पादप आकारिकी (Morphology)

 पादप आकारिकी (Morphology)

  • पादप आकारिकी वनस्पति विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत पौधों की बाह्य संरचना जैसे-जड़, तना, पत्ती, पुष्प, फल आदि के रूपों एवं गुणों का अध्ययन किया जाता है। 
  • दूसरे शब्दों में Morphology का सम्बन्ध शारीरिक आकार के अध्ययन से है। 

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जड़ (Root) : 

  • पौधे का वह भाग जो बीजों के अंकुरण के समय मूलांकुर (Radicle) से विकसित होता है तथा प्रकाश के विपरीत (negatively phototropic) लेकिन जल एवं भूमि की तरफ बढ़ता है, जड़ (Root) कहलाता है। 
  • जड़ें मृदा से जल एवं विभिन्न प्रकार के खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं।

जड़ की विशेषताएँ

  • जड़ पौधों के अक्ष का अवरोही (Descending) भाग है, जो मूलांकुर (Radicle) से विकसित होता है। 
  • जड़ सदैव प्रकाश से दूर भूमि में वृद्धि करती है। 
  • भूमि में रहने के कारण जड़ों का रंग सफेद अथवा मटमैला होता है। 
  • जड़ों पर तनों के समान (Nodes) एवं (Internodes) नहीं पायी जाती है। 
  • जड़ों पर पत्र एवं पुष्प कलिकाएँ भी नहीं होती हैं। अतः ये पत्तियाँ, पुष्प एवं फल धारण नहीं करती हैं। 
  • जड़ें सामान्यतः धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती (Positivegeotropic)तथा ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती (Negative phototropic) होती हैं। 
  • जड़ का सिरा मूल गोप (Root cap) द्वारा सुरक्षित रहता है। 
  • जड़ पर एककोशिकीय रोम (Unicellular hairs) होते हैं।

जड़ के प्रकार : तीन प्रकार

  • 1. मूसला जड़ (Tap root) 
  • 2. अपस्थानिक जड़ (Adventitious root)
  • 3.रेशेदार या झकड़ा  जड़ (Fibrous root)

root types

1. मूसला जड़ (Tap root)

  • इस प्रकार की जड़ें अधिकांशतया द्विबीजपत्री पौधों (Dicotyledonous plant) में पायी जाती है। 
  • इस प्रकार की जड़ में मूलांकर (Radicle) विकसित होकर एक मुख्य जड़ का निर्माण करता है। 
  • मूसला जड़ के चारों तरफ पार्श्व शाखाएँ निकलती हैं, जिन्हें द्वितीयक जड़ (Secondary roots) कहते हैं। 
  • द्वितीयक जड़ों से पुनः पार्श्व शाखाएँ निकलती हैं, जिन्हें तृतीयक जड़ (Tertiary roots) कहते हैं। 
  • इस प्रकार ये सब मिलकर मूसला जड़ तंत्र (Tap root system) बनाती हैं। 

मूसला जड़ों ( tap root) के रूपान्तरण

  • कुछ पौधों में मूसला जड़ें खाद्य पदार्थों का संचय करके मोटी तथा मांसल हो जाती हैं तथा इस कारण इनकी आकृति भी बदल जाती है। 
  • आकृति के आधार पर मूसला जड़ को विभिन्न नाम से पुकारा जाता है। 

tap root

  • (a) तर्कुरूपी (Fusiform): इस प्रकार की मूसला जड़ें मध्य में फूली हुई तथा आधार एवं शीर्ष की ओर पतली होती हैं। जैसे—मूली (Radish)
  • (b) शंकुरूपी (Conical): इस प्रकारी की मूसला जड़ें आधार की ओर मोटी तथा नीचे की ओर क्रमशः पतली होती हैं। जैसे-गाजर (Carrot)
  • (c) कुम्भीरूपी (Napiform): इस प्रकार की मूसला जड़ों का ऊपरी भाग लगभग गोल तथा फूला हुआ होता है तथा नीचे की तरफ से एकाएक पतला हो जाता है। जैसे—शलजम (Turnip), चुकन्दर (Beet) आदि । .
  • (d) न्यूमेटाफोर (Pneumataphore): राइजोफोरा (Rhizophora),सुन्दरी (Sundari)आदि पौधे जो दलदली स्थानों पर उगते हैं, में भूमिगत मुख्य जड़ों से विशेष प्रकार की जड़ें निकलती हैं, जिसे न्यूमेटाफोर कहते हैं। ये खूटी के आकार की होती हैं, जो ऊपर वायु में निकल आती हैं। इनके ऊपर अनेक छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें न्यूमेथोडस (Pneumathodes) कहते हैं। जैसे—राइजोफोरा, सुन्दरी आदि ।
  • (e ) गांठदार (Tuberous): मिराबिलिस ,शकरकंद 

2. अपस्थानिक जड़ (Adventitious root) :

  • इस प्रकार की जड़ें एकबीजपत्रीय पौधों (Monocotyledonous plants) में पायी जाती हैं। 
  • इस प्रकार की जड़ में मूलांकुर (Radicle) बीज के अंकुरण (germination) के पश्चात् नष्ट हो जाता है। 
  • मूलांकुर के अतिरिक्त पौधे के किसी अन्य भाग से विकसित होने वाली जड़ों को अपस्थानिक जड़ (Adventitious root) कहते हैं। 

अपस्थानिक जड़ों (adventitious roots) का रूपान्तरण

  • भोजन संग्रह, पौधों को यांत्रिक सहारा (Mechanical support) प्रदान करने अथवा अन्य विशिष्ट कार्यों को करने के उद्देश्य से अपस्थानिक जड़ें अनेक प्रकार से रूपांतरित हो जाती हैं। 

adventitious roots

(A) भोज्य पदार्थों के संचय के लिए (For storage of food):

(i) कन्दिल जड़ें (Tuberous roots): 

  • खाद्य पदार्थों के संचय के कारण इस प्रकार की अपस्थानिक जड़ की कोई निश्चित आकृति नहीं होती है। जैसे-शकरकंद । 

(ii) पुलकित जड़ें (Fasciculated roots): 

