पौधों में पोषण(nutrition in plants)

पौधों में पोषण(nutrition in plants)

  • पोषण’ (Nutrition) शब्द की उत्पत्ति ‘पोषक’ शब्द से हुई है। 
  • पोषक ऐसा पदार्थ है जिसे प्रत्येक जीवधारी अपने पर्यावरण (Environment) से प्राप्त करता है एवं इसका उपयोग ऊर्जा के स्रोत अथवा शारीरिक घटकों के जैव-संश्लेषण के लिए करता है। 

पोषण की विधियाँ (Methods of nutrition) : 

भोज्य पदार्थों की प्राप्ति के आधार पर जीवधारियों को दो समूहों में विभाजित किया जा सकता है

1.स्वपोषी (Autotrophic nutrition) : 

  • इस प्रकार के पोषण के अन्तर्गत जीव अपने भोज्य पदार्थ का निर्माण स्वयं करता है। 
  • सभी हरे पौधे, नील-हरित शैवाल (Blue green algae), कुछ जीवाणु तथा अधिकांश एककोशिकीय जीवों (Unicellular organisms) में स्वपोषी पोषण पाया जाता है।
  •  इस प्रकार से पोषण करने वाले जीव स्वपोषी (Autotrophs) कहलाते हैं।

2. परपोषी (Heterotrophic nutrition) : 

  • इस प्रकार के पोषण में जीव अपने भोज्य पदार्थ का संश्लेषण (निर्माण) स्वयं नहीं कर पाते बल्कि उन्हें वह दूसरे जीवों से प्राप्त करता है। 
  • इस प्रकार का पोषण सभी जन्तुओं, कवकों तथा कुछ एककोशिकीय जीवों में पाया जाता है। 
  • इस प्रकार से पोषण करने वाले जीवों को परपोषी या विषमपोषी (Heterotrophs) कहते हैं।

पौधों के पोषण में विभिन्न तत्त्वों की भूमिका 

  • पौधों की वृद्धि के लिए 17 आवश्यक तत्वों की आवश्यकता होती है जिनमें से 9 तत्त्व दीर्घमात्रिक तथा शेष 8 लघुमात्रिक हैं । इनमें से किसी एक की कमी से पौधे का पूर्ण विकास नहीं होता है।

1. दीर्घमात्रिक पोषक तत्व (Macronutrientelements) :

2. लघुमात्रिक पोषक तत्व (Micronutrient elements) : 

  • इसके अन्तर्गत वैसे पोषक तत्व आते हैं जिनकी पौधों को कम मात्रा में आवश्यकता होती है । 
  • लघुमात्रिक पोषक तत्वों की संख्या 8 है। ये हैं-लोहा, जस्ता, ताँबा, निकेल, मैंगनीज, बोरोन, मालिब्डेनम तथा क्लोरीन

3. क्रान्तिक तत्त्व (Critical elements) : 

  • अधिकांश मृदाओं में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटैशियम की कमी हो जाती है। अतः भूमि की उर्वरता को बढ़ाने के लिए इन तत्वों को खाद के रूप में डाला जाता है। इसी कारण से इन तीन तत्वों (N, P एवं K) को क्रान्तिक तत्व कहते हैं।

पौधों के पोषण में निम्नलिखित तत्वों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है

1. कार्बन, हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन

  • पौधे इन्हें अपनी आवश्यकतानुसार वायुमंडल एवं जल से ग्रहण करते हैं। 
  • कार्बन वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में ग्रहण किया जाता है और उसके सहयोग से पौधा प्रकाश संश्लेषण की क्रियाकर अपने भोजन का निर्माण करता है। 
  • ऑक्सीजन जीवित कोशाओं के श्वसन में काम आती है। पौधों की कोशाभित्ति एवं जीवद्रव्य के निर्माण में ये तीनों ही तत्व. महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

