्रण से श्वेत प्रकाश उत्पन्न होता है। 
  • वास्तव में किसी भी रंग को इन तीनों रंगों के समुचित मिश्रण से बनाया जा सकता है।
    • अतः लाल, हरा व नीला ‘प्राथमिक या मूल रंग’ कहलाते हैं। वे रंग जो अन्या रंगों के मिश्रण से नहीं बनाया जा सका उन्हें प्रथमिक रंग कहते हैं। 
    • अन्य रंगों कोगौण या द्वितीयक रंग कहते हैं। |

प्रदीप्त (Luminous), अप्रदीप्त (Non-Luminous) और पारदर्शी (Transparent)

  • किसी वस्तु के दिखाई पड़ने हेतु उस वस्तु द्वारा प्रकाश का परावर्तन आवश्यक है। 
  • प्रदीप्त (Luminous) : जब वस्तु में अपना स्वयं का प्रकाश होता है तो वस्तु अँधेरे में चमकती है। जैसे- सूर्य, बल्ब, मोमबत्ती इत्यादि। ऐसी वस्तु को ‘प्रदीप्त वस्तु‘ कहते हैं। 
  • Non- Luminous : इनके अलावा अन्य वस्तुएँ जो प्रकाश की उपस्थिति में ही दृश्यमान होती हैं, ‘अप्रदीप्त वस्तुएँ’ कहलाती हैं। 
  • Transparent : कुछ अप्रदीप्त वस्तुएँ ऐसी भी होती हैं, जिनसे प्रकाश आर-पार चला जाता है। ऐसी वस्तुओं को ‘पारदर्शी वस्तुएँ’ कहते हैं, जैसे शीशा।

 

प्रकाश की चाल (Speed of Light) 

  • प्रकाश निर्वात (Vaccum) और पारदर्शी माध्यमों में संचरण (गति) कर सकता है। 
  • इनमें प्रकाश की चाल भिन्न-भिन्न होती है। प्रकाश की चाल निर्वात में सर्वाधिक होती है। 
  • निर्वात तथा विभिन्न माध्यमों में प्रकाश की चाल निम्नवत है
  • निर्वात – 2.99 x 108 मीटर/सेकंड = 3 x 108 मी./से. 
  • सूर्य से पृथ्वी तक पहुँचने में प्रकाश द्वारा लिया गया समय लगभग 8 मिनट 20 सेकंड के बराबर है।
  • चंद्रमा से परावर्तित प्रकाश को पृथ्वी तक आने में 1.28 सेकंड का समय लगता है। 
  • जब प्रकाश तरंग, एक माध्यम से दूसरे में जाती है तो प्रकाश का तरंगदैर्ध्य बदल जाता है, जो प्रकाश की चाल बदलने का कारण है। 
  • प्रकाश की आवृत्ति प्रकाश स्रोत पर निर्भर करती है और माध्यम बदलने पर भी उसी रूप में बनी रहती है।

 

प्रकाश की दोहरी प्रकृति (Dual Nature of Light)

  • प्रकाश कभी कणों की भाँति व्यवहार करता है तो कभी तरंगों की भाँति। इसी कारण प्रकाश को दोहरी प्रकृति का माना जाता है।
  • प्रकाश का कणिका सिद्धांत:  सर्वप्रथम दकार्ते ने 1637 में इसकी व्याख्या की, जिसे बाद में न्यूटन ने और विकसित किया। प्रकाश के कणिका सिद्धांत का श्रेय प्रायः न्यूटन को ही दिया जाता है।
  • प्रकाश तरंग गति सिद्धांतः  हाइगेंस ने 1678 में प्रकाश के तरंग गति सिद्धांत को प्रस्तुत किया।
  • प्रकाश का क्वांटम सिद्धांतः आइंसटीन ने 1905 में क्वांटम सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार प्रकाश ऊर्जा बंडलों, जिन्हें क्वांटा कहते हैं, के रूप में होता है। प्रकाश के इन बंडलों को ‘फोटॉन कहा गया।  इस सिद्धांत ने प्रकाश के कण संबंधी गुणों एवं तरंग प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित किया।

 

प्रकाश का परावर्तन (Reflection of Light)

  • प्रकाश किरण का किसी चिकने पृष्ठ  से टकराकर किसी कोण पर मुड़ जाना, प्रकाश का परावर्तन कहलाता है। 
  • जिस पृष्ठ से टकराकर प्रकाश किरण मुड़ती है उसे परावर्तक पृष्ठ कहते हैं।
  • परावर्तक पृष्ठ पर आने वाली किरण को ‘आपतित किरण’ एवं परावर्तक पृष्ठ से दूर जाने वाली किरण को परावर्तित किरण कहते हैं।
  • आपतित किरण पृष्ठ के जिस बिंदु पर पड़ती है उस बिंदु पर परावर्तक पृष्ठ से समकोण बनाती रेखा को ‘अभिलंब‘ कहते हैं। 
  • अभिलंब और आपतित किरण के बीच का कोणआपतन कोण’ (i) एवं अभिलंब और परावर्तित किरण के बीच का कोण परावर्तन कोण’ (r) कहलाता है। 

परावर्तन के नियम (Laws of Reffection)

  • आपतन कोण (i) परावर्तन कोण (r)  के बराबर होता है।
  • आपतित किरण, दर्पण के आपतन बिंदु पर अभिलंब तथा परावर्तित किरण सभी एक ही तल में होते हैं।
  • परावर्तन के नियम सभी परावर्तक पृष्ठों पर समान रूप से लागू होते हैं। 

 

दर्पण (Mirror) 

  • वह वस्तु जिसमें परावर्तक पृष्ठ इस प्रकार का हो कि परावर्तित किरण आपतित किरण की प्रतिकृति हो, ‘दर्पण’ कहलाती है। 
  • यदि परावर्तक पृष्ठ समतल हो तो दर्पण को ‘समतल दर्पण‘ कहते हैं और यदि परावर्तक पृष्ठ गोलीय हो तो दर्पण को ‘गोलीय दर्पण‘ कहते हैं। 

समतल दर्पण 

  • समतल दर्पण से प्राप्त प्रतिबिंब सदैव आभासी तथा सीधा होता है। 
  • प्रतिबिंब का आकार वस्तु के आकार के बराबर होता है। 
  • प्रतिबिंब दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है, जितनी दूरी पर दर्पण के सामने रखा हो। 
  • किसी वस्तु का पूरा प्रतिबिंब देखने हेतु दर्पण की ऊँचाई वस्तु की ऊँचाई का आधा होना आवश्यक है। 
  • यदि कोई वस्तु दर्पण के सापेक्ष V चाल से गतिमान हो तो वस्तु और प्रतिबिंब की सापेक्ष गति 2V होगी।
  • यदि कोई वस्तु परस्पर 90° कोण पर रखे समतल दर्पणों के बीच में रखी हो तो वस्तु के कुल प्राप्त प्रतिबिंबों की संख्या = 3, वहीं यदि दोनों दर्पण समानांतर हो तो प्राप्त प्रतिबिंबों की संख्या अनंत होगी।

 