  • इस प्रकार की अपस्थानिक जड़ों में अनेक मांसल च्छे के रूप में तने के आधार से निकलती हैं। जैसे—डहलिया (Dahlia)। 

(iii) ग्रन्थिल जड़ें (Nodulose roots)

  • इस प्रकार की अपस्थानिक जड़ें अपने सिरे पर फूलकर मांसल हो जाती हैं-जैसे—आमहल्दी(Mango ginger)

(iv) मणिकामय जड़ें (Moniliform roots) : 

  • इस प्रकार की अपस्थानिक जड़ें थोड़े-थोड़े अन्तराल पर फूली रहती हैं। ये आकार में मणिकाओं की माला की भाँति होती है। जैसे—अंगूर, करेला (Bittergourd)। 

(B) यांत्रिक सहारा प्रदान करने के लिए (For providing mechanical support):

(i) स्तम्भ मूल (Prop roots): 

  • कुछ पौधों की शाखाओं से अनेक जड़ें निकलती हैं जो मोटी होकर भूमि में प्रवेश कर जाती हैं। 
  • इस प्रकार ये वृक्षों की लम्बी एवं मोटी शाखाओं को सहारा प्रदान करती हैं। इस प्रकार की जड़ें ही स्तम्भ मूल (Prop root) कहलाती हैं। 
  • जैसे—बरगद, इण्डियन रबर आदि। 

(ii) अवस्तम्भ मूल (Stilt roots) : 

  • इस प्रकार की जड़ें मुख्य तने के आधार के समीप से निकलकर भूमि में तिरछी प्रवेश कर जाती हैं और पौधे को यांत्रिक सहारा प्रदान करती हैं। 
  • जैसे—मक्का , गन्ना आदि ।

(iii) आरोही मूल (Climbing roots): 

  • इस प्रकार की जड़ें हर्बल तनों की सन्धियों अथवा पर्व सन्धियों से निकलती हैं तथा पौधों को किसी आधार पर चढ़ने में सहायता करती हैं। 
  • इस प्रकार की जड़ें अगले सिरे पर फूलकर छोटी-छोटी ग्रन्थियाँ बनाती हैं, जिनसे एक तरह का चिपचिपा द्रव स्रावित होता है जो तुरन्त ही वायु के संपर्क में सूख जाता है। जैसे—पान, पोथोस आदि ।

(C) अन्य जैविक क्रियाओं के लिए रूपान्तरित अपस्थानिक जड़ें (Roots modified for performing other vital functions) 

(i)चूषण मूल (Sucking roots) : 

  • इस प्रकार की अपस्थानिक जड़ें कुछ-परजीवी पौधों में विकसित होती हैं, जो पोषक पौधों (Host plants) के ऊतकों में प्रवेश कर भोज्य पदार्थों का अवशोषण करती हैं। जैसे—अमरबेल, चन्दन आदि।

(ii) श्वसनी मूल (Respiratory roots) : 

  • इस प्रकार की अपस्थानिक जड़ें कुछ जलीय पौधों (Aquatic plants) में पायी जाती है। 
  • इन जलीय पौधों की प्लावी शाखाओं (Floating branches) से विशेष प्रकार की नर्म, हल्की एवं स्पंजी जड़ें निकलती हैं जिनमें वायु भर जाती है। 
  • इस प्रकार की जड़ें पौधों को तैरने एवं श्वसन में मदद करती हैं। जैसे-जूसिया

(iii) अधिपादप मल (Epiphytic roots) : 

  • इस प्रकार की अपस्थानिक जड़ें अधिपादपों (Epiphytic plants) में पायी जाती हैं। इस प्रकार की जड़ें पत्तियों के कक्ष से निकलकर हवा में लटकती रहती हैं। 
  • इन जड़ों में वेलमिन (Velamen) नामक आर्द्रताग्राही स्पंजी ऊतक उपस्थित होता है, जो वायुमण्डल की आर्द्रता को अवशोषित करता है। जैसे—ऑर्किड

(iv) स्वांगीकारक मूल (Assimilatory roots) : 

  • इस प्रकार की अपस्थानिक जड़ें तने के आधार से निकलकर फैल जाती हैं। 
  • ये हरी, लम्बी एवं बेलनाकार होती हैं। इनमें हरितलवक (Chlorophyll) भी पाया जाता है जिस कारण ये प्रकाश संश्लेषण क्रिया करती हैं । जैसे—सिंघाड़ा, टिनोस्पोरा (Tinospora) आदि ।

जड़ के कार्य (Functions of root) : 

  • 1.यह पौधों को भूमि में स्थिर रखती है। 
  • 2. मूल रोम (Root hairs) तथा जड़ों के कोमल भाग जल और घुलित खनिज लवण का अवशोषण करते हैं। 
  • 3. जड़ें अवशोषित जल एवं खनिज लवणों को ऊपर की ओर तने में और पत्ती में संवहन करते हैं। 
  • 4. कुछ जड़ें अपने अंदर भोज्य पदार्थों का संग्रह करते हैं प्रतिकूल परिस्थितियों में इन संचित भोज्य पदार्थों का पौधों द्वारा उपयोग किया जाता है।

तना (Stem) :

  • तना पौधे का वह भाग है जो कि भूमि एवं जल के विपरीत तथा प्रकाश (Light) की ओर वृद्धि करता है। 
  • यह प्रांकुर (Plumule) से विकसित होता है और शाखाओं, पत्तियों, फूल एवं फल धारण करता है।

तने की विशेषताएँ (Characteristics of stem) :

  • 1. तना पौधे का आरोही भाग है, जो भूमि के विपरीत प्रकाश की ओर गति करता है। (Negatively geotropic but positively phototropic). 
  • 2. तने की अग्र सिरे पर कलिकाएँ (Buds) पायी जाती हैं, जिनसे तना वृद्धि करता है।
  • 3. तने पर शाखाएँ (Branches) तथा पत्तियाँ लगती हैं। 
  • 4. तने का आकार बेलनाकार, चपटा अथवा कोणीय (Angular) होता है।

तने के प्रकार : 

भूमि की स्थिति के अनुसार तना तीन प्रकार के होते हैं। ये हैं

1. भूमिगत तना (Underground stem) : 