2. नाइट्रोजन

  • पौधे इसे वायुमण्डल से प्राप्त करते हैं। 
  • यह तत्व पौधों में प्रोटीन (Protein) तथा न्यूक्लिक अम्ल (Nucleic acid) के निर्माण के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी होते हैं। 
  • इसकी कमी से पौधों की वृद्धि रुक जाती है, जबकि इसकी अधिकता होने से पौधों में फूल विलम्ब से  उगते हैं।

3. सल्फर 

  • यह तत्व पौधों के प्रोटीन तथा जीवद्रव्य के निर्माण में मुख्य भमिका निभाता है। 
  • इस तत्त्व की कमी होने से पेड़ो एवं पौधों की पत्तियाँ पीली हो जाती हैं एवं पौधे में फल नहीं बनते हैं। 
  • यह तत्व पौधों की शाकीय वृद्धि को प्रोत्साहित करता है। यह जड का निर्माण करता है तथा बीज निर्माण को उत्तेजित करता है। 
  • यह दलहनी फसलों की जड़ों में गाँठों के निर्माण में मदद करता है।

4. फॉस्फोरस

  • यह तत्व न्यूक्लिक अम्ल एवं फॉस्फोलिपिड पदार्थों में पाया जाता है। 
  • कोशाओं के निर्माण बीजों के निर्माण एवं फसलों की परिपक्वता में इस तत्व की अति महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

5. पोटैशियम : 

  • पौधों की वृद्धि में पोटैशियम तत्त्व की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 
  • इसका कमी से पत्तियों पर अंगमारी (Blight) हो जाता है जिससे प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया में रुकावट आती है।

6. कैल्सियम

  • यह DNA तथा RNA को प्रोटीन से संयुक्त करने, क्रोमोसोम (गुण सूत्र) के निर्माण, वसा के संश्लेषण, कार्बोहाइड्रेट एवं एमिनो अम्ल के परिवहन में सहायक होता है। 
  • इसकी कमी होने से कुछ पौधों में बीज नहीं बनते एवं हरित लवक (Chloroplast) उचित ढंग से कार्य नहीं करते हैं।

7. मैग्नीशियम

  • इस तत्व की प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 
  • यह क्लोरोफिल-में-संयोजन कर-प्रोटीन संश्लेषण में महत्वपूर्ण योगदान करता है। 
  • पौधों में मैग्नीशियम की कमी होने से वे पीले हो जाते हैं, जिसे हरिमहीनता (Chlorosis) कहते हैं।

8. लोहा

  • यह तत्व पौधों में श्वसन क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 
  • यह क्रेब्स चक्र (Kreb’s Cycle) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 
  • यह पौधों के जीवद्रव्य तथा क्रोमेटिक में पाया जाता है। 
  • पौधों में लोहे की कमी होने सेक्लोरोसिस या हरिमहीनता होता है। 

9. मैंगनीज

  • पौधों में इस तत्व की आवश्यकता क्लोरोफिल के निर्माण में होती है। 
  • यह नाइट्राइट से नाइट्रेट बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 
  • इसकी कमी से पौधों की पत्तियाँ भूरी हो जाती हैं।

10. ताँबा :

  •  यह श्वसन में उपयोग एन्जाइमों (Enzymes) में उपस्थित होता है। 
  • इसकी कमी से पौधों में हरिमहीनता (Chlorosis) होता है।

11. जिंक : 

  • इस तत्त्व की कमी से पौधों की लम्बाई में वृद्धि रुक जाती है एवं पौधे बौने हो जाते हैं। साथ-ही-साथ फल का विकास नहीं हो पाता है तथा पौधों की पत्तियाँ छोटी रह जाती हैं। 
  • यह इन्डोल एसीटिक अम्ल (Indole Acetic Acid or IAA) के संश्लेषण में उपयोगी होती है। 

12. बोरोन : 

  • यह मुख्यतः शर्करा के ट्रान्सलोकेशन में सहायक होता है। 
  • इसकी कमी से पौधे के Shoot tip नष्ट हो जाते हैं। 