  •  किरण आरेख (ray diagram) में किसी बिंदु से आती दो किरणें परावर्तित (या अपवर्तित) होकर जिस बिंदु पर मिलती हैं या मिलती प्रतीत होती हैं, वस्तु का प्रतिबिंब वहीं प्राप्त होता है।
    • जब किरणें वास्तव में मिलती हैं, तो वास्तविक प्रतिबिंब (Real Image), प्राप्त होता है।
    • जब किरणें मिलती हुई प्रतीत होती हैं तो आभासी प्रतिबिंब (Virtual Image) प्राप्त होता है।
    • आभासी प्रतिबिंब को पर्दे पर प्राप्त नहीं किया जा सकता, जबकि वास्तविक प्रतिबिंब पर्दे पर प्राप्त होता है।
  • समतल दर्पण द्वारा प्राप्त प्रतिबिंब पार्श्व-परिवर्तित (Lateral inverse) होता है।
    • यही कारण है कि एंबुलेंस पर ठीक सामने AMBULANCE को पार्श्व-परिवर्तित स्वरूप में लिखा गया होता है जिससे कि आगे जा रही गाड़ियों के रियर व्यू मिरर (Rear View Mirror) में देखकर आसानी से पढ़ा जा सके।
    • यदि समतल दर्पण के सामने अपने बाएं कान को दाएं हाथ से छुओगे तो दर्पण में दाएं कान को बाएं हाथ से छुआ है ऐसा दिखेगा।

            ice screenshot 20240211 200644              

समतल दर्पण के उपयोग 

  • दैनिक जीवन में समतल दर्पण का उपयोग आइने के रूप में सर्वाधिक किया जाता है। 
  • बहुदर्शी (Kaleidoscope) और परिदर्शी (Periscope) में समतल दर्पण का उपयोग किया जाता है। 
  • परिदर्शी का प्रयोग बंकर में छिपे सैनिकों एवं पनडुब्बी में पानी की सतह से बाहर देखने के लिये किया जाता है। 

 

गोलीय दर्पण (Spherical Mirror)

  • गोलीय दर्पण वास्तव में किसी वृहद् गोले का भाग ही है, जिनका एक पृष्ठ दर्पण की तरह कार्य करता है।
  • अवतल दर्पण’ (Concave Mirror)/ नतोदर दर्पण  : यदि गोलीय दर्पण का परावर्तक पृष्ठ अंदर की ओर वक्रित हो तो दर्पण को ‘अवतल दर्पण’ (Concave Mirror) कहते हैं
  • ‘उत्तल दर्पण’ (Convex Mirror)/ उन्नतोदर दर्पण : यदि परावर्तक पृष्ठ बाहर की ओर वक्रित हो तो दर्पण को ‘उत्तल दर्पण’ (Convex Mirror) कहते हैं। यदि दर्पण में परावर्तन बाहरी अर्थात् उभरी हुई सतह को रजतित (चमकीला ) करके होता है तो दर्पण उत्तल (उन्नतोदर दर्पण) कहलाता है।
  • ध्रुवः (Pole- P) : गोलीय दर्पण के परावर्तक पृष्ठ के केंद्र को ‘ध्रुव’ कहते हैं।
  • वक्रता केंद्र (center of curvature – C)गोलीय दर्पण का परावर्तक पृष्ठ जिस वृहद् गोले का भाग है, उसके केंद्र को गोलीय दर्पण का ‘वक्रता केंद्र’ कहते हैं। इसे C से दर्शाते हैं।
  • वक्रता त्रिज्या ( radius of curvature – R): गोलीय दर्पण का परावर्तक पृष्ठ जिस वृहद् गोले  का भाग है, उसकी त्रिज्या ‘वक्रता त्रिज्या’ कहलाती है। यह ध्रुव (P) और वक्रता केंद्र (C) के बीच की दूरी है। इसे R से दर्शाते हैं।
  • मुख्य अक्ष (principal axis) गोलीय दर्पण के ध्रुव तथा वक्रता त्रिज्या से गुजरने वाली सीधी रेखा को ‘मुख्य अक्ष’ कहते हैं। वास्तव में यह दर्पण के ध्रुव पर अभिलंब होता है। 
  • फोकस (focus – F) : गोलीय दर्पण के मुख्य अक्ष के समानांतर आती किरणें परावर्तित होकर मुख्य अक्ष के जिस बिंदु पर केंद्रित होती हैं (अवतल दर्पण के लिये) या जिस बिंदु से आती हुई प्रतीत होती हैं (उत्तल दर्पण के लिये) उसे गोलीय दर्पण का ‘फोकस बिंदु’ (Focus Point) कहते हैं। 
  • फोकस दूरी (focus distance) : फोकस बिंदु और ध्रुव के बीच की दूरी को ‘फोकस  दूरी’ कहते हैं।

 

अवतल दर्पण द्वारा प्रतिबिंब बननाः 

  • अवतल दर्पण से बने प्रतिबिंब की प्रकृति, स्थिति एवं आकार बिंदु P, F तथा C के सापेक्ष वस्तु की स्थिति पर निर्भर करते हैं। 
  • वस्तु की विभिन्न स्थितियों के लिये अवतल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंब की स्थिति, आकार एवं प्रकृति निम्नलिखित हैं

                 ice screenshot 20240212 073908

वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
अनंत पर फोकस F पर अत्यधिक छोटा , बिंदु आकार वास्तविक एवं उल्टा (real and inverted)

 

               ice screenshot 20240212 073924     

वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
C से परे  F तथा  C के बिच  छोटा वास्तविक एवं उल्टा

real and inverted

 

(c)                        ice screenshot 20240212 073948

वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
C पर  C पर समान आकार वास्तविक एवं उल्टा

real and inverted

(d)                     ice screenshot 20240212 074014

वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
C तथा  F के बीच  C से परे  आवर्धित (बड़ा) वास्तविक एवं उल्टा

real and inverted

 

(e)                 ice screenshot 20240212 074036

वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
F पर   अनंत पर  अत्यधिक आवर्धित वास्तविक एवं उल्टा

real and inverted

 

(f)                   ice screenshot 20240212 074056

वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
P तथा  F के बीच दर्पण के पीछे  आवर्धित (बड़ा) आभासी तथा सीधा

virtual and erect

 

 

अवतल दर्पणों का उपयोग (Uses of Concave Mirrors) 

  • टॉर्च, सर्चलाइट एवं वाहनों के हेडलाइट्स में प्रकाश का शक्तिशाली समानांतर किरण पुंज प्राप्त करने में। 
  • शेविंग दर्पणों (Shaving Mirror) में। 
  • दंत विशेषज्ञ (Dentist) द्वारा दाँतों का बड़ा प्रतिबिंब देखने के लिये। 
  • सौर भट्टी (Solar Furnace) में सूर्य के प्रकाश को केंद्रित करने के लिये। 

 

उत्तल दर्पण द्वारा प्रतिबिंब बननाः 

  • उत्तल दर्पण द्वारा बना प्रतिबिंब वस्तु की दो स्थितियों- वस्तु की अनंत दूरी पर स्थिति एवं वस्तु की निश्चित दूरी पर स्थिति, पर निर्भर करता है। 
  • वस्तु की दोनों स्थितियों के लिये उत्तल दर्पण द्वारा प्राप्त प्रतिबिंब की स्थिति, आकार एवं प्रकृति निम्नलिखित हैं

       ice screenshot 20240212 074702

वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
अनंत पर फोकस F पर 

दर्पण के पीछे

अत्यधिक छोटा 

बिंदु के आकार का

आभासी तथा सीधा

virtual and erect

 

              ice screenshot 20240212 074716

वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
अनंत तथा दर्पण के ध्रुव P के बीच P तथा F के बीच दर्पण के पीछे छोटा आभासी तथा सीधा

virtual and erect

 

उत्तल दर्पणों के प्रयोग (Uses of Convex Mirror) 

