पृथ्वी की गतियाँ (Motions of the earth)

  पृथ्वी की गतियाँ

  • पृथ्वी की घूर्णन गति का हमें आभास न होने का मुख्य कारण घूर्णन एवं परिक्रमण में निरंतरता का होना है। 

अक्ष

  • ‘अक्ष’, उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिण ध्रुव को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा है, जिसके सहारे पृथ्वी घूर्णन करती है।
    • पृथ्वी अपने अक्ष पर लगातार घूमती रहती है। 

कक्ष या कक्षा

  • पृथ्वी जिस काल्पनिक रेखा पर चलकर सूर्य का चक्कर लगाती है उसे कक्ष या कक्षा कहते हैं। 
    • पृथ्वी के परिक्रमण कक्ष द्वारा निर्मित तथा पृथ्वी के केंद्र से गुज़रने वाले तल को ‘कक्षातल’ या ‘कक्षीयसतह’ कहते हैं। 
  • पृथ्वी अपने अक्ष पर 231 2 ° झुकी हुई है और इसका अक्ष इसके कक्ष से 661 2 ° का कोण बनाता है। 

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  • पृथ्वी का आकार भू-आभ (Geoid) होने के कारण इसके आधे भाग पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है अतः आधे भाग पर दिन रहता है, जबकि शेष आधे भाग पर उस समय प्रकाश नहीं पहुँचता है. अतः आधे भाग पर रात रहती है। 

 ‘प्रदीप्ति वृत्त’ (Circle of illumination)

  • पृथ्वी पर दिन और रात वाले हिस्सों को विभाजित करने वाली रेखा को प्रदीप्ति वृत्त ‘प्रदीप्ति वृत्त’ (Circle of illumination) कहते हैं। 
    • प्रदीप्ति वृत्त और कक्षीय समतल के बीच समकोण बनता है। 
    • इस तरह से प्रदीप्ति वृत्त और अक्ष के बीच 23.5° का कोण बनता है।
  • प्रदीप्ति वृत्त और पृथ्वी के अक्ष के बीच बनने वाले कोण के कारण साल के अधिकतर दिनों को पृथ्वी के दोनों गोलार्धों पर सूर्य की किरणें समान रूप से नहीं पड़ती हैं। इसी कारण से ऋतु में परिवर्तन होता है। 

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  • पृथ्वी की दो प्रकार की गतियाँ हैं
    1. घूर्णन/परिभ्रमण/दैनिक गति (Rotation) 
    2. परिक्रमण/वार्षिक गति (Revolution)

घूर्णन/परिभ्रमण/दैनिक गति (Rotation)

  • पृथ्वी का अपने अक्ष के सापेक्ष पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर घूमना ही ‘पृथ्वी का घूर्णन’ कहलाता है। इसे ‘परिभ्रमण गति‘ भी कहते हैं। 
  • पृथ्वी पश्चिम से पूर्व लगभग 1670 किमी/घंटे की चाल से 23 घंटे. 56 मिनट व 4 सेकंड में एक घूर्णन पूरा करती है। 
    • इसी कारण पृथ्वी पर दिन-रात होते हैं। 
  • वर्ष भर विषुवत् रेखा पर दिन व रातें समान होती हैं
    • क्योंकि विषुवत् रेखा का सूर्य के सापेक्ष कोणीय झुकाव सदैव शुन्य होता है।

घूर्णन/दैनिक गति के प्रभाव 

  • दिन और रात का होना। 
  • अंतरिक्ष में उपस्थित पिंड (सूर्य, चंद्रमा) पृथ्वी के चारों ओर पूर्व से पश्चिम की ओर घूमते दिखाई पड़ते हैं। 
  • हवाओं और धाराओं की दिशा का बदलना 
    • घूर्णन गति के प्रभाव से कोरिऑलिस बल की उत्पत्ति होती है, जिसके कारण उत्तरी गोलार्द्ध में पवनें अपनी दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपनी बाईं ओर मुड़ जाती हैं)। 
  • ज्वारीय तरंगों की दिशा प्रभावित होती है।

परिक्रमण (Revolution)  

