Modern Physics

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परमाणु (Atom) की संरचना

  • प्रत्येक पदार्थ छोटे-छोटे कणों से बना होता है जिन्हें परमाणु (atoms) कहते हैं –1803 में डाल्टन ने बताया 
  • परमाणु का किसी भी भौतिक अथवा रासायनिक विधि द्वारा विभाजन नहीं किया जा सकता
    • परंतु आगे चलकर परमाणु का भी विभाजन हुआ और परमाणु भी अन्य सूक्ष्म कणों से मिलकर बना होता है।
    • विभाजक कणो  को पदार्थ का मौलिक कण (Fundamental Particles of Matter) कहा गया
    • इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन मौलिक कण हैं। 

इलेक्ट्रॉन (Electron)

  • इलेक्ट्रॉन की खोजजे.जे. थॉमसन
    •  ‘कैथोड किरण नलिका’ (CRT – cathode ray tube) प्रयोग द्वारा
  • इलेक्ट्रॉन पर आवेश –1.6022 x 10-19 C   
  • इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान (me) :  9.1094 x 10-31 kg 

प्रोटॉन (Proton)

  • प्रोटॉन की खोज :  गोल्डस्टीन , रदरफोर्ड (नामकरण किया )  
  • प्रोटॉन पर आवेश : +1.6022 x 10-19
  • प्रोटॉन का द्रव्यमान :  1.67 x 10-27 kg  

न्यूट्रॉन (Neutron) 

  • न्यूट्रॉन की खोज :  चैडविक ने, 1932 में, बेरिलियम धातु पर  
  • न्यूट्रॉन एक आवेश : वैद्युत उदासीन (Neutral)  
  • न्यूट्रॉन का द्रव्यमान :  प्रोटॉन के द्रव्यमान के लगभग बराबर  

पॉजिट्रान (Positron) :

  • इसकी खोज :  1932 ई० में,  एण्डरसन (Anderson)  
  • आवेश : धन आवेशित, इलेक्ट्रॉन के बराबर
  • द्रव्यमान : इलेक्ट्रॉन के बराबर
  • इसे इलेक्ट्रॉन का एन्टि कण (Anti-Particle of Electron) भी कहते है।

न्यूट्रिनो (Neutrino) :

  • खोज –  1930 ई,  पाउली (Pauli) ने  
  • द्रव्यमान व आवेश रहित मूल कण हैं। 
  • ये दो प्रकार के होते हैं, न्यूट्रिनो एवं एन्टिन्यूट्रिनो
  • इनके चक्रण (spin) एक-दूसरे के विपरीत होते हैं। 

पाई-मेसॉन (Π-meson) :

  • खोज –  1935 में,  युकावा (H. Yukawa) ने  
  • यह दो प्रकार की होती है—धनात्मक पाई मेसॉन एवं ऋणात्मक पाई मेसॉन। 
  • यह एक अस्थायी मूल कण है।
  • जीवनकाल :  10-8 से०  
  • इसका द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान का 274 गुना होता है।

फोटॉन (Photon) :

  • ये ऊर्जा के बंडल (packet) होते हैं, जो प्रकाश की चाल से चलते हैं। 
  • सभी विद्युत चुम्बकीय किरणों का निर्माण मूल कण से हुआ है।
  •  इनका विराम द्रव्यमान (Rest Mass) शून्य होता है।

नाभिक (Nucleus) : 

  • परमाणु का केन्द्रीय भाग है।
  • नाभिक में परमाणु का कुल धन आवेश और लगभग सभी द्रव्यमान संकेन्द्रित रहता है
  • नाभिक की त्रिज्या :  10-12 सेमी० होती है,
  • परमाणु की त्रिज्या :  10-8 सेमी० होती है।
  • नाभिक का घनत्व परमाणु के घनत्व से 1012 गुना अधिक होता है ।
  • परमाणु नाभिक की रचना प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों से होती है।
  • जिन नाभिकों में 2,8, 14, 20, 28, 50 या 82 न्यूट्रॉन अथवा प्रोट्रॉन या 126 अथवा 152 न्यूट्रॉन होते हैं, वह अन्य नाभिकों की तुलना में अधिक स्थायी  होता है। ये सख्याए स्थायित्व संख्याएँ (Stability Numbers ) कहलाती है

 

नाभिकीय बल (Nuclear Forces) : 

  • जो आकर्षण बल परमाणु नाभिक में न्यूक्लिऑन (प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों) को परस्पर बाँधे रहता है, वे नाभिकीय बल कहलाते हैं। 
  • समान charge के कारण प्रोटॉनों में प्रतिकर्षण होता है, परन्तु इस प्रतिकर्षण के बाबजुद नाभिक स्थायी होता है. क्योकि नाभिकीय बल प्रतिकर्षण बल से अधिक होता है। 
  • नाभिकीय बल केवल 2f- 3f की दूरी तक सक्रिय होते हैं। (1f= 10-15m

 

नाभिकीय बंधन ऊर्जा (Nuclear Binding Energy)