  • पौधे के तने का वह भाग जो भूमि के अंदर पाया जाता है, भूमिगत तना कहलाता है। 
  • प्रतिकूल परिस्थितियों में भूमिगत तने भोजन संग्रह करने के कारण मोटा एवं मांसल हो जाता है। 
  • जैसे—हल्दी, अदरक, केला, फर्न, आलू, प्याज, लहसुन, कचालू, जिमीकन्द, अरबी आदि। 

भूमिगत तने (Underground stem) का रूपान्तरण(Modifications of underground stem):

  • प्रतिकूल परिस्थितियों में भूमिगत तने भोजन संग्रह करने का कार्य करने लगते हैं, जिसके कारण वे फूलकर मोटे एवं मांसल हो जाते हैं।
  • ये निम्निलिखित प्रकार के होते हैं ।

Underground stem

(i) प्रकन्द (Rhizome)

  • यह मोटा, फैला हुआ भूमिगत तना होता है। 
  • इसमें कक्षस्थ तथा अग्रस्थ कलिकाएँ भी पायी जाती हैं । 
  • यह तना शाखारहित या शाखायुक्त हो सकता है। कभी-कभी इसमें अपस्थानिक जड़ (Adventitious roots) भी विकसित हो जाती है। 
  • इस प्रकार का भूमिगत तना हल्दी, अदरक, केला, फर्न आदि-पौधों में पाया जाता है। 

(ii) स्तम्भ कन्द (Stem tuber) : 

  • यह एक प्रकार का भूमिगत तना है। यह भोजन संग्रह करने के कारण शीर्ष पर फूल जाता है। 
  • इस प्रकार के तने की सतह पर अनेक गड्ढ़े होते है, जिन्हें आँखें (eyes) कहते हैं। 
  • प्रत्येक आँख एक शल्क पत्र होता है, जो पर्व-सन्धि की स्थिति को दर्शाता है तथा प्रसुप्त कलिकाएँ होती हैं। इन्हीं प्रसुप्त कलिकाओं से वायवीय (Aerial) शाखाएँ निकलती हैं जिनके अगले सिरे पर अग्रस्थ कलिका होती है जो कि अनुकूल परिस्थितियों में वृद्धि करके नए पौधे को जन्म देते हैं।
  • इस प्रकार का तना आलू में पाया जाता है।

(iii)शल्क कन्द (Bulb)

  • इस प्रकार का भूमिगत तना बहुत से छोटे-छोटे शल्क पत्रों से मिलकर बना होता है। यह शल्क पत्र जल तथा भोजन संग्रह करने के कारण मांसल (fleshy) हो जाते हैं। 
  • इस प्रकार के भूमिगत तने की बाहरी परत शुष्क (dry) होती है। यह केन्द्रीय क्रम में व्यवस्थित शल्क पत्र लिये हुए पाये जाते हैं। 
  • प्याज (Onion) तथा लहसुन (Garlic) इस प्रकार के भूमिगत तने का उत्तम उदाहरण है।

(iv) घनकन्द (Corm): 

  • इस प्रकार का भूमिगत तना  प्रकन्द (Rhizome) का संघनित रूप है। 
  • यह भूमि के नीचे उर्ध्व दिशा में वृद्धि करता है। इसमें अधिक मात्रा में भोजन संचित हो जाता है। शल्क पत्रों के कक्षा में कलिकाएँ पायी जाती हैं जबकि इसके आधार से अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं। 
  • कचालू एवं जिमीकन्द में इस प्रकार का भूमिगत तना देखने को मिलता है।

2. अर्द्धवायवीय तना (Sub aerial stem) : 

  • जब तने का कुछ भाग भूमि के अन्दर तथा कुछ भाग भूमि के बाहर वायु में पाया जाता है, तब इस प्रकार के तने को अर्द्धवायवीय-तना कहते हैं। 
  • जैसे—दूब घास, मसलिया, पैसीफ्लोरा, अरुई, जलकुम्भी, समुद्री सोख, गुलदाऊदी, पिपरमिन्ट आदि । 
  • अर्द्धवायवीय तने में कायिक जनन के लिए कलिकाएँ पायी जाती हैं, जिनसे पार्श्व शाखाओं (Lateral branches) की उत्पत्ति होती है।

अर्द्धवायवीय तने (sub aerial stem) का रूपान्तरण

sub aerial stem

(i) उपरिभूस्तरी (Runner)

  • यह भूमि की सतह के समानान्तर फैला हुआ अर्द्धवायवीय तना है। 
  • इस प्रकार के तने में लम्बे एवं पतले पर्व (Inter nodes) पाये जाते हैं। पर्वसन्धियों से ऊपर की ओर शाखाएँ एवं तना तथा भूमि के अन्दर अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं दूब घास, मसलिया आदि में उपरिभूस्तरी तना पाया जाता है। 

(ii) भूस्तरी (Stolon) : 

  • इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना भूमि के अन्दर क्षैतिज दिशा में वृद्धि करता है। इस प्रकार के तने पर पर्व (Internode) तथा पर्व सन्धियाँ (Nodes) पाये जाते हैं। 
  • पर्व सन्धियों से नीचे की ओर अपस्थानिक जड़ें तथा ऊपर की ओर शाखाएँ विकसित होती हैं। 
  • अरुई तथा पैसीफ्लोरा में इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना पाया जाता है। 

(iii) भूस्तारिका (Offset) : 

  • इस प्रकार का अर्द्ध वायवीय तना उपरिभूस्तरी (Runner) की तरह ही होता है, परन्तु इनके पर्व (nodes) मोटे तथा छोटे होते हैं। पर्व सन्धियों से ऊपर पत्तियाँ एक स्वतंत्र पौधे की भाँति होती है। 
  • जलकुम्भी भूस्तारिका का अच्छा उदाहरण है।

(iv) अन्तःभूस्तरी (Suckers): 

  • इस प्रकार के अर्द्धवायवीय तने में भूस्तरी (Stolon) तने की तरह एक पार्श्व शाखा होती है, परन्तु यह ऊपर की ओर तिरछा बढ़ता है और एक नए पौधे को जन्म देता है। यह भूस्तरी (stolon) की तुलना में छोटा होता है। 
  • इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना गुलदाऊदी, पिपरमिण्ट आदि में देखने को मिलता है।

