Electrostatics

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आवेशों के प्रकार ( Kinds of Charges )

  • लगभग 600 ईसा पूर्व (BC) में, यूनान के दार्शनिक थेल्स (Thales) ने देखा कि जब अम्बर (Amber) को बिल्ली की खाल से रगड़ा जाता है; तो उसमें कागज के छोटे-छोटे टुकड़े आदि को आकर्षित करने का गुण आ जाता है । यही प्रयोग आधुनिक विद्युत् युग का जन्मदाता माना जा सकता है ।
  • आवेशों के प्रकार ( Kinds of Charges ) :
    • ऋण आवेश (Negative charge)
    • धन आवेश (Positive charge)
  • आवेशों के लिए ऋणात्मक एवं धनात्मक पदों का प्रयोग सर्वप्रथम बेंजामिन फ्रेंकलिन (Benjamin Franklin) ने किया था ।
  • सजातीय आवेशों (like charges) में प्रतिकर्षण (Repulsion) होता है अर्थात्, धन आवेशित वस्तुएँ एक दूसरे की प्रतिकर्षित करती है और ऋण आवेशित वस्तुएँ भी एक-दूसरे की प्रतिकर्षित करती है।
  • विजातीय आवेशों (unlike charges) में आकर्षण (Attraction) होता है अर्थात् एक धन आवेशित वस्तु और एक ऋण आवेशित वस्तु में आकर्षण होता है। 
  • विद्युत् क्षेत्र (Electric field) : किसी जगह विद्युत् से आविष्ट वस्तु अगर रहती है, तो उसका प्रभाव उसके चारों और सीमित क्षेत्र पर पड़ता है। इसी क्षेत्र की विद्युत् क्षेत्र कहते हैं।  
  • विद्युत बल रेखा (Electric lines of force) : विद्युत् बल रेखा वह पथ है, जिस पर एक स्वतंत्र धन आवेश चलता है या चलने की प्रवृति रखता है।
    • अतः विद्युत् बल रेखा वह वक्र है, जिसके किसी भी बिन्दु पर खींची गयी स्पर्श रेखा उस बिन्दु पर विद्युत् क्षेत्र की दिशा बताती है।
    • ये बल रेखाएँ केवल एक समतल में न होकर माध्यम में प्रत्येक दिशा में होती है। 
  • चालक (Conductor) : जिन पदार्थों से होकर आवेश का प्रवाह सरलता से होता है, उन्हें चालक कहते है। लगभग सभी धातुएँ अम्ल, क्षार, लवणों के जलीय विलयन, मानव शरीर आदि विद्युत चालक पदार्थ के उदाहरण हैं।
    • चाँदी सबसे अच्छा चालक होता है। 
    • ताप बढ़ाने पर चालक पदार्थों का विद्युत् प्रतिरोध (electrical resistance) बढ़ता है तथा उसकी विद्युत चालकता (electrical conductivity) घटती है
    • चालक पदार्थों में कुछ मुक्त इलेक्ट्रॉन (free electrons) होते हैं, जिससे उनमें विद्युत् चालन की क्रिया सरलता से होती है ।
  • अचालक (Non-conductor) :  जिन पदार्थों से होकर आवेश का प्रवाह नहीं होता है. उन्हें अचालक कहते हैं। लकड़ी, रबर, कागज, अभ्रक, शुद्ध आसुत जल आदि अचालक पदार्थों के उदाहरण है। 
    • अचालक पदार्थों में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति होने के कारण इनसे होकर विद्युत का चालन नहीं होता है ।
  • अर्द्धचालक (Semi-conductor): कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं, जिनकी विद्युत् चालकता चालक एवं अचालक पदार्थों के बीच होती है, उन्हें अर्द्धचालक कहते हैं। सिलिकन, जर्मेनियम, कार्बन, सेलेनियम आदि अर्द्धचालक के उदाहरण हैं। 
    • जबकि अर्द्धचालक पदार्थों की विद्युत चालकता ताप के बढ़ाने पर बढ़ती है तथा ताप के घटाने पर छूटती हैं।
    • परम शून्य ताप पर अर्द्धचालक पदार्थ आदर्श अचालक की भाँति व्यवहार करता है।
    • अर्द्धचालक पदार्थों में अशुद्धियाँ मिलाने पर भी उसकी विद्युत् चालकता बढ़ जाती है। 
    • अर्द्धचालकों में सामान्य अवस्था में मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं होते हैं, लेकिन विशेष परिस्थितियों जैसे उच्च ताप या अशुद्धियाँ मिलाने पर मुक्त इलेक्ट्रॉन प्राप्त किए जा सकते हैं ।   
  • आवेश का पृष्ठ घनत्व ( Surface density of charge) : चालक के इकाई क्षेत्रफल पर स्थित आवेश की मात्रा को उस आवेश का पृष्ठ घनत्व कहते हैं । 