  • वाहनों के पश्च-दृश्य दर्पणों (Side-View Mirrors) में उत्तल दर्पण का प्रयोग करते हैं, क्योंकि यह सदैव सीधा प्रतिबिंब बनाता है। इससे ड्राइवर पीछे से आ रहे ट्रैफिक एवं पीछे के विस्तृत क्षेत्र को देख पाता है। 
  • यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि वाहन के अंदर चालक के पास वाहन के ठीक पीछे देखने के लिये सामान्यतः समतल दर्पण का प्रयोग होता है जिसे (Rear View Mirror) कहते हैं जबकि बाहर की ओर दोनों किनारों पर पीछे देखने के लिये उत्तल दर्पण का प्रयोग होता है। जिसे (Side View Mirror) कहते हैं। 
  • इनका दृष्टि क्षेत्र भी बहुत अधिक होता है। इसलिये सड़कों के अंधे मोड़ों (Blind Turns) पर भी प्रयोग किया जाता है। 
  • स्ट्रीट लैंप्स (Street Lamps) में उत्तल दर्पण का प्रयोग किया जाता है क्योंकि ये प्रकाश को विस्तृत क्षेत्र में फैला देते हैं। 

 

दर्पण सूत्र (Mirror Equation)

  • गोलीय दर्पण (अवतल एवं उत्तल दर्पण) में इसके ध्रुव से वस्तु (बिंब) की दूरी, बिंब दूरी (u) कहलाती है। 
  • ध्रुव से प्रतिबिंब की दूरी, प्रतिबिंब दूरी (v) कहलाती है।
  •  ध्रुव से मुख्य फोकस की दूरी, फोकस दूरी (f) कहलाती है। 
  • इन तीनों राशियों के बीच संबंध को दर्पण सूत्र द्वारा निम्न प्रकार से व्यक्त करते हैं।

ice screenshot 20240212 075407

गोलीय दर्पणों के लिये चिह्न परिपाटी (Sign  convention for spherical mirrors)

  • परिपाटी के अनुसार बिंब अर्थात् वस्तु सदैव दर्पण के बाई ओर रखा जाता है। इसका अर्थ है कि दर्पण पर बिंब से प्रकाश बाईं ओर से आपतित होता है। 
  • लेंस के लिये भी चिह्न परिपाटी दर्पण की चिह्न परिपाटी के समान हाती है। 
  • दर्पणों में सभी दूरियाँ उनके ध्रुवों से मापी जाती हैं। जबकि लेंस में ये माप प्रकाशिक केंद्र से करते हैं। 
  • उत्तल लेंस की फोकस दूरि धनात्मक तथा अवतल लेंस की फोकस दूरी ऋणात्मक होती है।

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आवर्धन (Magnification)

  • वह आपेक्षिक विस्तार जिससे यह ज्ञात हो कि प्रतिबिंब वस्तु की अपेक्षा कितना गुना आवर्धित है, गोलीय दर्पण का आवर्धन कहलाता है।
  • The relative extent by which it is known how many times the image is magnified relative to the object is called magnification of a spherical mirror.
  • आवर्धन के मान में ऋणात्मक चिह्न दर्शाता है कि प्रतिबिंब वास्तविक है। 
  • आवर्धन के मान में धनात्मक चिह्न दर्शाता है कि प्रतिबिंब आभासी(virtual) है। 

ice screenshot 20240212 080743

 

प्रकाश का अपवर्तन (Refraction of Light) 

  • जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में तिरछा प्रवेश करता है, तो दूसरे माध्यम में इसके संचरण की दिशा परिवर्तित हो जाती है। इस परिघटना को प्रकाश का ‘अपवर्तन‘ कहते हैं।

New Doc 2021 06 30 13.47.15 1

  • प्रकाश के अपवर्तन का कारण विभिन्न पारदर्शी माध्यमों में प्रकाश की चाल का अलग-अलग होना है।  
  • जब प्रकाश विरल माध्यम से सघन में जाता है तो प्रकाश किरण अभिलंब की ओर झुक जाती है
  • जब सघन से विरल में जाता है तो प्रकाश किरण अभिलंब से दूर हट जाती है

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  • कांच के स्लैब के एक ओर आपतित किरण अपवर्तन के पश्चात जब दूसरी ओर से बाहर निकलती है तो यह आपतित किरण के समानान्तर हो जाती है। ऐसा किरण के विरल माध्यम से सघन माध्यम तथा पुनः सघन माध्यम से विरल माध्यम में अपवर्तन ही वजह से होता है।

    ice screenshot 20240212 081403

 

अपवर्तन के नियम (Laws of Refraction) 

  • आपतित किरण, अपवर्तित किरण तथा दोनों माध्यमों को पृथक् करने वाले पृष्ठ के आपतन बिंदु पर अभिलंब, एक ही तल में होते हैं। 
  • आपतन कोण की ज्या (Sine) तथा अपवर्तन कोण की ज्या का अनुपात स्थि होता है। इस नियम को स्नेल का अपवर्तन नियम (snell’s law of refraction) भी कहते हैं।

Sin i/sin r  = μ

snell law

  • इस स्थिरांक (μ) के मान को दूसरे माध्यम का पहले माध्यम के सापेक्ष अपवर्तनांक कहते हैं। 
  •  दो माध्यमों के युग्म के लिये अपवर्तनांक का मान दोनों माध्यमों में प्रकाश की चाल पर निर्भर करता है। 

अपवर्तनांक (Refractive Index) 

  • किसी माध्यम का निर्वात के सापेक्ष अपवर्तनांक, निरपेक्ष अपवर्तनांक (absolute refractive index) कहलाता है। 
  • यदि निर्वात में प्रकाश की चाल c है तथा किसी माध्यम में प्रकाश की चाल v है तो उस माध्यम का अपवर्तनांक होगा

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  • किसी माध्यम का निरपेक्ष अपवर्तनांक को ही उसका अपवर्तनांक कहते हैं। 
  • दो माध्यमों के संदर्भ में ‘विरल माध्यम’ और ‘सघन माध्यम’ से अर्थ क्रमशः ‘प्रकाशिक विरल माध्यम’ और ‘प्रकाशिक सघन माध्यम’ है। यह आवश्यक नहीं है कि प्रकाशिक सघन माध्यम का द्रव्यमान घनत्व भी अधिक हो। 
  • अधिक अपवर्तनांक वाला माध्यम दूसरे की अपेक्षा प्रकाशिक सघन है। 

 

प्रकाश के अपवर्तन के उदाहरण  

  • जल से भरे किसी बर्तन अथवा तालाब आदि की पेंदी वास्तविक गहराई से कुछ ऊपर उठी हुई प्रतीत होती है। 
  • जल के अंदर पड़ी वस्तु या मछली की आभासी गहराई वास्तविक गहराई से कम प्रतीत होती है।
  • पानी से भरे काँच के ग्लास में रखा नींबू पार्श्व (Side) से देखने पर अपने वास्तविक आकार से बड़ा दिखाई पड़ता है। 
  • प्रकाश के अपवर्तन के कारण ही सूर्य, वास्तविक सूर्योदय से कुछ पहले ही दिखाई देने लगता है तथा वास्तविक सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक दिखाई देता है। वास्तविक सूर्यास्त एवं आभासी सूर्यास्त में लगभग 2 मिनट का अंतर होता है। 
  •  सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य की आकृति चपटी या अंडाकार प्रतीत होती है। 
  • वायुमंडल में भिन्न-भिन्न घनत्व की परतें पाई जाती हैं। रात्रि के समय तारों से आता प्रकाश इससे गुजरता हुआ अपवर्तित होता रहता है। इस कारण तारे टिमटिमाते (Twinkling) प्रतीत होते हैं।

 

क्रांतिक कोण  (Critical Angle)

