Internet and its Services : SARKARI LIBRARY

Internet

  • InternetInternational Networking 
  • इंटरनेट नेटवर्कों का नेटवर्क है। 
  • इंटरनेट के बढ़ते उपयोग के कारण ही आधुनिक युग को ‘संचार क्रांति का युग’ भी कहा जाता है। 

 

इंटरनेट का विकास (Development of Internet) 

  • सर्वप्रथम इंटरनेट की स्थापना का विचार 1962 मेंजे.सी. लिक्लाइडर (J.C. Licklider) ने
  • ‘इंटरनेट का जनक’J.C. Licklider
  • ARPANETइंटरनेट का प्रारंभ 1969 ई. में अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा (ARPANET – Advanced Research Project Agency Net) के विकास से किया गया। 
  • ARPANET को दुनिया का पहला नेटवर्क कहा जाता है।
  • 1989 में इंटरनेट को आम जनता के लिए खोल दिया गया। 
  • 1989 में टिम बर्नर्स ली ने हाइपर टेक्स्ट मार्कअप लैंग्वेज (HTML) का विकास किया। 
  • (www – world wide web) का प्रस्ताव Tim Berners Lee द्वारा 1989 ई. में दिया गया था। 
    • www का जनक – टिम बर्नर्स ली को (इंग्लैंड के वैज्ञानिक )
    • www पर (http- hyper text transfer protocol) तथा (TCP/IP) के द्विस्तरीय नियमों का परिपालन किया जाता है।
    • WWW का पहला आम प्रयोग 6 अगस्त 1991 को किया गया।
    • Mosaic – www पर प्रयुक्त पहला Graphical web Browser था
      • जिसका विकास मार्क एण्डरसन (Marc Andressen) ने 1993 में किया था। 
    • 1993 ई. में (CERN – European Organization for Nuclear Research) ने www को निःशुल्क उपयोग के लिए उपलब्ध कराया।
    • 1994 ई. में वर्ल्ड वाइड वेब संघ (World wide web consortium-W3C) की स्थापना की गई। 
  • 15 अगस्त 1995. ई. को विदेश संचार निगम लिमिटेड (VSNL) द्वारा भारत में इंटरनेट सेवा का प्रारंभ किया गया।
  •  इंटरनेट Client-Server Model पर काम करता है। 
  • इंटरनेट से जुड़ा प्रत्येक कंप्यूटर एक सर्वर से जुड़ा होता है
  • संसार के सभी सर्वर विभिन्न संचार माध्यमों द्वारा आपस में जुड़े होते हैं। 
  • ओपन ऑर्किटेक्चर नेटवर्किंग द्वारा (TCP/IP) के द्विस्तरीय नियमों के परिपालन द्वारा सूचनाओं का आदान-प्रदान सुविधाजनक बनाया गया है।
    • इसमें सूचनाओं के आदानप्रदान के लिए पैकेट स्विचिंग (Packet Switching) का प्रयोग किया जाता है
      • जिसमें सूचनाओं का बंडल (Packet) बनाकर एक से दसरे स्थान तक ले जाया जाता है। 

 

  • किसी कंप्यूटर को इंटरनेट से जोड़ने के लिए हमें Internet Service Provider की सेवा लेनी पड़ती है। 
    • टेलीफोन लाइन या वायरलेस तकनीक द्वारा कंप्यूटर को इंटरनेट सेवा प्रदाता के सर्वर से जोड़ा जाता है। 
    • इसके लिए हमें इंटरनेट सेवा प्रदाता को कुछ शुल्क भी देना पड़ता है। 

 

इंटरनेट की कार्यप्रणाली की देखरेख करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं

ISOC (Internet Society) :

  • यह एक गैर लाभकारी अंतर्राष्ट्रीय संस्थान है जिसका गठन 1992 में किया गया।

Internet Architecture Board (IAB): 

  • यह संस्थान इंटरनेट सोसायटी (ISOC) द्वारा निर्धारित नियमों के तहत इंटरनेट के लिए आवश्यक तकनीकी और इंजीनियरिंग विकास का कार्य करता है। 

ICANN (Internet Corporation for Assigned Names & Numbers) : 

  • 1998 ई. में स्थापित यह संगठन इंटरनेट पर IP Address तथा Domain name प्रदान करने तथा उसके मानकों के निर्धारण का कार्य करता है। 

Domain Name Registrars : 

  • कुछ गैर सरकारी संस्थाएं ICANN द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार इंटरनेट के प्रयोग के लिए डोमेन नेम (Domain Name) प्रदान करती हैं जिन्हें डोमेन नेम रजिस्ट्रार कहा जाता है। 
  • Ex – godaddy,Hostinger
  • विभिन्न डोमेन नेम रजिस्ट्रार यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति या संस्था को इंटरनेट पर एक विशेष (Unique) डोमेन नेम प्रदान किया जाए। 
  • डोमेन नेम रजिस्ट्रार का निर्धारण ICANN या Country Code Top Level Domain (CCTLD) द्वारा किया जाता है।

 IRTF (Internet Research Task Force) : 

  • यह संस्थान भविष्य में इंटरनेट की कार्यप्रणाली में सुधार हेतु अन्वेषण व खोज (Research) को बढ़ावा देता है। 

IETF (Internet Engineering Task Force) : 

  • इंटरनेट मानकों का विकास करना व उनके उपयोग को प्रोत्साहित करना इस संस्थान का उद्देश्य है। 

W3C (Word Wide Web Consortium) : 

  • यह एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जो वर्ल्ड वाइड वेब के जनक टिम बर्नर्स ली के नेतृत्व में काम करती है। 
  • इसका गठन 1994 में किया गया। 
  • यह संस्था वर्ल्ड वाइड वेब के प्रयोग के लिए मानकों का निर्धारण करती है। 

 

इंटरनेट से जुड़ना (Connecting to Internet)

किसी व्यक्ति द्वारा इंटरनेट सेवा से जुड़ने के लिए निम्नलिखित उपकरणों/साफ्टवेयर की आवश्यकता होती है

(i) (PC-Personal Computer) 

(ii) (Modem) या (NIC – network interface card)

(iii) Communication medium

  • टेलीफोन लाइन या विशेषीकृत लाइन या प्रकाशीय तंतु या वायरलेस तकनीक आदि 

(iv) वेब ब्राउसर साफ्टवेयर  

(v) इंटरनेट सर्विस प्रदाता (ISP-Internet Service Provider)

 

  • इंटरनेट सेवा प्रदाता को निर्धारित शुल्क देकर इंटरनेट खाता, यूजर नेम तथा पासवर्ड प्राप्त किया जाता है। 
  • यूजर नेम इंटरनेट से जुड़ने के लिए तथा पासवर्ड सुरक्षा और गोपनीयता के लिए आवश्यक है। 
  • इंटरनेट से जुड़े सभी कम्प्यूटरों को एक विशेष IP Address प्रदान किया जाता है जो उस कंप्यूटर की पहचान बताता है।

 

इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP-Internet Service Provider) : 

  • इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISPs) वे संस्थाएं हैं जो व्यक्तियों और संस्थानों को इंटरनेट से जुड़ने का माध्यम और उससे संबंधित सेवाएं प्रदान करते हैं।
  • इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP) का कम्प्यूटर सर्वर (Server) कम्प्यूटर कहलाता है जबकि उपयोगकर्ता का कम्प्यूटर क्लाइंट (Client) कम्प्यूटर कहलाता है। 
  • इंटरनेट उपयोगकर्ता द्वारा ISPs को कुछ सेवा शुल्क भी प्रदान करना पड़ता है। 
  • इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP) उपयोगकर्ता और विभिन्न कम्प्यटर नेटवर्क से जुड़ने के लिए कई संचार माध्यमों का उपयोग करता है। 

 

इंटरनेट पर प्रयुक्त प्रोटोकाल (Protocols used on Internet)

  • नियमों तथा प्रतिमानों के समूह (Set of rules and standards) को प्रोटोकाल (protocol) कहा जाता है।

 

कंप्यूटर नेटवर्क में प्रयोग किए जाने वाले कुछ प्रचलित प्रोटोकाल हैं

1. ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकाल/इंटरनेट प्रोटोकाल (TCP/IP) : 

  • ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकाल (TCP) तथा इंटरनेट प्रोटोकाल (IP) दो अलग-अलग प्रोटोकाल हैं, पर चूंकि इनका प्रयोग एक साथ किया जाता है, अतः इन्हें सम्मिलित रूप से इंटरनेट प्रोटोकाल सूट (Internet Protocol Suite) कहा जाता है। 
  • इसका प्रयोग कर इंटरनेट पर दूरस्थ कंप्यूटर तथा सर्वर के बीच संचार स्थापित किया जाता है।
  • TCP/IP इंटरनेट का संचार प्रोटोकॉल (Communication Protocol) है। 
  • TCP पैकेट स्विचिंग (Packet Switching) तकनीक का प्रयोग करता है। 
  • जब किसी सूचना या डाटा को किसी कंप्यूटर या सर्वर द्वारा इंटरनेट पर भेजा जाता है, तो ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकाल (TCP) उस सूचना को छोटे-छोटे समूहों (units) में विभाजित कर देता है। इन समूहों को पैकेट (Packets) कहा जाता है।

 

  • इंटरनेट प्रोटोकाल (IP) प्रत्येक पैकेट को एक विशेष पता (address) देता है तथा गंतव्य तक पहुंचाने के लिए उनका रास्ता (path) तय करता है। 
  • नेटवर्क से जुड़ा राउटर (Router) प्रत्येक पैकेट को अपने गंतव्य तक पहुंचाने में मदद करता है। 

 

2. एसएमटीपी (SMTP-Simple Mail Transfer Protocol) : 

  • यह इंटरनेट पर e-mail के लिए प्रयुक्त सर्वाधिक लोकप्रिय प्रोटोकाल है। 
  • उपयोगकर्ता (client) के कंप्यूटर से मैसेज को e-mail सर्वर तक और पुनः सर्वर से प्राप्तकर्ता तक भेजने के लिए इस प्रोटोकाल का प्रयोग किया जाता है।

 

3. एचटीपीपी (HTTP-Hypertext Transfer Protocol) : 

  • यह वर्ल्ड वाइड वेब (www) पर hyper text documents को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए प्रयुक्त ट्रांसफर प्रोटोकाल है। 
  • वेब सर्वर से उपयोगकर्ता तक web page का हस्तांतरण इसी प्रोटोकाल द्वारा किया जाता है। 
  • एचटीटीपी Client-Server Principle पर काम करता है। 
  • इसमें एक कम्प्यूटर दूसरे कम्प्यूटर से संपर्क स्थापित कर फाइल या डाटा भेजने का अनुरोध करता है। 
  • दूसरा कम्प्यूटर उस अनुरोध को स्वीकार कर संबंधित सूचना वापस भेजता है।

 

4. एफटीपी (FTP-File Transfer Protocol) : 

