पृथ्वी की आंतरिक संरचना (Internal structure of the earth)

 पृथ्वी की आंतरिक संरचना  (internal structure of the earth)

  • पृथ्वी की त्रिज्या लगभग 6,378 किमी है और पृथ्वी पर सबसे गहरी खुदाई आर्कटिक महासागर के कोला क्षेत्र में 12 किमीकी गहराई तक की गई है। 

आंतरिक संरचना संबंधी स्रोत/प्रमाण  (Sources/Evidences related to Internal Structure)

  1. अप्राकृतिक स्रोत
    1. घनत्व आधारित स्रोत 
    2. दाब आधारित स्रोत 
    3. ताप आधारित स्रोत
  2. पृथ्वी की उत्पत्ति संबंधी स्रोत
  3. प्राकृतिक स्रोत 
    1. ज्वालामुखी आधारित स्रोत 
    2. उल्का पिंडों से प्राप्त साक्ष्य 
    3. भूकंपीय तरंगों पर आधारित स्रोत

घनत्व आधारित स्रोत 

  • पृथ्वी की आंतरिक परतों का घनत्व ऊपरी परतों से अधिक होता है।
    • पृथ्वी की ऊपरी परत का घनत्व 2.67-3.3 ग्राम प्रति घन सेमी माना जाता है जबकि केंद्र का घनत्व लगभग 13 ग्राम प्रति घन सेमी अनुमान लगाया गया है। 
    • संपूर्ण पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 माना जाता है। 
    • पृथ्वी के आंतरिक भाग में अधिक घनत्व वाले पदार्थ पाए जाते हैं। 
  • इस अध्ययन के आधार पर पृथ्वी के आंतरिक भागों को क्रमशः ऊपर से केंद्र की ओर सियाल, सीमा एवं निफे परत के रूप में भी सीमांकित किया गया है। 

रासायनिक संघटन के आधार पर (एडवर्ड स्वेस)  

सियाल (SiAI) 

  • यह परत महाद्वीपीय अवसादी शैलों के नीचे स्थित होती है तथा इसके मुख्य संघटक सिलिका (Si) एवं एल्युमीनियम (AI) हैं। 
  • इसका औसत घनत्व 2.9 है तथा  परत की मोटाई लगभग 50-300 किमी. के मध्य होती है।

सीमा (SiMa) 

  • इसके मुख्य संघटक सिलिका (Si) और मैग्नीशियम (Mg) होते हैं। 
  • यह सियाल के ठीक नीचे पाई जाती है तथा भारी बेसाल्टी आग्नेय चट्टानों से बनी होती है। 
  • इस परत का औसत घनत्व 2.9-4.7 के बीच होता है तथा इसकी मोटाई 1,000 से 2,000 किमी. तक है। 

निफे (NiFe) 

  • यह परत निकेल (Ni) तथा आयरन (Fe) से मिलकर बनी होती है। 
  • यह सीमा(SiMa)  के नीचे स्थित परत है। 
  • इसका औसत घनत्व लगभग 11 है। 

sial earth inner parts             

      दाब आधारित स्रोत 

  • पृथ्वी की सतह से आंतरिक परतों की ओर जाने पर दाब में वृद्धि होती है, जिसके फलस्वरूप घनत्व में भी वृद्धि होती है। 
  • पृथ्वी के केंद्र में घनत्व लगभग 11-12 ग्राम प्रति घन सेमी. पाया जाता है। 
  • अधिक दाब के कारण ही ज्वालामुखी विस्फोट होते हैं तथा आंतरिक शक्तियाँ काम करती हैं। 

ताप आधारित स्रोत 

  • पृथ्वी की सतह से अंदर की परतों में जाने पर रेडियोएक्टिव तत्वों के विघटन के कारण सामान्यत: 32 मीटर की गहराई पर 1°C तापमान बढ़ जाता है। 
    • यदि इसे आधार मानें तो 10 किमी. की गहराई में तापमान धरातल की अपेक्षा 300°C से अधिक तथा 40 किमी. की गहराई पर इसे लगभग 1,200°C होना चाहिये, परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। पृथ्वी के आंतरिक भागों में अत्यधिक ताप भिन्नता देखने को मिलती है। 
  • अतः ताप एवं दाब दोनों के अध्ययन द्वारा यह स्पष्ट नहीं हो सका कि आंतरिक परतें किस अवस्था में हैं।

 

पृथ्वी की उत्पत्ति संबंधी स्रोत  (Sources related to the Earth’s Origin)