  • जब प्रोटॉन और न्यूट्रॉन मिलकर नाभिक  की रचना करते हैं तो कुछ द्रव्यमान लुप्त हो जाता है या लुप्त द्रव्यमान ऊर्जा में रूपांतरित हो जाता है अतः न्यूट्रॉन एवं प्रोटोन के संयोग  से किसी नाभिक बनने में जो ऊर्जा विमुक्त होती है उसे नाभिक की बंधन ऊर्जा कहते हैं 
  • किसी नाभिक के नाभिकीय कणों को अलग-अलग करने के लिये आवश्यक ऊर्जा को नाभिकीय बंधन ऊर्जा कहते हैं।
  • गुरुत्वाकर्षण बलः यह एक दुर्बल बल है, जो अनंत दूरी पर भी कार्य करता है। 
  • विद्युतचुंबकीय बलः यह प्रबल बल है, जो अनंत दूरी पर भी कार्य करता है। 

 

इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन (Electron Emission)

  • धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉन (Free Electrons) होते हैं, जो उनकी चालकता के लिये उत्तरदायी होते हैं। 
  • मुक्त इलेक्ट्रॉन सामान्यतः धातु पृष्ठ से बाहर नहीं निकल सकते, क्योंकि ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन के बाहर आने पर धातु धनावेशित हो जाएगी और पुनः इलेक्ट्रॉन को आकर्षित कर लेगी। सिर्फ वे इलेक्ट्रॉन, जिनकी ऊर्जा इस आकर्षण से ज़्यादा हो, धातु पृष्ठ से बाहर आ पाते हैं। 
  • अतः इलेक्ट्रॉनों को धातु पृष्ठ से बाहर निकालने के लिये एक निश्चिंत न्यूनतम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस न्यूनतम ऊर्जा को धातु का कार्य-फलन (Work Function) कहते हैं। इसे 0द्वारा व्यक्त करते हैं और eV (इलेक्ट्रॉन वोल्ट) में मापते हैं। 
  • धातु के पृष्ठ से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन के लिये मुक्त इलेक्ट्रॉनों को न्यूनतम आवश्यक ऊर्जा निम्न में से किसी भी भौतिक विधि द्वारा दी जा सकती है

 

तापायनिक उत्सर्जन (Thermionic Emission)

  • तापन द्वारा धातु के मुक्त इलेक्ट्रॉनों को पर्याप्त ऊर्जा देने पर वे धातु के पृष्ठ से बाहर आ जाते हैं, इसे ‘तापायनिक उत्सर्जन’ कहते हैं। 

 

क्षेत्र उत्सर्जन (Field Emission)

  • किसी धातु पर प्रबल विद्युत क्षेत्र लगाने पर यदि इलेक्ट्रॉन पृष्ठ से बाहर आ जाएँ तो इसे ‘क्षेत्र उत्सर्जन’ कहते हैं। स्पार्क प्लग में यही  प्रक्रिया होती है। 

 

प्रकाशविद्युत उत्सर्जन (Photoelectric Emission)

  • उपयुक्त आवृत्ति का प्रकाश जब किसी धातु पृष्ठ पर पड़ता है तो इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होता है। 
  • प्रकाश के कारण उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों को ‘प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन’ (Photoelectron) कहते हैं। 
  • प्रकाशविद्युत उत्सर्जन की परिघटना की खोज हेनरिच हटर्ज़ द्वारा 1887 में की गई थी। 
  • प्रकाशविद्युत उत्सर्जन को ही ‘प्रकाशविद्युत प्रभाव’ (Photoelectric Effect) कहते हैं। 

 

देहली आवृत्ति (Threshold Frequency) 

  • जब उत्सर्जन पृष्ठ पर एक नियत न्यूनतम मान से कम आवृत्ति का प्रकाश पड़ता है तो इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन नहीं होता और विद्युत धारा प्राप्त नहीं होती है। इस नियत न्यूनतम आवृत्ति को जो कि इलेक्ट्रॉन उत्सजन के लिये आवश्यक होती है, ‘देहली आवृत्ति’ कहते हैं। 
  • इसका मान उत्सर्जक पृष्ठ के पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है।
  • जिंक, कैडमियम, मैग्नीशियम जैसी कुछ धातुओं में यह प्रभाव केवल कम तरंगदैर्ध्य की पराबैंगनी तरंगों के लिये होता है। 
  • लीथियम, सोडियम, पोटेशियम, सीजियम तथा रूबीडियम जैसी क्षार धातुएँ दृश्य प्रकाश के द्वारा भी यह प्रभाव दर्शाती हैं। 

 

effect of light intensity on photoelectric current

  • The photoelectric current is directly proportional to the number of electrons emitted per second and the number of electrons emitted per second is proportional to the intensity of the incident radiation.

Effect of frequency of light on photoelectric current

  • प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जन के लिये प्रकाश की आवृत्ति का मान देहली आवृत्ति से अधिक होना चाहिये। 
  • देहली आवृत्ति का मान भिन्न-भिन्न धातुओं के लिये भिन्न-भिन्न होता है। 
  • The highest kinetic energy of photoelectrons varies linearly with the frequency of the incident radiation, though it does not depend on its intensity.

 

प्रकाशविद्युत प्रभाव तथा प्रकाश का तरंग सिद्धांत

  • The various properties of light, such as interference, diffraction, polarization, etc., can be explained by the wave nature theory of light, but the photoelectric effect could not be explained by this theory.