  • यह इंटरनेट पर प्रयुक्त एक प्रोटोकाल है जिसका प्रयोग नेटवर्क से जुड़े किसी कंप्यूटर तथा सर्वर के बीच फाइल स्थानांतरित करने के लिए किया जाता है। 
  • फाइल में डाटा, टैक्स्ट, ग्राफ, चित्र, ध्वनि (audio) या चलचित्र (video) हो सकता है।
  • फाइल स्थानान्तरण के लिए दूरस्थ (remote) कंप्यूटर से Log-in द्वारा संपर्क स्थापित किया जाता है। इसके बाद फाइल को upload या download किया जाता है। फाइल स्थानान्तरण के लिए उपयोगकर्ता के पास दूरस्थ कंप्यूटर तक जाने का अधिकार होना आवश्यक है। 
  • इंटरनेट पर कुछ अज्ञात एफटीपी साइट (Anonymous FTP Sites) होती हैं जिन्हें किसी भी व्यक्ति द्वारा उपयोग किया जा सकता है। 
  • इसके लिए किसी विशेष एकाउंट या पासवर्ड की जरूरत नहीं होती है। 
  • वर्ल्ड वाइड वेब पर उपलब्ध डाटा व सूचनाओं का भंडार अधिकांशतः Anonymous FTP Sites ही हैं।

 

5. गोफर (Gopher) : 

  • यह एक प्रोटोकॉल साफ्टवेयर है जो इंटरनेट द्वारा दूरस्थ कम्प्यूटर से डाक्यूमेंट्स को खोजना, प्राप्त करना तथा उन्हें प्रदर्शित करना संभव बनाता है।

 

6. टेलनेट (Telnet) : 

  • टेलनेट एक टेक्स्ट आधारित संचार प्रोटोकाल है जो कमांड लाइन इंटरफेस (Command Line Interface) का उपयोग करता है। 
  • टेलनेट प्रोग्राम द्वारा दो अलग-अलग स्थान पर स्थित कम्प्यूटरों को दूरसंचार नेटवर्क द्वारा आपस में जोड़कर Remote कम्प्यूटर के डाटा और फाइलों का उपयोग किया जा सकता है। इसे Remote Login भी कहा जाता है। 
  • Telnet द्वारा हम Remote कम्प्यूटर का उपयोग ऐसे करते हैं, जैसे उसी कम्प्यूटर के सामने बैठे हों। इसमें Local कम्प्यूटर पर टाइप किया गया कमांड Remote कम्प्यूटर द्वारा क्रियान्वित किया जाता है तथा Romote कम्प्यूटर में होने वाले प्रोसेसिंग तथा उसके परिणाम को Local कम्प्यूटर के मॉनीटर पर देखा जाता है। 

 

7. वर्ल्ड वाइड वेब (www-World Wide Web)

  • इसे W3 या वेब (Web) भी कहा जाता है। 
  • वर्ल्ड वाइड वेब (www) पर लाखों वेब पेज डाक्यूमेंट के रूप में उपलब्ध हैं। यह हाइपर लिंक द्वारा आपस में जुड़े हुए सूचनाओं का विशाल समूह है जिसे इंटरनेट पर web browser की सहायता से प्राप्त किया जा सकता है। 
  • वर्ल्ड वाइड वेब एक ऐसा तंत्र है जिसमें विभिन्न कंप्यूटरों में एकत्रित सूचनाओं को Hyper text documents की सहायता से एक-दूसरे से जोड़ा जाता है। 
  • इन सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने के लिए Hyper text transfer protocol का प्रयोग किया जाता है। 
  • वर्ल्ड वाइड वेब (www) ने इंटरनेट पर सूचनाओं का आदान-प्रदान आसान बनाया है तथा इंटरनेट को ‘सूचना राजमार्ग’ (Information Highway) में परिवर्तित कर दिया है।
  • वर्ल्ड वाइड वेब पर संग्रहित प्रत्येक पेज web page कहलाता है। 
  • ये वेब पेज एचटीएमएल (hyper text mark-up language) का प्रयोग कर तैयार किए जाते हैं तथा hyperlink द्वारा एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। 
  • वह स्थान जहां ये web page संग्रहित रखे जाते हैं, web site कहलाता है। 
    • प्रत्येक web site का प्रथम पृष्ठ, जो उसके अंदर स्थित सूचनाओं की सूची प्रदान करता है, Home Page कहलाता है। 
    • किसी वेब साइट को खोलने पर सबसे पहले home page ही दिखाई पड़ता है। 
    • वेब पेज को एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर तक भेजने के लिए Hyper text transfer protocol (Http) का प्रयोग किया जाता है। 
    • इस प्रोटोकाल से इंटरनेट सेवा प्रदान करन वाला कंप्यूटर Web server कहलाता है, जबकि इस सेवा क उपयोग करने वाला web client कहलाता है।

 

7.1. वर्ल्ड वाइड वेब तथा इंटरनेट में अंतर : 

  • वर्ल्ड वाइड वेब इंटरनेट पर आधारित एक सेवा मात्र है। 
  • वर्ल्ड वाइड वेब तथा इंटरनेट में कुछ मूलभूत अंतर इस प्रकार हैं

इंटरनेट

वर्ल्ड वाइड वेब

इंटरनेट एक अंतर्राष्ट्रीय संचार नेटवर्क (Communication Network) है जो हार्डवेयर व साफ्टवेयर का इस्तेमाल कर दुनियाभर में फैले छोटे बड़े कंप्यूटर नेटवर्कों को आपस में जोड़ता है।

वर्ल्ड वाइड वेब हाइपरलिंक द्वारा आपस में जुड़े सूचनाओं का एक समूह है जिनका साझा उपयोग किया जा सकता है।

इंटरनेट के लिए इंटरनेट प्रोटोकाल सूइट (TCP तथा IP) का प्रयोग किया जाता है

जबकि वर्ल्ड वाइड वेब हाइपर टेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकाल (http) का प्रयोग करता है।

इंटरनेट के प्रयोग के लिए इंटरनेट सेवा प्रदाता (Internet Service Provider) को शुल्क देना पड़ता है

वर्ल्ड वाइड वेब इंटरनेट पर उपलब्ध एक निःशुल्क सुविधा है।

इंटरनेट हार्डवेयर तथा साफ्टवेयर दोनों के समन्वय से कार्य करता है

वर्ल्ड वाइड वेब केवल विभिन्न साफ्टवेयर का उपयोग करता है।

 

वर्ल्ड वाइड वेब पर प्रयुक्त भाषाएं (Languages Used on WWW)

 

(i) एचटीएमएल (HTML- Hyper Text Markup Language) : 

  • यह वर्ल्ड वाइड वेब पर web pages को तैयार करने के लिए प्रयुक्त साफ्टवेयर language है जिसमें hypertext तथा hyperlink का प्रयोग किया जाता है।
  •  HTML में विभिन्न वेब पेज को हाइपर लिंक का प्रयोग कर आपस में जोड़कर रखा जाता है जिससे उपयोगकर्ता अपनी इच्छानुसार एक वेब पेज से दूसरे वेब पेज या वेब साइट तक जा सकता है। 
  • एचटीएमएल (HTML) का उपयोग कर बनाए गए डाक्यूमेंट को वेब पेज पर प्रकाशित किया जा सकता है तथा सभी प्रकार के ब्राउसर द्वारा दर्शाया (display) जा सकता है।

 

हाइपर टेक्स्ट (Hyper text) : 

  • यह कंप्यूटर या किसी वेब पेज पर प्रदर्शित वह text है जो उसी या किसी अन्य वेब पेज पर उपलब्ध टेक्स्ट, ग्राफिक्स, चित्र, चलचित्र या किसी अन्य डिवाइस से जुड़ा (link) रहता है। 
  • हाइपर टेक्स्ट को स्क्रीन पर गहरे नीले रंग (blue colour) में या रेखांकित (underline) कर दिखाया जाता है। 
  • इस टेक्स्ट पर कर्सर को ले जाने पर वह हाथ के चिह्न  के जैसा हा जाता है। 
  • हाइपर टेक्स्ट को माउस या की-बोर्ड द्वारा activate करने पर उपयोगकर्ता तुरंत उससे जुड़ी सूचना तक पहुंच जाता है। 

 

हाइपर लिंक (Hyper link) : 

  • यह हाइपर टेक्स्ट द्वारा प्रदर्शित text या icon को आपस में जोड़ने की व्यवस्था है। 
  • हाइपर लिंक धारा हम वर्ल्ड वाइड वेब पर स्थित विभिन्न वेब पेज को अपनी सुविधानुसार देख सकते हैं। 
  • हाइपर लिंक को HTML साफ्टवेयर भाषा में तैयार किया जाता है। 
  • यह विभिन्न वेब पेज को आपस में जोड़ने का काम करता है।

 

(ii) एक्सटेंसिबल मार्कअप लैंग्वेज (XML-Extensible Markup Language) : 

  • यह वर्ल्ड वाइड वेब पर वेब पेज तैयार करने के लिए प्रयुक्त एक लैंग्वेज है। 
  • XML लैंग्वेज में डाटा स्टोर करने तथा उसे एक कम्प्यूटर से दूसरे कम्प्यूटर तक स्थानान्तरित करने को प्रमुखता दी जाती है। 
  • HTML भाषा में जहां वेब पेज की डिजाइन पर ध्यान होता है वहीं XML भाषा में डाटा स्टोर करने तथा डाटा स्थानान्तरण पर जोर होता है।

 

(ii) एक्सटेंसिबल एचटीएमएल (XHTML-Extensible HTML) : 

  • इस साफ्टवेयर लैंग्वेज में HTML तथा XML दोनों भाषाओं की विशेषता समाहित होती है।

 

(iv) जावा स्क्रिप्ट (Java Script) : 

  • यह Sun Microsystems कम्पनी द्वारा विकसित साफ्टवेयर लैंग्वेज है जिसका प्रयोग वेब पेज बनाने में किया जाता है। 
  • यह एक Scripting Language है जिसमें निर्देशों को लिखने की आवश्यकता कम पड़ती है।

 

(v) पीएचपी (PHP- Hypertext PreProcessor) : 

  • प्रारंभ में इसे Personal Home Page नाम दिया गया था। 
  • PHP एक साफ्टवेयर लैंग्वेज है जिसका प्रयोग Dynamic Web Pages के विकास में किया जाता है। 
  • इस भाषा का विकास Rasmus Lerdorf ने 1994 में किया था। 
  • PHP एक मुफ्त साफ्टवेयर है। 
  • इस भाषा का प्रयोग HTML भाषा के साथ मिलाकर भी किया जा सकता है। 
  • Facebook तथा Yahoo की वेबसाइट PHP भाषा में ही तैयार की गई है।

 

8. इंटरनेट प्रोटोकाल एड्रेस (IP Address)