  • जब प्रकाश किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती है तो अपवर्तित होकर अभिलंब से दूर हट जाती है। किंतु सघन माध्यम में आपतन कोण का मान बढ़ने पर अपवर्तन कोण भी बढ़ता है।
  • किसी सघन माध्यम में वह विशेष आपतन कोण, जिसके लिये विरल माध्यम में अपवर्तन कोण 90° हो, क्रांतिक कोण कहलाता है।
  • सघन माध्यम का अपवर्तनांक(refractive index) ज़्यादा होने पर क्रांतिक कोण का मान कम होता है।

New Doc 2021 06 30 13.31.11 1

कुछ माध्यमों के अपवर्तनांक और क्रांतिक कोण
माध्यम अपवर्तनांक

(refractive index)

क्रांतिक कोण

critical angle

पानी 1.33 48.5
क्राउन काँच 1.52 41.1
फ्लिट काँच 1.65 37.4
हीरा 2.42 24.4

 

पूर्ण आंतरिक परावर्तन (Total Internal Reflection) 

  • सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाने वाली प्रकाश किरण के लिये यदि आपतन कोण क्रांतिक कोण से अधिक हो तो किरण सघन माध्यम के पृष्ठ से परावर्तित हो सघन माध्यम में ही लौट आती है। इस परिघटना को ‘पूर्ण आंतरिक परावर्तन’ कहते हैं।

New Doc 2021 06 30 13.31.11 2

पूर्ण आंतरिक परावर्तन की शर्तेः 

  1. प्रकाश किरणें सघन माध्यम से विरल माध्यम में जा रही हों।
  2. सघन माध्यम में आपतन कोण, क्रांतिक कोण से बड़ा हो। 

 

पूर्ण आंतरिक परावर्तन के उदाहरण

  •  हीरे का चमकना
  • काँच का चटका हुआ भाग चमकीला प्रतीत होता है।  
  • मरीचिका (Mirage) : मरुभूमि में गर्मी के दिनों में दूर किसी स्थान पर पानी के होने का भ्रम होता है, जिसे ‘मरीचिका’ कहते हैं, यह प्रकाश के पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण होता है।
    • मरुस्थलों में गर्म ज़मीन के संपर्क में हवा गर्म रहती है और ऊपर का ओर हवा की परतें ठंडी रहती हैं। ठंडी परतें सघन माध्यम(dense medium) की तरह और गर्म वायु की परतें विरल माध्यम(rare medium) की तरह कार्य करती हैं।
    • जब सघन वायु से प्रकाश किरण विरल वायु में प्रवेश करती है तो दूर स्थित किसी दर्शक के लिये आपतन कोण क्रांतिक कोण से ज़्यादा हो जाता है और पूर्ण आंतरिक परावर्तन होता है, जिससे पानी की सतह जैसे परावर्तन का आभास होता है। 

 

प्रकाशिक तंतु  (Optical Fiber)

  • Optical fiber is the technology associated with data transmission using light pulses travelling along with a long fiber which is usually made of plastic or glass.
  • प्रकाशिक तंतु उच्च गुणवत्ता वाले काँच या क्वार्ट्ज तंतुओं से बनाया जाता है। प्रत्येक तंतु में एक क्रोड (Core) तथा आवरण (Cladding) होता है। 
  • क्रोड का अपवर्तनांक, आवरण के अपवर्तनांक से ज़्यादा होता है।
  • The fiber optical cable uses the application of total internal reflection of light.
  • प्रकाशिक तंतु में जब प्रकाश प्रवेश करता है तो उसका पूर्ण आंतरिक परावर्तन होता है और प्रकाश तंतु के दूसरे सिरे तक बिना क्षय के पहुँच पाता है। प्रकाशिक तंतु के इसी गुण के कारण विभिन्न संचार संकेतों को लंबी दूरी तक भेजने हेतु प्रकाशिक तंतु का प्रयोग करते हैं। इसमें संचार सिग्नल की ऊर्जा क्षय नगण्य होती है तथा सिग्नल की गुणवत्ता भी न्यूनतम प्रभावित होती है। 
  • मानव शरीर के आंतरिक भागों के चिकित्सीय निरीक्षण हेतु एंडोस्कोप का प्रयोग करते हैं। 
  • एंडोस्कोप प्रकाशीय तंतु पर आधारित प्रणाली है।

ice screenshot 20210630 131757

लेंस (Lens)

  • दो पृष्ठों से घिरा हुआ कोई पारदर्शी माध्यम, जिसके एक या दोनों पृष्ठ गोलीय हैं, ‘लेंस’ कहलाता है। इसका अर्थ यह है लेंस का कम से कम एक पृष्ठ गोलीय होता है।
  • किसी लेंस के उभरे गोलीय पृष्ठ को उत्तल (Convex) तथा धंसे गोलीय पृष्ठ को ‘अवतल (Concave) पृष्ठ’ कहते हैं। 
  • लेंस के दो पृष्ठों में उत्तल, अवतल और समतल पृष्ठों के अलग-अलग संयोजनों से विभिन्न प्रकार के लेंस प्राप्त किये जा सकते हैं, जो निम्नलिखित हैं

New Doc 2021 06 30 11.30.00 3

काँच का अपवर्तनांक

  • काँच का अपवर्तनांक वायु से ज्यादा होता है। अतः लेंस से वायु में जाने पर प्रकाश का अपवर्तन होता है और लेंस विशिष्ट व्यवहार प्रदर्शित करता है। यदि लेंस को वायु की जगह किसी अन्य तरल में डुबोया जाए, जिसका अपवर्तनांक वायु से अलग हो तो लेंस के व्यवहार में परिवर्तन आएगा। 
  • यदि लेंस को काँच के समान अपवर्तनांक वाले तरल में डुबोया जाए तो लेंस समतल प्लेट की भाँति व्यवहार करेगा। इसकी फोकस दूरी अनंत एवं क्षमता शून्य हो जाएगी। 
  •  यदि लेंस को काँच से अधिक अपवर्तनांक वाले तरल में डुबोया जाए तो लेंस की प्रकृति बदल जाएगी अर्थात् अवतल लेंस उत्तल की तरह और उत्तल लेंस अवतल की तरह व्यवहार करेगा। 
  • जल में डूबे हुये वायु के बुलबुले की ठीक वही स्थिति होगी, जो काँच से अधिक अपवर्तनांक वाले तरल में डूबे उत्तल लेंस  की। यह बुलबुला अवतल लेंस की भाँति व्यवहार करता है। 

 

उत्तल लेंस (Convex Lens)

  • द्वि-उत्तल लेंस (Bi-Convex Lens) को ही ‘उत्तल लेंस’ कहते हैं अर्थात् वह लेंस जो बाहर की ओर उभरे दो गोलीय पृष्ठों से घिरा हो, ‘उत्तल लेंस’ कहलाता है। 
  • यह किनारों की अपेक्षा बीच में मोटा होता है। 
  • यह प्रकाश किरणों को अभिसरित (converges)करता है। अतः इसे अभिसारी लेंस’ (Converging lens) भी कहते हैं।

New Doc 2021 06 30 11.30.00 1

अवतल लेंस (Concave Lens)

  • द्वि-अवतल लेंस या उभयावतल लेंस (Bi-concave lens) को ही ‘अवतल लेंस’ कहते हैं अर्थात् वह लेंस जो अंदर की ओर वक्रित दो गोलीय पृष्ठों से घिरा हो, ‘अवतल लेंस’ कहलाता है। 
  • यह किनारों की अपेक्षा बीच में पतला होता है। 
  • यह प्रकाश किरणों को अपसारित(diffracts) करता है। अतः इसेअपसारी लेंस’ (Diverging lens) भी कहते हैं।

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वक्रता केंद्र (Center of Curvature) 

  • लेंस के गोलीय पृष्ठ जिन वृहद् गोलों के भाग हैं, उनके केंद्रों को लेंस का ‘वक्रता केंद्र’ कहते हैं। 
  • इसे ‘C’ द्वारा दर्शाते हैं, क्योंकि लेंस के दो वक्रता केंद्र होते हैं। अतः इन्हें C1, तथा C2, द्वारा निरूपित किया जाता है।

 

 मुख्य अक्ष(Principal axis). 

