अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग National Commission for Scheduled Tribes : SARKARI LIBRARY

 

अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग (National Commission for Scheduled Tribes)

  • राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की तरह राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग भी एक संवैधानिक निकाय है। 
  • इसका गठन संविधान के अनुच्छेद 338-क के द्वारा किया गया है।अनुच्छेद 338ए संविधान का भाग 16 ‘कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध‘ में वर्णित है 
  • इस अनुच्छेद को 2003 के 89 वा संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा जोड़ा गया

 

 अनूसूचित जनजातियों के लिए पृथक् आयोग 

  • 1990 के 65वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिये एक राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग की स्थापना की गयी। 
  • संविधान के अनुच्छेद 338 के द्वारा इस आयोग की स्थापना अनुसूचित जाति एवं  जनजाति को संविधान या अन्य विधियों के अंतर्गत संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से की गयी है।
  • 1999 में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण एवं विकास के कार्यों को गति देने के लिये एक नये जनजातीय मंत्रालय की स्थापना की गयी। 

 

  • 2003 के 89वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा,राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग एवं जनजाति आयोग का विभाजन कर दिया गया तथा दोनों के लिये पृथक्-पृथक् आयोगों की स्थापना किया गया । 
  • इसके लिये संविधान के अनुच्छेद 338 में संशोधन किया गया तथा उसमें एक नया अनुच्छेद 338-क जोड़ा गया।
  • वर्ष 2004 से राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग अस्तित्व में आया। 
  • इस आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष एवं तीन अन्य सदस्य हैं। 
  • वे राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाते हैं। 
  • उनकी सेवा शर्ते एवं कार्यकाल भी राष्ट्रपति द्वारा ही निर्धारित किया जाता है। 

 

आयोग के कार्य 

  • (क) अनुसूचित जनजातियों के लिए इस संविधान या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या सरकार के किसी आदेश के अधीन उपबंधित रक्षोपायों से संबंधित सभी विषयों का अन्वेषण करे और उन पर निगरानी रखे तथा ऐसे रक्षोपायों के कार्यकरण का मूल्यांकन करे;
  • (ख) अनुसूचित जनजातियों को उनके अधिकारों और रक्षोपायों से वंचित करने के सम्बन्ध में विनिर्दिष्ट शिकायतों की जांच करे; 
  • (ग) अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग ले और उन पर सलाह दे तथा संघ और किसी राज्य के अधीन उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करे; 
  • (घ) उन रक्षोपायों के कार्यकरण के बारे में प्रतिवर्ष और ऐसे अन्य समयों पर जो आयोग ठीक समझे, राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करे; 
  • (ङ) ऐसी रिपोर्टों में उन उपायों के बारे में, जो उन रक्षोपायों के प्रभावपूर्ण कार्यान्वयन के लिए संघ या किसी राज्य द्वारा किए जाने चाहिए तथा अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याणा और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए अन्य उपायों के बारे में सिफारिश करे, और;
  • (च) अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण और विकास तथा उन्नयन के संबंध में ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करे जो राष्ट्रपति, संसद, द्वारा बनाई गई किसी क विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, नियम द्वारा विनिर्दिष्ट करे।

 

आयोग के अन्य कार्य 

2005 में राष्ट्रपति ने अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा, कल्याण तथा विकास और उन्नति के लिए आयोग के निम्नलिखित कुछ अन्य कार्य निर्धारित किए 

  • (i) वन क्षेत्र में रह रही अनुसूचित जनजातियों को लघुवनोपज पर स्वामित्व का अधिकार देने संबंधी उपाय। 
  • (ii) कानून के अनुसार जनजातीय समुदायों के खनिज तथा जल संसाधनों आदि पर अधिकार को सुरक्षित रखने संबंधी उपाय। 
  • (iii) जनजातियों के विकास तथा उनके लिए अधिक वहनीय आजीविका रणनीतियों पर काम करने संबंधी का उपाय। गत 
  • (iv) विकास परियोजनाओं द्वारा विस्थापित जनजातीय समूहों के लिए सहायता एवं पुनर्वास उपायों की प्रभावकारिता बढ़ाने संबंधी उपाय।
  • (v) जनजातीय लोगों का भूमि से बिलगाव रोकने के उपाय तथा उन लोगों का प्रभावी पुनर्वासन करना जो पहले ही भूमि से विलग हो चुके हैं। 
  • (vi) जनजातीय समुदायों की वन सुरक्षा तथा सामाजिक वानिकी में अधिकतम सहयोग एवं संलग्नता प्राप्त करने संबंधी उपाय। 
  • (vii) पेसा अधिनियम, 1996 का पूर्ण कार्यान्वयन सुनिश्चित करने संबंधी उपाय। 
  • (viii) जनजातियों द्वारा झूम खेती के प्रचलन को कम करने तथा अंततः समाप्त करने संबंधी उपाय, जिसके कारण उनके लगातार अशक्तीकरण के साथ भूमि तथा पर्यावरण का अपरदन होता है। 

 

आयोग का प्रतिवेदन 

  • आयोग अपना वार्षिक प्रतिवेदन राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है। यदि आवश्यक समझा जाता है तो समय से पहले भी आयोग अपना प्रतिवेदन दे सकता है।
  • राष्ट्रपति ऐसी सभी रिपोर्टों को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा और उनके साथ संघ से संबंधित सिफारिशों पर की गई या किए जाने के लिए प्रस्थापित कार्रवाई तथा यदि कोई ऐसी सिफारिश अस्वीकृत की गई है तो अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाला ज्ञापन भी होगा।
  • जहां कोई ऐसी रिपोर्ट या उसका कोई भाग, किसी ऐसे विषय से संबंधित है, जिसका किसी राज्य सरकार से संबंध है तो ऐसी रिपोर्ट की एक प्रति उस राज्य के राज्यपाल को भेजी जाएगी जो उसे राज्य के विधानमंडल के समक्ष रखवाएगा और उसके साथ राज्य से संबंधित सिफारिशों पर की गई या किए जाने के लिए प्रस्थापित कार्रवाई तथा यदि कोई ऐसी सिफारिश अस्वीकृत की गई है तो अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाला ज्ञापन भी होगा।

 

आयोग की शक्तियां 

  • आयोग को अपनी कार्यविधि को विनियमित करने की शक्ति प्राप्त है।
  • आयोग को, किसी विषय का अन्वेषण करते समय या किसी परिवाद के बारे में जांच करते समय, विशिष्टता निम्नलिखित विषयों के संबंध में, वे सभी शक्तियां होंगी, जो वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय को प्राप्त हैं, अर्थात्:
    • (क) भारत के किसी भी भाग से किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना; 
    • (ख) किसी दस्तावेज को प्रकट और पेश करने की अपेक्षा करना; 
    • (ग) शपथ पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना; 
    • (घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अध्यपेक्षा करना; 
    • (ङ) साक्षियों और दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना; 
    • (च) कोई अन्य विषय, जो राष्ट्रपति, नियम द्वारा अवधारित करे।
    • संघ और प्रत्येक राज्य सरकार, अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले सभी महत्वपूर्ण नीतिगत विषयों पर आयोग से परामर्श करेगी।