3. वायवीय तना (Aerial stem): 

  • जब सम्पूर्ण तना भूमि के ऊपर स्थित होता है, तो ऐसे तने को वायवीय तना कहते हैं। इस प्रकार के तने में शाखाएँ, पत्तियाँ, पर्व, पर्वसन्धियाँ, कलिकाएँ, फल, फूल सभी पाये जाते हैं। उदाहरण—गुलाब, अंगूर, नागफनी, रस्कस, कोकोलोवा आदि । 

वायवीय तने (Aerial Stem) का रूपान्तरण

stem Modifications

(i) कंटक स्तम्भ (Stem thorn) :

  • इस प्रकार के तने में कक्षस्थ कलिकाएँ काँटे (thorn) के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं | 
  • इन काँटों पर पत्ती, शाखा एवं पुष्प विकसित होते हैं। 
  • नींबू , वोगेनविलिया आदि पौधों में कंटक स्तम्भ पाये जाते है।

(ii) स्तम्भ प्रतान (Stem tendril): 

  • इस प्रकार के तने में पत्तियों के कक्ष से निकली शाखा बनाने वाली कलिका एक कुण्डलित, तन्तु बना लेती है जो कमजोर तने वाले पौधों के आरोहण में सहायता करती है। यह तन्तु (Filament) ही स्तम्भ प्रतान कहलाता है। 
  • अंगूर तथा कुकरबिटेसी कुल के पौधों में स्तम्भ प्रतान पाया जाता है।

(iii) पर्णकाय स्तम्भ (Phylloclade) : 

  • यह एक हरा, चपटा तथा कभी-कभी गोल-सा तना होता है जो कि पत्तियों की भाँति कार्य करता है। 
  • इसकी पत्तियाँ काँटे रूपी संरचना में परिवर्तित हो जाती हैं। यह रूपान्तरण पौधों से होने वाले जल हानि को रोकता है। पर्णकाय स्तम्भ अनिश्चित वृद्धि वाले शाखा से विकसित होता है। 
  • नागफनी (Opuntia) तथा केजुराइना (Casurina) पर्णकाय स्तम्भ का उत्तम उदाहरण है। 

(iv) पर्णाभ पर्त (Cladode) : 

  • कुछ पौधों की पर्त सन्धियाँ से छोटी, हरी, बेलनाकार अथवा चपटी शाखाएँ निकलती हैं। इस प्रकार की शाखाएँ पत्तियों के कक्ष से निकलती हैं, जो स्वयं शल्क पत्र (Scaly leaves) में रूपांतरित हो जाती हैं। ऐसा रूपांतरण पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करने के उद्देश्य से होता है। 
  • प्रकाश संश्लेषण की क्रिया हरे तने एवं उसकी शाखाओं के द्वारा सम्पादित होती है। तनों के इस प्रकार के रूपान्तरण को पर्णाभ-पर्व (Cladode) कहते हैं। 
  • सतावर (Asparagus), रस्कस (Ruscus) पर्णाभ पर्व का सुन्दर उदाहरण हैं। 

 (v) पत्र प्रकलिका (Bulbil) : 

  • कुछ पौधों की कक्षस्थ एवं पुष्प कलिकाएँ विशेष छोटे आकार की रचना में रूपांतरित हो जाती हैं, जिन्हें पत्र-प्रकलिका (Bulbil) कहते हैं। 
  • ये पत्र-प्रकलिका अपने मातृ पौधे (Mother plant) से अलग होकर मिट्टी में गिर जाती हैं तथा अनुकूल परिस्थितियों में विकसित होकर नए पौधों को जन्म देती हैं। 
  • अलोय (Aloe), अगेव (Agave) आदि-पौधों में पत्र-प्रकलिका देखने को मिलता है।

पत्ती (Leaf) :

  • हरितलवक की उपस्थिति के कारण पत्ती का रंग हरा होता है ।

पत्ती के भाग : आकारिकीय दृष्टि से पत्ती के तीन भाग होते हैं

1. पत्राधार (Leaf base)

  • यह पत्ती का आधारीय भाग है जो पत्रवृन्त (Petiole) और स्तम्भ (stem) को जोड़ता है।

2. पत्रवृन्त (Petiole):

  • अधिकांश पत्तियों में एक लम्बा डण्ठल होता है जिसे पत्रवृन्त (Petiole) कहते हैं। 
  • जिन पत्तियों में पत्रवृन्त होता है, उन्हें सवृन्त (Petiolate) कहते हैं। जैसे—आम, पीपल आदि । 
  • जिन पत्तियों में पत्रवृन्त नहीं होता है, उन्हें अवृन्त (sessile) कहते हैं। जैसे—मक्का, गेहूँ आदि। 
  • पत्रवृन्त पत्ती के फलक को प्रकाश में उठाए रखता है ताकि अधिक-से-अधिक प्रकाश प्राप्त हो सके।

3. पत्रफलक (Leaf blade या Lamina)

  • यह पत्ती का हरा, चपटा एवं फैला हुआ भाग होता है। 
  • इसके मध्य में पत्रवृन्त (Petiole) से लेकर पत्ती के शीर्ष तक प्रायः एक मोटी शिरा होती है, जिसे मध्य शिरा (Mid rib) कहते हैं। 
  • मध्य शिरा से दोनों तरफ अनेक पतली-पतली शिराएँ निकलती हैं जिससे पुनः और पतली शिराएँ निकलती हैं। 
  • ये पत्रफलक को कंकाल की भाँति दृढ़ता प्रदान करते हैं परन्तु इसका मुख्य कार्य जल तथा भोज्य पदार्थों का परिवहन करना है।

पत्ती के प्रकार (Types of Leaf) : 

पत्रफलक के कटाव के आधार पर पत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं

  • सरल पत्ती 
  • संयुक्त पत्ती 

1. सरल पत्ती (Simple leaf) : 

  • वह पत्ती, जिसका फलक अधिक हो और यदि कटा भी हो तो कटाव कभी-भी मध्य शिरा या पत्रवृन्त तक न पहुँचे, सरल पत्ती कहलाती है। जैसे—आम की पत्ती।