13. मॉलिब्डेनम

  • यह नाइट्रोजन के मेटाबोलिज्म में मुख्य भूमिका निभाता है। 
  • इसकी कमी से फूलगोभी एवं पतगोभी में व्हिपटेल (Whiptail) रोग होता है। 

नोट : 

  • धान का खैरा रोग जिंक की कमी से होता है।
  • मटर का मार्श रोग मैंगनीज की कमी से होता है। 
  • फूलगोभी का व्हिपटेल रोग (Whiptail disease) मॉलिब्डेनम की कमी से होता है। 
  • पत्तियों की हरिमहीनता (Chlorosis) रोग कैल्सियम, मैग्नीशियम तथा मॉलिब्डेनम की कमी से होता है। 
  • नींबू का डाइबैक रोग (Dieback disease) कॉपर की कमी से होता है। 
  • आम का लिटिल लीफ रोग जस्ता की कमी से होता है।
  • नींबू का लिटिल लीफ रोग कॉपर की कमी से होता है। 

नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen fixation): 

  • वायुमंडल में नाइट्रोजन की मात्रा 78% होती है लेकिन इतनी अधिक मात्रा होते हुए भी वायुमण्डलीय नाइट्रोजन पौधों के लिए अनुपयोगी होता है। 
  • पौधों में नाइट्रोजन को गैसीय रूप में ग्रहण करने की क्षमता का पूर्णतः अभाव होता है। 
  • पौधे नाइट्रेट (NO3) तथा नाइट्राइट (NO2) के रूप में नाइट्रोजन ग्रहण करते हैं । 
  • यौगिकों के रूप में उपस्थित नाइट्रोजन स्थिर नाइट्रोजन (Fixed nitrogen) कहलाता है। 
  • अतः वायुमण्डल के मुक्त नाइट्रोजन गैस को नाइट्रोजन के यौगिकों के रूप में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को नाइटोजन का स्थिरीकरण कहा जाता है।

नाइट्रोजन का स्थिरीकरण दो विधियों द्वारा होता है

1. प्राकृतिक विधि : 

  • लेग्यूमिनस परिवार (Leguminous family) के पौधों की जड़ों में गाँठें उपस्थित होती हैं। इन गाँठो के ऊपर या इनके निकट की भमि में कुछ सहजीवी जीवाणु  उपस्थित रहते हैं। ये जीवाणु वायुमण्डल से सीधे नाइट्रोजन ग्रहण कर उसे नाइट्रेट में परिणत कर देते हैं जो मिट्टी में चला जाता है। 
  • पौधे मिट्टी से नाइट्रेट ग्रहण कर प्रोटीन का संश्लेषण करते हैं। इस प्रकार, इन पौधों के कट जाने के बाद खेत में नाइट्रोजनयुक्त खाद की मात्रा पहले की तुलना में बढ़ जाती है। 
  • इसी कारण भूमि को अधिक उपजाऊ बनाने के लिए उसमें लेग्यूमिनस परिवार के पौधों की खेती-की-जाती है।

2. विद्युत विसर्जन द्वारा : due to the action of electric discharge

  • वर्षा ऋतु या अन्य दिनों में विद्युत विसर्जन की क्रिया होने पर वायुमण्डलीय नाइट्रोजन एवं ऑक्सीजन परस्पर संयोग कर नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) बनाते हैं। 
  • नाइट्रिक ऑक्साइड ऑक्सीजन के साथ संयोग कर नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2 ) बनाते हैं। 
  • यह नाइट्रोजन डाइऑक्साइड-वर्षा-जल-में-घुलकर नाइट्रिक अम्ल (HNO3 ) तथा नाइट्रस अम्ल (HNO2 ) में परिवर्तित हो जाते हैं। 
  • ये अम्ल मृदा में उपस्थित चूना या अन्य क्षारीय पदार्थों से संयोग कर नाइट्रेट एवं नाइट्राइट बनाते हैं, जो पौधों के लिए खाद का काम करते हैं।