ग्रहाणु परिकल्पना’ (Planetesimal Hypothesis) 

  • पृथ्वी का केंद्र ठोस अवस्था में है

 ‘ज्वारीय परिकल्पना’ के अनुसार 

  • पृथ्वी का केंद्र तरल अवस्था में है। 

अतः स्पष्ट है कि पृथ्वी का केंद्र या तो ठोस होगा या तरल होगा। 

ज्वालामुखी स्रोत 

  • ज्वालामुखी से निकलने वाले लावा, गैस व तरल मैग्मा के आधार पर कि पृथ्वी की आंतरिक परत तरल अवस्था में है। 
    • लेकिन यदि पृथ्वी का केंद्र द्रव अवस्था में होता तो सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित अवश्य होता। 
    • परंतु, वास्तव में ऐसा नहीं है क्योंकि कोर में अत्यधिक दबाव चट्टानों को पिघली हुई अवस्था में नहीं रहने देगा। 

 

उल्का पिंडों से प्राप्त साक्ष्य 

  • उल्का पिंड के केंद्रीय भाग में पाए जाने वाले भारी पदार्थों के संघटन के आधार पर पृथ्वी की आंतरिक संरचना का अनुमान लगाया गया है।
    • उल्काएँ, वैसे ही ठोस पदार्थ की बनी हुई हैं, जिनसे पृथ्वी की रचना हुई है अर्थात् दोनों का भूतकाल में समान नक्षत्र प्रणाली से निर्मित होना माना जाता है। 

भूकंपीय तरंगों पर आधारित स्रोत 

  • भूकंप मूल (Focus) से निकली हुई तरंगें पृथ्वी के अंदर सभी दिशाओं में प्रवाहित होती हैं। साथ ही, सभी प्राकृतिक भूकंप स्थलमंडल में ही आते हैं। 

ये तरंगें मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं

  1. P या प्राथमिक तरंगें (Primary Waves) 
  2. S या द्वितीयक तरंगें (Secondary Waves)
  3. L या धरातलीय तरंगें (Long or Surface Waves) 

P या प्राथमिक तरंगें (Primary Waves) 

  •  ‘P’ तरंगें, ध्वनि तरंगों के समानअनुदैर्ध्य तरंगें(Longitudinal Waves) होती हैं, जिनकी गति सबसे अधिक होती है। 
    • ये ठोस, द्रव एवं गैसीय तीनों माध्यमों में गमन कर सकती हैं परंतु इनकी गति ठोस भाग में अपेक्षाकृत अधिक होती है। 

S या द्वितीयक तरंगें (Secondary Waves)

  • ‘S’ तरंगें प्राथमिक तरंगों के बाद अनुभव की जाती हैं इसीलिये इन्हें “द्वितीयक तरंगें’ कहते हैं। 
  • ये प्रकाश तरंगों के समान ‘अनुप्रस्थ तरंगें’ (Transverse Waves) होती हैं। 
    • यह केवल ठोस भाग में ही गमन कर सकती हैं तथा द्रवीय भाग में लुप्त हो जाती हैं। 

गमन कर सकती हैं

P Waves

ठोस, द्रव एवं गैसीय तीनों माध्यमों में गमन

S Waves

केवल ठोस भाग में,द्रवीय भाग में लुप्त

 

इन तरंगों की गति एवं दिशा के आधार पर पृथ्वी के आंतरिक भाग की संरचना का पता चलता है।

  • यदि भूकंपीय तरंगों की गति सतह की अपेक्षा आंतरिक भाग में अधिकहै तो , पृथ्वी की आंतरिक परतों का घनत्व सतह की अपेक्षा अधिक है। 
  • यदि भूकंपीय तरंग वक्राकार मार्ग से मुड़ जाती है तो पृथ्वी की आंतरिक परतों की रासायनिक संरचना एक समान नहीं है।
  • S-तरंग के विलुप्त हो जाने के कारण यह प्रमाणित होता है कि ‘बाह्य क्रोड’ के पदार्थ तरल अवस्था में हैं। 

‘क्रस्ट’ और ‘मैंटल’ के पदार्थ ठोस अवस्था में

  • सतह से लगभग 2,900 किमी. की गहराई में ‘गुटेनबर्ग असंबद्धता ‘ तक P और S तरंगों का प्रभाव होने के कारण जहाँ यह प्रमाणित हुआ कि ‘क्रस्ट’ और ‘मैंटल’ के पदार्थ ठोस अवस्था में रहते हैं, 