आवेश = पृष्ठ घनत्व /क्षेत्रफल 

  • विद्युत् बल के नियम या कूलम्ब का नियम (Laws of Electric Force or Coulomb’s Law) : दो समान आवेशों के बीच प्रतिकर्षण और दो असमान आवेशों के बीच आकर्षण का बल कार्य करता है।
    • यह बल दोनों आवेशों के परिमाण, उनके बीच की दूरी तथा उनके बीच के माध्यम की प्रकृति पर निर्भर करता है ।
    • कूलम्ब ने अपने प्रयोगों के आधार पर दो आवेशों के बीच कार्य करने वाले बल के लिए दो नियम प्रतिपादित किए— 
    • (i) दो आवेशों के बीच आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण का बल उनके आवेशों के गुणनफल का अनुक्रमानुपाती (directly proportional) होता है । 
    • (ii) दो आवेशों के बीच आकर्षण या विकर्षण का बल आवेशों के बीच की दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती (Inversely Proportional) होता है । यह नियम व्युत्क्रम-वर्ग-नियम (Inverse Square Law) कहलाता है। 

 

  • आवेश का मात्रक  : कूलम्ब है।
  • अगर किसी चालक से होकर एक एम्पियर की धारा प्रवाहित होती है, तो एक सेकण्ड में प्रवाहित आवेश के परिमाण को एक कूलम्ब कहते हैं । 
  •  किसी चालक में से एक एम्पियर की धारा प्रवाहित होने का तात्पर्य यह है कि चालक के अनुप्रस्थ परिच्छेद में से प्रति सेकण्ड 6.25 x 1018 इलेक्ट्रॉन गुजर रहे हैं । 

 

  • विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता (Intensity of Electric Field) : विद्युतीय क्षेत्र के किसी बिन्दु पर स्थित एकांक धन आवेश पर कार्य करने वाले बल को उस बिन्दु पर विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता कहते है।
    • विद्युत् तीव्रता का मात्रक :  वोल्ट प्रति मीटर (Vm-1) या न्यूटन / कूलम्ब है ।
    • यह एक सदिश राशि है ।
    • साधारणतः विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता को विद्युत् क्षेत्र भी कहते है । 
  • खोखले चालक के भीतरी भाग में विद्युतीय क्षेत्र :
    • किसी खोखले चालक के भीतर विद्युत् क्षेत्र शून्य होता है ।
    • यदि ऐसे चालक को आवेशित किया जाय, तो सम्पूर्ण आवेश उसके बाहरी पृष्ठ पर ही रहता है । अतः खोखला गोला एक विद्युत् परिरक्षक (electrostatic shield) का कार्य करता है ।
    • यही कारण है कि कार से यात्रा करते समय यदि तेज वर्षा होने लगे और बिजली गिरने की संभावना हो, तो सुरक्षा का उपाय यही है कि कार की खिड़कियाँ पूर्णतः बन्द करके अन्दर ही बैठे रहा जाए। यदि बिजली कार पर ही गिरती है, तो भी कोई हानि नहीं होगी । विद्युत् आवेश कार के बाहरी सतह पर ही रहेगा । 

विद्युत् विभव (Electric Potential ) :

  • एकांक धन आवेश को अनन्त से विद्युत् क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में जो कार्य करना पड़ता है, उसे विद्युत् विभव कहते है ।
  • अर्थात् विद्युत् विभव किसी धनात्मक परीक्षण आवेश को अनन्त से विद्युत् क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में किए गए कार्य (W) एवं परीक्षण आवेश के मान (q0) की निष्पत्ति है । अतः 

विद्युत् विभव, V = W / q0

  • विद्युत् विभव का SI मात्रकजूल प्रति कूलम्बवोल्ट)
    • वोल्ट – इटली के वैज्ञानिक एलसेन्ड्रो वोल्टा  के सम्मान में रखा गया है ।
    • विभव एक अदिश राशि है । 
  • शूज्य विभव (Zero Potential ) : पृथ्वी के विभव को शून्य माना जाता है । पृथ्वी एक विशाल चालक है । इसमें थोड़ा आवेश देने से या इसमें से थोड़ा आवेश निकाल लेने से इसके विभव में कोई अन्तर नहीं होता है, यानी पृथ्वी का विभव हमेशा शून्य रहता है । 
  • विभवान्तर (Potential Difference) : एक कूलम्ब धनात्मक आवेश को विद्युत् क्षेत्र में एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक ले जाने में किए गए कार्य को उन बिन्दुओं के मध्य विभवान्तर कहते हैं ।
    • विभवान्तर का मात्रक :  वोल्ट 
    • यह भी एक अदिश राशि है ।