प्रकाश-विद्युत् प्रभाव के आइन्स्टीन की व्याख्या : 

  • सन् 1905 ई० में आइन्स्टीन ने जर्मन वैज्ञानिक मैक्स प्लांक (Max Planck) द्वारा प्रतिपादित क्वाण्टम सिद्धान्त (Quantum Theory) को आधार मानकर प्रकाश-विद्युत् प्रभाव की व्याख्या की।
  •  उसने प्रकाश ऊर्जा को छोटे-छोटे बंडलों के रूप में कल्पना की जो प्रकाश के वेग से चलते हैं। इन बंडलों को क्वाण्टा या फोटॉन कहते हैं। 
  • प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा hv के बराबर होती है, जहाँ h प्लांक नियतांक और v विकिरण की आवृत्ति है। 
  • आइन्स्टीन ने बताया कि प्रकाश की तीव्रता इन्हीं फोटॉन की संख्या पर निर्भर करती है। 
  • इसके अनुसार, जब hv ऊर्जा का एक फोटॉन किसी धातु के तल पर आपतित होता है, तो ऊर्जा का एक भाग धातु के तल से इलेक्ट्रॉन निकालने या धातु के परमाणु से इलेक्ट्रॉन मुक्त करने में व्यय होता है, इस ऊर्जा को कार्य-फलन की ऊर्जा (0)कहते हैं फोटॉन की शेष ऊर्जा उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन को गतिज प्रदान करती है।
  • यदि उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान m और वेग V हो तो, 

फोटॉन की ऊर्जा = उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा + कार्य-फलन की ऊर्जा 

                              hv  =   12mV2 + 0

 

यदि आवृत्ति, फोटॉन की ऊर्जा, कार्य-फलन के ऊर्जा के बराबर हो, तो धातु  तल से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन का वेग शून्य होता है। इस स्थिति में फोटॉन की ऊर्जा  hv0  होता है, जहाँ v0 दहलीज आवृत्ति (Threshold frequency) है। 

   h(v-v0)  = 12mV2 

यह आइन्स्टीन का प्रकाश-विद्युत समीकरण कहलाता है।

 

प्रकाश-विद्युत् सेल (Photo-Electric Cell) :

  • प्रकाश-विद्युत् सेल के द्वारा प्रकाश ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में बदला जाता है। 
  • प्रकाश-विद्युत् सेल का सिद्धान्त प्रकाश-विद्युत् प्रभाव के सिद्धान्त पर आधारित है। 
  • प्रकाश-विद्युत् सेल कई प्रकार के होते हैं, जैसे
    • प्रकाश चालकीय सेल (Photo Conductive Cell), 
    • प्रकाश वोल्टीय सेल (Photo Voltaic Cell), 
    • प्रकाश उत्सर्जक सेल (Photo Emissive Cell) आदि। 

 

प्रकाश-विद्युत् सेल के उपयोग :

  • इसका सर्वाधिक उपयोग सिनेमाघरों में ध्वनि के पुनरुत्पादन.(reproduction of sound) व टेलीविजन में किया जाता है।
  • सड़कों पर लगी लाइटें प्रकाश-विद्युत् सेलों के द्वारा स्वचालित रूप से रात के समय जल जाती हैं व दिन के समय बुझ जाती हैं।
  • दरवाजों को स्वचालित रूप से खोलने व बन्द करने के लिए भी प्रकाश-विद्युत् सेलों का प्रयोग किया जाता है।
  • बैंकों की तिजोरियों में प्रकाश-विद्युत् सेल लगे होते हैं, जो चोरी आदि होने की सूचना देते हैं।
  • प्रकाश-विद्युत् सेलों का उपयोग अंतरिक्ष यान की बैटरियों के आवेशन में किया जाता है। दिन के समय इन बैटरियों को आवेशित किया जाता है तथा रात के समय इनसे बिजली प्राप्त की जाती है।

 

प्रतिदीप्ति (Fluorescence): 

  • प्रकृति में कुछ-पदार्थ ऐसे होते हैं जब उन पर उच्च आवृत्ति या छोटी तरंगदैर्ध्य का प्रकाश (जैसे—पराबैंगनी प्रकाश) डाला जाता है, तो वे उसे अवशोषित कर लेते हैं और अपेक्षाकृत निचली आवृत्ति या ऊँची तरंगदैर्घ्य का प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। 
  • इन पदार्थों के द्वारा प्रकाश का उत्सर्जन तभी तक होता है, जब तक कि उन पर प्रकाश डाला जाता है। इस घटना को प्रतिदीप्ति और ऐसे पदार्थ को प्रतिदीप्त पदार्थ कहते हैं। 
  • प्रतिदीप्त पदार्थ के उदाहरण है-फ्लोरस्पार (Fluorspar), पेट्रोल (Petrol), कुनीन सल्फेट (Quinine sulphate) यूरेनियम ऑक्साइड, बेरियम प्लेटिनो सायनाइड आदि । 
  • प्रतिदीप्त पदार्थ का दैनिक जीवन में कई उपयोग देखने को मिलते हैं, 

जैसे-इनकी सहायता से आँखों से न दिखायी देने वाले विकिरणों (जस-पराबैंगनी किरणे. x-किरणे) का पता लगाया जाता है | 