  • किसी लेंस के दोनों वक्रता केंद्रों से गुजरने वाली एक काल्पनिक सीधी रेखा लेंस का मुख्य अक्ष कहलाती है।

 

प्रकाशिक केंद्र (Optical Center) 

  • लेंस का केंद्रीय बिंदु इसका प्रकाशिक केंद्र कहलाता है। 
  • इसे ‘O’ से दर्शाते हैं। 
  • लेंस के प्रकाशिक केंद्र से गुजरने वाली किरण बिना किसी विचलन के निर्गत होती है।

 

मुख्य फोकस (Principal Focus) 

  • मुख्य अक्ष के समानांतर लेंस पर आपतित किरणे अपवर्तन के पश्चात् मुख्य अक्ष के जिस बिंदु पर अभिसरित होती हैं (उत्तल लेंस हेतु) या जिस बिंदु से अपसारित होती प्रतीत होती हैं (अवतल लेंस हेतु), लेंस का ‘मुख्य फोकस’ कहलाता है। 
  • इसे ‘F’ द्वारा दर्शाते हैं।

 

फोकस दूरी (Focal Length) 

  • किसी लेंस के मुख्य फोकस की प्रकाशिक केंद्र से दूरी ‘फोकस दूरी’ कहलाती है। 
  • इसे ‘f’ द्वारा निरूपित किया जाता है। 

 

उत्तल लेंस द्वारा बने प्रतिबिंब 

उत्तल लेंस द्वारा बनाए गए प्रतिबिंब की प्रकृति, स्थिति तथा आपेक्षिक आकार का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है

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वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
अनंत पर  फोकस F2 पर  अत्याधिक छोटा 

बिंदु आकार

वास्तविक एवं उल्टा

real and inverted

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वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
2F1 से परे  F2 तथा 2F2  के बीच  छोटा  वास्तविक एवं उल्टा

real and inverted

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वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
2 F1 पर 2F2 पर  समान आकार वास्तविक एवं उल्टा

real and inverted

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वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
F1 तथा 2F1के बीच 2F2 से परे  बड़ा (आवर्धित) वास्तविक एवं उल्टा

real and inverted

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वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
F1 पर अनंत पर  असीमित रूप से बड़ा अथवा अत्यधिक आवर्धित वास्तविक एवं उल्टा

real and inverted

 

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वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
फोकस F1 तथा प्रकाशिक केंद्र O के बीच लेंस के जिस ओर वस्तु है उसी ओर बड़ा (आवर्धित) आभासी तथा  सीधा

virtual and erect

 

अवतल लेंस द्वारा बने प्रतिबिंब 

images formed by a concave lens

वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
अनंत पर फोकस F1 पर अत्यधिक छोटा , बिंदु आकार  आभासी तथा  सीधा (virtual and erect)

 

images formed by a concave lens 2

वस्तु की स्थिति प्रतिबिंब की स्थिति प्रतिबिंब का आकार प्रतिबिंब प्रकृति
अनंत तथा लेंस के प्रकाशिक केंद्र O  के बीच फोकस F1 तथा प्रकाशिक केंद्र O  के बीच छोटा  आभासी तथा  सीध (virtual and erect)

 

लेंस सूत्र (Lens Formula)

  • वस्तु की दूरी (u), प्रतिबिंब की दूरी (v) तथा फोकस दूरी (f) के बीच संबंध लेंस सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है।

1v1u = 1f

आवर्धन (Magnification)

  • किसी लेंस द्वारा उत्पन्न आवर्धन, प्रतिबिंब की ऊँचाई तथा वस्तु की ऊँचाई के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है। 
  • इसे ‘m’ द्वारा निरूपित करते हैं।

                       

 

लेंस की क्षमता (Power of Lens)

  • किसी लेंस द्वारा प्रकाश किरणों को अभिसरण या अपसरण(convergence or divergence) करने की मात्रा (Degree) को उसकी क्षमता के रूप में व्यक्त किया जाता है। 
  • इसे P द्वारा दर्शाते हैं।
  • लेंस की क्षमता(P ) =  1/ ; f = फोकस दूरी
  • लेंस की क्षमता का SI मात्रक- डाइऑप्टर (Dioptre) होता है। यदि f (फोकस दूरी) को मीटर से व्यक्त करें तो क्षमता डाइऑप्टर में होगी। 

lens power

डाइऑप्टर (Dioptre)

  • 1 मीटर फोकस दूरी वाले लेंस की क्षमता 1 डाइऑप्टर होती है।
  • उत्तल लेंस की क्षमता धनात्मक तथा अवतल लेंस की क्षमता ऋणात्मक होती है। 
  • चश्मा बनाने वाले लेंस की क्षमता का ही उपयोग करते हैं। 
  • यदि निर्धारित क्षमता + 2.0D है तो यह लेंस उत्तल है, जिसकी फोकस दूरी + 0.50 मीटर है। 
  • वहीं जब निर्धारित क्षमता- 2.5D हो तो यह अवतल लेंस होगा, जिसकी फोकस दूरी -0.40 मीटर होगी। 

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लेंसों का उपयोग 

  • विभिन्न प्रकाशिक यंत्रों को बनाने में लेंसों का उपयोग किया जाता  है, जैसे- दूरबीन, चश्मा, माइक्रोस्कोप आदि। 
  • आवर्धक ग्लास (Magnifying Glass), उत्तल लेंस का बना होता है। 
  • दृष्टि दोषों के निवारण हेतु ऐनकों में लेंसों का उपयोग करते हैं।

प्रकाश का परिक्षेपण (वर्ण विक्षेपण)/Dispersion of light :

  • प्रकाश परिक्षेपण प्रकाश के प्रिज्म से होकर गुजरने पर विभिन्न रंगों के प्रकाश में बँट जाने को परिक्षेपण कहा जाता है।
    • 7 रंग : VIBGYOR
      • बैंगनी ( Violet) – विक्षेपण सबसे अधिक
      • नील या जामुनी (Indigo)
      • आसमानी या नीला (Blue)
      • हरा (Green)
      • पीला (Yellow)
      • नारंगी (Orange)
      • तथा लाल (Red) – विक्षेपण सबसे कम
  • बैंगनी रंग का विक्षेपण सबसे अधिक होता है।
  • लाल रंग का विक्षेपण सबसे कम होता है।
  • न्यूटन ने 1666 ई. में पाया कि भिन्न-भिन्न रंग भिन्न-भिन्न कोणों से विक्षेपित होते हैं।
  • वर्ण विक्षेपण किसी पारदर्शी पदार्थ में भिन्न-भिन्न रंगों के प्रकाश के भिन्न-भिन्न चाल होने के कारण होता है।
  • अतः किसी पदार्थ का अपवर्तनांक भिन्न-भिन्न रंगों के प्रकाश के लिए भिन्न-भिन्न होता है ।
    • जिस रंग का अपवर्तनांक ज्यादा  होगा , किसी  पदार्थ में उसकी चाल कम होती जाती है;
    • जैसे- काँच में बैंगनी रंग के प्रकाश की चाल सबसे कम तथा अपवर्तनांक सबसे अधिक होता है
    • लाल रंग की चाल सबसे अधिक एवं अपवर्तनांक सबसे कम होता है ।
    • बैंगनी रंग के प्रकाश की तरंगदैर्ध्य (wave length) सबसे कम होती है।
    • लाल रंग की तरंगदैर्घ्य सबसे अधिक होती है।
    • प्रकाश की तरंगदैर्घ्य को Angstrom में मापते है तथा इसे से व्यक्त करते हैं । (1A° = 10-10 m)
  • इन्द्रधनुष (Rainbow) : परावर्तन, पूर्ण आन्तरिक परावर्तन तथा अपवर्तन द्वारा वर्ण विक्षेपण का सबसे अच्छा उदाहरण हैं ।