  • अपने अक्ष पर घूमती हुई पृथ्वी सूर्य के चारों ओर लगभग 107,000 किमी/ घंटा की गति से दीर्घ वृत्ताकार कक्षा(elliptical orbit) में चक्कर लगाती है, इसे पृथ्वी की परिक्रमण गति’ कहते हैं। 
  • पृथ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा करने में 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट व 46 सेकंड का समय लगता है
    • लेकिन इसे 365 दिन ही मान लेते हैं और अतिरिक्त 6 घंटे को प्रत्येक चौथे वर्ष (6 x 4 = 24 घंटा = 1 दिन) में जोड़ दिया जाता है, जिसे अधिवर्ष (Leap year) कहते हैं, इसमें कुल 366  दिन होते हैं।
    • बढे हुए एक दिन को ‘फरवरी माह में जोड़ दिया जाता है, जिससे फरवरी प्रत्येक 4 साल बाद 28 के स्थान पर 29 दिन की होती है।

पृथ्वी की परिक्रमण/वार्षिक गति के प्रभाव 

  • दिन-रात का छोटा और बड़ा होना
  • ऋतु परिवर्तन
  • कर्क और मकर रेखाओं का निर्धारण
  • सूर्य की किरणों का सीधा और तिरछा चमकना
  • विषुव तथा उपसौर एवं अपसौर की स्थिति का होना
  • ध्रुवों पर 6 माह का दिन व 6 माह की रात का होना।

ऋतु परिवर्तन (Change of Seasons) 

  • पृथ्वी का अपने अक्ष पर झुकाव के कारण पृथ्वी पर सूर्य की किरणों का झुकाव अलग-अलग होता है। 
    • सूर्य की किरणों के भिन्न-भिन्न झुकाव के कारण पृथ्वी पर ताप का वितरण बदलता रहता है। 
    • इसी वितरण के कारण समय के साथ उस स्थान पर गर्मी अथवा सर्दी की ऋतु बन जाती है। 

पृथ्वी के परिक्रमण में चार मुख्य अवस्थाएँ आती है, जो निम्न हैं

  • A.उपसौर (Perihelion)
  • B.अपसौर (Aphelion)
  • C.विषुव(equinox)
    • ‘बसंत विषुव’ (Spring Equinox) 
    • ‘शरद विषुव’ (Autumn Equinox) 
  • D.अयनांत (solstice)
    • उत्तर अयनांत/ग्रीष्म अयनांत’ (Summer Solstice)
    • दक्षिण अयनांत/’शीत अयनांत’ (Winter Solstice) 

earth rotation

उपसौर (Perihelion) (P FOR PASS)

  • जब पृथ्वी सूर्य के अत्यंत पास होती है (147.5 मिलियन किमी), तो इस घटना को उपसौर कहते हैं। 

अपसौर (Aphelion) 

  • जब पृथ्वी सूर्य से अत्यधिक दूरी पर होती है तो उसे अपसौर (152.6 मिलियन किमी) कहते हैं। 
    • ऐसी स्थिति 4 जुलाई को होती है।

         earth rotation1

विषुव की स्थिति

  • विषुव की स्थिति में सूर्य विषुवत रेखा पर लंबवत्(perpendicular to the equator) चमकता है। 
  • विषुव की स्थितिमें समस्त विश्व में दिन और रात बराबर होते हैं। 

 21 मार्च

  • उत्तरी गोलार्द्ध में बसंत ऋतु तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में शरद ऋतु होती है

उत्तरी गोलार्द्ध

दक्षिणी गोलार्द्ध

बसंत ऋतु 

शरद ऋतु

23 सितंबर

  • उत्तरी गोलार्द्ध में शरद ऋतु होती है तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बसंत ऋतु होती है

उत्तरी गोलार्द्ध

दक्षिणी गोलार्द्ध

शरद ऋतु 

बसंत ऋतु

विषुव (उत्तरी गोलार्द्ध के सापेक्ष) 

अयनांत (solstice)

‘ग्रीष्म अयनांत’ (Summer Solstice) या ‘उत्तर अयनांत’ 

  • सूर्य 21 मार्च को विषुवत रेखा के लंबवत होता है और 21 मार्च के बाद सूर्य का उत्तर दिशा की ओर यानी कि उत्तरी गोलार्ध की ओर सूर्य  का उत्तरायण होने लगता है
    • उत्तरी गोलार्द्ध में दिन की अवधि बढ़ने लगती है, जिससेउत्तरी गोलार्द्ध में  ‘ग्रीष्म ऋतु’ का आगमन होता है। 
  • 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत् होता है। 
    • इस दिन उत्तरी गोलार्द्ध में दिन सबसे बड़ा तथा रात सबसे छोटी होती है। इस स्थिति को ‘ग्रीष्म अयनांत’ (Summer Solstice) या ‘उत्तर अयनांत’ भी कहते हैं। 
    • 21 मार्च से 21 जून की अवधि को ‘उत्तरायण’ कहते हैं। 
  • 21 मार्च से 23 सितंबर तक उत्तरी ध्रुव पर लगातार 6 महीने का दिन होता है और दक्षिणी ध्रुव में लगातार 6 महीने तक अँधेरा (रात )रहता है.