  • इंटरनेट से जुड़े प्रत्येक कंप्यूटर या उपकरण को उसकी पहचान के लिए एक विशेष अंकीय पता दिया जाता है जिसे IP Address कहा जाता है। 
  • यह अंकीय पता इंटरनेट से जुड़ने पर Internet Service Provider द्वारा दिया जाता है। 
  • विश्वभर में इंटरनेट से जुड़े किसी दो कम्प्यूटर का IP Address एक समान नहीं हो सकता।
  • IPAddress इंटरनेट से जुड़े प्रत्येक कंप्यूटर को एक विशेष पहचान प्रदान करता है। 
  • इसमें कंप्यूटर या उपकरण द्वारा प्रयुक्त प्रोटोकाल का नाम तथा नेटवर्क पर उसकी स्थिति (location) शामिल रहता है। 
  • इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) यदि किसी कंप्यूटर को स्थायी IP Address प्रदान करता है तो उसे Static IP Address कहते हैं। 
  • यदि किसी कंप्यूटर के इंटरनेट से जुड़ने पर हर बार नया IP Address दिया जाता है तो उसे Dynamic IP Address कहा जाता है।
  • Internet Protocol Version 4 (IPv4) का प्रयोग IP address के लिए अभी तक किया जा रहा है। 
    • इसमें एड्रेस के लिए 32 बिट नंबर का प्रयोग किया जाता है। 
    • IPv4 में 0 से 255 तक के अंकों का चार समूह (set) होता है जिसे तीन डॉट (.) द्वारा अलग किया जाता है। 

जैसे-173.225.0.14

 

  • इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के बढ़ती संख्या के कारण 32 बिट एड्रेस कम पड़ने लगा। इसी कारण Internet Protocol Version 6 (IPv6) का विकास किया गया जिसमें एड्रेस के लिए 128 बिट नंबर का प्रयोग होता है। 
  • इस व्यवस्था में कुल 2128 IP Address प्रदान किए जा सकते हैं। 
  • IPv6 में चार हेक्साडेसीमल अंकों का आठ समूह होता है जिसे colons (:) द्वारा अलग किया जाता है। 

जैसे 2001:1276 : 0a8c: 1234 : 0000 : 0001 : 0576:008b

 

 

  • मॉडेम की सहायता से जब किसी कम्प्यूटर या अन्य उपकरण को इंटरनेट से जोड़ा जाता है, तो ISP (Internet Service Provider) उपयोगकर्ता को एक अस्थायी IP Address प्रदान करता है। 
  • प्रत्येक बार इंटरनेट से जुड़ने पर अलग-अलग IP Address प्रदान किया जाता है, जिसे Dynamic IP Address कहते हैं। 
  • यह इंटरनेट सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होता है।
  • ISDN, DSL, केबल मॉडेम या फाइबर ऑप्टिक में मॉडेम का प्रयोग नहीं होता। अतः इनका प्रयोग कर इंटरनेट से जुड़ने पर एक स्थायी IP Address प्रदान किया जाता है जिसे Static IP Address कहते हैं। 

 

डोमेन नेम सिस्टम (Domain Name System)

  • इंटरनेट से जुड़े प्रत्येक कंप्यूटर या उपकरण को सर्वर द्वारा एक विशेष अंकीय पता दिया जाता है, जिसे IP address कहते हैं। 
  • इस अंकीय पता को याद रखना एक कठिन कार्य है। दूसरी तरफ, कंप्यूटर सर्वर केवल बाइनरी अंकों वाले अंकीय पता की ही पहचान कर सकता है। इस समस्या के हल के लिए डोमेन नेम सिस्टम (DNS) का प्रयोग किया जाता है। 
  • डोमेन नेम सिस्टम संख्याओं से बने IP Address को शब्दों से बने डोमेन नेम में बदल देता है जो याद रखने और उपयोग करने में आसान होता है। 
  • डोमेन नेम सिस्टम में सभी Domain Name तथा उससे संबंधित IP Address का संग्रह होता है।
  • जब हम किसी वेब ब्राउसर पर किसी वेबसाइट का domain name टाइप करते हैं तो डोमेन नेम सिस्टम उसे अंकीय पता (IP Address) में बदल देता है ताकि सर्वर उस कंप्यूटर की पहचान कर उससे संपर्क स्थापित कर सके।

वेबसाइट का domain name == IP Address

  • Domain Name केस सेंसिटिव (case sensitive) नहीं होता, अर्थात् उन्हें बड़े अक्षरों (Capital letters) या छोटे अक्षरों (small letters) किसी में भी टाइप करने पर समान परिणाम प्राप्त होता है।

 

डोमेन नेम (Domain Name) : 

  • नेटवर्क में प्रत्येक वेब साइट को एक विशेष (Unique) नाम दिया जाता है जो उस वेब साइट का पता (address) होता है। 
  • किसी भी दो वेबसाइट का डोमेन नेम एक समान नहीं हो सकता। 
  • DNS सर्वर डोमेन नेम को IP Address में बदलकर उस वेब साइट की पहचान करता है।
  • डोमेन नेम में उस वेब साइट का नाम तथा एक्सटेंशन नाम शामिल होता है। 
  • प्रत्येक वेब साइट का अपना अलग-अलग नाम होता है जबकि एक्सटेंशन नाम कुछ पूर्व निर्धारित विकल्पों में से कोई एक हो सकता है। 
  • नाम तथा एक्सटेंशन को डॉट (.) द्वारा अलग किया जाता है।
  • www डोमेन नेम का अंग होता है। पर यदि इसे ब्राउसर के Address Bar पर टाइप न किया गया हो, तो वेब ब्राउसर इसे स्वयं जोड़ लेता है।

Domain name के उदाहरण हैं

  • Google.com
  • Yahoo.co.in 
  • Hotmail.com 

 

Name Extention 

  • डोमेन नेम में अंक या अक्षर दोनों हो सकते हैं। 
  • इसमें अधिकतम 64 कैरेक्टर हो सकते हैं। 
  • इसमें एकमात्र विशेष कैरेक्टर hyphen (-) का प्रयोग किया जा सकता है। 
  • डोमेन नेम का अंतिम भाग, जिसे dot (.) के बाद लिखा जाता है, किसी संगठन (organization) या देश (country) को इंगित करता है। 
  • इसे domain indicator या Top Level Domain (TLD) भी कहते हैं। 
  • संगठन को इंगित करने वाला डोमेन नेम generic domain कहलाता है जबकि देश को इंगित करने वाला डोमेन नेम country domain कहलाता है। 

टॉप लेवेल डोमेन (TLD) एक्सटेंशन के कुछ उदाहरण हैं

  • edu – educational (शैक्षणिक) 
  • com – commercial (व्यवसायिक) 
  • org – organization (संस्थान) 
  • gov – government (सरकारी)
  • mil – military (सैन्य संगठन) 
  • net – networking (नेटवर्क) 
  • int – international (अंतर्राष्ट्रीय) 
  • co – company (कंपनी) 
  • info – information (सूचना प्रदाता) 
  • Country Code टॉप लेवेल डोमेन (ccTLD) के उदाहरण हैं
    • in – India (भारत) (www.sarkarilibrary.in) 
    • uk – United Kingdom 
    • us – United States of America 

 

9.2: यूनीफार्म रिसोर्स लोकेटर (URL-Uniform Resource Locator) : 

  • वर्ल्ड वाइड वेब (www) पर किसी वेब साइट या वेब पेज का विशेषीकृत पता (specific address) उस वेब साइट या वेब पेज का URL कहलाता है। 
  • यह कंप्यूटर नेटवर्क की व्यवस्था है जो यह बतलाता है कि सूचना कहां उपलब्ध है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है। 
  • वेब ब्राउसर का उपयोग कर किसी वेब साइट या वेब पेज तक पहुंचने के लिए web browser के address bar पर उसका URL टाइप किया जाता है। 
  • URL में डोमेन नेम शामिल होता है तथा इसमें शब्द, अंक या विराम चिह्न (Letters, number or Punctuation marks) हो सकते हैं। 
  • किसी वेबसाइट में प्रत्येक वेब पेज का अपना अलग URL होता है जिसे टाइप कर सीधे उस वेब पेज तक पहंचा जा सकता है

 

किसी भी URL में शामिल होता है

1. Transfer protocol का नाम (http)

2. Colon तथा दो Slash (://)

3. Server का नाम पता (www.google.com)

  • इसे host computer का domain name भी कहा जाता है। 
  • इसमें WWW, वेबसाइट का Domain name तथा Top Level Domain (TLD) शामिल होता है।

4. वेब पेज तक पहुंचने का रास्ता – Directory path 

5. File का नाम 

  • URL में खाली स्थान (space) का प्रयोग नहीं होता तथा इसमें प्रयुक्त forward slash फाइल के directory path को दर्शाता है।

 

9.3. यूनीफार्म रिसोर्स आइडेंटिफायर (Uniform Resource Identifier-URI) : 

  • URI वर्ल्ड वाइड वेब पर स्थित किसी फाइल या सूचना का नाम और उसकी स्थिति (name and location) बताता है। 
  • URI में URL का कुछ या पूरा हिस्सा शामिल होता है। 
  • URI में सूचना या फाइल का नाम या स्थिति या दोनों होता है जबकि URL सूचना की स्थिति (location) तथा उसे प्राप्त करने का मार्ग बतलाता है।
  • URL केस सेंसिटिव (case sensitive) होता है। अतः किसी वेब साइट का URL टाइप करते समय बड़े अक्षरों (Capital letters) तथा छोटे अक्षरों (Small letters) का विशेष ध्यान रखना होता है।

 

 वेब ब्राउसर (Web Browser)

  • वेब ब्राउसर इंटरनेट पर किसी वेब पेज की खोज (Search) करने वाला साफ्टवेयर है।
  • वेब ब्राउसर साफ्टवेयर हाइपर टेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकाल (http) पर कार्य करता है। 
  • वेब ब्राउसर का प्रयोग कर वर्ल्ड वाइड वेब पर वेब पेज को देखना Browsing या Surfing कहलाता है। 
  • किसी वेब ब्राउसर में जब हम किसी वेब साइट या वेब पेज का URL टाइप करते हैं, तो वेब ब्राउसर उस URL को डोमेन नेम सिस्टम की मदद से IP address में बदल देता है तथा इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) के जरिये उस वेबसाइट से हमें जोड़ देता है।
  • सबसे पहले वेब ब्राउसर का विकास टिम बर्नर्स ली ने 1991 में किया था।

 

वर्तमान में कुछ प्रचलित वेब ब्राउसर हैं

  • Internet Explorer :
  • Mozilla FireFox : 
  • Opera :
  • Apple’s Safari : 
  • Google Chrome : 

 

Internet Explorer : 

  • यह Microsoft Corporation द्वारा विकसित वेब ब्राउसर है जो विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम में शामिल रहता है। 
  • यह विश्व का सबसे अधिक प्रयोग में लाया जाने वाला वेब ब्राउसर है।

Mozilla FireFox : 

  • इसका विकास मोजिला कार्पोरेशन द्वारा किया गया है। 
  • इस वेब ब्राउसर का प्रयोग Windows, Linux. तथा Macintosh आदि ऑपरेटिंग सिस्टम में किया जा सकता है। 
  • यह एक निःशुल्क वेब ब्राउसर है । 

Opera : 

  • यह ओपेरा साफ्टवेयर कार्पोरेशन द्वारा विकसित वेब ब्राउसर है जो मोबाइल फोन तथा पीडीए (Personal Digital Assistant) में प्रयोग के लिए लोकप्रिय हो रहा है।

Apple’s Safari : 

  • सफारी वेब ब्राउसर का विकास एप्पल कापरिशन द्वारा 2007 में किया गया। 
  • यह Mocintosh ऑपरेटिंग सिस्टम में शामिल रहता है तथा इसका प्रयोग आईफोन तथा आइपैड (ipad) के लिए भी किया जाता है।