2. संयुक्त पत्ती (Compound leaf) :

  • वह पत्ती जिसका पत्रफलक का कटाव कई स्थानों पर फलक की मध्य शिरा (Midrib) या फलंक के आधार तक पहुँच जाता है तथा जिसके फलस्वरूप फलक अनेक छोटे-छोटे खण्डों में बँट जाता है, संयुक्त पत्ती कहलाती है। 

पत्तियों के कार्य (Function of leaves):

पत्तियाँ पौधे का महत्त्वपूर्ण अंग है । यह निम्नलिखित प्रमुख कार्य सम्पादित करती है

  • 1. पत्तियाँ प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा पौधों के लिए भोजन का निर्माण करती हैं।
  • 2.पत्तियाँ प्रकाश-संश्लेषण एवं श्वसन के लिए विभिन्न गैसों का आदान-प्रदान करती हैं। 
  • 3.पत्तियाँ उत्स्वेदन (Transpiration) की क्रिया को नियंत्रित करती है। 
  • 4. पत्तियाँ कलिकाओं को सुरक्षा प्रदान करती हैं। यह कन्टकों (thorns) में रूपान्तरित होने पर पशु-पक्षियों से पौधों की रक्षा करती है। 
  • 5. प्रतन्तओं में रूपान्तरित होने पर यह कमजोर पौधों को मजबूत आधार प्रदान करती है, तथा आरोहण में मदद करती है। 
  • 6. कीटभक्षी पौधों में पिचर(Pitcher), ब्लेडर(Bladder) आदि में यह रूपान्तरित होकर प्रोटीनयुक्त पोषण में सहायता करती है। 
  • 7. यह जल तथा घुलनशील, भोज्य पदार्थों का पत्तियों से स्तम्भ तक संचरण में सहायता करती है। 
  • 8. कुछ पत्तियाँ वर्षी प्रजनन (Vegetative reproduction) एवं परागण (Pollination) में सहायता करती हैं। 
  • 9. कुछ पत्तियाँ भोजन संग्रह (Food Storage) का कार्य भी करती हैं।

पत्तियों का रूपान्तरण (Modification of Leaves)

पत्तियाँ कुछ विशेष कार्य सम्पादित करने हेतु रूपान्तरित हो जाती हैं। जैसे

1. पर्ण कंटक (Leaf spines) : 

  • इसमें पत्तियाँ काँटों या शूलों (Spines) में रूपान्तरित हो जाती हैं। जैसे—आर्जिमोन, नागफनी आदि। 

2. पर्ण प्रतान (Leaf tendril)

  • इसमें पत्तियाँ रूपान्तरित होकर लम्बी, पतली, तारनुमा कुण्डलित रचना में बदल जाती हैं जिसे प्रतान (Tendril) कहते हैं। ये प्रतान अति संवेदनशील होते हैं और ज्योंहि वे किसी आधार के सम्पर्क में आते हैं, उसके चारों ओर लिपट जाते हैं। इस प्रकार वे पौधों को आरोहण में सहायता प्रदान करते हैं। जैसे—मटर।

3. पर्णाभवृन्त (Phyllode)

  • इसमें पर्णवृन्त अथवा रेकिस का कुछ भाग चपटा एवं हरा होकर पर्णफलक जैसा रूप ग्रहण कर लेता है। इसे ही पर्णाभवृन्त कहते हैं। 
  • यह प्रकाश संश्लेषण का कार्य करता है क्योंकि पौधे की सामान्य पत्तियाँ नवोद्भिद (Seedling) अवस्था में ही गिर जाते हैं। जैसे—आस्ट्रेलियन बबूल।

4. घटपर्णी (Pitcher)

  • घट (Pitcher) की भीतरी सतह पर पाचक ग्रन्थियाँ (digestive glands) होती हैं, जिनसे पाचक रस निकलता है। 
  • जब कोई कीट आकर्षित होकर फिसलकर घट में गिर जाता है तो घट का ढक्कन स्वतः बन्द हो जाता है। कीट पाचक रस द्वारा पचा लिया जाता है। इस क्रिया द्वारा पौधे अपने नाइट्रोजन की आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। जैसे—घटपर्णी (Pitcher plant)

5. ब्लैडर वर्ट (Bladderwort)

  • यूट्रीकुलेरिया (Utricularia) जैसे जलीय कीटभक्षी पौधों में पत्तियाँ अनेक छोटे-छोटे खण्डों में बँटी होती हैं। कुछ खण्ड रूपान्तरित होकर थैलीनुमा संरचना बनाते हैं। प्रत्येक थैली (bladder) में एक खोखला कक्ष (Empty chamber) होता है, जिसमें एक मुख होता है। इस मुख पर एक प्रवेश द्वार होता है जिससे होकर केवल सूक्ष्म जलीय जन्तु ही प्रवेश कर सकते हैं। थैली या ब्लैडर के अंदर पाचक एन्जाइम उन सूक्ष्म जन्तुओं को पचा डालते हैं। 

पुष्प (Flowers) : 

  • आकारकीय (Morphological) रूप से पुष्प एक रूपान्तरित प्ररोह (स्तम्भ) है जिस पर गाँठें तथा रूपान्तरित पुष्पी पत्तियाँ लगी रहती हैं। 
  • पुष्प प्रायः तने या शाखाओं के शीर्ष अथवा पत्ती के अक्ष (Avil) में उत्पन्न होकर प्रजनन (Reproduction) का कार्य करती है तथा फल एवं बीज उत्पन्न करता है।

पुष्प की रचना : 

  • पुष्प एक डंठल द्वारा तने से सम्बद्ध होता है। इस डंठल को वृन्त या पेडिसेल (Pedicel) कहते हैं। 
  • वृन्त के सिरे पर स्थित चपटे भाग को पुष्पासन या थेलामस (Thalamus) कहते हैं। 
  • इसी पुष्पासन पर पुष्प के विविध पुष्पीय भाग (Floral Parts) एक विशेष प्रकार के चक्र (Cycle) में व्यवस्थित होते हैं। 