X-किरणों का पता लगाने के लाए हम नियम देटिनो सायनाइड का प्रयोग करते हैं। यह पदार्थ x-किरणों को अवशोषित कर हरे रंग के प्रकाश का उत्सर्जन करते हैं। आजकल घरों में प्रयोग की जाने वाली टयूब लाइट fluorescent tube) में विभिन्न प्रकार के प्रतिदीप्त पदार्थों का लेप चढ़ाते हैं, जिनसे उनसे विभिन्न रंग के प्रकाश उत्सर्जित होते हैं। 

टयूब लाइट में लेप के रूप में चढ़ाए जाने वाले प्रतिदीप्त पदार्थ का उनसे उत्सर्जित प्रकाश के रंगों का विवरण आगे सारणी में दिया गया है

 

प्रतिदीप्त पदार्थ

उत्पन्न प्रकाश का रंग 

कैडमियम बोरेट

गुलाबी प्रकाश 

जिक सिलिकेट

हरे रंग का प्रकाश

मैग्नीशियम टंगस्टेट

हल्का नीला रंग का प्रकाश 

जिंक बेरीलियम सिलिकेट

पीला प्रकाश

मैग्नीशियम टंगस्टेट + जिंक बेरीलियम सिलिकेट

श्वेत प्रकाश

 

 

स्फुरदीप्ति (Phosphorescence) : 

  • प्रतिदीप्त पदार्थों पर जब तक प्रकाश डाला जाता है, तभी तक उनसे प्रकाश का उत्सर्जन होता है अर्थात प्रकाश डालना बन्द करते ही उनसे प्रकाश का उत्सर्जन बन्द हो जाता है। लेकिन कुछ पदार्थ ऐसे भी होते हैं, कि जब उन पर प्रकाश डालना बन्द कर दिया जाता है, तो उसके बाद भी कुछ देर तक प्रकाश का उत्सर्जन करते रहते हैं। इस घटना को स्फुरदीप्ति कहते हैं तथा ऐसे पदार्थों को स्फरदीप्त पदार्थ कहते हैं। 
  • जिंक सल्फाइड, कैल्शियम सल्फाइड, बेरियम सल्फाइड आदि स्फुरदीप्त पदार्थों के उदाहरण हैं। 
  • ये पदार्थ दिन में सूर्य का प्रकाश अवशोषित करके रात में चमकते हैं। 
  • जिंक सल्फाइड पर जब नीले रंग का प्रकाश डाला जाता है, तो वह हरे रंग का प्रकाश उत्सर्जन करता है। प्रकाश डालना बन्द करने पर स्फुरदीप्त पदार्थ जितने समय तक प्रकाश का उत्सर्जन करते हैं वह स्फुरदीप्ति काल कहलाता है। 
  • स्फुरदीप्ति काल भिन्न-भिन्न पदार्थों के लिए भिन्न-भिन्न होते हैं तथा यह पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है। गर्म करने पर स्फुरदीप्त पदार्थों की क्षमता नष्ट हो जाती है। 
  • आजकल घड़ी की सूईयों पर, साईन बोर्डों पर, बिजली बोर्डों आदि पर स्फुरदीप्त पदार्थों का लेप चढ़ाया जाता है। ये पदार्थ दिन में सूर्य का प्रकाश अवशोषित करके रात में चमकते हैं। 

 

ऊष्मायनिक तापायनिक उत्सर्जन (Thermionic emission) :

  • सन् 1884 ई० में थॉमस एल्वा एडीसन (Thomas Alva Edision) ने इसके बारे में बताया। 
  • जब किसी धातु के तार अथवा फिलामेंट को निर्वात् (vacuum) में गर्म किया जाता है, तो उसमें से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होने लगते हैं। ये इलेक्ट्रॉन ऊष्मायन/तापायन कहलाते हैं। 
  • किसी धातु के फिलामेंट को गर्म करने पर इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन की इस क्रिया को ही ऊष्मायनिक/तापायनिक उत्सर्जन कहते हैं।
  • तापायनिक सिद्धान्त का प्रयोग कर तापायनिक वाल्व बनाये जाते हैं। डायोड (Diode) ट्रायोड (Triode) आदि वाल्व इसके उदाहरण हैं। 
  • एक्स.किरण तथा कैथोड किरण नलिका में भा इलेक्ट्रॉन तापायनिक उत्सर्जन से ही प्राप्त किये जाते हैं।

अतिचालकता (Superconductivity) : 