विनाइट्रीकरण (Denitrification) :-

  • यह-नाइट्रोजन यौगिकीकरण तथा नाइट्रीकरण की विपरीत प्रक्रिया है। 
  • इस प्रक्रिया में कुछ जीवाणु भाग लेते हैं। जैसे—-स्यूडोमोनास डिनाइट्रीफिकेन्स (Pseudomonas denitrificans), (माइक्रोकॉकस डेनिट्रिफिकैंस)(Micrococcus denitrificans) आदि । 
  • इस प्रक्रिया द्वारा सभी सड़े-गले जीव-जन्तु, पेड़-पौधे नाइट्रोजन विमुक्त करते हैं जो पुनः वायुमण्डल में चले जाते हैं। 

प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) : 

  • प्रकाश संश्लेषण सिर्फ हरे पौधों एवं कुछ जीवाणुओं में घटित होने वाली वह क्रिया है जिसमें पौधे के हरे भाग सौर ऊर्जा (Solar Energy) को ग्रहण कर वायुमण्डल से ली गई कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) तथा भूमि से अवशोषित जल (H2O) के द्वारा कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं। 
  • इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन एवं जल सहायक उत्पाद (By-product) के रूप में निष्कासित होते हैं। 
  • पौधों में होने वाली यह क्रिया हरित लवक या पर्णहरित (Chlorophyll) की उपस्थिति में सम्पन्न होती है।

Photosynthesis

ग्लूकोज प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्चा पदार्थ :

1. कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) :

  • शर्करा (कार्बोहाइड्रेट) के संश्लेषण के लिए पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग कच्चे पदार्थ (Raw materials) के रूप में करते हैं। 
  • स्थलीय पौधे वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं, जबकि जलीय पौधे (Aquatic Plants) जल में घुली हुई कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं। 
  • प्रकाश संश्लेषण क्रिया के द्वारा पौधे कार्बन डाइऑक्साइड को स्थिर करते हैं। 
  • जब प्रकाश की तीव्रता कम होती है (मुख्यतः प्रातः तथा सायंकाल में) तो पौधों द्वारा श्वसन की क्रिया में मुक्त की गई कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा इसकी प्रकाश-संश्लेषण क्रिया हेतु संचित मात्रा के समान होती है। इस स्थिति को संतुलन बिन्दु (Compensation point) कहा जाता है। 
  • रात्रि के समय पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं करते बल्कि संचित पदार्थ का उपापचयन करते हैं और कार्बनडाइऑक्साइड छोड़ते हैं।

2. जल (H2O)

  • प्रकाश संश्लेषण की क्रिया हेतु जल भी कच्चे पदार्थ के रूप में इस्तेमाल होता है। पौधों की जड़ें परासरण (Osmosis) क्रिया के द्वारा भूमि से जल का अवशोषण करता हैं। 
  • जल का पत्तियों तक आरोही संवहन जाइलम (Xylem) ऊतक के माध्यम से होता है, जहाँ से यह प्रकाश संश्लेषी कोशिकाओं तक पहुँच जाता है। 
  • हाइड्रोजन की प्राप्ति जल के माध्यम से ही होती है जो कि कार्बन डाइऑक्साइड का अपचयन करती है। 

3. पर्णहरित (Chlorophyll)