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  • प्राथमिक रंग (Primary Colour) : लाल, हरा एवं नीला रंग को प्राथमिक रंग कहते हैं ।
  • द्वितीयक तथा पूरक रंग (Secondary colours) :  यह दो प्राथमिक रंगों को मिलाने से प्राप्त होता है ।
    • पीला, मैजेंटा एवं पीकॉक नीला को द्वितीयक रंग कहते हैं ।
  • पूरक रंग (  Complementary colours) : जब दो रंग परस्पर मिलने से श्वेत प्रकाश उत्पन्न  करते हैं, तो उन्हें पूरक रंग कहते हैं।
  • लाल कांच को अधिक ताप पर गर्म करने पर वह हरा दिखाई देगा।

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वस्तुओं के रंग (Colour of Objects) : वस्तु जिस रंग का दिखलाई देती है, वह वास्तव में उसी रंग को परावर्तित करती है, शेष सभी रंगों को अवशोषित कर लेती है,

  • जो वस्तु सभी रंगों को परावर्तित कर देती है, वह श्वेत दिखलाई पड़ती है, क्योंकि सभी रंगों का मिश्रित प्रभाव सफेद होता है ।
  • जो वस्तु सभी रंगों को अवशोषित कर लेती है और किसी भी रंग को परावर्तित नहीं करती है वह काली दिखाई देती है ।
  • इसलिए जब लाल गुलाब को हरा शीशा के माध्यम से देखा जाता है, तो वह काला दिखलाई पड़ता है, क्योंकि उसे परावर्तित करने के लिए लाल रंग नहीं मिलता और हरे रंग को वह अवशोषित कर लेता है ।

व्यतिकरण (Interference of Light) :

प्रकाश तरंगों का व्यतिकरण (Interference of Light) : जब समान आवृत्ति की दो प्रकाश तरंगें किसी माध्यम में एक ही दिशा में गमन करती हैं, तो उनके अध्यारोपण के फलस्वरूप प्रकाश की तीव्रता में परिवर्तन हो जाता है। इस घटना को प्रकाश का व्यतिकरण कहते हैं । प्रकाश के व्यतिकरण के उदाहरण : 

  • जल की सतह पर फैली हुई किरासन तेल की परत का सूर्य के प्रकाश में रंगीन दिखाई देना । 
  • साबुन के बुलबुलों का रंगीन दिखाई देना
  • व्यतिकरण दो प्रकार के होते हैं-
    • (i) संपोषी व्यतिकरण (Constructive Interference)
    • (ii) विनाशी व्यतिकरण (Destructive Interference) 

(i) संपोषी व्यतिकरण : माध्यम के जिस बिन्दु पर दोनों तरंगें समान कला (phase) में मिलती हैं, वहाँ प्रकाश की परिणामी तीव्रता अधिकतम होती है, इसे संपोषी व्यतिकरण कहते हैं । 

(ii) विनाशी व्यतिकरण : माध्यम के जिस बिन्दु पर दोनों तरंगें विपरीत कला में मिलती हैं, वहाँ प्रकाश की तीव्रता न्यूनतम या शून्य होती है। इस प्रकार के व्यतिकरण को विनाशी व्यतिकरण कहते हैं । 

प्रकाश तरंगों का ध्रुवण, (Polarisation) 

  • ध्रुवण प्रकाश संबंधी ऐसी घटना है, जो अनुदैर्घ्य तरंग (Longitudinal Wave) और अनुप्रस्थ तरंग (Transverse Wave) में अन्तर स्पष्ट करती है।
  • अनुदैर्घ्य तरंग में ध्रुवण की घटना नहीं होती है।
  • अनुप्रस्थ तरंग में ध्रुवण की घटना होती है।
  • यदि प्रकाश तरंग के कम्पन प्रकाश संचरण की दिशा के लम्बवत् तल में एक ही दिशा में हों, प्रत्येक दिशा में सममित न हों, तो इस प्रकाश को समतल ध्रुवित प्रकाश कहते हैं । प्रकाश संबंधी यह घटना ध्रुवण कहलाती है ।
  • साधरण प्रकाश में विद्युत वेक्टर के कम्पन प्रकाश संचरण की दिशा के लम्बवत् तल में प्रत्येक दिशा में समान रूप से अथवा सममित रूप से होते हैं; ऐसे प्रकाश को अध्रुवित प्रकाश (Unpolarised Light) कहते हैं ।
  • प्रकाश स्रोतों जैसे विद्युत् बल्ब, मोमबत्ती, टयूब लाइट, आदि से उत्सर्जित प्रकाश अध्रुवित प्रकाश होते हैं ।
  • पोलराइडों (Polaroids) का प्रयोग : समतल ध्रुवित प्रकाश उत्पन्न करने के लिए किया जाता है । पोलराइडों का हमारे जीवन में काफी उपयोग है । जैसे—
    • पानी से भींगी सड़कों परावर्तित प्रकाश की चकाचौंध से बचने के लि
    • अत्यधिक श्वेत प्रकाश अथवा चमकीले सतहों, आदि से परावर्तित प्रकाश की चकाचौंध से बचने के लिए इनका प्रयोग किया जाता है ।
    • जब दो कारें एक-दूसरे की ओर आती हैं, तो उनके प्रकाश के कारण चकाचौंध से दुर्घटना हो सकती है । इसे रोकने के लिए कारों में पोलराइडों का उपयोग किया जाता है ।
    • सिनेमाघर में पोलराइड के चश्मे पहनकर 3D वाले चित्रों को देखा जाता है ।
    • फोटोग्राफी करने में, किसी विलयन में शर्करा की सान्द्रता ज्ञात करने में, धातुओं के प्रकाशीय गुणों के अध्ययन करने में भी पोलराइडों का प्रयोग किया जाता है । 

प्रकाश का विवर्तन (Diffraction of Light)

  • प्रकाश का विवर्तन (Diffraction of Light) : यदि किसी प्रकाश स्रोत व पर्दे के बीच कोई अपारदर्शी अवरोध ( obstacle) रख दिया जाए, तो हमें पर्दे पर अवरोध की स्पष्ट छाया (shadow) दिखलायी पड़ती है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रकाश का संचरण सीधी रेखा में होती है ।
    • लेकिन यदि अवरोध का आकार बहुत छोटा हो, तो प्रकाश अपने सरल रेखीय संचरण से हट जाता है, वह अवरोध के किनारों पर मुड़कर छाया में प्रवेश कर जाता है ।
    • प्रकाश के इस प्रकार अवरोध के किनारों पर थोड़ा मुड़कर उसकी छाया में प्रवेश करने की घटना को प्रकाश का विवर्तन कहते हैं ।
    • विवर्तन के कारण अवरोध की छाया के किनारे तीक्ष्ण (sharp) नहीं होते हैं ।
    • प्रकाश के विवर्तन के कारण ही दूरदर्शी में तारों के प्रतिबिम्ब तीक्ष्ण बिन्दुओं की तरह दिखायी न देकर अस्पष्ट धब्बों की तरह दिखायी देते हैं ।
    • प्रकाश का विवर्तन अवरोध के आकार पर निर्भर करता है ।
      • यदि अवरोध का आकार प्रकाश की तरंगदैर्घ्य की कोटि (order) का है, तो विवर्तन स्पष्ट होता है
      • यदि अवरोध का आकार प्रकाश की तरंगदैर्घ्य की तुलना में बहुत बड़ा है, तो विवर्तन उपेक्षणीय होता है । 
  • प्रकाश का विवर्तन इसके तरंग प्रकृति की पुष्टि करता है
  • ध्वनि तरंगों की तरंगदैर्घ्य प्रकाश के तरंगदैर्घ्य की तुलना में बहुत अधिक होती है, इस कारण से ध्वनि तरंगों में विवर्तन की घटना आसानी से देखने को मिलती है
  • ध्वनि तरंगें अवरोधों पर आसानी से मुड़कर हमें सुनाई देती हैं, जबकि प्रकाश तरंगों का तरंगदैर्घ्य हमारे जीवनोपयोगी वस्तुओं के आकार की आकार की तुलना में बहुत छोटी होती है, जिसके कारण हमें प्रकाश के विवर्तन की घटना साधारणतया देखने को नहीं मिलती है । 