  • इसकी खोज सन् 1911 ई० में नीदरलैंड की भौतिकशास्त्री केमरलिंघ ओन्स (Kamerlingh Onnes) ने की थी। 
  • अत्यन्त निम्न ताप पर कुछ पदार्थों का विद्युत् प्रतिरोध शून्य हो जाता है, इन्हें ही अतिचालक (super conductor) कहते हैं और इस गुण को अतिचालकता कहते हैं। 
  • अतिचालक न केवल धारा का सबसे अच्छा बहाव का माध्यम है, बल्कि यह एक पूर्ण चुम्बकीय कवच भी है। अर्थात् एक अतिचालक पूर्णतः प्रति चुम्बकीय होता है, जिसे कोई भी चुम्बकीय रेखा भेद नहीं सकती है। 
  • अनुसंधान के दौरान यह भी देखा गया कि कुछ धातुएँ काफी ऊँचे तापक्रम पर अतिचालक हो जाती है। उदाहरण के लिए नियोबिस्टन 180 K ताप पर अतिचालकता प्राप्त कर लेती है। 
  • कुछ अतिचालक मृत्तिकाय (ceramics), थैलियम (TI), बेरियम और कॉपर ऑक्साइड से युक्त होती हैं, जिनमें 120 K ताप पर अतिचालकता आ जाती है। 
  • कोई पदार्थ जिस ताप पर अतिचालक बनता है, उसे उसका क्रांतिक ताप कहते हैं। वर्तमान में आधुनिक अनुसंधानों से अतिचालक के लिए क्रांतिक ताप को लगभग 240 K  तक पहुंचा दिया गया है 
  • अतिचालकता के महत्व को देखते हुए भारत सरकार ने फरवरी 1991 ई. में राष्ट्रीय  अतिचालकता विज्ञान तकनीकी बोर्ड(National Superconductivity Science Technical Board(National Superconductivity Science Technical Board) की स्थापना की जो अतिचालकता से संबंधित खोज कार्य का प्रबंधन करती है

 

अल्बर्ट आइंस्टीन (1879–1955) 

  • आइंस्टीन ने सापेक्षिकता/आपेक्षिकता (Relativity) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। 
  • प्रकाशविद्युत प्रभाव के अपने कार्य के लिये आइंस्टीन को 1921 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया। प्रकाशविद्युत प्रभाव पर कार्य के लिये 1923 में मिलिकन को भी नोबेल पुरस्कार दिया गया। 
  • सापेक्षिकता के सामान्य सिद्धांत के अनुसार, जब प्रकाश न्यूट्रॉन तारे अथवा ब्लैक होल जैसे विशालकाय पिंडों से होकर गुज़रता है तो उसकी ओर आकर्षित होता है। 

 

गुरुत्वीय तरंगें (Gravitational Waves) 

  • आइंस्टीन ने अपने सापेक्षिकता के सिद्धांत के आधार पर गुरुत्वीय तरंगों की परिकल्पना की थी। 
  • गुरुत्वीय तरंगें कुछ वृहद् गुरुत्वाकर्षण अंतःक्रियाओं द्वारा स्पेसटाइम (Spacetime) में उत्पन्न विक्षोभ या लहरें हैं, जो उत्पत्ति के स्थान से बाहर की ओर तरंगों की भाँति और प्रकाश की चाल से गमन करती हैं।

द्रव्य की तरंग प्रकृति (Wave Nature of Matter) 

  • फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी दे ब्रॉग्ली (De Broglie) ने परिकल्पित किया कि पदार्थ के गतिमान कण उपयुक्त परिस्थितियों में तरंग सदृश्य गुण प्रदर्शित कर सकते हैं। अर्थात् गति करने वाले प्रत्येक कण का अपना तरंगदैर्ध्य होता है। 
  • गतिमान सूक्ष्म कणों में इस तरंगदैर्ध्य को OBSERVE किया जा सकता है परंतु बड़े गतिमान वस्तुओं में यह तरंगदैर्ध्य इतना छोटा हो जाता है कि उसका निरीक्षण नहीं हो पाता। जैसे- फेंके हुए क्रिकेट बॉल का तरंगदैर्ध्य बहुत कम होता है।
  • दे ब्रॉग्ली के अनुसार कोई कण जिसका संवेग ‘P’ है, के साथ जुड़े तरंगदैर्ध्य को निम्न प्रकार से दर्शाया जा सकता है

 

= hp= hmv

 

जहाँ, m = कण का द्रव्यमान,v=चाल,h = प्लांक नियतांक 

उपर्युक्त समीकरण को दे ब्रॉग्ली समीकरण तथा द्रव्य की तरंग के तरंगदैर्ध्य   को ‘दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य’ कहते हैं।

  • क्लिटन डेविसन एवं जी.पी. थॉमसन को क्रिस्टल द्वारा इलेक्ट्रॉनों के विवर्तन (Diffraction) की खोज के लिये 1937 में संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार दिया गया। 

फोटोवोल्टिक प्रभाव (Photovoltaic Effect)

  • ‘फोटोवोल्टिक प्रभाव’ प्रकाशविद्युत प्रभाव का विशिष्ट रूप है, जिसमें प्रकाश के कारण विभवांतर उत्पन्न होता है और विद्युत धारा का प्रवाह प्रारंभ हो जाता है। 

 

सोलर सेल(Solar Cell) या फोटोवोल्टिक सेल (Photovoltaic Cell)