‘शीत अयनांत’ (Winter Solstice) अथवा ‘दक्षिण अयनांत’ 

  •  23 सितंबर से 21 मार्च तक दक्षिणी ध्रुव पर लगातार 6 महीने का दिन होता है। 
  • 22 दिसंबर को सूर्य मकर रेखा पर लंबवत् होता है। 
    • इस दिन दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन सबसे बड़ा और रात सबसे छोटी होती है। 
  • इस समय उत्तरी गोलार्द्ध में यहाँ शीत ऋतु रहती है। इस अवस्था को ‘शीत अयनांत’ (Winter Solstice) अथवा ‘दक्षिण अयनांत’ कहते हैं।

किरणों का प्रभाव 

लंबवत् किरणें

  • इससे पृथ्वी द्वारा ऊष्मा का अवशोषण अधिक होता है 

तिरछी किरणें 

  • इससे पृथ्वी द्वारा ऊष्मा का  अवशोषण कम होता है। 

सूर्यग्रहण (Solar Eclipse) 

  • जब सूर्य एवं पृथ्वी के बीच चंद्रमा आ जाता है, जिसके कारण पृथ्वी पर सूर्य का प्रकाश न पड़कर चंद्रमा की छाया पड़े तो इस स्थिति को ‘सूर्यग्रहण’ कहते हैं। 
    • सूर्यग्रहण प्रायः हमेशा अमावस्या को होता है
  • आंशिक सूर्यग्रहण – सूर्य का आंशिक भाग छिप जाता है
  • पूर्ण सूर्यग्रहण – जब पूरा सूर्य छिप जाता है

            Solar Eclipse

चंद्रग्रहण (Lunar Eclipse) 

  • जब सूर्य एवं चंद्रमा के बीच पृथ्वी आ जाता है, जिसके कारण चंद्रमा पर सूर्य का प्रकाश न पड़कर पृथ्वी की छाया पड़े तो इस स्थिति को ‘चंद्रग्रहण’ कहते हैं। 
  • चंद्रग्रहण प्रायः पूर्णिमा की रात को होता है
  • पूर्ण चंद्रग्रहण – पूरा चंद्रमा ढंक जाने पर 
  • आंशिक चंद्रग्रहण –  चन्द्रमा का कुछ भाग ढंक जाने पर 

                    Lunar Eclipse

युति-वियुति बिंदु/सिज़िगी’ (Syzygy)

  • जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की  स्थिति एक सीधी रेखा में होती है ,जिसके कारण सूर्यग्रहण व चंद्रग्रहण होता है, ‘सिज़िगी’ (Syzygy) या ‘युति-वियुति बिंदु’ कहलाता है। 

युति (Conjunction)

  • जब सूर्य और पृथ्वी के मध्य चंद्रमा होता है तो उसे ‘युति’ (Conjunction) कहते हैं। 
  • ऐसी स्थिति हमेशा सूर्यग्रहण के दौरान देखने को मिलती है। 

वियुति (Opposition)

  • जब सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी होती है तो उसे ‘वियुति’ (Opposition) कहते हैं। 
  • ऐसी स्थिति हमेशा चंद्रग्रहण के दौरान देखने को मिलती है।

            

सुपरमून (Supermoon)

  • जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नज़दीक होता है। इस स्थिति  को ‘पेरिजी फुल मून‘ भी कहा जाता है। 
  • इस दशा में चंद्रमा पहले की अपेक्षा 14% अधिक बड़ा और 30% ज्यादा चमकीला दिखाई पड़ता है।

ब्लू मून (Blue Moon) 

  • जब एक माह में दो पूर्णिमायें हों, तो दूसरी पूर्णिमा वाले चांद को ही ‘ब्लू मून’ कहा जाता है। 
  • दो पूर्णिमाओं वाला समयांतराल 30 या 31 दिन की माह में ही हो पाता है। 
  • ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति लगभग 2.5 वर्ष के बाद होती है। 
  • एक पूर्णिमा 29.5 दिन की होती है। इसलिये फरवरी माह में कभी भी ‘ब्लू मून’ की घटना नहीं हो सकती है। 
  • जब किसी वर्ष में दो या उससे अधिक माह ब्लू मून के होते हैं, ‘तो उसे ‘ब्लू मून ईयर’ कहा जाता है.