विद्युत्-धारिता (Electric Capacity) :

  • किसी चालक पर जितना आवेश देने से उसके विभव में एकांक वृद्धि होती है, उतने ही आवेश को उस चालक की धारिता कहते हैं। अगर Q कूलम्ब आवेश देने से किसी चालक के विभव में V वोल्ट वृद्धि होती है, तो

चालक की धारिता, C = Q/V

  •  धारिता का SI मात्रक : फैराडे ( Faradey-F)
  • फैराड एक बहुत बड़ा मात्रक है । इसीलिए प्रयोग हेतु माइक्रो फैराडे (MF) यानी 10-6 फैराडे मात्रक का प्रयोग किया जाता है।
  • चालक का पृष्ठ क्षेत्रफल अधिक होने से उसकी धारिता अधिक और कम होने से उसकी धारिता कम होती है ।
  • किसी चालक की धारिता अपने चारों ओर के माध्यम पर निर्भर करता है । 

 

विद्युत् धारा (Current electricity) :

  •  किसी चालक में आवेश के  प्रवाह को विद्युत धारा कहते हैं।
  • धारा निम्न विभव ( low potential) से उच्च विभव (high potential) की ओर प्रवाहित होती है, किन्तु परम्परा के अनुसार हम यह मानते हैं कि धारा का प्रवाह इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह की विपरीत दिशा में होता है ।
  • अर्थात् धनात्मक आवेश के प्रवाह की दिशा ही विद्युत्-धारा की दिशा मानी जाती है ।
  • परिमाण एवं दिशा दोनों होने के बावजूद विद्युत्-धारा एक अदिश राशि है, क्योंकि यह जोड़ के त्रिभुज नियम का पालन नहीं करती है ।
  • प्रायः ठोस चालकों में विद्युत् प्रवाह इलेक्ट्रॉनों द्वारा और द्रवों में आयन तथा इलेक्ट्रॉन दोनों से ही होता है । अर्द्धचालकों में विद्युत् प्रवाह इलेक्ट्रॉन तथा होल (Hole) द्वारा होता है । 
  • यदि किसी परिपथ में धारा का प्रवाह सदैव एक ही दिशा में होता रहता है, तो हम इसे दिष्ट धारा (Direct Current – DC) कहते हैं
  • यदि धारा का प्रवाह एकांतर क्रम में समानान्तर रूप से आगे और पीछे होता हो, तो ऐसी धारा प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current- AC) कहलाती है। 
  • विद्युत् धारा का मात्रक : एम्पीयर (Ampere – A )  
  • यदि किसी चालक तार में 1 एम्पियर (A) की विद्युत् धारा प्रवाहित हो रही है, तो इसका अर्थ है कि उस तार में प्रति सेकण्ड 6.25 x 1018 इलेक्ट्रॉन एक सिरे से प्रविष्ट होते हैं तथा इतने ही इलेक्ट्रॉन प्रति सेकण्ड दूसरे सिरे से बाहर निकल जाते हैं । 
  • विद्युत् परिपथ में धारा का लगातार प्रवाह प्राप्त करने के लिए विद्युत् वाहक बल (electro motive force-e.m.f.) की आवश्यकता होती है, इसे विद्युत् सेल (Cell) या जनित्र (Generator) द्वारा प्राप्त किया जाता है । 

विद्युत् सेल (Electric Cell) 

  • विद्युत् सेल परिपथ के दो बिन्दुओं के बीच आवश्यक विभवान्तर (potential difference) बनाए रखता है ताकि विद्युत् धारा का प्रवाह लगातार बना रहे ।
  • विद्युत् सेल से रासायनिक ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।
  • विद्युत् सेल में धातु सेल में धातु की दो छड़ें होती हैं, जिन्हें इलेक्ट्रोड (Electrode) कहते हैं ।
    • इन छड़ों पर विपरीत प्रकार के आवेश होते हैं ।
    • वह छड़ जो धनावेशित होती है एनोड (Anode) कहलाती है
    • ऋणावेशित छड़ कैथोड (Cathode) कहलाती है ।
  • ये छड़ें विभिन्न प्रकार के विलयनों विद्युत् अपघट्य (Electrolyte)  में पड़ी रहती हैं । 
  • विद्युत् सेल मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-
    • (i) प्राथमिक सेल
    • (2) द्वितीयक सेल 
  • प्राथमिक सेल (Primary Cell) : प्राथमिक सेलों में रासायनिक ऊर्जा को सीधे विद्युत् ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।
    • एक बार प्रयोग कर लेने के बाद यह बेकार  हो जाता है ।
    • वोल्टीय सेल, लेक्लांशे सेल, डेनियल सेल, शुष्क सेल आदि प्राथमिक सेलों के उदाहरण हैं । 
  • द्वितीयक सेल (Secondary Cell ) : द्वितीयक सेल में पहले विद्युत् ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में, फिर रासायनिक ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।
    • इसे रिचार्जेबल सेल (Rechargable Cell) भी कहा जाता है क्योंकि इस सेल को रिचार्ज (recharge) कर बार- बार उपयोग किया जा सकता है।
    • इसे बाह्य विद्युत् स्रोत से जोड़कर रिचार्ज किया जाता है।
    • मोटरकारों ट्रकों, ट्रैक्टरों आदि के इंजनों को स्टार्ट करने के लिए प्रयुक्त बैटरियां, इमर्जेंसी लाइट (Emergency Light) में प्रयुक्त बैटरी आदि द्वितीयक सेल के उदाहरण हैं । 