पुष्प के चार मुख्य भाग होते हैं-

  • 1. बाह्य दलपुंज (Calyx) 
  • 2. दलपुंज (Corolla)
  • 3. पुमंग (Androecium)  
  • 4.जायांग (Gynoecium)
  • बाह्य दलपुंज एवं दलपुंज को पुष्प का सहायक अंग या अनावश्यक भाग तथा पुमंग एवं जायांग को पुष्प का आवश्यक भाग कहा जाता है। 
  • पुमंग एवं जायांग पुष्प के वास्तविक जनन भाग हैं। 
  • पुमंग पुष्प का नर जनन भाग तथा जायांगमादा जनन भाग है।

1. बाह्य दलपुंज (Calyx) : 

  • यह पुष्प के सबसे बाहर का चक्र है। यह हरे छोटी पत्तीनुमा संरचनाओं का बना होता है जिन्हें बाह्य दल (Sepals) कहते हैं। जब ये स्वतंत्र होते हैं तो इन्हें पृथक बाह्यदलीय (Polysepalous) कहते हैं और जब जुड़े होते हैं तो इन्हें संयुक्त बाह्यदलीय (Gamosepalous) कहते हैं। 
  • ये कली (Buds) को तथा उसके अन्य आन्तरिक भागों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। 
  • कुछ पुष्पों में यह रंगीन होकर परागण के लिए कीटों को आकर्षित करने का काम करता है।

2. दलपुंज (Corolla)

  • यह पुष्प का दूसरा चक्र होता है जो बाह्य दलपुंज के अन्दर स्थित होता है। 
  • यह प्रायः 2-6 दलों (Petals) का बना होता है। ये प्रायः रंगीन होते हैं। 
  • इसका मुख्य कार्य परागण हेतु कीटों को आकर्षित करना है। 
  • जब दल (Petals) स्वतंत्र होते हैं, तो उन्हें पृथक दलीय (Polypetalous) तथा जब वे जुड़े होते हैं तो उन्हें संयुक्त दलीय (Gamopetalous) कहते हैं।

3. पुमंग (Androecium) : 

  • यह पुष्प का तीसरा चक्र है जो नर अंगों का बना होता है। 
  • प्रत्येक  नर अंग पुंकेसर (Stamen) कहलाता है। 
  • पुंकेसर ही पुष्प का वास्तविक नर भाग है। 
  • प्रत्येक पुंकेसर के तीन भाग होते हैं
    • तन्तु या फिलामेंट (Filament) 
    • परागकोष या ऐन्थर (Anther) तथा 
    • योजी या कनेक्टिव (Connective)। 

पुतन्तु पतला सूत्रनुमा भाग होता है जो पुंकेसर को पुष्पासन से जोड़ता है। 

  • पुंकेसर में एक द्विपालिक (bilobed) रचना होती है जिसे परागकोष (Anthers) कहते हैं। 
  • परागकोष में चार कोष्ठ होते हैं, जिन्हें परागपुट (Pollen sacs) कहते हैं। परागपुट में ही परागकण (Pollen grains) की उत्पत्ति होती है। 
  • परागकण ही वास्तविक नर युग्मक (Male gamete) होता है। 
  • जब परागकोष पक जाते हैं तब वे फट जाते हैं और परागकण प्रर्कीर्णन के लिए तैयार होते हैं। योजी (Connective) पुतन्तु तथा परागकोष को जोड़ने का काम करता है। 

जायांग (Gynoecium) : 

  • जायांग पुष्प का  मादा भाग है। 
  • यह पुष्प का चौथा और सबसे भीतरी चक्र है। 
  • यह अण्डपों (Carpels) से निर्मित होता है। 
  • अण्डप के किनारों से बीजाण्ड (Ovules) उत्पन्न होते हैं । इन्हीं बीजाण्डों में मादा युग्मक अण्डाणु होते हैं। विभिन्न पादपों में बीजाण्डों की संख्या निश्चित होती है। वर्तिका अंडाशय के ऊपर का लम्बा एवं पतला भाग होता है जबकि वर्तिकाग्र (Stigma) वर्तिका (Style) का सबसे ऊपर का भाग होता है जो चिपचिपा होता है।

बीजाण्ड की रचना (Structure of ovule)

  • बीजाण्ड साधारणतः अण्डाकार होता है। 
  • यह एक बीजाण्ड वृन्त (Funiculus) द्वारा बीजाण्डसन से जुड़ा रहता है। जिस स्थान पर बीजाण्ड बीजाण्ड-वृन्त द्वारा लगा रहता है उस हिस्से को हाइलम (Hilum) कहते हैं। बीजाण्ड वृन्त अटकर बीजाण्ड से मिलकर एक स्थान बनाता है, जिसे रैफे (Raphe) कहते हैं। 
  • बीजाण्ड के भीतर भ्रूणकोष (Embryosac) होता है। 
  • इस भ्रूणकोष के भीतर मादा युग्मक (अंडाणु) उपस्थित होता है। 
  • भ्रूणकोष परिपक्व होकर निषेचन (Fertilization) के लिए तैयार होता है। 

नोट :

  • पुष्पों का अध्ययन एन्थोलॉजी (Anthology) कहलाता है। 
  • जिन पुष्पों में पुष्प के चारों चक्र (बाह्य दलपुंज, दलपुंज, पुमंग एवं जायांग) उपस्थित होते हैं, उन्हें पूर्ण पुष्प (Complete flower) कहते हैं। 
  • जिन पुष्पों में पुष्प के एक या अधिक चक्र अनुपस्थित होते हैं, उन्हें अपूर्ण पुष्प (Incomplete flower) कहते हैं। 
  • बाह्य दलपुंज एवं दलपुंज को पुष्प का सहायक अंग (Accessary organ) तथा पुमंग एवं जायांग को आवश्यक अंग (Essential organ) कहते हैं। 

पुष्प का कार्य

  • पुष्प का मुख्य कार्य लिंगीय प्रजनन द्वारा फल तथा उसके अन्दर बीज का निर्माण करना है।

परागण (Pollination)

  • परागकणों (Pollengrains) के परागकोष (Anther) से मुक्त होकर उसी जाति के पौधे के जायांग (Gynoecium) के वर्तिकाग्र (Stigma) तक पहुँचने की क्रिया को परागण कहते हैं