प्रकाश का प्रकीर्णन (Scattering of Light) : 

  • प्रकाश का प्रकीर्णन (Scattering of Light) : धूल तथा अन्य पदार्थों के कण द्वारा प्रकाश सभी दिशाओं में   प्रसारित हो जाता है। इस घटना को प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं।
  • रमन प्रभाव, जिसे रमन प्रकीर्णन के रूप में भी जाना जाता है, एक भौतिक घटना है जो तब घटित होती है जब प्रकाश अणुओं द्वारा विक्षेपित होता है।
    • रमन प्रभाव की खोज 28 फरवरी, 1928 को सी. वी. रमन द्वारा की गई थी।
    • भारत सरकार प्रतिवर्ष इस दिन को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाती है।
    • 1930 में, इस प्रभाव के अवलोकन के लिए रमन को भौतिकी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • लॉर्ड रैले ‘ (Lord Rayleigh ) के अनुसार किसी रंग का प्रकीर्णन उसकी तरंगदैर्घ्य पर निर्भर करता है
    • जिस रंग के प्रकाश की तरंगदैर्घ्य सबसे कम होती है, उस रंग का प्रकीर्णन सबसे अधिक होता है।
      • बैंगनी रंग, जिसकी तरंगदैर्ध्य सबसे कम होती है का प्रकीर्णन सबसे अधिक होता है ।
    •  जिस रंग के प्रकाश की तरंगदैर्घ्य सबसे अधिक होती है, उस रंग का प्रकीर्णन सबसे कम होता है।
      • लाल रंग, जिसकी तरंगदैर्ध्य सबसे अधिक होती है का प्रकीर्णन सबसे कम होता है । 

प्रकाश के प्रकीर्णन के उदाहरण: 

  • आकाश का रंग सूर्य के प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण नीला दिखायी देता है :
  • सूर्य उगते व डूबते समय प्रकीर्णन के कारण ही लाल दिखाई देता है :
  • जब सूर्य दिन के समय सिर के ऊपर होता है, तो  सूर्य सफेद दिखाई पड़ता है ।
  • समुद्र का पानी भी प्रकीर्णन के कारण नीला दिखाई देता है ।
  • जब अंतरिक्ष यात्री चन्द्रमा के तल पर खड़े होते हैं, तो वहाँ से आकाश इन्हें काला दिखायी देता है।

वर्ण-विपथन (Chromatic aberration) : जब हम श्वेत प्रकाश से लेंस द्वारा किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब बनाते हैं, तो प्रतिबिम्ब प्रायः रंगीन व अस्पष्ट होता है । लेंस द्वारा उत्पन्न प्रतिबिम्ब के इस दोष को ही वर्ण-विपथन कहते हैं। यह दोष इसीलिए उत्पन्न होता है, क्योंकि लेंस के पदार्थ का अपवर्तनांक तथा इसके कारण लेंस की फोकस दूरी भिन्न-भिन्न रंगों के लिए भिन्न-भिन्न होती है । 

मानव नेत्र (Human Eye) : 

  • आँख शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसकी सहायता से हम वस्तुओं को देखते हैं।
  • आँख एक कैमरे की भाँति कार्य करती है ।
  • दृढ़ पटल (sclerotic) : आँख बाहर से एक कठोर व अपारदर्शी श्वेत झिल्ली से ढकी रहती है, जिसे दृढ़ पटल (sclerotic) कहते है ।
  • कॉर्निया (Cornea) : दृढ़ पटल के सामने वाला भाग कुछ उभरा हुआ रहता है, जिसे  कॉर्निया (Cornea) कहते हैं । नेत्रदान में इसे ही दान किया जाता है। आँख में प्रकाश कार्निया से होकर ही प्रवेश करता है।
  • आइरिस (Iris) :  कॉर्निया के पीछे एक रंगीन अपारदर्शी झिल्ली का पर्दा होता है, जिसे परितारिका या आइरिस (Iris) कहते हैं । आइरिश के बीच में एक छेद होता है, जिसे आँख की पुतली (Pupil) अथवा नेत्र तारा कहते है ।
    • आइरिश का कार्य आँख में जाने वाले प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करना होता है।
    • अधिक  प्रकाश में यह स्वतः सिकुड़कर छोटा हो जाता है तथा अंधेरे या कम प्रकाश में स्वतः फैल जाता है ।
  • नेत्र लेंस (Eye Lens) : पुतली के पीछे नेत्र लेंस (Eye Lens) होता है ।
  • नेत्रोद या जलीय द्रव (Aqueous Humour) : कॉर्निया और आँख के लेंस के बीच में एक नमकीन पारदर्शी द्रव भरा रहता है, जिसे नेत्रोद या जलीय द्रव (Aqueous Humour) कहते हैं ।
  • काचाभ द्रव ( Vitreous Humour) : आँख के लेंस के पीछे एक अन्य पारदर्शी द्रव होता है, जिसे काचाभ द्रव ( Vitreous Humour) कहते हैं।
  • रक्तक पटल (Choroid) : दृढ़ पटल के नीचे काले रंग की एक झिल्ली होती है, जिससे रक्तक पटल (Choroid) कहते हैं । यह प्रकाश को शोषित करके प्रकाश के आन्तरिक परावर्तन को रोकती है ।
  • दृष्टि पटल या रेटिना (Retina) : इआँख के सबसे भीतर एक पारदर्शी झिल्ली होती है, जिसे दृष्टि पटल या रेटिना (Retina) कहते हैं ।
    • रेटिना पर वस्तु का प्रतिबिम्ब उल्टा एवं वास्तविक बनता है ।
    • रेटिना के बीचों-बीच एक पीला भाग होता है, जहाँ पर बना हुआ प्रतिबिम्ब सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देता है । इसे पीत-बिन्दु (Yellow spot) कहते हैं ।
    • जिस स्थान पर दृष्टि शिरा रेटिना को छेदकर मस्तिष्क में जाती  है, उस स्थान पर प्रकाश का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । इस स्थान को अन्ध बिन्दु (Blind spot) कहते हैं।
  • दृष्टि शिराओं. या तंत्रिकाओं (Optic Nerves) :  ये शिराएँ वस्तुओं के प्रतिबिम्बों के रूप, रंग और आकार का ज्ञान मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं।

आँख की समंजन क्षमता (Power of Accommodation of Eye) : किसी वस्तु को स्पष्ट देखने के लिए यह आवश्यक है कि उससे चलने वाली प्रकाश किरणें रेटिना पर ही केन्द्रित हों ।