 ‘बाह्य क्रोड’ के पदार्थ तरल अवस्था में

  • वहीं गुटेनबर्ग असंबद्धता के बाद S-तरंग के विलुप्त हो जाने के कारण यह प्रमाणित होता है कि ‘बाह्य क्रोड’ के पदार्थ तरल अवस्था में हैं। 

 

‘Pg’ तथा ‘Sg’ तरंगें 

  • सन् 1909 में क्रोएशिया’ की ‘कुपा (कुल्पा) घाटी’ में आए भूकंप के निरीक्षण से P तथा S तरंगों से मिलती-जुलती तरंगों का पता लगाया गया, जिन्हें ‘Pg’ तथा ‘Sg’ तरंगें कहा गया। 
    • व्यवहार में ‘Pg’ तथा ‘Sg’ तरंगें, क्रमशः P तथा S तरंगों के समान ही होती हैं लेकिन इनकी गति P तथा S तरंगों की अपेक्षा कम होती है। 
    • ये तरंगें मुख्यतः पृथ्वी की ऊपरी परत से होकर भ्रमण करती हैं।

P* तथा S* तरंगें 

  • P* तरंगकी खोज सन् 1923 में‘कोनराड ‘ ने की। 
    • इसकी गति P एवं Pg के बीच की होती है। 
  • जबकि S* तरंग की खोज सन् 1925 में ‘जैफ्रीज’ (Jeffreys) ने की। 
    • इसकी गति S तथा Sg के बीच की होती है। 

भूकंपीय तरंग आधारित वर्गीकरण 

P,S, Pg, Sg, P* तथा S* भूकंपीय तरंगों के व्यवहार के आधार पर पृथ्वी में तीन आंतरिक परतों का अनुमान लगाया जाता है

  1. क्रस्ट या भूपर्पटी (Crust )
    1. ऊपरी परत
    2. निम्न परत
  2. मैंटल (mantle) 
    1. ऊपरी मैंटल
    2. निम्न मैंटल
  3. केंद्रीय भाग (क्रोड) (Core) 
    1. ऊपरी क्रोड
    2. निम्न परत

earth core1 earth core

असंबद्धता (Discontinuity)

  • पृथ्वी की परतों के मध्य पाया जाने वाला एक ऐसा संक्रमण क्षेत्र, जहाँ पर दो परतों की विशेषताएँ एक साथ पाई जाती हैं। 
  • पृथ्वी के आंतरिक भाग में दो मुख्य असंबद्धताएँ (Discontinuity) पाई जाती हैं। 
    1. ‘मोहो असंबद्धता’ (Moho Discontinuity) 
    2. ‘गुटेनबर्ग असंबद्धता’

‘मोहो असंबद्धता’ (Moho Discontinuity) 

  • यह  भूपर्पटी (Crust) तथा  मैंटल  को एक-दूसरे से अलग करती है। इस सीमा को ‘मोहो असंबद्धता’ (Moho Discontinuity) कहते हैं। 

‘गुटेनबर्ग असंबद्धता’

  • यह मैंटल तथा कोर को अलग करती है। इसे ‘गुटेनबर्ग असंबद्धता’ कहते हैं। 
    • यह असंबद्धता पृथ्वी में 2,900 किमी. की गहराई पर है। 

 

भूपर्पटी (Crust) 

  • यह पृथ्वी की सबसे ऊपरी एवं पतली परत है, जिसकी औसत मोटाई 33 किमी. है
    • महासागरीय क्रस्ट की मोटाई (औसत 5 किमी) महाद्वीपीय क्रस्ट की मोटाई से कम है। 

भूकंपीय लहरों (तरंगों) के आधार पर क्रस्ट को दो भागों में विभाजित किया जाता है  

  1. ऊपरी परत
  2. निम्न परत

 

ऊपरी परत

  • ऊपरी परत में मुख्यतः ग्रेनाइट चट्टानें पाई जाती हैं, जिसके द्वारा महाद्वीपों का निर्माण हुआ है। 
  • इस परत में सिलिका एवं एल्युमीनियम जैसे तत्त्वों की प्रधानता है अतः इसे ‘सियाल’ (SiAI) भी कहा जाता है। 
  • यहाँ पर ‘P’ लहरों की गति 6.1 किमी. प्रति सेकंड होती है। 

निम्न परत 

  • निम्न परत  में बेसाल्ट चट्टानें पाई जाती हैं, जिसके द्वारा महासागरीय सतह का निर्माण हुआ है। 
  • इसे सीमा (SiMa– सिलिका तथा मैग्नीशियम की प्रधानता के कारण) भी कहा जाता है। 
  • यहाँ पर ‘P’ लहरों की गति 6.9 किमी. प्रति सेकंड होती है।