ब्लड मून (Blood Moon) 

  •  जब लगातार  चार पूर्ण चंद्रग्रहण लगते है, तो इसे ब्लड मून/’टेट्राड’ भी कहा जाता है। 

ज्वार-भाटा (Tide) 

  • ज्वार – समुद्री जलस्तर के ऊपर उठने को 
  • भाटा – समुद्री जलस्तर के नीचे गिरने को 
  • समुद्री सतह पर ज्वार व भाटा की उत्पत्ति के कारण 
  • चंद्रमा का पृथ्वी के अधिक निकट होने के कारण समुद्रीय सतह पर आने वाले ज्वार को सूर्य के आकर्षण बल की अपेक्षा चंद्रमा का आकर्षण बल अधिक प्रभावित करता है.
  • दीर्घ ज्वार की उत्पत्ति –  जब सूर्य, पृथ्वी, चंद्रमा एक सीध में होते हैं
    • इस तरह के ज्वार एक माह में दो बार (अमावस्या व पूर्णिमा) आते हैं। 
  • निम्न ज्वार की उत्पत्ति – जब सूर्य, चंद्रमा व पृथ्वी एक सीध में न होकर समकोण पर 

ज्वार-भाटा के  लाभ 

  • ज्वारीय तरंगों द्वारा जलविद्युत का उत्पादन 
  • आर्थिक दृष्टि से बहुत लाभदायक 
    • ज्वारीय तरंगों द्वारा मोती, शंख, सीपियाँ एवं अन्य बहुमूल्य पदार्थ तट पर आ जाते हैं 
    • ज्वारीय लहरों द्वारा उन्नत किस्म की मछलियाँ तटों पर आ जाती  हैं। इससे मत्स्य उद्योग में वृद्धि होती है।
  • सागरीय स्वच्छ बने  रहते हैं। 
  • ज्वारीय तरंगों के सहारे जलयानों को बंदरगाहों तक पहुँचने में सहायता मिलती है। 

ज्वार के प्रकार 

अयनवृत्तीय व भूमध्यरेखीय ज्चार 

  • अयनवृत्तीय ज्वार
    • जब चंद्रमा का अधिकतम झुकाव कर्क व मकर रेखा पर होता है तो इस स्थिति में आकर्षण बल के प्रभाव से आने वाले उच्च ज्वार को ‘अयनवृत्तीय ज्वार’ कहते हैं। 
    • ऐसी स्थिति महीने में दो बार होती है। 
  • ‘भूमध्यरेखीय ज्वार’
    • जब चंद्रमा का अधिकतम झुकाव भूमध्यरेखा पर होता है तो आकर्षण बल के प्रभाव से आने वाले ज्वार को ‘भूमध्यरेखीय ज्वार’ कहते हैं। 

उपभू व अपभू ज्वार 

  • उपभू ज्वार की उत्पत्ति 
  • अपभू ज्वार की उत्पत्ति
  • विश्व में सर्वाधिक ऊँचा ज्वार उत्तरी अमेरिका के पूर्वी किनारे पर स्थित ‘फंडी की खाड़ी’ (उत्तरी अटलांटिक महासागर) में आते हैं
  • इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर स्थित ‘साउथ हैंपटन की खाड़ी’ में प्रतिदिन चार बार ज्वार आते हैं। 
    • यहाँ पर सागरीय लहरें दो बार इंग्लिश चैनल से तथा दो बार उत्तरी सागर से भिन्न समयांतराल पर पहुँचती हैं।
  • प्रत्येक स्थान पर सामान्यतः दिन में दो बार ज्वार आता है। 
    • प्रत्येक ज्वार की उत्पत्ति हर 12 घंटे के अंतराल पर होनी चाहिये ,लेकिन चंद्रमा के घूर्णन व परिक्रमण तथा पृथ्वी की घूर्णन अवधि में अंतर होने के कारण प्रतिदिन ज्वार लगभग 26 मिनट की देरी से आता है।
  • पृथ्वी पर प्रत्येक स्थान पर प्रतिदिन 12 घंटे 26 मिनट के बाद ज्वार तथा ज्वार के 6 घंटा 13 मिनट बाद भाटा आता है 
  • ज्वार प्रतिदिन दो बार आते हैं