  • पर्णहरित वर्णक मुख्यतः हरित लवक नामक पादप कोशिकांग में पाया जाता है। 
  • प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के लिए पर्णहरित बहुत ही आवश्यक है। पौधों की जिन कोशिकाओं में पर्णहरित उपस्थित होता है केवल वे ही प्रकाश संश्लेषण क्रिया कर पाती हैं। 
  • पौधों में पर्णहरित प्रायः हरी पत्तियों में पाया जाता है, इस कारण पत्तियों को पौधे का प्रकाश संश्लेषी अंग (Photosynthetic organs of plant) कहा जाता है। 
  • शैवाल (Algae) और हाइड्रिला (Hydrila) जो प्रायः जल में मिलते हैं का पूरा शरीर ही प्रकाश संश्लेषी होता है। 
  • हरित लवक एक सतत् दोहरी झिल्ली से घिरे होते हैं। उच्च पादपों में हरित लवक में स्तरमय रचनाओं की पट्टियाँ होती हैं, जिन्हें ग्रेना (Granna) कहते हैं। हरित लवक का आन्तरिक स्तर इसकी गुहा (Cavity) को आस्तरित करता है जिसे पीठिका (Stroma) कहते हैं। 
  • प्रकाश संश्लेषण की क्रिया इन्हीं ग्रेना एवं स्ट्रोमा में सम्पन्न होती है। 
  • पर्णहरित में चार पाइरोल रिंग का बना चपटा पोरफारिन हेड जिसके केन्द्र में मैग्नीशियम (Mg) का एक परमाणु तथा एक रिं. पर हाइड्रोकार्बन चेन होती है। 
  • क्लोरोफिल-a का सूत्र C55H72O5N4Mg तथा क्लोरोफिल–b का सूत्र C55H70O6N4Mg  है।

4. प्रकाश (Light) : 

  • प्रकाश संश्लेषण की क्रिया केवल दृश्य प्रकाश वर्णों (VIBGYOR) में सम्पन्न होती है। 
  • पर्णहरित प्रकाश में बैंगनी, नीला और लाल रंगों को ग्रहण करता है। 
  • प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बैंगनी रंग के प्रकाश में सबसे कम तथा लाल रंग के प्रकाश में सबसे अधिक होती है। 
  • कुछ कृत्रिम स्रोत भी प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को सम्पन्न करने में समर्थ होते हैं। पौधों में न केवल कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल ही कार्बोहाइड्रेट के रूप में स्थिर होते हैं बल्कि सूर्य से प्राप्त ऊर्जा भी स्थिर होती है। 
  • पौधे सूर्य के प्रकाश को भोजन के रूप में स्थिर करते हैं।

प्रकाश संश्लेषण की क्रिया :

  • प्रकाश संश्लेषण की क्रिया एक उपचयन-अपचयन (Oxidation-Reduction) क्रिया है। 
  • इसमें जल का उपचयन (Oxidation) ऑक्सीजन के बनने में तथा कार्बन डाइऑक्साइड का अपचयन (Reduction) शर्करा के निर्माण में होता है।

प्रकाश संश्लेषण क्रिया की अवस्थाएँ : प्रकाश संश्लेषण क्रिया की दो अवस्थाएँ होती हैं

  • 1. प्रकाश रासायनिक क्रिया तथा 
  • 2. रासायनिक प्रकाशहीन क्रिया।

प्रकाश रासायनिक क्रिया (Photo chemical reaction)

  • यह क्रिया पर्णहरित के गेना में सम्पन्न होती है। 
  • इसे हिल क्रिया (Hill Reaction) भी कहते है। 
  • इस प्रक्रिया में जल का अपघट्न  होकर हाइड्रोजन आयन तथा इलेक्ट्रॉन बनता है। जल के अपचयन के लिए ऊर्जा प्रकाश द्वारा मिलती है। 
  • इस प्रक्रिया के अन्त में ऊर्जा के रूप में ATP तथा NADPH निकलता है जो अंधकार क्रिया (Dark reaction) में क्रिया संचालित करने में मदद करते हैं। 

रासायनिक प्रकाशहीन क्रिया (Chemical dark reaction) : 

  • यह क्रिया क्लोरोफिल के स्ट्रोमा(STROMA) में सम्पन होती है 
  • इस अभिक्रिया के लिए ऊर्जा प्रकाश अभिक्रिया से मिलती है
  •  इस कारण इसे “अप्रकाशिक अभिक्रिया (Dark reaction) कहा जाता है। 
  • मेल्विन केल्विन (Melvin Kelvin) एवं एन्डिल बेन्सन (Andil Benson) ने इस चक्र की खोज की थी। इस कारण इसे केल्विन-बेन्सन चक्र (Kelvin-Benson Cycle) भी कहते है। 
  • प्रकाश संश्लेषण की सम्पूर्ण क्रिया को संक्षेप में अति सरल तरीके से इस प्रकार प्रदर्शित किया जा सकता है