 

Google Chrome : 

  • यह गूगल कंपनी द्वारा सन 2008 में विकसित किया गया वेब ब्राउसर है जो अपने बेहतर सुरक्षा प्रावधानों (Security Features) तथा उच्च गति क्षमता (high speed) के लिए लोकप्रिय हो रहा है।

 

ग्राफिकल वेब ब्राउसर (Graphical Web Browser) : 

  • यह ग्राफिकल यूजर इंटरफेस (Graphical User Interface – GUI) का उपयोग करते हुए इंटरनेट पर वेब पेज को एक्सेस करने की सुविधा प्रदान करता है। 
  • Mosaic को पहला लोकप्रिय ग्राफिकल वेब ब्राउसर कहा जाता है।

 

विंडोज इंटरनेट एक्सप्लोरर (Windows Internet Explorer)

Title Bar :

  • इंटरनेट एक्प्लोरर विंडों के सबसे ऊपर टाइटल बार स्थित होता है। 
  • इस पर, वर्तमान वेब पेज का नाम तथा Minimize, Maximize/Restore और Close बटन होता है।

Address Bar : 

  • Address Bar पर दो navigation button – Back तथा Forward होते हैं। 
  • Back  बटन से हम पिछली देखी हुई वेबसाइट पर जा सकते हैं। 
  • Forward बटन से हम उस वेब पेज पर जाते हैं जहां Back बटन दबाने से पहले थे। 
  • इन बटनों के साथ एक डाउन ऐरो बटन भी होता है। इस बटन को दबाने पर एक पुल डाउन मेन्यू प्रदर्शित होता है, जो उस टैब में पहले देखे गए सभी वेब पेज की सूची प्रदर्शित करता है।

URL Box : 

  • Address bar पर स्थित URL बॉक्स में वांछित वेबसाइट या वेब पेज का डोमेन नेम या IP Address टाइप कर address bar पर स्थित Go बटन या कीबोर्ड पर Enter बटन दबाया जाता है। 
  • इससे Web Browser उस वेब पेज को प्रदर्शित करता है। 
  • वेब ब्राउसर के URL बॉक्स में URL के आरंभ में http://www तथा अंत में .com टाइप करना आवश्यक नहीं होता। वेब ब्राउसर इसे स्वतः ही URL के साथ जोड़ लेता है।

Recycle/GO

  • URL box के बगल में Recycle/Go आइकन होता है। 
  • यह वेब पेज को refresh या update करता है। 
  • की-बोर्ड पर F5 बटन को दबाकर इस कार्य को किया जा सकता है। 

Stop  :

  • Address bar पर स्थित Stop आइकन पर क्लिक करने से वेब ब्राउसर वर्तमान वेब पेज को लोड करना बंद कर देता है।

Search Box : 

  • यह इंटरनेट एक्सप्लोरर का सर्च इंजन है। 
  • इस बॉक्स में वांछित सूचना के कुछ प्रमुख शब्द (Key words) टाइप कर उससे संबंधित वेब पेज खोजा जा सकता है।

Favorites : 

  • इस आइकन का प्रयोग कर बार-बार देखी जाने वाली वेबसाइट का URL सेव (Save) किया जा सकता है। 
  • अगली बार इस वेबसाइट पर जाने के लिए URL टाइप करने की जरूरत नहीं होती है। 
  • कुछ वेब ब्राउसर में इस सुविधा को Bookmark कहा जाता है।

History : 

  • इस सुविधा का प्रयोग कर उस वेब ब्राउसर द्वारा पहले देखे गए वेब साइट की सूची प्राप्त कर सकते हैं। 

 

 

Internet Explorer Key Board Short Cuts

Help विंडो खोलना 

F1

वर्तमान वेब पेज को Refresh करना  

F5

वेब पेज डाउनलोड रोकना (Stop) 

Esc

वेब पेज पर अगले विकल्प पर जाना  

Tab

वेब पेज पर पिछले विकल्प पर जाना  

Shit+Tab

डाक्यूमेंट के प्रथम पृष्ठ पर जाना  

Home

डाक्यूमेंट के अंतिम पृष्ठ पर जाना  

End

वेब साइट के होम पेज पर जाना  

Alt+Home

पिछली देखी हुई वेबसाइट पर जाना(Back)  

Alt+Left Arrow

अगली देखी हुई वेबसाइट/पेज पर जाना (Forward)  

Alt+Right Arrow

नया वेब साइट/पेज खोलना 

Ctrl+O

वर्तमान विंडो बंद (Close) करना 

Ctrl+W

History लिंक प्रदर्शित करना  

Ctrl+H

Favorites लिंक प्रदर्शित करना  

Ctrl+I

Fovorite URL सेव करना  

Ctrl+D

Search Box पर जाना  

Ctrl+E

Address Bar पर टेक्स्ट सेलेक्ट करना   

Alt+D.

Browsing History डिलीट करना 

Ctrl+Shift+Del

 

 

वेब इंडेक्स (Web Index) : 

  • वर्ल्ड वाइड वेब पर उपलब्ध वेब साइट्स की सूची या डायरेक्टरी वेब इंडेक्स कहलाता है। 
  • वेब इंडेक्स में वेब साइट की सूची अंग्रेजी वर्णमाला अक्षरों के क्रम (Alphabetic Order) या किसी अन्य अनुक्रम (Hierarchical Order) में हो सकते हैं। 
  • Yahoo! वेब इंडेक्स का एक उदाहरण है। 

सर्च इंजिन (Search Engine)

  • वर्ल्ड वाइड वेब सूचनाओं का अथाह भंडार है ,इसमें से वांछित सूचना खोजने में सर्च इंजिन हमारी मदद करता है। 
  • सर्च इंजिन वेब पर स्थित सभी वेब पेज की सूची (index) बना कर रखता है। 
  • यह वेब पेज के टाइटल (title), उसके मुख्य शब्द (keywords) या वेब पेज पर स्थित किसी शब्द या शब्द समूह (text or phrase) के आधार पर वेब पेज की खोज करता है। 
  • मुख्य शब्द (KeyWord) के साथ टर्म आपरेटर (Term Operator) का प्रयोग कर सर्च को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इसे सर्च को रिफाइन (Refine) करना कहा जाता है।
  • वेब ब्राउसर में जब हम कोई टेक्स्ट या फ्रेज डालते हैं, तो सर्च इंजिन इससे संबंधित वेब पेज की सूची प्रदर्शित करता है।
  • कुछ लोकप्रिय सर्च इंजिन हैं
    • Google 
    • Yahoo
    • Orkut 
    • Alta vista
    • Ask.com
  •  

टर्म ऑपरेटर (Term operator) : 

  • टर्म ऑपरेटर सर्च इंजिन पर वांछित वेब पेज को खोजना प्रभावी और आसान बनाता है। 
  • कुछ प्रचलित टर्म ऑपरेटर हैं

AND (+) : 

  • दो Keywords के बीच AND या (+) लगाने पर सर्च इंजिन उन सभी वेब पेज को प्रदर्शित करता है जिनमें दोनों Keyword होते हैं। 
  • AND सर्च इंजिन का डिफाल्ट ऑपरेटर है। 
  • Keywords के बीच AND नहीं लगाने पर भी सर्च इंजिन उन्हीं वेब पेज को प्रदर्शित करता है जिनमें दोनों Keyword हों।

OR (|) : 

  • OR या / से जुड़े शब्दों को खोजने पर सर्च इंजिन उन सभी वेब पेज को प्रदर्शित करता है जिनमें दोनों Keywords में से कोई एक भी शब्द हो।

NOT (-)  

  • दो Keywords के NOT या (-) से जुड़े होने पर सर्च इंजिन उन वेब पेज को प्रदर्शित करता है जिसमें पहला शब्द तो हो, पर NOT से जुड़ा दूसरा शब्द न हो।

Phrase Search (” “) : 

  • फ्रेज सर्च में शब्दों को Inverted Comma के अंदर रखा जाता है। 
  • इससे सर्च इंजिन उस वेब पेज को प्रदर्शित करता है जिसमें पूरा फ्रेज एक साथ उपलब्ध हो।

 

  • गूगल (Google) शब्द की उत्पत्ति गूगोल (Googol) से हुई है जिसका अर्थ है 
    • 10 का घात 100 (10100) या संख्या 1 के बाद सौ शून्य।

 

वाइल्ड कार्ड (Wild Card) : 

  • वाइल्ड कार्ड वह विशेष चिह्न (Special Symbol) है जिसका प्रयोग किसी सूचना या वेब पेज को खोजने के दौरान Keyword के साथ किया जाता है। 
  • वाइल्ड कार्ड किसी एक कैरेक्टर या एक से अधिक कैरेक्टर के समूह को इंगित करता है।
  • प्रश्न चिह्न (?) तथा एस्टेरिस्क या स्टार (*) वाइल्ड कार्ड के उदाहरण हैं। 
  • प्रश्नचिह्न (?) एक बार में एक कैरेक्टर को निरूपित करता है, 
  • asterisk (*) एक बार में एक या एक से अधिक कैरेक्टर को निरूपित करता है। 
  • किसी Keyword के साथ वाइल्ड कार्ड का प्रयोग करने पर सर्च इंजिन उससे संबंधित सभी विकल्पों वाले वेब पेज़ की सूची प्रदर्शित करता है।
  • सोशल नेटवर्किंग साइट पर हैश (hash) कैरेक्टर (#) का प्रयोग Keywords के साथ वाइल्ड कार्ड के रूप में किया जाता है। .

 

Surfing : 

  • वर्ल्ड वाइड वेब पर अपने पसंद की सूचना की खोज में एक वेब पेज से दूसरे वेब पेज पर जाना Surfing कहलाता है। 
  • वेब पेज पर उपलब्ध हाइपर लिंक की व्यवस्था इस कार्य को आसान बनाती है। 

 

हिट्स (Hits) : 

  • वर्ल्ड वाइड वेब पर किसी सूचना को प्राप्त करने के लिए वेब सर्च इंजन पर उस वेब पेज का टाइटल या कुछ मुख्य शब्द (keywords) टाइप किया जाता है। 
  • सर्च इंजिन इसके परिणामों की एक सूची प्रदर्शित करता है जिसे हिट्स कहा जाता है।

 

Push Message : 

  • सामान्यतः इंटरनेट के जरिए कोई वेब पेज या फाइलं अपने कम्प्यूटर पर प्राप्त करने के लिए सर्वर को इसका अनुरोध (request) भेजा जाता है। इसके बाद वेब पेज या फाइल को सर्वर से कम्प्यूटर तक Pull या खींचा जाता है। इसे डाउनलोड (Down Load) भी कहते हैं।
  • पुश मैसेज को सर्वर द्वारा कम्प्यूटर या मोबाइल फोन पर बिना किसी अनुरोध के Push या धकेला जाता है। 
  • इस तकनीक का उपयोग सर्वर द्वारा उपभोक्ता को सूचना, अपडेट (update) या SMS भेजने के लिए किया जाता है।

 

Ping : 