परागण के प्रकार (Type of Pollination) : परागण दो प्रकार के होते हैं

1.स्वपरागण (Self Pollination) :

  • जब एक पुष्प के परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर या उसी पौधे पर स्थित किसी अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचता है, तो इसे स्व-परागण कहते हैं।

2. पर-परागण (Cross pollination) :

  • जब एक पुष्प का परागकण उसी जाति के दूसरे पौधे पर स्थित पुष्प के वर्तिकाग्र  पर पहुँचता है, तो उसे पर-परागण कहते हैं। 
  • पर-परागण कई माध्यमों से होता है। पर परागण पौधों के लिए उपयोगी होता है। पर-परागण के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता होती है। 
  • वायु, कीट, जल या जन्तु इस आवश्यकता की पूर्ति करते हैं।

परागण की विधियाँ (Methods of pollination) : 

परागण की निम्नलिखित विधियाँ हैं 

  • 1. वायु परागण (Anemophilous) : वायु द्वारा परागणी 
  • 2. कीट परागण (Entomophilous) : कीट द्वारा परागण 
  • 3. जल परागण (Hydrophilous) : जल द्वारा परागण 
  • 4. जन्तु परागण (Zoophilous) : जन्तु द्वारा परागण 
  • 5. पक्षी परागण (Ornithophilous) : पक्षियों द्वारा परागण 
  • 6. मेलेकोफिलस (Malacophilous) : घोंघे द्वारा परागण 
  • 7. चिरोप्टोफिलस (Chiroptophilous) :चमगादड़ द्वारा परागण
  • परागण के पश्चात निषेचन की क्रिया प्रारम्भ होती है। 

निषेचन (Fertilization)

  • परागण क पश्चात निषेचन की क्रिया प्रारम्भ होती है 
  • परागनली (Pollen tube) बीजाण्ड (ovule) में प्रवेश करके बीजाण्डासन से होते हुए भ्रूणपोष(Endosperm) तक पहुँचती है और  परागकणों को वहीं छोड़ देती है। 
  • इसके पश्चात् एक नर युग्मक एक अण्डकोशिका से सयोजन करता है। इसे ही निषेचन कहते हैं। 
  • अब निषेचित अण्ड (Fertilized egg) युग्मनज (Zygote) कहलाता है । 
  • यह युग्मनज-बीजाणुभिद की प्रथम इकाई है। 
  • निषेचन के पश्चात बीजाण्ड से बीज, युग्मनज से भ्रूण (embryo) तथा अण्डाशय से फल का निर्माण होता है। 
  • आवृत्तबीजी पौधों (Angiospermic plants) में निषेचन को त्रिक संलयन (Triple fusion) कहते हैं।

निषेचन के पश्चात् पुष्प में होने वाले परिवर्तन : 

  • निषेचन के पश्चात् पुष्प में निम्नलिखित प्रकार के परिवर्तन देखने को मिलते हैं
  • 1. बाह्य दलपुंज (Calyx) : यह प्रायः मुरझाकर गिर जाता है। अपवाद-मिर्च ।
  •  2. दलपुंज (Corolla) : यह मुरझाकर गिर जाता है ।
  • 3. पुंकेसर (Stamen) : यह मुरझाकर झड़ जाता है। 
  • 4. वर्तिकाग्र (Stigma): यह मुरझा जाती है।
  • 5. वर्तिका (Style) : यह मुरझा जाती है। 
  • 6. अण्डाशय (Ovary): यह फल में परिवर्तित हो जाती है।
  • 7. अण्डाशय भित्ति (Ovary wall) : यह फलाभित्ति में परिवर्तित हो जाती है। 
  • 8. त्रिसंयोजक केन्द्रक (Triple fused nucleus) : यह भ्रूणपोष (Endosperm) में परिवर्तित हो जाती है ।
  • 9. अण्डकोशिका (Egg cells) : यह भ्रूण (embryo) में परिवर्तित हो जाता है। 
  • 10. बीजाण्डसन (Nucellus) : यह पेरीस्पर्म (Perisperm) में परिवर्तित हो जाती है। 
  • 11. बीजाण्ड (Ovule) : यह बीज (seed) में परिवर्तित हो जाती है।

फल का निर्माण (Formation of Fruits)

  • फल का निर्माण अण्डाशय (Ovary) से होता है। 
  • परिपक्व अण्डाशय को ही फल (Fruit) कहा जाता है। 
  • परिपक्व अण्डाशय की भित्ति फल-भित्ति (Pericarp) का निर्माण करती है। फल-भित्ति मोटी या पतली हो सकती है। 
  • मोटी फलभित्ति में प्रायः तीन स्तर हो जाते हैं। बाहरी स्तर को बाह्य फलभित्ति (Epicarp), मध्य स्तर को मध्य फलभित्ति (Mesocarp) तथा सबसे अन्दर के स्तर को अन्तःफलभित्ति (Endocarp) कहते हैं।

फल के प्रकार : फल के मुख्यतः दो प्रकार होते हैं

  • 1. सत्य फल (True Fruit)
  • 2. असत्य फल (False fruit)

1. सत्य फल (True Fruit) यदि फल के बनने में केवल अण्डाशय ही भाग लेता है, तो उसे सत्य फल कहते हैं। जैसे—आम।

2. असत्य फल (False fruit) : 

  • कभी-कभी अण्डाशय-के अतिरिक्त पुष्प के अन्य भाग, जैसे—पुष्पासन, बाह्यदल इत्यादि भी फल बनने में भाग लेते हैं। ऐसे फलों को असत्य फल या कूट फल कहते हैं।  जैसे—सेब (Apple) में पुष्पासन (Thalamus) फल बनाने में भाग लेता है।