6CO2 + 12 ATP + 12NADPH→ C6H12O6 + 12 ATP + 12 NADP 

प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को प्रभावित करने वाले कारक (Factors governing photo synthesis): 

प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को प्रभावित करनेवाले कारक निम्नलिखित हैं

1. प्रकाश (Light)

  • प्रकाश संश्लेषण की क्रिया लाल एवं नीले प्रकाश में सबसे अधिक होती है जबकि पराबैंगनी, हरी, पीली एवं अवरक्त प्रकाश में यह बिल्कुल नहीं होती है। 
  • प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रकाश की निम्न तीव्रता पर तो बढ़ती है परन्तु जैसे-जैसे तीव्रता उच्च होती है, यह घटती जाती है।

2. ताप (Temperature)

  • प्रकाश संश्लेषण में अनेक एन्जाइमों की प्रतिक्रियाएँ होती हैं। एन्जाइम तापक्रम की एक अनुकूलतम परास सीमा में ही क्रियाशील होते हैं। अतः 0°C से 37°C तक तापक्रम बढ़ने पर प्रकाश संश्लेषण की दर बढ़ती जाती है, परन्तु 37°C से उच्च ताप पर यह घट जाती है।

3. कार्बन डाइऑक्साइड (CO,): 

  • एक निश्चित स्तर तक कार्बन डाइऑक्साइड की सान्द्रता बढ़ने पर प्रकाश संश्लेषण की दर बढ़ती है लेकिन इसके उपरान्त कार्बन डाइऑक्साइड की सान्द्रता का प्रकाश संश्लेषण की दर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। 

4. जल (Water): 

  • जल के अभाव की स्थिति में प्रकाश संश्लेषण की दर कम हो जाती है क्योंकि ऐसा वाष्पोत्सर्जन की दर कम करने के लिए रंध्रों के बंद रहने के कारण होता है इससे पत्तियों में CO2 का प्रवेश रुक जाता है। 

श्वसन (Respiration)

  • श्वसन एक जैविक क्रिया है जिसमें शर्करा तथा वसा का ऑक्सीकरण होता है तथा ऊर्जा मुक्त होती है। 
  • यह ऊर्जा शरीर के विभिन्न कार्यों को करने में सहायता करती है। 
  • इस प्रक्रिया में ATP तथा CO2 निकलती है। अतः वृहत रूप में श्वसन उन सभी प्रक्रियाओं का सम्मिलित रूप है, जिनके द्वारा शरीर में ऊर्जा का उत्पादन होता है।  
  • श्वसन क्रिया में ग्लूकोज अणुओं का ऑक्सीकरण कोशिकाओं में होता है। इसीलिए इसे ‘कोशिकीय श्वसन’ कहते हैं। 

सम्पूर्ण कोशिकीय श्वसन को दो अवस्थाओं में विभाजित किया जा सकता है।

  • 1. अवायवीय श्वसन (Anaerobic respiration)
  • 2. वायवीय श्वसन (Aerobic respiration)

1. अवायवीय श्वसन (Anaerobic respiration): 