  • पिंग इंटरनेट पर कम्प्यूटर तथा अन्य उपकरणों की जांच (test) है जो यह बताता है कि वह कम्प्यूटर या उपकरण सही काम कर रहा है या नहीं। 
  • इंटनेट पर किसी सर्वर के प्रतिक्रिया देने में लगा समयं (response time) की जांच भी पिंग कहलाता है।
  • पिंग द्वारा किसी विशेष IP Address वाले कम्प्यूटर या उपकरण के उपलब्धता की जांच की जाती है। 
  • इसके लिए, उस IP Address पर कोई सूचना पैकेट भेजा जाता है तथा प्राप्त जवाब की जांच की जाती है। 

 

Meta Search Engin : 

  • यह एक सर्च टूल है जो इंटरनेट पर किसी सूचना को खोजकर वेब पेज की सूची दर्शाने के लिए अन्य सर्च इंजन से प्राप्त परिणामों का उपयोग करता है। 
  • मेटा सर्च इंजन यूजर से इनपुट लेकर उसे अन्य सर्च इंजन को भेजता है और उनसे प्राप्त परिणामों को प्रोसेस कर सर्च रिजल्ट के रूप में प्रस्तुत करता है। 

 

इंटरनेट शब्दावलियाँ (Terms Related to Internet) 

 

उपयोगकर्ता कंप्यूटर (Client Computer) : 

  • इंटरनेट से जुड़ा कंप्यूटर जो सर्वर कंप्यूटर के माध्यम से इंटरनेट की सुविधाओं का उपयोग करता है, Client Computer कहलाता है। 
  • Client कम्प्यूटर सूचना प्राप्त करने के लिए सर्वर कम्प्यूटर को अनुरोध भेजता है।

 

सर्वर कंप्यूटर (Server Computer) : 

  • उच्च भंडारण क्षमता तथा तीव्र गति वाला कंप्यूटर जिस पर एक या अधिक वेब साइट की सूचनाएं/वेब पेज संग्रहित रहते हैं, सर्वर कंप्यूटर कहलाता है। 
  • सर्वर कंप्यूटर अपने नेटवर्क से जुड़े Client कंप्यूटरों को अनुरोध पर सूचना/वेब पेज उपलब्ध कराता है। 
  • यह एक साथ कई उपयोगकर्ताओं को डाटा उपलब्ध करा सकता है। 
  • सर्वर कम्प्यूटर नेटवर्क का सबसे शक्तिशाली व महत्वपूर्ण कम्प्यूटर होता है। इस तरह सूचना प्राप्त करने को Client Server Model कहा जाता है। 
  • सर्वर कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे-Web Server, Lan Server, e-mail server आदि। 
  • किसी एक कंप्यूटर पर एक साथ कई प्रकार के सर्वर प्रोग्राम चल सकते हैं।

 

वेब पेज (Web Page) : 

  • वेब पेज एक इलेक्ट्रानिक पेज है जिसे HTML (Hyper Text Markup Language) का प्रयोग कर बनाया जाता है। 
  • वेब साइट पर दिखने वाला प्रत्येक पेज वेब पेज ही होता है। 
  • वेब पेज में टेक्स्ट, चित्र, रेखाचित्र, आडियो, वीडियो या हाइपरलिंक कुछ भी हो सकता है।

 

स्टैटिक/डायनमिक वेब पेज (Static/Dynamic Web Page) : 

  • स्टैटिक वेब पेज के कम्प्यूटर स्क्रीन पर प्रदर्शित होने के बाद उसमें कोई परिवर्तन तब तक नहीं किया जा सकता जब तक उसे Refresh या Update नहीं कर दिया जाए।
  • डायनमिक वेब पेज के स्वरूप और तथ्यों (Content) में लगातार परिवर्तन होता रहता है। 
    • उपयोगकर्ता द्वारा दिए गए इनपुट या डाटाबेस के आधार पर कम्प्यूटर स्वतः वेब पेज में परिवर्तन कर लेता है। 
    • डायनमिक वेब पेज Java Script या Dynamic HTML लैग्वेज साफ्टवेयर का प्रयोग कर तैयार किया जाता है।

 

वेब साइट (Web Site) : 

  • एक ही डोमेन नेम के अंतर्गत पाये जाने वाले वेब पेज का संकलन वेब साइट कहलाता है। 
  • किसी वेब साइट में एक या अधिक वेब पेज हो सकते हैं। 
  • वेब साइट के विभिन्न पेज आपस में हाइपर लिंक द्वारा जुड़े होते हैं।

होम पेज (Home Page) : 

  • किसी वेब साइट का पहला या मुख्य पृष्ठ होम पेज कहलाता है। 
  • किसी वेब साइट को खोलने पर सबसे पहले उसका होम पेज़ ही कंप्यूटर पर प्रदर्शित होता है। 
  • होम पेज पर वेब साइट पर उपलब्ध विषयों की सूची (index) हो सकती है। 
  • किसी वेब साइट के विभिन्न पेज को देखते समय “Home” बटन क्लिक करने पर उसका होम पेज स्वतः सामने आ जाता है।

होस्ट (Host) : 

  • इंटरनेट सेवा व अन्य सुविधाएं प्रदान करने के लिए नेटवर्क से जुड़ा प्रत्येक कंप्यूटर होस्ट कहलाता है।

इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (Internet Service Provider) : 

  • यह इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली एक संस्था है जिसमें एक या अधिक गेटवे (Gateway) कंप्यूटर रहता है तथा जो इससे जुड़े अन्य कंप्यूटरों को इंटरनेट से जुड़ने की सेवा प्रदान करता है।

एनोनिमस सर्वर (Anonymous Server) : 

  • वह सर्वर जिससे जुड़ने के लिए पासवर्ड (Password) या किसी अन्य पहचान (authentication) की जरूरत नहीं होती, एनोनिमस सर्वर कहलाता है।

थम्बनेल (Thumbnail) : 

  • किसी चित्र या मैप को प्रदर्शित करने वाला नाखून (nail) के आकार का छोटा रूप thumbnail कहलाता है। 
  • इसे क्लिक करके चित्र का बड़ा आकार देखा जा सकता है।

क्रॉस प्लेटफार्म (Cross platform) : 

  • ऐसा साफ्टवेयर जो किसी भी कंप्यूटर हार्डवेयर या किसी भी operating system के साथ काम कर सकता है, cross platform कहलाता है।

नोड (Node) : 

  • किसी भी नेटवर्क से जुड़ा प्रत्येक कंप्यूटर, सर्वर या कोई अन्य उपकरण नोड कहलाता है। 
  • यह कंप्यूटर नेटवर्क का अंतिम बिंदू या टर्मिनल होता है।

फ्रेम (Frame) : 

  • वेब ब्राउसर विंडो के भीतर स्थित आयताकार स्थान जो कई वेब पेज को एक साथ प्रदर्शित करता है, फ्रेम कहलाता है।

 

वर्चुअल रियलिटी (Virtual Reality) 

  • इंटरनेट पर उपलब्ध वेब पेज को वास्तविकता के नजदीक लाने तथा जीवंत बनाने के लिए उनमें त्रि-आयामी प्रभाव (three dimentional effect) डाला जाता है जिसे virtual reality कहते हैं।
  • VRML (Virtual Reality Modelling Language) भाषा का प्रयोग कर वेब पेज में वर्चुअल रियलिटी का आभास डाला जाता है। 
  • VRML को HTML(Hyper Text Markup Language) का three dimentional (3D) रूप कहा जा सकता है। 

 

पॉप अप (Pop up) : 

  • वर्ल्ड वाइड वेब पर सर्फिंग करते समय या वेब पेज पढ़ते समय स्वयं खुलने वाला छोटा विंडो पॉप अप कहलाता है। 
  • यह सामान्यतः अवांछित विंडो होता है जिसका प्रयोग ऑनलाइन व्यवसायिक विज्ञापनों के लिए किया जाता है।

लॉग इन (Log in) : 

  • इंटरनेट पर किसी अन्य कंप्यूटर या सर्वर से जुड़ने की प्रक्रिया ताकि उस कंप्यूटर या सर्वर की सुविधाओं तथा सूचनाओं का उपयोग किया जा सके, लॉग इन कहलाता है।

लॉग ऑफ (Log off) : 

  • इंटरनेट पर किसी कंप्यूटर या सर्वर से जुड़कर अपना कार्य समाप्त कर उस प्रोग्राम से बाहर निकलने की प्रक्रिया लॉग ऑफ कहलाता है। 

 

डाउनलोड (Download) : 

  • किसी नेटवर्क में किसी दूसरे कंप्यूटर या सर्वर से डाटा या सूचना को Local कम्प्यूटर पर प्राप्त करना download कहलाता है। 
  • डाउनलोड किए गए फाइल (डाटा या सूचना) को स्थानीय कंप्यूटर पर संग्रहित तथा प्रोसेस किया जा सकता है। 
  • डाउनलोड के लिए ‘Get’ आदेश दिया जाता है।

 

अपलोड (upload) : 

  • किसी नेटवर्क में डाटा या सूचना को स्थानीय कंप्यूटर से किसी दूसरे कंप्यूटर या सर्वर आदि को भेजने की प्रक्रिया अपलोड कहलाती है। 
  • अपलोड किए गए डाटा को दूसरे कंप्यूटर पर स्थायी तौर पर संग्रहित व प्रोसेस किया जा सकता है। 
  • अपलोड के लिए ‘Put’ आदेश दिया जाता है।

 

ऑनलाइन (Online) : 

  • जब कोई कंप्यूटर या उपकरण चालू हालत में रहते हुए उपयोग के लिए तैयार (ready for use) रहता है या किसी दूसरे उपकरण से जुड़ा रहता है, तो उसे ऑनलाइन कहा जाता है। 
  • इंटरनेट या किसी अन्य नेटवर्क से जुड़े हुए कंप्यूटर या उपकरण को ऑनलाइन कहा जाता है।

 

ऑफ लाइन (Off line) : 

  • जब कोई कंप्यूटर या उपकरण पॉवर सप्लाई बंद कर देने के कारण चालू हालत में न हो या किसी अन्य उपकरण से जुड़ा न हो, तो उसे ऑफ लाइन कहते हैं।
  • वर्तमान में, जब कोई कंप्यूटर या उपकरण इंटरनेट या किसी अन्य नेटवर्क से जुड़ा हुआ न हो तो उसे ऑफ लाइन कहा जाता है।

 

क्लाउड कंप्यूटिंग (Cloud computing) : 

  • किसी कंप्यूटर द्वारा इंटरनेट से जुड़कर इंटरनेट पर उपलब्ध सुविधाओं का उपयोग करना क्लाउड कंप्यूटिंग कहलाता है। 
  • इसमें वर्ल्ड वाइड वेब, सोशल नेटवर्किंग साइट जैसे—फेसबुक, ट्विटर, यू-ट्यूब आदि; वेब ब्राउसर, ई-मेल, ऑनलाइन बैकअप आदि शामिल होते हैं। .