वोल्टीय सेल (Voltaic Cell ) :

  • वोल्टीय सेल का आविष्कार सन् 1799 ई० में एलसेन्ड्रो वोल्टा ने किया था ।
  • इस सेल में एक जस्ते की छड़ (कैथोड) एवं तांबे की छड़ (एनोड) काँच की बर्तन में रखे सल्फ्यूरिक अम्ल में डुबी होती है।
  • वोल्टीय सेल का विद्युत् वाहक बल (e.m.f.) का मान 1.08 वोल्ट होता है । 

लेक्लांशे सेल (Leclanche cell): 

  • इस सेल में काँच के एक बर्तन में अमोनियम क्लोराइड ( नौसादर ) का संतृप्त विलयन भरा रहता है ।
  • इसमें जस्ते की छड़ कैथोड का कार्य करती है।
  • सेल में एनोड के लिए कार्बन की छड़ (मैगनीज डाइऑक्साइड व कार्बन के मिश्रण) के बीच रखी रहती है ।
  • लेक्लांशे सेल का विद्युत् वाहक बल (e.m.f.) लगभग 1.5 वोल्ट होता है ।
  • इसका प्रयोग ऐसे परिपथ में किया जाता है, जहाँ रुक-रुककर थोड़े समय के लिए विद्युत् धारा की आवश्यकता होती है ।
  • इसका प्रयोग मुख्यतः विद्युत् घंटी, टेलीफोन आदि में किया जाता है । 

शुष्क सेल (Dry cell ) :

  • इस सेल में प्रयुक्त विद्युत् अपघट्य विलयन के रूप में न रहकर शुष्क अवस्था में रहते है ।
  • इसमें जस्ते का एक बर्तन होता है, जिसमें मैगनीज डाइऑक्साइड, अमोनियम क्लोराइड (नौसादर ) कार्बन आदि का मिश्रण भरा रहता है। इस मिश्रण के बीच में कार्बन की छड़ रखी रहती है ।
  • कार्बन की छड़ एनोड का कार्य करती है, जबकि स्वयं जस्ते का बर्तन कैथोड का कार्य करता है ।
  • मैगनीज डाइऑक्साइड व कार्बन के मिश्रण व जस्ते के दीवारों के बीच नौसादर की गाढ़ी लुगदी भरी रहती है ।
  • इस सेल का विद्युत् वाहक बल 1.5 वोल्ट होता है ।
  • इसका प्रयोग टार्च, ट्रांजिस्टर, रेडियो आदि उपकरणों में किया जाता है । 

 

  • सेल का विद्युत् वाहक बल (e.m.f) : सेल द्वारा 1 कूलम्ब आवेश की पूरे विद्युत् परिपथ में एक पूर्ण चक्र लगाने हेतु सेल द्वारा प्रदत्त ऊर्जा को सेल का विद्युत् वाहक बल कहते है ।
    • इसका मात्रक वोल्ट होता है।
    • विद्युत् वाहक बल का मान विभवान्तर से सदैव अधिक होता है । 
  • कुछ सेलों के विद्युत् वाहक बल 
    • वोल्टीय सेल : 1.08 वोल्ट
    • डेनियल सेल : 1.08 वोल्ट
    • शुष्क सेल : 1.50 वोल्ट
    • लेक्लांशे सेल : 1.50 वोल्ट
    • सीसा संचायक सेल : 2 वोल्ट
    • 6 सेल वाली कार बैटरी : 12 वोल्ट

ओम का नियम (Ohm’s law) :

  • धारा और विभवांतर के बीच संबंध की खोज सर्वप्रथम जर्मनी के जार्ज साइमन ओम ने की ।
  •  “स्थिर ताप पर किसी चालक में प्रवाहित होने वाली धारा चालक के सिरों के बीच विभवांतर के समानुपाती होती है।’ 
  • यदि चालक के सिरों के बीच का विभवांतर V हो और उसमें प्रवाहित धारा I हो, तो ओम के नियम से