 

  • भूपर्पटी तथा ऊपरी मैंटल की ऊपरी परतस्थलमंडल‘ के अंतर्गत आती है, जिसकी मोटाई महाद्वीपों व महासागरों में अलग-अलग होती है। 
  • भूकंप भी इसी ‘स्थलमंडल में आते हैं। 
  • ऊपरी तथा निचले क्रस्ट के बीच घनत्व संबंधित भिन्नता ‘कोनराड असंबद्धता’ कहलाती है।

भूपर्पटी की रचना के सामान्य तत्त्व

तत्त्व

भार (प्रतिशत)

ऑक्सीजन (O)

46.60

सिलिकॉन (Si)

27.72

एल्युमीनियम (AI)

8.13

लोहा (Fe)

5.00

कैल्शियम (Ca)

3.63

सोडियम (Na)

2.83

पोटेशियम (K)

2.59

मैग्नीशियम (Mg)

2.09

 

मैंटल (Mantle) 

  • इसका विस्तार मोहो असंबद्धता से 2,900 किमी की गहराई तक है। 
    • निचले क्रस्ट तथा ऊपरी मैंटल को ‘मोहो असंबद्धता’ अलग करती है । 
  • पृथ्वी के समस्त आयतन का सर्वाधिक 83 प्रतिशत एवं द्रव्यमान का लगभग 68 प्रतिशत भाग मैटल में विद्यमान है। 
  • इसका औसत घनत्व 3.5 से 5.5 है। 
  • निचले क्रस्ट से ऊपरी मैंटल में ‘P’ तरंगों की गति 6.9 से बढ़कर 7.9 किमी. तथा 7.9 किमी. से बढ़कर 8.1 किमी. प्रति सेकंड हो जाती है।
  • ऊपरी मैंटल के ऊपरी भाग को ‘दुर्बलतामंडल’ (Asthenosphere) कहा जाता है। 
    • दुर्बलतामंडल ही ज्वालामुखी लावा का प्रमुख स्रोत होता है। 
  • मैंटल की निचली परत को ‘मध्यमंडल’ (Mesosphere) कहा जाता है। 
  • मैंटल के ऊपरी परत को निचली परत से अलग करने वाली संरचना को ‘रेपेटी असंबद्धता’ कहते हैं। 
  • भूकंपीय लहरों की गति के आधार पर मैंटल को तीन भागों में बाँटा जाता है 
    1. मोहो असंबद्धता से 200 किमी. तक 
    2. 200 से 700 किमी. तक 
    3. 700 से 2,900 किमी. तक 

 

क्रोड (Core) 

  • निचले मैंटल तथा ऊपरी कोर में तरंगों की गति के आधार पर एक असंबद्धता पाई जाती है जिसे ‘गुटेनबर्ग असंबद्धता’ कहते हैं। यह मैंटल तथा कोर को अलग करती है
  • यह पृथ्वी की सबसे आंतरिक परत है, जिसे ‘केंद्रमंडल’ (Centrosphere) कहा जाता है। 
  • यह मुख्यतः निकेल एवं लोहा द्वारा निर्मित है, अतः इसे ‘निफे’ (NiFe) के नाम से भी जाना जाता है। 
  • कोर का विस्तार 2,900 किमी से पृथ्वी के केंद्र (त्रिज्या-6378 किमी.) तक है। 
  • इसका तापमान लगभग 2700°C है। 
  • कोर का बाहरी भाग तरल तथा आंतरिक भाग ठोस अवस्था में है। 
  • P तरंगों की गति के आधार पर कोर को दो उपभागों में बाँटा जाता है
    • बाह्य कोर 
    • आंतरिक क्रोड
  • बाह्य कोर तथा आंतरिक क्रोड के घनत्व में भिन्नता के कारण इसको “लेहमन असंबद्धता’ अलग करती है। 
  • बाह्य कोर का विस्तार 2,900 किमी. से 5,100 किमी. तक है, यहाँ पर S लहरें विलुप्त हो पाती है; अतः यह तरल अवस्था में विद्यमान है। 
  • आंतरिक कोर का विस्तार 5,100 किमी. से 6,378 किमी. तक है जो ठोस अथवा प्लास्टिक अवस्था में है। 
    • इसका घनत्व लगभग 13 ग्राम प्रति घन सेमी है। 
    • कोर में P लहरों की गति बढ़कर लगभग 11.23 किमी. प्रति सेकंड हो जाती है।