 

रीयल टाइम कम्युनिकेशन (Real time communication) : 

  • दो या अधिक उपयोगकर्ताओं के बीच सीधा संवाद स्थापित कर तत्काल सूचनाओं का आदान प्रदान रीयल टाइम कम्युनिकेशन कहलाता है। 
  • इसे ‘जीवंत संवाद’ (Live communication) भी कहा जाता है। 
  • जैसे टेलीफोन, मोबाइल फोन, टेलीकान्फरेंसिंग, वीडियो कान्फरेंसिंग, वायस ओवर इंटरनेट प्रोटोकाल (Voice over Internet Protocol) आदि द्वारा स्थापित संवाद।

 

(MPEG-Moving Picture Experts Group) : 

  • यह वीडियो डाटा या फाइल को डिजिटल रूप में संपीडित (compress) कर नेटवर्क पर भेजने या संग्रहित करने की तकनीक है। 
  • इसका प्रयोग कर चलचित्रों तथा सिनेमा आदि को नेटवर्क पर भेजा तथा देखा जा सकता है।

(JPEG-Joint Photographic Expert Group) : 

  • यह चित्र (picture) तथा रेखाचित्रों (graphics) आदि को डिजिटल डाटा में परिवर्तित कर नेटवर्क पर भेजने, संग्रहित करने तथा देखने की एक लोकप्रिय तकनीक है।

पीडीएफ (PDF-Portable Document Format) : 

  • यह द्विविमीय डाक्यूमेंट (2 dimentional document) जैसे-टेक्स्ट, चित्र, रेखाचित्र आदि को संग्रहित करने (store) तथा स्थानान्तरण (transfer) के लिए गठित एक प्रचलित मानक है। 
  • इसे Adobe System द्वारा 1993 में जारी किया गया था। 

 

13. भारत में इंटरनेट (Internet in India)

  • भारत में इंटरनेट का आरंभ 80 के दशक में हुआ जब अर्नेट (ERNET-Education and Research Network) के माध्यम से भारत के पांच प्रमुख संस्थानों को जोड़ा गया। 
  • बाद में नेशनल इन्फार्मेटिक्स सेंटर (NIC) द्वारा देश के सभी जिला मुख्यालयों को प्रशासनिक सुविधा हेतु नेटवर्क से जोड़ा गया। 
  • भारत में जनसामान्य के लिए इंटरनेट सेवा का आरंभ 15 अगस्त 1995 को विदेश संचार निगम लिमिटेड (VSNL) द्वारा किया गया।

 

इंटरनेट ऑफ थिंग्स (Internet of Things – IoT) : 

  • दैनिक जीवन में उपयोग आने वाली विभिन्न भौतिक वस्तुओं (Physical devices) में कम्प्यूटर स्थापित कर उन्हें आपस में जोड़कर एक नेटवर्क बनाया जा सकता है ताकि वे मानवीय हस्तक्षेप (Human interference) के बगैर एक दूसरे को डाटा स्थानान्तरित कर संवाद स्थापित कर सकें। 
  • इंटरनेट द्वारा आपस में जुड़े भौतिक उपकरणों से बना नेटवर्क इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) कहलाता है।
  • इंटरनेट ऑफ थिंग्स से जुड़े एक उपकरण से प्राप्त डाटा का उपयोग दूसरे संबंधित उपकरण को नियंत्रित व संचालित करने तथा इंटरनेट पर रीयल टाइम निर्देश देने के लिए किया जा सकता है। 
  • इसका उपयोग भविष्य में भौतिक उपकरणों को इंटरनेट से नियंत्रित करने आदि में किया जा सकता है।

 

 

इंटरनेट के उपयोग (Uses of Internet)

  • WWW-World Wide Web
  • e-mail – electronic mail 
  • Social Networking
    • Facebook, Twitter, Orkut, Linkedin, Whatsapp, Instagram, Blog, Youtube 
  • Telenet/Remote Login
  • Video Conference) 
  • Instant Messaging
  • Chatting
    •  Internet Relay Chat. 
  • News Group
  • Use Net
  • Internet Telephony
  • IPTv
  • e-commerce 
  • e-business
  • e-governance
  • e-Telephony
  • Research and Education
    • eLearning, Virtual Classroom. 
  • Entertainment

 

ई-मेल (e-mail)

  • ई-मेल (electronic mail) इंटरनेट पर कम खर्च में तीव्र गति से message भेजने या प्राप्त करने का एक लोकप्रिय साधन है। 
  • ईमल Client Server Model पर काम करता है। 
  • विश्व का पहला ई-मेल रे टॉमलिंसन (Ray Tomlinson) ने 1971 में भेजा था। इन्हें ‘ई-मेल सेवा का जनक’ (Father of e-mail) कहा जाता है। 
  • ई-मेल संदेश एक साथ एक या अधिक व्यक्तियों को भेजा जा सकता है। 
  • ई-मेल संदेश साथ टेक्स्ट, फोटो, ऑडियो या वीडियो फाइल संलग्न कर भेजा सकता है जिसे Attachments कहते हैं। 
  • भेजे गए e-mail की कॉपी भेजने वाले के e-mail account पर भी उपलब्ध होता है जिसे बाद में देखा (View), परिवर्तित किया (Edit), पुनः भेजना forward) या डिलीट (Delete) किया जा सकता है। 

 

  • इ-मेल की तुलना परंपरागत डाक व्यवस्था से की जा सकती है Email भेजना पत्र भेजने के समान है। 
  • ई-मेल की सुविधा प्राप्त न के लिए प्रत्येक उपभोक्ता का एक ई-मेल एड्रेस होता है जिसे ई-मेल सर्विस प्रोवाइडर के पास ई-मेल खाता (e-mail account) खोलकर प्राप्त किया जा सकता है। 
  • उपयोगकर्ता अपने ई-मेल एड्रेस तथा पासवर्ड का प्रयोग कर ई-मेल सर्वर से जुड़ता है जिसे लॉग इन (log in) कहते हैं। 
    • इसके बाद हम दिए गए ई-मेल एड्रेस पर संदेश (message) भेज सकते हैं।

 

  • ई-मेल सर्वर प्रत्येक ई-मेल खाताधारी को एक निश्चित मेमोरी प्रदान करता है जिसे Mail box या In box कहा जाता है। 
  • e-mail सेवा इतना तीव्र है कि परंपरागत डाक व्यवस्था को धीमा मेल (Snail Mail) कहा जाने लगा है।
  • इंटरनेट पर e-mail द्वारा संदेश भेजने के लिए SMTP (Simple Mail Transfer Protocol) का प्रयोग किया जाता है जबकि संदेश प्राप्त करने के लिए POP (Post Office Protocol) का प्रयोग किया जाता है।

 

 

ई-मेल एड्रेस (e-mail address)

  • ई-मेल एड्रेस को ई-मेल सर्वर पर अपना खाता (account) खोलकर प्राप्त किया जा सकता है। 
  • ई-मेल सेवा में प्रत्येक उपयोगकर्ता का एक विशेष (Unique) ई-मेल ऐड्रेस होता है। ई-मेल एकाउंट खोलते समय उपयोगकर्ता अपना User name चुनता है। 
    • यदि वह Username पहले से प्रयोग में है, तो ई-मेल सेवाप्रदाता कोई अन्य Username चुनने का विकल्प देता है। 
    • यदि वह Username प्रयोग में नहीं है तो इसे उपभोक्ता के लिए आरक्षित (Reserve) कर लिया जाता है। 

 

ई-मेल एड्रेस में होता है

  • यूजर नेम (User name) : यह उपयोगकर्ता द्वारा दिया जाता है। एक ई-मेल सर्वर पर किसी एक यूजर नेम का प्रयोग एक ही बार किया जाता है। 
  • @ : इसे at symbol कहा जाता है जो e-mail में स्वतः जुड़ जाता है। 
  • Domain name : यह उस सर्वर का नाम होता है जो ई-मेल खाता प्रदान करता है। जैसे

Vinaykumarojha @gmail .in

यूजर नेम – at  – डोमेन नेमडोमेन नेम एक्सटेंशन 

 

  • ई-मेल एड्रेस में यूजर नेम 64 कैरेक्टर तक का हो सकता है। 
  • यूजर नेम केस सेंसिटिव (case sensitive) होता है, अर्थात् इसमें capital letters तथा small letters का विशेष ध्यान रखना पड़ता है।

 

  • ध्यान दें कि ई-मेल एड्रेस में कोई खाली (space) स्थान नहीं रहता है। 
  • इसमें A से Z तक अक्षर, 0 से 9 तक अंक तथा कुछ विशेष चिह्न हो सकते हैं। 
  • भारत में निःशुल्क ई-मेल एकाउंट प्रदान करने वाले प्रमुख वेबसाइट हैं

www.yahoomail.com 

www.hotmail.com 

www.rediffmail.com 

www.gmail.com

 

ऐड्रेस बुक (Address Book) : 

  • ई-मेल सेवा में बने Address बुक में e-mail address स्टोर किया जाता है जिसे जरूरत पड़ने पर मेल भेजा जा सकता है। 
  • ऐड्रेस बुक में स्टोर किए गए email address को दोबारा टाइप करने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि उसे सेलेक्ट कर To, Cc या BCc बॉक्स में डाला जा सकता है। इससे प्रत्येक e-mail ऐड्रेस को याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती।

 

मेलिंग लिस्ट (Mailing List) : 

  • यह e-mail की एक वेशेषता है जिसके द्वारा कोई संदेश कई लोगों को एक साथ भेजा जा सकता है। 
  • Mailing list में प्राप्तकर्ताओं के ई-मेल एड्रेस संग्रहित रहते हैं। 
  • जब किसी संदेश को mailing list में भेजा जाता है तो ईमेल सर्वर उस संदेश को mailing list में उपलब्ध सभी ई-मेल एड्रेस को स्वतः भेज देता है।

 

एटैचमेंट (Attachment) : 

  • किसी e-mail के साथ text, table, graphics, animation, audio या video युक्त किसी फाइल को जोड़कर भेजा जा सकता है जिसे attachments कहते हैं। 

 

सिग्नेचर (Signature) : 

  • ई-मेल संदेश के अंत में कोई विशेष अभिवादन या सूचना (यूजर नेम, ई-मेल पता, फोन नंबर आदि) जोड़ी जा सकती है जिसे सिग्नेचर (Signature) कहा जाता है। 
  • E-mail के Signature icon में पेन का चित्र बना होता है। 
  • इस पर क्लिक करने से संदेश के साथ सिग्नेचर स्वतः जुड़ जाता है। 
  • यह ई-मेल संदेश को आत्मीयता का स्वरूप प्रदान करता है।

 

कार्बन कापी (Carbon copy – Cc) : 

  • message को यदि e-mail के जरिये एक या अधिक व्यक्तियों को सूचनार्थ भेजना होता है तो उसका e-mail address कार्बन कापी (Cc) कालम में लिखा जाता है। 
  • कार्बन कापी (Cc) बॉक्स में अंकित पते पर ई-मेल पाने वाला यह जान सकता है कि उक्त ई-मेल उसके अतिरिक्त और किस-किस पते पर भेजा गया है। 

 

ब्लाइंड कार्बन कापी (Blind Carbon copy -BCc) : 

  • BCc में प्राप्तकर्ता को यह पता नहीं चल पाता कि यह संदेश अन्य किन-किन व्यक्तियों को भेजा गया है

 

प्राथमिकता (Priority) : 