V  I ⇒ V =IR 

  •  जहाँ R एक नियतांक है, जिसे चालक प्रतिरोध कहते हैं । 
  • प्रतिरोध (Resistance) :
    • किसी चालक का वह गुण जो उसमें प्रवाहित धारा का विरोध करता है, प्रतिरोध कहलाता है । 
    • प्रतिरोध का SI इकाई :  ओम (Ω)
    •  किसी चालक का प्रतिरोध निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है- 
      •  किसी चालक का प्रतिरोध उसके पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है । 
      • ताप बढ़ने पर चालक का प्रतिरोध बढ़ता है, लेकिन ताप बढ़ने पर अर्द्धचालकों का प्रतिरोध घटता है । 
      • लम्बाई बढ़ने से चालक का प्रतिरोध बढ़ता है और लम्बाई घटने से चालक का प्रतिरोध घटता है । 
      • चालक का प्रतिरोध उसके अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल का व्युत्क्रमानुपाती होता है। अर्थात् मोटाई बढ़ने पर चालक का प्रतिरोध घटता है । 
  • ओमीय प्रतिरोध (Ohmic resistance) : जो चालक ओम के नियम का पालन करते हैं, उन्हें ओमीय प्रतिरोधक (Ohmic resistor) तथा उनके प्रतिरोध को ओमीय प्रतिरोध कहते हैं, जैसे – मैंगनीज का तार, तांबा का तार, ऐल्युमिनियम का तार आदि । 
  • अनओमीय प्रतिरोध (Non-Ohmic resistance) : जो चालक ओम के नियम का पालन नहीं करते, उन्हें अनओमीय प्रतिरोधक तथा उनके प्रतिरोध को अनओमीय प्रतिरोध कहते हैं ।
    • जैसे- डायोड वाल्व (Diode Valve ) का प्रतिरोध, ट्रायोड वाल्व ( Triode Valve ) का प्रतिरोध ।
    • डायोड एवं ट्रायोड वाल्व में धारा ओम के नियम का पालन न करके चाइल्ड गर नियम (Child Langmuir’s Law) का पालन करती है। 

Specific resistance or resistivity

  • विशिष्ट प्रतिरोध (Specific resistance or resistivity) : किसी चालक का प्रतिरोध उसके लम्बाई का समानुपाती तथा उसके अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल का व्युत्क्रमानुपाती होता है । 

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  • R = चालक का प्रतिरोध , A चालक के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल, 
  • ρ एक नियतांक है, जिसे चालक का विशिष्ट प्रतिरोध कहते हैं । इसका मान चालक पदार्थ की प्रकृति और उसके ताप पर निर्भर करता है । 
  • विशिष्ट प्रतिरोध का SI इकाई :  ओम मीटर (Ω-m) होता है ।
  • सबसे कम विशिष्ट प्रतिरोध चाँदी का होता है, इसीलिए चाँदी विद्युत् का सबसे अच्छा चालक है । 

चालकता (Conductance)

  • चालकता (Conductance) : किसी चालक के प्रतिरोध के व्युत्क्रम (reciprocal) को चालक की चालकता कहते हैं । इसे G से सूचित करते हैं । यदि चालक का प्रतिरोध R हो, तो- 

G=1/R 

  • चालकता की SI इकाई :  ओम -1 (  Mho ) ,  सीमेन (Simen) 

Specific Conductance

  • विशिष्ट चालकता (Specific Conductance): किसी चालक के विशिष्ट प्रतिरोध के व्युत्क्रम को चालक की विशिष्ट चालकता कहते हैं। इसे σ से सूचित करते हैं । 

σ = 1/ρ 

  • विशिष्ट चालकता की SI इकाई :  ओम-1मीटर – 1

(Combination of Resistance) : 

  • श्रेणीक्रम संयोजन (Series Combination ) :
    • समान धारा ,  भिन्न-भिन्न विभवान्तर हो
    • अधिकतम प्रतिरोध प्राप्त करने के लिए इस संयोजन का प्रयोग करते हैं ।
    • Req = R1 + R2 + R3 + 
  • पार्श्वबद्ध या समांतरक्रम संयोजन (Parallel Combination ) :
    • विभवान्तर समान रहे
    • न्यूनतम प्रतिरोध प्राप्त करने के लिए इस संयोजन का प्रयोग करते हैं ।

 

विद्युत् शक्ति/ सामर्थ्य (Electric power):

  • विद्युत् परिपथ में ऊर्जा के क्षय होने की दर को विद्युत् शक्ति कहते हैं ।
  • SI मात्रकवाट (Watt-W) , किलोवाट व मेगावाट
  • P = I x V
    • विद्युत् शक्ति ( P )
    • धारा (I)
    • विभवान्तर (V) 
  • किलोवाट घंटा मात्रक या यूनिट (1 KWh) :  विद्युत् ऊर्जा की वह मात्रा जो एक घंटे में व्यय होती है
  • , जबकि परिपथ में 1 किलोवाट की शक्ति हो, वोल्ट x ऐम्पियर x घंटा 