  • यह श्वसन का प्रथम चरण है, जिसके अन्तर्गत ग्लकोज का आंशिक विखण्डन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। 
  • इस क्रिया द्वारा एक अणु ग्लूकोज से दो अणु पायरुवेट का निर्माण होता है। 
  • यह क्रिया कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) में होती है 
  • इस क्रिया में चूँकि ग्लूकोज अणु का आंशिक विखण्डन होता है, अतः उसमें निहित ऊर्जा का बहत छोटा भाग ही मुक्त हो पाता है। शेष ऊर्जा पायरुवेट (Pyruvate) के बंधनों में ही संचित रह जाती है। 
  • पायरुवेट के आगे की स्थिति निम्नांकित तीन प्रकार की हो सकती है
    • (i) पायरुवेट ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में इथेनॉल एवं कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है। यह क्रिया किण्वन (Fermentation) कहलाती है, जो यीस्ट (Yeast) में होता है।
    • (ii) ऑक्सीजन के अभाव में पेशियों में पायरुवेट से लैक्टिक अम्ल का निर्माण होता है। पेशी कोशिकाओं में अधिक मात्रा में लैक्टिक अम्ल के संचय से दर्द होने लगता है। बहुत ज्यादा चलने या दौड़ने के पश्चात् मांसपेशियों में इसी कारण क्रैम्प (Cramp) होती है। 
    • (iii) ऑक्सीजन की उपस्थिति में पायरुवेट का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है एवं CO2, तथा जल का निर्माण होता है। चूँकि यह क्रिया ऑक्सीजन की उपस्थिति में होती है, अतः इसे वायवीय श्वसन कहते हैं। 

2. वायवीय श्वसन (Aerobic respiration) 

  • श्वसन के प्रथम चरण में बना पायरुवेट पूर्ण ऑक्सीकरण के लिए माइटोकोण्ड्रिया में चला जाता है। 
  • यहाँ ऑक्सीजन की उपस्थिति में पायरुवेट का विखण्डन होता है। 
  • तीन कार्बन वाले पायरुवेट अणु विखंडित होकर कार्बन डाइऑक्साइड के तीन अणु बनाते हैं। इसके साथ-साथ जल तथा रासायनिक ऊर्जा भी मुक्त होती है, जो ATP अणुओं में संचित हो जाती है। 
  • ATP के विखण्डन से जो ऊर्जा मिलती है, उससे कोशिका के अंदर होनेवाली विभिन्न जैव क्रियाएँ संचालित होती हैं।

वायवीय श्वसन 

1. वायवीय श्वसन ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है। 

2. वायवीय श्वसन का प्रथम चरण कोशिकाद्रव्य में तथा द्वितीय चरण माइटोकोण्ड्रिया में सम्पन्न  होता है। 

3. वायवीय श्वसन में ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है तथा CO2, एवं जल का निर्माण होता है। 

4. वायवीय श्वसन में अवायवीय श्वसन की तुलना में अधिक ऊर्जा मुक्त होती है।

अवायवीय श्वसन 

1. अवायवीय श्वसन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है।

 2. अवायवीय श्वसन की पूरी क्रिया कोशिकाद्रव्य में सम्पन्न होती है।

3. अवायवीय श्वसन में ग्लूकोज का आंशिक ऑक्सीकरण होता है एवं पायरुवेट, इथेनॉल

या लैक्टिक अम्ल का निर्माण होता है । 

4. अवायवीय श्वसन में वायवीय श्वसन की तुलना में कम ऊर्जा मुक्त होती है।

पौधों में श्वसन (Respiration in plants) : 

  • पौधों में श्वसन-गैसों का आदान-प्रदान शरीर की सतह द्वारा विसरण (Diffusion) क्रिया से होता है।
  •  इसके लिए ऑक्सीजन पत्तियों के रंध्रों (Stomatas), पुराने वृक्षों के तनों की कड़ी त्वचा (bark) पर स्थित वातरंध्रों (Lenticels) और अंतर कोशिकीय स्थानों (Intercellular spaces) द्वारा पौधों में प्रवेश करती है। 
  • पौधों की जड़ें मृदा के कणों के बीच के स्थानों में स्थित हवा से ऑक्सीजन ग्रहण करती है। जड़ों से निकले मूल रोम (Root hairs) मिट्टी के कणों के बीच फैली रहती है। इन्हीं मूल रोमों की सहायता से जड़ें ऑक्सीजन ग्रहण करती हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड बाहर छोड़ देते हैं। 
  • पुरानी जड़ों में ऐसे मूल रोमों का अभाव होता है। ऐसे जड़ों में तने की कड़ी त्वचा की तरह वातरंध्र (Lenticels) पाये जाते हैं। इन्हीं वातरंध्रों के माध्यम से श्वसन गैसों का आदान-प्रदान होता है। इसी कारण से पौधों की जड़ों में लम्बे अवधि तक जल जमाव होने से पौधा मर जाता है। 
  • दिन में CO2, गैस का उपयोग पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में करते हैं। अतः CO2, गैस की जगह ऑक्सीजन रंध्रों से निकलती है। रात्रि में चूँकि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया सम्पन्न नहीं होती है, अतः श्वसन से CO2, गैस रंध्रों से बाहर निकलती है।