  • किसी ई-मेल संदेश में Priority तय किए जाने का विकल्प होता है। 
  • किसी ई-मेल को तीन Priority – Low, Normal तथा High में से किसी एक में रखा जा सकता है। 
  • High Priority वाले ई-मेल संदेश के टेक्स्ट का रंग लाल होता है। 
  • किसी ई-मेल संदेश की डिफाल्ट priority Normal होता है। 
    • अगर कोई priority इंगित न की गई हो, तो वह ई-मेल Normal Priority वाला होता है। 

 

रिप्लाई (Reply) : 

  • अगर हम प्राप्त किए गए किसी ई-मेल का जवाब (Reply) भेजते हैं तो Subject Box में RE : स्वतः जुड़ जाता है जो Reply को इंगित करता है।

 

2.11. फारवर्ड (Forward) : 

  • यदि प्राप्त किए गए ई-मेल को किसी अन्य ई-मेल ऐड्रेस पर भेजते हैं, तो इसे Forward कहा जाता है। 
  • इसके साथ FW : स्वतः जुड़ जाता है जो Forward को इंगित करता है।

 

2.12. ड्राफ्टस (Drafts) : 

  • यदि आप कोई ई-मेल संदेश तैयार करते हैं, परंतु उसे बाद में भेजने के लिए सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो उसे Drafts फोल्डर में Save कर सकते हैं। 
  • इस ई-मेल संदेश को कभी भी खोलकर edit, delete या किसी ई-मेल एड्रेस को Send किया जा सकता है।

 

2.13. ई-मेल मैसेज फार्मेट (e-mail message format) 

  • From : ई-मेल भेजने वाले का पता 
    • (ई-मेल भेजते समय From तथा Date ई-मेल प्रोग्राम द्वारा स्वतः पूरा कर लिया जाता है।) 
  • To : ई-मेल पाने वालों का पता (एक या अधिक) 
  • Cc : कार्बन कॉपी(Carbon Copy) भेजे जाने वालों का ई-मेल पता 
  • BCc : Blind Carbon Copy – वह ई-मेल पता जिसे मैसेज ब्लाइंड कार्बन कापी के रूप में भेजना है। 
  • Subject : ई-मेल संदेश का विषय लिखा जाता है। 
  • Attach a file : ई-मेल के साथ attachment जोड़ने के लिए 
  • Body : ई-मेल संदेश का टेक्स्ट तथा उसके साथ लगे attachment का आइकन

 

2.14. ई-मेल संदेश की सुरक्षा (Security of e-mail) 

  • व्यक्तिगत सूचना को ई-मेल पर न भेजें। 
  • संदिग्ध ई-मेल या उसके attachment को न खोलें। 
  • स्पाम (Spam) ई-मेल संदेश का उत्तर न दें। 
  • ई-मेल एकाउंट बंद करते समय हमेशा log-out करें। 
  • ई-मेल पासवर्ड को सुरक्षित रखें तथा इसे समय-समय पर बदलते रहें। 

 

ई-मेल स्पॉम (e-mail Spam) :

  • इसे Junk e-mail या Unsolicited Bulk e-mail भी कहा जाता है। 
  • इसमें अवांछित ई-मेल अनेक व्यक्तियों को उनके ई-मेल एड्रेस पर भेजा जाता है।
  • स्पैम भेजने वाला विभिन्न स्रोतों से ई-मेल एड्रेस प्राप्त करता है। 
  • वर्तमान में ई-मेल स्पॉम कुल स्पॉम का 80% होता है। 

 

3. यूज नेट (Use net)

  • यह User network का संक्षिप्ताक्षर है। 
  • यह इंटरनेट आधारित एक व्यवस्था है जिसमें अनेक वेब साइटों को आपस में जोड़कर उसका प्रयोग electronic discussion forum की तरह किया जाता है। 
  • इसमें विभिन्न उपयोगकर्ता किसी खास विषय पर अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं तथा दूसरों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों को पढ़कर उन पर अपनी प्रतिक्रिया (comments) दे सकते हैं।
  • न्यूज ग्रुप (News Group) यूजनेट का एक उदाहरण है। 
  • इस विशेष कार्य के लिए रखे गए सर्वर को न्यूज सर्वर कहा जाता है। 
  • पुशनेट (Pushnet) की सहायता से संदेश इलेक्ट्रानिक बुलेटिन बोर्ड (Electronic Bulletin Board) पर भेजा जाता है जहां वह सबके लिए उपलब्ध होता है।

 

थ्रेड (Threads) : 

  • इंटरनेट पर electronic discussion forum में किसी विषय पर किसी उपयोगकर्ता द्वारा अलग से चर्चा आरंभ करना threads कहलाता है। 
  • इस विषय पर किए गए Post तथा उनके reply से मिलकर नए thread का निर्माण होता है।

 

न्यूज ग्रुप (News Group) : 

  • यह समान विषय में रुचि रखने वाले व्यक्तियों द्वारा इंटरनेट पर अपने विचार, अनुभव या किसी सूचना आदि को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम है। 
  • न्यूज ग्रुप इंटरनेट आधारित एक डिस्कशन फोरम (Discussion forum) है। 
  • Use net न्यूज ग्रुप का एक उदाहरण है। 
  • न्यूज ग्रुप में अपने विचारों को डालना पोस्ट (Post) कहलाता है। 

 

4. चैटिंग (Chatting) 

  • इंटरनेट सेवा से जुड़े कंप्यूटर द्वारा दो या अधिक व्यक्तियों को आपस में की-बोर्ड के माध्यम से बातचीत करना चैटिंग कहलाता है। 
  • इसमें, दूर बैठे व्यक्ति के साथ चैट सर्वर के जरिए संपर्क स्थापित कर की-बोर्ड पर अपने विचारों को टाइप किया जाता है। की-बोर्ड द्वारा टाइप किए गए संदेश उस चैनल से जुड़े सभी उपयोगकर्ताओं के मानीटर पर प्रदर्शित होता है। 
  • इसमें दोनों उपयोगकर्ताओं का कंप्यूटर पर उपस्थिति होना आवश्यक है। 
  • चैटिंग की सुविधा Rediff, Yahoo, Google आदि सर्विस प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध करायी जा रही है।
  • चैटिंग के दौरान किसी चैनल पर उपयोगकर्ता को उसके यूजर नेम (user name) द्वारा जाना जाता है। 
  • इंटरनेट रिले चैट (IRC) इंटरनेट के माध्यम से Real time chatting सुविधा उपलब्ध कराता है। 
  • इसमें बातचीत का जवाब भी तुरंत प्राप्त किया जा सकता है। किसी खास विषय पर बनाया गया On line discussion group जो जीवंत (Live) संवाद स्थापित करता है, चैट ग्रुप (Chat Group) कहलाता है। 

 

5. टेलीनेट (Telenet) या रिमोट लॉग इन (Remote Login)

  • टेलीनेट का अर्थ है- टेलीफोन नेटवर्क। 
  • यह एक टेक्स्ट आधारित संचार प्रोटोकाल है। किसी स्थानीय कंप्यूटर द्वारा इंटरनेट से जुड़े दूरस्थ कंप्यूटर (Remote Computer) पर स्थित डाटा, सूचना तथा संसाधनों का उपयोग करने की सुविधा टेलीनेट या रिमोट लॉग इन कहलाता है। 
  • इस सेवा के उपयोग के लिए उपयोगकर्ता के पास दूरस्थ कम्प्यूटर का Login name तथा Password होना जरूरी है। 
  • टेलीनेट के जरिए हम इंटरनेट सेवा का उपयोग कर किसी स्थानीय कंप्यूटर के द्वारा दूरस्थ स्थित किसी अन्य कंप्यूटर पर ऐसे कार्य कर सकते हैं मानों हम दूरस्थ स्थित कंप्यूटर के सामने ही बैठे हों। ऐसे में स्थानीय कंप्यूटर से दिया गया कोई भी आदेश दूरस्थ कंप्यूटर पर क्रियान्वित होता है तथा उसका परिणाम स्थानीय कंप्यूटर के स्क्रीन पर प्रदर्शित होता है। 

 

6. इंसटैंट मैसेजिंग (Instant Messaging) 

  • इंटरनेट पर text मैसेज भेजकर तुरंत जीवंत संवाद (live conversation) स्थापित करना Instant Messaging कहलाता है। 
  • यह online chat का एक रूप है। 
  • इसमें मैसेज पाने वाला तुरंत उसका जवाब भी दे सकता है। इसमें हम टेक्स्ट के साथ चित्र, ऑडियो तथा वीडियो फाइल भी भेज सकते हैं। 
  • Instant Messaging की सुविधा प्रदान करने वाले कुछ वेबसाइट्स हैं

Windows Live Messenger 

Yahoo! Messenger

Google Talk 

 

7.वीडियो कांफरेंस (Video Conference)

  • कंप्यूटर तथा इंटरनेट की सहायता से दो या अधिक अलगअलग स्थानों पर स्थित व्यक्ति आपस में जीवंत (live) दृश्य व श्रव्य (video and audio) संवाद स्थापित कर सकते हैं मानों वे एक साथ बैठे हों। इसे वीडियो कान्फरेंस कहा जाता है। 
  • इसमें कंप्यूटर, वेब कैमरा, माइक/माइक्रोफोन, स्पीकर तथा इंटरनेट तकनीक का प्रयोग किया जाता है। 
  • वीडियो कांफरेंसिंग कम्प्यूटर पर मल्टी मीडिया के उपयोग का एक उदाहरण है। 

 

8. इंटरनेट टेलीफोनी (Internet Telephony) 

  • कंप्यूटर तथा इंटरनेट सेवा के जरिए टेलीफोन पर उपलब्ध सेवाओं का प्रयोग करना इंटरनेट टेलीफोनी कहलाता है। 
  • इसके द्वारा आवाज (voice) या फैक्स (fax) आदि को टेलीफोन नेटवर्क की जगह इंटरनेट के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जाता है। 
  • इंटरनेट टेलीफोनी इंटरनेट प्रोटोकॉल का प्रयोग कर रीयल टाइम टेलीफोन संवाद स्थापित करता है। 
  • इंटरनेट टेलीफोनी में आवाज के प्रसारण के लिए VoIP (Voice over Internet Protocol) का प्रयोग किया जाता है। 
  • इसके लिए इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) के अलावा VoIP Service Provider की सेवा भी ली जाती है। 
  • इसमें फोन का शुल्क नहीं लगता बल्कि केवल इंटरनेट का शुल्क देना पड़ता है, अतः कम खर्च में लंबी दूरी की बातचीत संभव हो पाती है। 
  • इंटरनेट टेलीफोनी में Soft Phone अप्लिकेशन साफ्टवेयर का प्रयोग किया जाता है जो कम्प्यूटर में स्थित माइक और हेडफोन/ स्पीकर का प्रयोग टेलीफोन की तरह बातचीत के लिए करता है। 

 

9. इंटरनेट प्रोटोकाल टेलीविजन (IPTv – Internet Protocol Television)