  • ‘फोटोवोल्टिक सेल’ फोटोवोल्टिक प्रभाव पर आधारित एक विद्युत युक्ति है, जो प्रकाश ऊर्जा को सीधे विद्युत में परिवर्तित करती है। कई सोलर सेल से मिलकर फोटोवोल्टिक मॉडयूल (Photovoltaic Modules) या सौर पैनल बनाया जाता है।
  • सोलर सेल में विभिन्न फोटोवोल्टिक पदार्थों, जैसेः सिलिकॉन, जर्मेनियम, कैडमियम इत्यादि का प्रयोग किया जाता है, परंतु व्यापारिक व्यवहार्यता की दृष्टि से सिलिकॉन सबसे ज़्यादा उपयोग किया जाता है।
  • एक कृत्रिम उपग्रह में विद्युत ऊर्जा का स्रोत सौर सेल होते हैं। फोटोवोल्टिक प्रौद्योगिकी में प्रकाशवोल्टीय प्रभाव का प्रदर्शन करने वाले अर्द्धचालकों द्वारा सौर विकिरण को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। 
  • प्रकाशवोल्टीय प्रक्रिया ‘दिष्ट विद्युतधारा’ (DC) का जनन करती है।
  • सौर तापीय प्रणालियाँ प्रकाशवोल्टीय प्रणालियों से भिन्न हैं क्योंकि ये सौर ऊर्जा के द्वारा तापीय ऊर्जा का जनन करती हैं जिसका आगे विद्युत जनन प्रक्रिया में प्रयोग किया जा सकता है।

द्रव्यमान ऊर्जा (Mass Energy) 

  • आइंस्टीन के अनुसार हम द्रव्यमान को ऊर्जा के अन्य रूपों, जैसे: गतिज ऊर्जा में परिवर्तित कर सकते हैं तथा विपरीत प्रक्रम अर्थात् ऊर्जा को द्रव्यमान में भी रूपांतरित किया जा सकता है।
  • आइंस्टीन ने इसके लिये प्रसिद्ध mass energy equivalence relation दिया

E = mc2 

यहाँ ऊर्जा E, द्रव्यमान m के समतुल्य ऊर्जा है एवं c निर्वात में प्रकाश की चाल है।

 

चालक(conductor)

  • Conductors are the materials or substances which allow electricity to flow through them. 
  • They conduct electricity because they allow electrons to flow easily inside them from atom to atom. 
  • Also, conductors allow the transmission of heat or light from one source to another.
  • Metals, humans, earth, and animals are all conductors.
  • Conductors have free electrons on its surface which allow current to pass through easily.

अचालक (Insulator)

  • An insulator is a material that does not conduct electrical current. 
  • Insulating materials include paper, plastic, rubber, glass and air. Vacuum is also an insulator, but is not actually a material

 

विद्युत चालकता(Conductance) 

  • (also known as electrical conductance) is defined as the potential for a substance to conduct electricity. 
  • Conductance is the measure of how easily electrical current (i.e. flow of charge) can pass through a material. 
  • Conductance is the inverse (or reciprocal) of electrical resistance, represented as 1/R

 

अर्द्धचालक (Semiconductors), 

  • ऐसे पदार्थ जिनकी विद्युत चालकता चालक एवं अचालक पदार्थों के बीच के होती है, ‘अर्द्धचालक’ कहलाते हैं। जैसे- सिलिकॉन और जर्मेनियम। 
  • परम शून्य ताप पर अर्द्धचालक एक आदर्श अचालक का भाँति व्यवहार करते हैं।

classification of semiconductors on the basis of the source and the nature of charge carriers

  1. Intrinsic semiconductors
  2. Extrinsic semiconductors

 

Intrinsic semiconductors

  • the pure semiconductors are called intrinsic semiconductors ex- Ge or Si.

Extrinsic semiconductors

  • the semiconductors obtained by adding or dopping the pure semiconductor with a small amounts of certain specific impurity atoms having valency different from that of the host atoms are called extrinsic semiconductors

Doping :

  • the process of adding impurity to a pure semiconductor so as to increase its conductivity is called dopping.
  • the impurity atoms added are called dopants and the semiconductors doped with the impurity atoms are called extrinsic semiconductors or doped semiconductors.

Two types of dopants :

  • there are two types of dopants used in doping the tetravalent Silicon or Germanium 
    • pentavalent  dopants
    • trivalent dopants

 

  • pentavalent  dopants
    • they have 5 Valence Electrons 
    • For example  – arsenic(As), antimony(Sb), phosphorus(P),
  • trivalent dopants
    • they have 3 Valence Electrons 
    • For example  -indium (In),Boron(B),Aluminium(Al),

n-प्रकार के अर्द्धचालक (n-Type Semiconductors)

  • The semiconductor is  obtained by doping the tetravalent semiconductor Silicon(si) or Germanium(Ge) with pentavalent impurities such as As,p,or Sb of group 5 of the periodic table.

P-प्रकार के अर्द्धचालक (p-Type Semiconductors)

  • The semiconductor is  obtained by doping the tetravalent semiconductor Silicon(si) or Germanium(Ge) with trivalent impurities such as In,B,Al,or Ga.
  • जिन अर्द्धचालकों में विद्युत प्रवाह कोटरों (Holes) की गति के कारण होता है, उन्हें p-प्रकार का अर्द्धचालक कहते हैं। 

 

p-n संधि (p-n Junction) 

  • it is a single crystal of Germanium)Ge) or Silicon(Si) doped in such a manner that one half portion of it acts as a p-type semiconductor and other half as n type semiconductor 
  • junction means the boundary or region of transition between n type and P type semiconductor materials.the junction behaves as a discontinuity for the flowing charge carriers.
  • the small region in the vicinity of the junction which is depleted of free charge Carriers and has only immobile ions is called the depletion layer
  • p-n Junction can be used as diodes,Rectifier,transistor etc.
  • It is also known as Junction Diode.
Depletion layer
Depletion layer

External potential difference can be applied to p-n junction in two ways :

  1. Forward biasing
  2.  Reverse biasing

 

Forward biasing

  • if the positive terminal of a battery is connected to the P side and the negative terminal to the n side then the PN junction is said to be forward biased
  • when PN junction diode is forward biased it offers less resistance and a current flows through it.