1 KWh =  (वाट x घंटा )/ 1000

1 KWh =  (वोल्ट  x एम्पेयर x घंटा )/ 1000

  • यदि किसी बल्व पर 60W – 220V लिखा हुआ है, तो इसका अर्थ है कि यदि बल्ब को 220V पर जलाया जाए, तो प्रति घंटे 60W की शक्ति व्यय होगी । 
  • विद्युत् धारा के प्रभाव (Effects of Electric Current) :
    • चुम्बकीय प्रभाव
    • ऊष्मीय प्रभाव
    • रासायनिक प्रभाव
    • प्रकाशीय प्रभाव  

 विद्युत् धारा के चुम्बकीय प्रभाव 

  • जब भी किसी चालक से विद्युत् धारा का प्रवाह होता है, तो चालक के चारों ओर एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।
  • सन् 1812 ई० में ऑस्टेंड (Oersted) ने एक प्रयोग के द्वारा पता लगाया  है।
  • चुम्बकत्व की दिशा संबंधी नियम :
    • मैक्सवेल के कॉर्क-स्क्रू नियम
    • फ्लेमिंग के दाहिने हाथ के नियम  
  • मैक्सवेल का कॉर्क- स्क्रू नियम (Maxwell’s Cork-Screw Law) :
    • यदि एक काग पेंच को हाथ में ले कर इस तरह से घुमाया जाए कि वह धारा की दिशा में आगे की ओर बढ़े, तो अँगूठे की गति की दिशा चुम्बकीय बल रेखाओं की धनात्मक दिशा बताती है । 
  • फ्लेमिंग के दाहिने हाथ का नियम (Fleming’s Right Hand Rule) : जिस तार से होकर धारा बहती है उस तार के ऊपर यदि दाहिने हाथ को रखकर अँगूठे तथा पहली दो ऊँगलियों को इस तरह फैलाया जाय कि वे एक-दूसरे के समकोणिक दिशा में हों और यदि तर्जनी (fore finger) धारा की दिशा तथा बीच वाली ऊँगली सूई की विक्षेपित दिशा बतावें, तो अँगूठे की दिशा चुम्बकीय बल की दिशा बताती है । 
  • लॉरेन्ज बल (Lorentz force) : जब किसी चुम्बकीय क्षेत्र में कोई आवेशित कण गति करता है, तो उस पर एक बल आरोपित होता हैं, जिसे लॉरेन्ज बल कहते हैं ।
    • यह बल कण के आवेश, उसकी चाल तथा चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होता है । 
    • इस बल की दिशा कण की गति के लम्बवत् तथा चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् होती है ।
    • बल का परिमाण महत्तम तब होता है, जब कण चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् गति करता है
    • यह बल न्यूनतम (शून्य) तब होता है जब कण चुम्बकीय क्षेत्र के अनुदिश गति करता है ।
    • बल का व्यंजक F = qvB sin θ]
      • [जहाँ q= कण का आवेश, v = कण की चाल,  B = चुम्बकीय क्षेत्र, θ = v  एवं B के मध्य  का कोण]
      • बल F की दिशा फ्लेमिंग के बायें हाथ के नियम (Fleming’s Left Hand Rule) से भी ज्ञात की जा सकती है । 
  • विद्युत चुम्बक (Electromagnet ) : यदि किसी बेलनाकार वस्तु के चारों ओर विद्युतरोधी  तार (insulated wire) को लपेट दिया जाए, तो इसे परिनालिका (solenoid) कहते हैं ।
    • बेलनाकार वस्तु को उसका क्रोड़ (core) कहते हैं ।
    • नर्म लोहे के क्रोड़ वाली परिनालिका विद्युत् चुम्बक कहलाती है। नर्म लोहा से अस्थायी चुम्बक बनता है ।
    • इनका उपयोग डायनमो, ट्रांसफॉर्मर, विद्युत् घंटी, तार-संचार, टेलीफोन, अस्पताल आदि में होता है।

 विद्युत् चुम्बक द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता निम्न बातों पर निर्भर करती है— 

  • परिनालिका के फेरों (turns) की संख्या : यदि फेरों की संख्या अधिक है, तो चुम्बकीय क्षेत्र भी तीव्र होगा । 
  • क्रोड़ पदार्थ की प्रकृति : यदि क्रोड़ नर्म लोहे का है, तो चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता अधिक होती है । 
  • धारा का परिमाण : धारा का परिमाण जितना अधिक होगा, क्षेत्र उतना तीव्र होगा ।

 

चुम्बकीय फ्लक्स (Magnetic Flux) :