सम्पूर्ण फलों को तीन भागों में विभाजित किया गया है

  • 1. सरल फल (Simple Fruits)
  • 2. पुंज फल या समूह फल (Aggregate Fruits)
  • 3. संग्रहित फल (Composite fruits)
  • 1. सरल फल (Simple Fruits) : जैसे—अमरूद, केला, नारियल, सुपारी, खीरा, ककड़ी, लौकी, तरबूज, सन्तराँ, मुसम्मी, नींबू, टमाटर, मिर्च, अंगूर, पपीता, सेब, नाशपाती, अनार आदि । 
  • 2. पुंज फल या समूह फल (Aggregate Fruits)जैसे—शरीफा, रसभरी, मदार, चम्पा, सदाबहार, कमल, स्ट्राबेरी आदि।
  • 3. संग्रहित फल (Composite fruits)जैसे-शहतूत, कटहल, अनन्नास, बरगद, गूलर, अंजीर आदि।

1. सरल फल (Simple Fruits):

  • जब किसी पुष्प के अण्डाशय से केवल एक ही फल बनता है, तो ऐसे फलों को सरल फल कहते हैं। 
  • सरल फल को एकल फल भी कहा जाता है। 
  • सरल फल भी दो प्रकार के होते हैं
    • (a) सरस फल (Succulent fruits)
    • (b) शुष्क फल (Dry fruits): 

(a) सरस फल (Succulent fruits):इस प्रकार का सरल फल रसदार, गुदेदार तथा अस्फुटनशील  होता है। जैसे—आम, नारियल आदि।

  • सरस फल छः प्रकार के होते हैं
  • (i) अष्ठिल फल (Drupe) : जैसे—आम, बेर, नारियल, सुपारी आदि । 
  • (ii)  पीपो (Pepo) : जैसे—खीरा, ककड़ी, लौकी, तरबूज आदि। 
  • (iii) हेस्पिरीडियम (Hespiridium) : जैसे—संतरा, मुसम्मी, नींबू आदि । 
  • (iv) बेरी (Berry) : जैसे- टमाटर, अमरूद, मिर्च, अंगूर, केला आदि।
  • (v) पोम (Pome) : जैसे-सेब, नाशपाती आदि ।
  • (vi) बैलस्टा (Balausta) : जैसे-अनार । 

(b) शुष्क फल (Dry fruits): 

  • यह नौ प्रकार का होता है- 
  • (i) कैरियोप्सिस (Caryopsis) : जैसे—गेहूँ, मक्का , जौ, धान आदि। 
  • (ii) सिप्सेला (Cypsella) : जैसे—गेंदा, सूर्यमुखी आदि। 
  • (iii) नट (Nut) : जैसे—सिंघाड़ा, लीची, काजू आदि। 
  • (iv) फली (Legume or pod) : जैसे मटर, सेम, चना आदि । 
  • (v) सिलिक्यूआ (Siliqua) : जैसे–सरसों, मूली, आदि ।
  • (vi) कोष्ठ विदारक (Loculicidal) : जैसे—भिण्डी, कपास,आदि । 
  • (vii) लोमेण्टम (Lomentum) : बबूल, इमली, मूंगफली आदि । 
  • (viii) क्रेमोकार्प (Cremocarp) : जैसे-सौंफ, जीरा, धनिया आदि ।
  • (ix) रेग्मा (Regma) : जैसे-रेड़ी।

2. पुंज फल या समूह फल (Aggregate Fruits):

  • जब एक ही बहुअण्डपी पुष्प के वियुक्ताण्डपी अण्डाशयों से अलग-अलग फल बने, परन्तु समूह के रूप में रहें तो ऐसे फल को पुंज फल या समूह फल कहते हैं। जैसे—स्ट्राबेरी, शरीफा, चम्पा, मदार आदि।
  • पुंजफल भी चार प्रकार के होते हैं
  • (i) बेरी का पुंजफल (Etaerio of berries) : जैसेशरीफा।
  • (ii) अष्टिल का पुंजफल (Etaerio of drupes) : जैसे—रसभरी। 
  • (iii) फालिकिल का पुंजफल (Etaerio of folicles) : जैसे—चम्पा, मदार, सदाबहार आदि।
  • (iv) एकीन का पुंज फल (Etaerio of achenes): जैसे—कमल, स्ट्राबेरी आदि ।

3. संग्रथित फल (Composite fruits): 

  • जब एक ही सम्पूर्ण पुष्पक्रम के पुष्पों से पूर्ण फल बनता है, तो उसे संग्रथित फल कहते हैं। जैसे—अनन्नास, शहतूत, कटहल, बरगद, गूलर, अंजीर आदि।
  • संग्रथित फल दो प्रकार के होते हैं-
  • (i) सोरोसिस (Sorosis) : जैसे-शहतूत, कटहल, अनन्नास आदि ।
  • (ii) साइकोनस (Syconus) : जैसे—बरगद, गूलर, अंजीर आदि।
  • फल, पौधों के लिए लाभदायक है, क्योंकि यह बीजों की रक्षा करता है। यह बीजों के प्रकीर्णन Persal) में सहायता करता है। 
  • फलों-व-उनके उत्पादन अध्ययन को पोमोलॉजी (Pomology) कहते हैं।

फल 

खाने योग्य भाग

आम 

मध्य फलभित्ति

सेब

पुष्पासन

नाशपाती

पुष्पासन

लीची

एरिल

नारियल

भ्रूणपोष

अमरूद 

फलभित्ति

पपीता

मध्य फलभित्ति

मूंगफली

बीजपत्र एवं भ्रूण

काजू

बीजपत्र

बेर 

बाह्य एवं मध्य फलभित्ति

अनार

रसीले बीजचोल 

अंगूर

फलभित्ति

कटहल

सहपत्र परिदल एवं बीज 

गेहूँ

भ्रूणपोष 

धनिया

पुष्पासन एवं बीज

शरीफा

फलभित्ति

सिंघाड़ा

बीजपत्र

नींबू

रसीले रोम

बेल

मध्य एवं अन्तः फलभित्ति

टमाटर

फलभित्ति एवं बीजाण्डसन 

शहतूत

सहपत्र, परिदल एवं बीज

 

अनिषेक फलन (Parthenocarpy): 

  • कुछ पौधों में बिना निषेचन के ही अण्डाशय से फल का निर्माण हो जाता है। 
  • इस तरह बिना निषेचित हुए फल के विकास को अनिषेक फलन कहते हैं। 
  • ऐसे फल बीजरहित होते हैं। जैसे—पपीता, नारंगी, अंगूर, अनन्नास आदि।