Forward Biased

Reverse biasing

  • if the positive terminal of a battery is connected to the n side and the negative terminal to the p side then the PN junction is said to be Reverse biased.
  • when PN junction diode is Reverse Biased it offers high resistance and almost no current flows through it.

Reverse Biased

Rectifier : 

  • the process of converting alternating current into direct current is called rectification and the device used for this purpose is called rectifier

Light Emitting Diode :

  • It it is a heavily doped forward biased PN junction which spontaneously converts the biasing electrical energy into Optical energy like infrared and visible light.

 

ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक संधि युक्तियाँ (Optoelectronic Junction Devices)

  • ऐसे अर्द्धचालक डायोड, जिनमें आवेश वाहकों की उत्पत्ति फोटॉनों (प्रकाशिक उत्तेजन – Photo Excitation) द्वारा होती है, उन्हें ‘ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक युक्तियाँ’ कहते हैं। 
  • ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक डायोडो के कुछ प्रकार निम्नलिखित हैं
  • प्रकाश चालकीय डायोड (फोटो डायोड): इनका उपयोग प्रकाशित संकेतों के संसूचन (Photo Detector) में किया जाता है। 
  • प्रकाश उत्सर्जक डायोड (Light Emitting Diode-LED): ये विद्युत ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में रूपांतरित करते हैं। 
  • फोटोवोल्टीय युक्तियाँ या सोलर सेल: ये मूल रूप में ऐसी p-n संधि होती है, जो सौर विकिरण आपतित होने पर विद्युत-वाहक बल उत्पन्न करती है। इनको बनाने हेतु सिलिकॉन (Si) का प्रयोग किया जाता है। 

 

ट्रांजिस्टर (Transistor)

  • एक ट्रांजिस्टर एक अर्धचालक उपकरण है जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक संकेतों और विद्युत शक्ति को बढ़ाने या स्विच करने के लिए किया जाता है।
  • A transistor is a semiconductor device used to amplify or switch electronic signals and electrical power. 
  • transistor is a three terminal device obtained by growing either a narrow section of p-type Crystal between two relatively thicker section of n-type Crystal or a narrow section of n type crystal between two thicker section of p-type Crystal
  • ट्रांजिस्टर का आविष्कार सबसे पहले जे.बारडीन और डब्ल्यू.एच ब्रेटेन ने किया था
  • ट्रांजिस्टर दो प्रकार के होते हैं
  1. n-p-n ट्रांजिस्टर
  2. p-n-p ट्रांजिस्टर

n-p-n ट्रांजिस्टर

  • it consists of a thin section of p-type semiconductor sandwitched between two thicker section of n- type semiconductors

npn transistor

p-n-p ट्रांजिस्टर

  • it consists of a thin section of n-type semiconductor sandwitched between two thicker section of p- type semiconductors.

pnp transistor

Construction : Each type of transistor has three main parts:

1. Emitter (E)

  • It is a section on one side of the transistor. 
  • It is of moderate size and heavily doped semiconductor. 
  • It is normally forward biased w.r.t. any other part of the transistor. 
  • It supplies a large number of majority charge carriers for the flow of current through the transistor.

2. Base (B)

  • It is the middle section. 
  • It is very thin and lightly doped.
  •  It controls the flow of majority charge carriers from emitter to collector.

3. Collector (C) 

  • It is a section on the other side of the transistor.
  • It is moderately doped and larger in size as compared to the emitter. 
  • It is normally reverse biased w.r.t. any other part of the transistor. 
  • It collects the majority charge carriers for the circuit operation.

Why is a transistor so called ? 

  • The collector current  is almost equal to the emitter current. 
  • But the resistance offered by the emitter-base junction to the flow of current is small as it is forward biased. 
  • The resistance offered by the base-collector junction to the flow of current is large because this junction is reverse biased. 
  • The current is thus transferred from a low resistance circuit to a high resistance circuit.
  •  Hence the name transistor, which is a combination of the words transfer and resistor.

Amplifier : amplifier is a circuit consisting of at least one transistor which is used for increasing the voltage current or power of alternating form

Oscillator :

  • an oscillator is an electronic device which produces electric oscillation of constant frequency and amplitude without requiring any external input signal 
  • It converts the DC energy obtained from a battery into AC energy in some oscillatory circuit.

Analog and Digital circuit :

all electronic circuits can be broadly divided into two categories

  1. Analog circuit 
  2.  Digital circuit 

Analog circuit :

  • a signal in which current or voltage varies continuously with time is called analog signal 
  • the electronic circuits which process analog signals are called analog circuit 
  • Avometer (ampere-volt-ohmmeter) is an analog device.