  • चुम्बकीय क्षेत्र में रखी हुई किसी सतह के लम्बवत् गुजरने वाली कुल चुम्बकीय रेखाओं की संख्या को उस सतह का चुम्बकीय फ्लक्स कहते हैं ।
  • चुम्बकीय फ्लक्स की SI इकाई वेबर ( wb ) है । 

चुम्बकीय क्षेत्र (Magnetic Field) :

  • प्रति इकाई क्षेत्रफल से लम्बवत् गुजरने वाली चुम्बकीय फ्लक्स उस बिन्दु का चुम्बकीय क्षेत्र कहलाता है । 
  • चुम्बकीय क्षेत्र का मात्रकटेसला (T) 
  • 1 टेसला == 1 वेबर / मीटर 2 
  • 1 गॉस = 10-4 टेसला  

धारामापी (Galvanometer):

  • विद्युत परिपथ में विद्युत धारा की उपस्थिति बताने वाले यंत्र को धारमापी कहते हैं। इसमें एक कुंडली होती है, जो चुम्बकीय ध्रुव खंडों के मध्य स्थित होती है। कुंडली से एक संकेतक जुड़ा रहता है, जो एक अर्द्धवृत्ताकार स्केल पर घूमकर धारा की उपस्थिति बताता है । इस यंत्र से 10 ” एम्पियर तक की विद्युत् धारा को मापा जा सकता है । 

शंट (Shunt) :

  • शंट एक अत्यन्त ही कम प्रतिरोध वाला तार होता है। शंट उच्च धाराओं से धारामापी की रक्षा करता है, क्योंकि यह मुख्य धारा का अधिकांश भाग अपने अन्दर होकर प्रवाहित कर दता है। शंट का प्रतिरोध कम होने से शंटयुक्त धारामापी का कुल प्रतिरोध भी बहुत कम होता जाता है । 

आमीटर (Ammeter ) :

  • धारामापी के समानान्तर क्रम में शंट लगाकर आमीटर बनाया जाता है । इसकी सहायता से विद्युत् धारा का मान एम्पियर में ज्ञात किया जाता है। एक आदर्श आमीटर का प्रतिरोध शून्य होना चाहिए। आमीटर को विद्युत् परिपथ के श्रेणीक्रम में लगाया जाता है। 

वोल्टमीटर (Voltmeter ) :

  • धारामापी के श्रेणीक्रम में एक उच्च प्रतिरोध लगाकर वोल्टमीटर बनाया जाता है। इसकी सहायता से दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर ज्ञात किया जाता है । इसको उन दो बिन्दुओं के बीच समानान्तर क्रम में जोड़ते हैं, जिनके बीच विभवान्तर ज्ञात करना होता है । वोल्टमीटर का प्रतिरोध बहुत अधिक होता है । एक आदर्श वोल्टमीटर का प्रतिरोध अनन्त होना चाहिए । 

 

विद्युत् चुम्बकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction )

  • यदि किसी बन्द परिपथ में होकर गुजरने वाले चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन कर दिया जाय, तो परिपथ में विद्युत् धारा उत्पन्न हो जाती है, विद्युत् धारा उत्पन्न होने की इस घटना को विद्युत् चुम्बकीय प्रेरण कहते हैं । चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन से उत्पन्न विद्युत् धारा को प्रेरित विद्युत् धारा (Induced current) तथा विद्युत वाहक बल (e. m.f) को प्रेरित विद्युत्वाहक बल ( Induced e.m.f) कहते हैं । परिपथ में प्रेरित विद्युत् धारा का अस्तित्व तब तक रहता है, जब तक फ्लक्स परिवर्तन होता है। विद्युत् चुम्बकीय प्रेरण का उपयोग हृदय के लिए कृत्रिम पेसमेकर, डायनमो, ट्रांसफॉर्मर आदि बनाने में किया जाता है । 
  • लेंज का नियम (Lenz’s law) : प्रेरित विद्युत् वाहक बल की दिशा सदैव ऐसी होती है कि वह उस कारण का विरोध करती है, जिससे इसकी उत्पत्ति हुई है । 
  • स्व-प्रेरण (Self induction) : ऐसी घटना जिसमें स्वयं की धारा से उत्पन्न फ्लक्स में परिवर्तन होने से किसी परिपथ में प्रेरित विद्युत् वाहक बल उत्पन्न हो जाता है, उसे स्व-प्रेरण कहते हैं। स्व-प्रेरण को स्व-प्रेरण गुणांक (स्व – प्रेरकत्व ) द्वारा मापते हैं।
    • इसका मात्रक हेनरी (Henry – H) होता है । 
    •  किसी कुंडली से सम्बद्ध फ्लक्स उसमें प्रवाहित धारा के अनुक्रमानुपाती होता है । 
  • अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction) : एक कुंडली में धारा परिवर्तन करके दूसरी कुंडली में प्रेरित विद्युत् वाहक बल उत्पन्न करने की घटना को अन्योन्य प्रेरण कहते हैं । 
  • अन्योन्य प्रेरण गुणांक (Coefficient of Mutal Induction ) : दो कुंडलियों के मध्य अन्योन्य प्रेरण गुणांक, संख्यात्मक दृष्टि से एक कुंडली में उत्पन्न उस प्रेरित विद्युत् वाहक बल के बराबर होता है, जो दूसरी कुंडली में एकांक धारा परिवर्तन की दर के कारण उत्पन्न होता है ।
    • अन्योन्य प्रेरण गुणांक या अन्योन्य प्रेरकत्व का मात्रक भी हेनरी होता है । 
  • फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण का नियम ( Faraday’s Laws of Electromagnetic Induction ) 
  • प्रथम नियम : जब किसी कुंडली से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, तो उस कुंडली में एक प्रेरित विद्युत् वाहक बल उत्पन्न हो जाता है ।, 
  • द्वितीय नियम:प्रेरित विद्युत् वाहक बल चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन की दर के अनुक्रमानुपाती होता है,  
  • प्रेरित विद्युत वाहक बल ( Induced e.m.f.) : चुम्बकीय क्षेत्र में गतिशील चालक के सिरों पर विद्युत् वाहक बल उत्पन्न हो जाता है ।
    • प्रेरित वि० वा० बल का SI मात्रक वोल्ट होता है । 