पौधों में श्वसन की क्रिया जन्तुओं के श्वसन से भिन्न होती है। 

  • 1. पौधों के प्रत्येक भाग अर्थात् जड़, तना एवं पत्तियों में अलग-अलग श्वसन होता है। 
  • 2. जन्तुओं की तरह पौधों में श्वसन गैसों का परिवहन नहीं होता है।
  • 3. पौधों में जन्तुओं की अपेक्षा श्वसन की गति धीमी होती है।

वाष्पोत्सर्जन (Transpiration): 

  • पौधों के वायवीय भागों से जल का वाष्प के रूप में उड़ना वाष्पोत्सर्जन कहलाता है। 
  • वाष्पोत्सर्जन वह क्रिया है, जिसमें पादप सतह से जल वाष्प के रूप में उड़ता है।

वाष्पोत्सर्जन के प्रकार : 

वाष्पोत्सर्जन मुख्यतः 4 प्रकार का होता है। ये हैं

1. पत्रीय वाष्पोत्सर्जन (Leaf transpiration): 

  • पत्रीय वाष्पोत्सर्जन लगभग 80-90% पत्तियों पर उपस्थित रंध्रों के द्वारा होता है।

2. उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन (Cuticular transpiration)

  • यह पौधों की त्वचा (Bark) या छाल द्वारा होता है। इससे कुल जल की लगभग 3-8% हानि होती है।

3. (Tenticellular transpiration)

  • काष्ठीय तने तथा कुछ फलों में  वातरंध्र(Tenticels) पाये जाते हैं। इन वातरंध्रों के द्वारा वाष्पोत्सर्जन होता है परन्तु जल की हानि नगण्य होती है।

4.बिन्दुस्राव (Guttation): 

  • बिन्दुस्राव सामान्यतः रात्रि के समय होता है। 
  • इसमें पत्तियों के नारों से जल बूंद-बूंद के रूप में निकलता है। 
  • बिन्दु-स्राव के द्वारा निकलने वाले जल में कुछ कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थ भी मौजूद रहते हैं। 

वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक :

  • 1. प्रकाश की तीव्रता : प्रकाश की तीव्रता बढ़ने से वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ती है।
  • 2. तापक्रम : तापक्रम के बढ़ने से वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ती है। 
  • 3. आर्द्रता : आर्द्रता के बढ़ने से वाष्पोत्सर्जन की दर घटती है।
  • 4. वायु : वायु की गति तेज होने पर वाष्पोत्सर्जन तीव्र गति से होता है। 

वाष्पोत्सर्जन का महत्व : 

  • 1. यह खनिज लवणों को जड़ से पत्तियों तक पहुँचाने में सहायता करता है।
  • 2. यह पौधे का तापमान संतुलित रखने में सहायता करता है। सामान
  • 3. यह जल अवशोषण एवं रसारोहण में मदद करता है। 
  • 4. यह वायुमण्डल को नम (Moist) बनाकर जल चक्र (Hydrologic cycle) को पूराकरने में मदद करता है।
  •  5. प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के लिए यह जल का संभरण करता है। 
  •  पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर को गैनोंग पोटोमीटर (Ganong potometer) के द्वारा मापा जाता है।