ANALOG

Digital circuits :

  •  signal in which current or voltage can take only two discrete values is called a digital signal 
  • digital signal can take only two values 1 and 0 which are labelled as high and low values 
  • digital signals are in the form of pulses of equal level 
  • the electric circuit which process digital signals are called digital circuits a digital multimeter is a digital device.

Digital

Boolean operators :

  • boolean variable can have either a true value or a false value. 
  • the true value is represented by 1 and false value by 0. 
  • for electronic circuits 1 is ‘ON” condition and 0 is ‘OFF” condition.
  • in Boolean Algebra, three basic operators like OR,AND and NOT are used.

OR operator :    Y = A+B (Read as Y equals A or B)

A

B

Y

RESULT

0

0

0

OFF

0

1

1

ON

1

0

1

ON

1

1

1

ON

 

AND operator :  Y = A.B (Read as Y equals A and B)

A

B

Y

RESULT

0

0

0

OFF

0

1

0

OFF

1

0

0

OFF

1

1

1

ON

 

NOT operator :  Y = A   (Read as Y equals not  A)

A

Y

RESULT

0

1

ON

1

0

OFF

टेलीविजन (Television) : 

  • इसका आविष्कार 1923 ई० में जॉन एल बेयर्ड  ने किया।  

राडार (Radar) :

  • Full Form : Radio Detection and Ranging
  • इसके द्वारा रेडियो तरंगों की सहायता से वायुयान की स्थिति व दूरी का पता लगाया जाता है। 
  • राडार का उपयोग
    • वाययानों के संसूचन, निर्देशन एवं संरक्षण में,
    • बादलों की स्थिति व दूरी ज्ञात करने में,
    • धातु व तेल भंडारों का पता लगाने में
    • वायुमडंल की उच्चतम परत, आयनमंडल की ऊँचाई आदि ज्ञात करने में  
  • राडार के आविष्कार :  राबर्ट वाट्सन
  • राडार का प्रथम (Prototype) बनाने का श्रेय टेलर और यंग को जाता है।

लेसर (Laser) :

  • Full Form : Light Amplification by Stimulated Emission of Radiation
  • LASER is a process by which we get a light beam which is coherent highly monochromatic and almost perfectly parallel
  • लेसर तरंगों की आवृत्ति समान होती है तथा इसके विभिन्न तरंगों की कला (phase) भी स्थिर होती है। 
  • इसके मूलभूत सिद्धान्त की चर्चा सर्वप्रथम सन् 1917 ई० में आइंस्टीन द्वारा की गई थी
  • लेसर की खोज :  1960 ई० में थियोडोर एच. मेमैन (Theodore H. Maiman) द्वारा  
  • मूल रूप में लेसर में Ruby crystal का उपयोग होता था, लेकिन वर्तमान समय में विभिन्न प्रकार के लेसर विभिन्न प्रकार के धात्विक पदार्थों से निर्मित होने लगे हैं।
  • लेसर तरंगें एकवर्णी (monochromatic) होती हैं, यानी विभिन्न तरंगों की आवृत्ति समान होती है। 
  • लेसर-विकिरण को बहुत सूक्ष्म क्षेत्रों में फोकस किया जा सकता है। 
  • लेसर किरणों के उपयोग : 
    • लेसर का उपयोग CD, DVD पर आँकड़ों के संग्रहण या भंडारण में किया जाता है।
    • लेसर का उपयोग स्कैनर उपकरण में भी किया जाता है।
    • दूरी एवं समय मापने में :
    • लेसर प्रकाश के उपयोग से  3D चित्र ‘ खींचे जा सकते हैं, जिससे होलोग्राफी (Holography) तकनीक संभव हो सकी है।
    • 1962 में Y.N. Denisyuk ने होलोग्राफी का प्रथम उपयोग किया।
    • वायुयान के उड़ान पथ का शुद्धतम निर्धारण लेसर के प्रयोग से किया जाता है।
    • लेसर के उपयोग से कैंसर के उपचार, हृदय की धमनियों में रक्त के जमने से उत्पन्न अवरोधों को दूर करने, नेत्रों के विभिन्न प्रकार के ऑपरेशनों आदि में किया जाता है।
  • भारत में लेजर प्रौद्योगिकी के उपयोग की शुरूआत 1960 के दशक में हुई। 
  • भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र द्वारा 1964  में गैलियम-आर्सेनिकअर्द्धचालक लेसर का निर्माण किया गया। 

मेसर (Masers):

  • Full FormMicrowave Amplification by Stimulated Emission of Radiation  
  • मेसर के आविष्कार:  तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों गोरडन, गीगर एवं टाउन्स को जाता है (1955 ई.)। 
  • मेसर कार्य सिद्धान्त : जिस आधार पर लेसर कार्य करता है।
    • लेसर में प्रकाश किरणें उत्पन्न होती हैं जबकि मेसर में सूक्ष्म तरंगें उत्पन्न होती हैं।
  • मेसर तरंगों का उपयोग
    • राडार में करके कृत्रिम उपग्रहों आदि का ठीक-ठीक पता लगाया जाता है
    • कई ग्रहों के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्राप्त की जाती है। 
    • समुद्र के अन्दर सन्देश भेजने में भी किया जाता है । 
    • कई रोगों का इलाज किया जाता है।