रासायनिक प्रभाव 

  • विद्युत् अपघट्य (Electrolyte) : शुद्ध जल विद्युत का कुचालक होता है, लेकिन जब जल में किसी धातु के लवण, अम्ल अथवा क्षार घुले रहते हैं, तो ऐसा घोल विद्युत् का सुचालक हो जाता है। ऐसे घोल जिससे विद्युत् धारा गुजर सकती है, विद्युत् अपघट्य (Electrolyte) कहलाता है ।
  • जब किसी लवण, अम्ल अथवा क्षार घुले जलीय घोल में विद्युत् धारा प्रवाहित की जाती है, तो उसका विद्युत् अपघटन (Electrolysis) होता है, अर्थात् उस विलियन का धनात्मक व ऋणात्मक आयनों में अपघटन (Decomposition) हो जाता है । इस घटना को विद्युत् धारा का रासायनिक प्रभाव कहते हैं ।
  • जिस उपकरण में घोल का विद्युत् अपघटन होता है, उसे वोल्टामीटर (Voltameter) कहते हैं ।
  • धातु के दो चालक, जो वोल्टामीटर में धारा के प्रवेश ( entrance) और निर्गमन ( exit ) के लिए लगे रहते है, इलेक्ट्रोड (Electrode) कहलाते हैं ।
    • जिस इलेक्ट्रोड में होकर धारा वोल्टामीटर में प्रवेश करती है, उसे एनोड (Anode) तथा जिससे होकर धारा बाहर निकलती है, उसे कैथोड (Cathode) कहते हैं ।
    • अर्थात् वोल्टामीटर के धन इलेक्ट्रोड को एनोडऋण इलेक्ट्रोड को कैथोड कहते है ।
    • जब विद्युत् अपघट्य में धारा प्रवाहित की जाती है, तो धनायन (Cation) कैथोड की ओर तथा ऋणायन (Anion) एनोड की ओर चलने लगते हैं और उन पर जाकर जमा हो जाते है । 
  • संचायक सेल या द्वितीयक सेल (Accumulator or Secondary Cell ) : संचायक सेल में विद्युत् ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा के रूप में जमा किया जाता है और जब सेल को किसी परिपथ से जोड़ दिया जाता है, तब सेल के भीतर एकत्रित रासायनिक ऊर्जा विद्युत् ऊर्जा में धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगती है ।
    • संचायक सेल दो प्रकार के होते हैं—
    • (i) सीसा संचायक सेल (Lead accumulator cell)
    • (ii) क्षारीय संचायक सेल (Alkaline accumulator cell) 
  • सीसा संचायक सेल (Lead Accumalator Cell ) : इसमें सीसे की दो पट्टिकाएँ होती हैं । पट्टिकाएँ तनु गंधकाम्ल में डुबी रहती हैं । विद्युत् धारा प्रवाहित करने यानी आवेशन करने पर पानी का विघटन होता है, जिसके कारण हाइड्रोजन कैथोड पर और ऑक्सीजन एनोड पर जमा होता है। ऑक्सीजन ऐनोड पर के सीसे से मिलकर लेड पेरॉक्साइड बनाता है, जो गहरे भूरे रंग का होता है। कुछ देर तक धारा बहने के बाद धारा बन्द कर दी जाती है। इस समय ‘