  • कंप्यूटर नेटवर्क में इंटरनेट प्रोटोकाल का प्रयोग कर टेलीविजन प्रसारण करना, उसे प्राप्त करना तथा अपने कंप्यूटर पर उसे देखना IPTv कहलाता है। 
  • इसमें टेलीविजन कार्यक्रम का प्रसारण पैकेट स्विचिंग तकनीक द्वारा किया जाता है।
  • आईपीटीवी में तीन प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं
    • जीवंत प्रसारण देखना (Live TV
    • पूर्व में प्रसारित कार्यक्रमों को अपनी सुविधानुसार देखना (Time Shifted Programme
    • वीडियो ऑन डिमांड (VOD-Video on Demand) द्वारा अपनी इच्छानुसार चयनित कार्यक्रम को देखना। 

 

10.ई-कामर्स (e-commerce)

  • कंप्यूटर तथा इंटरनेट सेवाओं का उपयोग कर किसी व्यवसाय को संचालित करना ई-कामर्स कहलाता है। 
  • इसमें इंटरनेट के माध्यम से ग्राहकों तथा व्यापारियों से संपर्क स्थापित करना, उत्पादों का विज्ञापन करना तथा वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय करना आदि शामिल है।
  • ऑनलाइन शॉपिंग (online shopping) ई-कामर्स का एक उदाहरण है। 
    • इसमें उत्पादों का विवरण कंपनी की वेबसाइट पर उपलब्ध होता है। विवरण देखकर किसी उत्पाद के लिए घर बैठे ही खरीदने का आर्डर दिया जा सकता है तथा इंटरनेट पर ही मूल्य का भुगतान भी किया जा सकता है। 
    • इसके बाद कंपनी द्वारा उत्पाद को उपभोक्ता के घर तक पहुंचा दिया जाता है। इसे e-trading भी कहा जाता है।
  • ई-कामर्स को निम्नलिखित भागों में बांटा जा सकता है

B2B (Business to Business) 

    • दो कंपनी के बीच किया गया इलेक्ट्रॉनिक व्यापार। 

B2C (Business to Consumer) 

    • कंपनी तथा उपभोक्ता के बीच का इलेक्ट्रॉनिक व्यापार।

C2C (Consumer to Consumer) 

    • दो उपभोक्ताओं द्वारा आपस में इंटरनेट पर किया गया लेन-देन।

 

  • भारत सरकार ने सूचना तकनीक अधिनियम 2000 (Information Technology Act 2000) के द्वारा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर किए गए लेन-देन को वैधता प्रदान किया है। 

 

11. ई-पब्लिाशिंग (e-Publishing) 

  • किसी पुस्तक या लेख को वर्ल्ड वाइड वेब पर स्टोर करना ताकि इच्छुक व्यक्ति इंटरनेट के माध्यम से इसे देख व पढ़ सकता है, ई-पब्लिशिंग कहलाता है। 
  • इसमें पुस्तक को डिजिटल रूप में प्रकाशित किया जाता है जो इंटरनेट पर निःशुल्क या थोड़ा शुल्क चुकाकर उपलब्ध होता है। 
  • इस तरह प्रकाशित किए गए पुस्तक को e-book कहा जाता है। इसे e-book Reader साफ्टवेयर की सहायता से पढ़ा जा सकता है। 
  • Microsoft Reader ई-बुक के लिए तैयार किया गया एक साफ्टवेयर है।

 

 

ब्लॉग (Blog)

  • यह Web Log का संक्षिप्ताक्षर है। 
  • यह वर्ल्ड वाइड वेब पर उपलब्ध सोशल नेटवर्किंग साइट (Social Networking Site) का उदाहरण है। 
  • ब्लॉग का संचालन किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा किया जा सकता है। 
  • इस वेब साइट पर संचालनकर्ता (user) अपने विचार, घटनाओं का विवरण, चित्र (photo) या चलचित्र (video) आदि डाल सकता है। 
  • ब्लॉग पर उपयोगकर्ता द्वारा डाले गये विवरण को पोस्ट (Post) कहा जाता है।
  • ब्लॉग को व्यक्तिगत आनलाइन डायरी (online diary) भी कहा जाता है। 
  • ब्लॉग में सामान्यतः एक मुख्य पेज होता है। ब्लॉग के वेब पेज उल्टे क्रम (Reverse Chronological Order) में व्यवस्थित रहते हैं, अर्थात् सबसे नया ब्लॉग सबसे पहले दिखाई देता है। 
  • किसी ब्लॉग को पढ़ने वाला उसका फालोवर (follower) कहलाता है।
  • ब्लॉग को उपयोग तथा विचार के आधार पर अनेक समूहों में बांटा जा सकता है। जैसे

Personal blog – किसी एक व्यक्ति द्वारा संचालित 

Microblog — छोटे विवरणों का ब्लॉग 

Corporate blog – कंपनियों द्वारा संचालित

Reverse blog – कई उपयोगकर्ताओं द्वारा किसी विशेष विषय पर जारी चर्चा के दौरान तैयार ब्लॉग 

Art blog, Photo blog, Video blog आदि।

  • वर्ल्ड वाइड वेब पर स्थित सभी ब्लॉग के समूह को ब्लागोस्फीयर (Blogosphere) कहा जाता है। 
  • ब्लॉग को प्रकाशित करने के लिए RSS (Really Simple Syndication) फार्मेट तथा Word Press साफ्टवेयर का प्रयोग किया जाता है।

 

  • Personal Blogging का आरंभ जस्टिन हॉल (Justin | Hall) ने 1994 में किया था। अतः इन्हें ‘पर्सनल ब्लॉगिंग का जनक’ (father of personal blogging) कहा जाता है। 
  • ब्लॉग तथा अन्य ऑनलाइन विषयों से संबंधित पुस्तकें, जिन्हें ब्लॉग पर प्रकाशित किया जाता है, Blooks (Blog+Books) कहलाती है। 
  • ब्लॉग पर आधारित सर्वश्रेष्ठ पुस्तक को प्रतिवर्ष पुरस्कार भी दिया जाता है जिसे Blooker Prize कहते हैं। 

 

सोशल नेटवर्किंग साइट (Social Networking Site)

  • सोशल नेटवर्क (Social Network) शब्द का प्रचलन प्रोफेसर .ज.ए. बार्नेस (J. A. Barnes) ने 1950 में शुरू किया था। आज
  • सोशल नेटवर्किंग साइट द्वारा कम्प्यूटर तथा इंटरनेट के माध्यम से दुनिया भर में कहीं भी स्थित लोगों से संपर्क स्थापित कर सकते हैं ।

कुछ प्रचलित सोशल नेटवर्किंग साइट हैं

 

फेसबुक (Facebook)

  • यह वर्ल्ड वाइड वेब पर उपलब्ध दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट है। 
  • सन् 2004 में मार्क जुकरबर्ग (Mark Zuckerberg) द्वारा प्रारंभ की गई इस 
  • वेबसाइट को Facebook Inc कंपनी द्वारा चलाया व नियंत्रित किया जाता है।
  • यह वर्ल्ड वाइड वेब पर उपलब्ध एक निःशुल्क सुविधा है जिसका प्रयोग इंटरनेट के जरिए किया जाता है। 
  • वेब ब्राउसर पर www.facebook.com टाइप कर फेसबुक का होम पेज खोल सकते हैं। 
  • यहां sign up की सुविधा के द्वारा नया फेसबुक एकाउंट खोला जा सकता है। 
  • इसके बाद e-mail ID तथा password के जरिए login कर फेसबुक सुविधा का प्रयोग किया जा सकता है।

 

ट्विटर (Twitter)

  • यह सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट का एक उदाहरण है। 
  • इसे माइक्रो ब्लागिंग (Micro blogging) भी कहा जाता है। 
  • इस वेबसाइट का प्रयोग कर इंटरनेट पर दुनियाभर में अपने मित्रों, शुभचिंतकों या फालोवर्स (followers) को संदेश भेजा जा सकता है। इस संदेश को ट्वीट (Tweet) कहा जाता है। 
  • ट्वीट टेक्स्ट आधारित छोटा संदेश है जिसमें अधिकतम 140 अक्षर हो सकते हैं।
  • ट्विटर के उपयोगकर्ता को ऑथर (Author) कहा जाता है। 
  • किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा किए गए ट्वीट को जानने के लिए उस वेबसाइट पर जाने वालों को फालोवर्स (followers) कहा जाता है। फालोवर्स किसी ट्वीट पर अपनी राय (Comments) भी दे सकता है। 
  • ट्विटर वेब साइट का प्रारंभ 2006 में जैक डोर्सी (Jack Dorsey) द्वारा किया गया था। 
  • इसे “इंटरनेट का एसएमएस” (SMS of Internet) की संज्ञा दी जाती है।

 

 

यू ट्यूब (You Tube)

  • यह Google Inc कंपनी द्वारा संचालित एक वीडियो शेयरिंग वेबसाइट (Video Sharing Website) है जहां कोई व्यक्ति वीडियो क्लिप डाल सकता है या पहले से डाले गए वीडियो क्लिप देख सकता है.
  • यू ट्यूब का प्रारंभ PayPal कंपनी के तीन व्यक्तियों चॉड हर्ली (Chad Hurley), स्टीव चेन (Steve chen) तथा जावेद करीम (Jawed Karim) ने मिलकर 2005 ई. में किया था। 

 

14. फ्लैश (Flash)

  • यह Macromedia कंपनी द्वारा विकसित एक साफ्टवेयर प्रोग्राम है जिसका प्रयोग वेब पेज पर animation, sound तथा interactivity प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। 
  • अधिकांश video games इसी साफ्टवेयर का प्रयोग कर बनाए जाते हैं। 

 

15. नेटीकेट (Netiquette)

  • इंटरनेट पर सूचनाओं के आदान-प्रदान जैसे-e-mail, chatting, video conferencing आदि के दौरान किए जाने वाले अपेक्षित व शिष्ट व्यवहार netiquette  (Internet+etiquette) कहलाता है। 
  • हालांकि यह व्यवहार बाध्यकारी नहीं होता पर एक सभ्य व सुसंस्कृत उपयोगकर्ता द्वारा इसकी अपेक्षा की जाती है। 

 

16. एक्रोनिम्स (Acronyms)

  • कंप्यूटर संचार में प्रचलित संक्षिप्ताक्षर जिनका प्रयोग न्यूज ग्रुप, ई-मेल या चैटिंग के दौरान किया जाता है, एक्रोनिम्स कहलाता है। 
  • इंटरनेट पर प्रचलित कुछ एक्रोनिम्स हैं

ASAP – As soon as possible 

BTW – By the way 

FYI – For your Information

 IMO – In my opion 

LOL- Laughing out loud

TIA – Thanks in advance 

 

फ्लेम (Flame)

  • इंटरनेट उपयोगकर्ताओं द्वारा ई-मेल, चैटिंग या वीडियो कान्फ्रेंसिंग के दौरान अवांछनीय व अपमानजनक भाषा का प्रयोग फ्लेम कहलाता हैं

 

इमोटिकान (Emoticon)

  • यह Emotion+icon से मिलकर बना है जिसका अर्थ है संकेतों के माध्यम से भावनाओं को अभिव्यक्त करना। 
  • ई-मेल तथा ऑन लाइन चैट के दौरान अक्षर तथा चिह्नों (Letters and Characters) की सहायता से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करना इमोटिकान कहलाता है। 
  • जैसे

🙂 का अर्थ है—मुस्कुराता चेहरा

🙁 का अर्थ है—दुखी चेहरा

 

Leave a Reply