  • यदि किरणें रेटिना के आगे या पीछे केन्द्रित होगी तो वह वस्तु हमें दिखाई नहीं देगी ।
  • सामान्य अवस्था में दूर की वस्तुओं से चलने वाली किरणें स्वतः ही रेटिना पर ही केन्द्रित होती हैं, जिससे आँख की मांसपेशियों पर कोई तनाव नहीं पड़ता एवं वस्तु हमें दिखायी देने लगती है । यह आँख की सामान्य स्थिति होती है । इस स्थिति में आँख के लेंस की फोकस दूरी सबसे अधिक होती है।
  • जब आँख किसी समीप की वस्तु को देखता है, तो मांसपेशियाँ सिकुड़कर लेंस के तलों की वक्रता त्रिज्याओं को छोटी कर देती हैं। इससे आँख के लेंस की फोकस दूरी कम हो जाती है और वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब पुनः रेटिना पर बन जाता है।
  • आँख की इस प्रकार फोकस दूरी को कम करने की क्षमता को समंजन क्षमता कहते हैं।
  •  वह निकटतम बिन्दु जिसे आँख अपनी अधिकतम समंजन क्षमता लगाकर स्पष्ट देख सकता है, आँख का निकट-बिन्दु (Near Point) कहलाता है।
    • आँख से निकट-बिन्दु की दूरी स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी (Least Distance of Distinct Vision) कहलाती है ।
    • सामान्य नेत्र (normal eye) के लिए यह दूरी 25 cm होती है।
    • इसके विपरीत, वह दूरतम बिन्दु जिसे आँख बिना समंजन क्षमता लगाए स्पष्ट देख सकता हैं, नेत्र का दूर – बिन्दु (Far Point) कहलाता है।
    • सामान्य आँख के लिए दूर बिन्दु अनन्त (infinity) पर होता है । 

– 

रंग दृष्टि (Colour Vision) :

  • रेटिना में दो प्रकार की प्रकाश संवेदनशील कोशिकाएँ होती हैं
    • शंकु (cones) – इन्हीं से हमें रंग का आभास होता है ।
    • छड़ ( rods) – प्रकाश की तीव्रता के अनुरूप प्रतिक्रिया करती है।

दृष्टिदोष एवं दृष्टिदोष के प्रकार 

दृष्टिदोष (Defects of Vision) : एक सामान्य व्यक्ति में स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी 25 सेमी होती है। वह 25 सेमी से लेकर अनन्त पर स्थित वस्तु को अपनी रेटिना पर फोकस कर सकता है । लेकिन उम्र बढ़ने या अन्य कारणों से आँख की यह क्षमता कम या समाप्त हो जाती है । इसका कारण आँख के लेंस में उत्पन्न गड़बड़ी होती है, इससे कई प्रकार के दृष्टि-दोष उत्पन्न होते हैं । 

निकट दृष्टि दोष (Myopia or, Short Sightedness) :

  • इस रोग से ग्रसित व्यक्ति नजदीक की वस्तु को देख लेता है, परन्तु दूर स्थित वस्तु को नहीं देख पाता है ।
  • कारण:
    • (i) लेंस की गोलाई बढ़ जाती है ।
    • (ii) लेंस की फोकस दूरी घट जाती है ।
    • (iii) लेंस की क्षमता बढ़ जाती है ।
  • इस कारण वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना पर न बनकर रेटिना के आगे बन जाता है। 
  • रोग का निवारण : निकट दृष्टि दोष के निवारण के लिए उपयुक्त फोकस दूरी के अवतल लेंस का प्रयोग किया जाता है । 

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दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia or Long Sightedness) :

  • इस रोग से ग्रसित व्यक्ति को दूर की वस्तु दिखलाई पड़ती है, निकट की वस्तु दिखलाई नहीं पड़ती है ।
  • कारण :
    • (i) लेंस की गोलाई कम हो जाती है ।
    • (ii) लेंस की फोकस दूरी बढ़ जाती है ।
    • (iii) लेंस की क्षमता घट जाती है ।
  • इस रोग में निकट की वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना के पीछे बनता है । 
  • रोग का निवारण: इस दोष के निवारण के लिए उपयुक्त फोकस दूरी के उत्तल लेंस का प्रयोग किया जाता है । 

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जरा दृष्टि दोष (Presbyopia) : वृद्धावस्था के कारण आँख की समंजन क्षमता घट जाती है या समाप्त हो जाती है, जिसके कारण व्यक्ति न तो दूर की वस्तु और न निकट की ही वस्तु देख पाता है । 

  • रोग का निवारण : इस रोग के निवारण के लिए द्विफोकसी लेंस (Bifocal Lens) का उपयोग किया जाता है । 

दृष्टि वैषम्य या अबिन्दुकता (Astigmatism ) :

  • यह दोष नेत्र लेंस के क्षैतिज (horizontal) या उर्ध्वाधर (vertical) वक्रता में अंतर आ जाने के कारण उत्पन्न होता है ।
  • इसमें नेत्र क्षैतिज दिशा में तो ठीक देख पाता है, परन्तु उर्ध्व दिशा में नहीं देख पाता है; या फिर नेत्र उर्ध्व दिशा में तो ठीक देख पाता है, परन्तु क्षैतिज दिशा में नहीं देख पाता है ।
  • इसके निवारण हेतु बेलनाकार लेंस (Cylindrical Lens) का प्रयोग किया जाता है । 

वर्णांधता (Colour Blindness) :

  • कुछ व्यक्तियों की आँखों में सभी रंगों को देखने की क्षमता नहीं होती। इसे वर्णांधता कहते हैं ।
  • यह रेटिना की शंक्वाकार कोशिकाओं के विभिन्न दोषों पर निर्भर करता है ।
  • वर्णांधता आनुवांशिक बीमारी होती है, इसका इलाज नहीं किया जा सकता है।
  • इस बीमारी से ग्रसित व्यक्ति को हरे एवं लाल रंग की पहचान नहीं होती है। 

दृष्टि निर्बंध (Persistence of Vision) : किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना पर 1/10 सेकण्ड तक रहता है । अतः यदि वस्तु को आँख के सामने से हटा दिया जाए तो वस्तु 1 / 10 सेकण्ड तक दिखाई देती रहेगी। दृष्टि का यह विशेष गुण दृष्टि निर्बंध कहलाता है ।

  • चलचित्र इसी सिद्धांत पर बनाया जाता है ।
  • दृष्टि निर्बंध के कारण ही उल्काएँ आकाश में लम्बी रेखा जैसा मालूम पड़ते है।
  • तेजी से चलते हुए बिजली के पंखे भी इसी कारण अस्पष्ट दिखाई पड़ते हैं ।

 

दूरबीन (Telescope) : दूरबीन एक ऐसा प्रकाशिक यंत्र है जिसकी सहायता से आकाशीय पिंडों अथवा बहुत अधिक दूरी पर स्थित वस्तुओं को आसानी से स्पष्ट रूप से देखा जाता है ।

  • दूरबीन दो प्रकार के होते हैं
    • अपवर्तक दूरबीन (Refracting Telescope) – तीन प्रकार
      • खगोलीय दूरबीन (Astronomical Telescope) – डेनमार्क के केपलर के द्वारा 1911 में
      • पार्थिव दूरबीन (Terresterial Telescope) 
      • गैलीलियन दूरबीन (Galilean Telescope) –  गैलीलियो ने  1609  में
    • परावर्तक दूरबीन (Reflecting Telescope)

 

सूक्ष्मदर्शी ( Microscope ) : इसका आविष्कार 1590 में जकारियास जानसेन ने किया था.सूक्ष्मदर्शी या सूक्ष्मबीन वह यंत्र है जिसकी सहायता से आँख से न दिखने योग्य सूक्ष्म वस्तुओं को भी देखा जा सकता है।