झारखण्ड में आपदा प्रबंधन (Disaster Management)

झारखण्ड में आपदा प्रबंधन Disaster Management in Jharkhand : SARKARI LIBRARY 

झारखण्ड में आपदा प्रबंधन

आपदा

  • ऐसी दुर्घटनाएँ जो अचानक घटित हो तथा जिनके प्रभावस्वरूप जीवन एवं संपत्ति की व्यापक हानि होती हो, आपदा कहलाती है। 
  • आपदा को प्राकृतिक आपदा तथा मानवजनित आपदा में वर्गीकृत किया जाता है। 
  • ऐसी आपदाएँ जो प्राकृतिक कारणों जैसे- भूकंप, ज्वालामुखी, चक्रवात, आँधी-तुफान, सुनामी, सूखा, बाढ़ आदि के कारण घटित हों, प्राकृतिक आपदाएँ हैं। 
  • मानवीय कारणों से उत्पन्न आपदाएँ जैसे- युद्ध, परमाणविक घटनाएँ, रासायनिक घटनाएँ आदि शामिल हैं। इसे सामाजिक आपदा भी कहा जाता है। 
  • आपदा की भयावहता को देखते हुए आपदाओं के घटित होने पर कार्रवाई करने की अपेक्षा आपदा के कुशल प्रबंधन पर अधिक जोर दिया जाता है। इसके तहत आपदा के पूर्व ही प्रबंधन उपायों द्वारा उनसे होने वाले नुकसान को कम करने की कोशिश की जाती है। 
  • झारखण्ड विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक एवं मानवजनित आपदाओं का शिकार होता रहा है 
  • इन आपदाओं में भूकंप, बाढ़, सूखा, चक्रवात, सुनामी के प्रभाव, तड़ित, खनन दुर्घटना, रासायनिक दुर्घटना, औद्योगिक दुर्घटना, जंगलों में आग, हाथियों का आक्रमण आदि प्रमुख हैं। 

 

भूकंप 

 

बाढ़ 

 

सूखा 

  • किसी क्षेत्र में सामान्य से कम वर्षा होने के आधार पर सूखा का वर्गीकरण किया जाता है। इसके तहत सामान्य से 25 प्रतिशत कम वर्षा होने पर सामान्य सूखा, 25-50  प्रतिशत कम वर्षा होने पर मध्यम सूखा तथा 50 प्रतिशत से कम वर्षा होने पर गंभीर सूखा कहा जाता है। यदि किसी क्षेत्र में सामान्य के 75% से कम वर्षा होती है, तो यह आपदा का रूप ले लेती है। 
  • राज्य के उत्तरी-पश्चिमी हिस्से में सूखा कई बार आपदा का रूप धारण कर लेती है, जिसके परिणाम स्वरूप पलामू, गढ़वा, लातेहार, चतरा तथा लोहरदगा जिलों की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  •  राज्य का पलामू जिला सूखा की दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील जिला है।
  • वर्ष 2010 में झारखण्ड राज्य गंभीर सूखे से प्रभावित रहा है।
  • इस दौरान राज्य के 24 में से 12 जिले गंभीर सूखे की प्रकोप में रहे हैं। इन सभी जिलों में वर्षा का अनुपात औसत वर्षा के 50 प्रतिशत से भी कम रहा।
  •  सूखे जैसी आपदा से निपटने हेतु राज्य में बाँध, तालाब, डोभा, वाटर शेड प्रबंधन, उचित फसलों का चयन, मृदा संरक्षण, वृक्षों की कटाई पर नियंत्रण आदि उपाय अपनाये जाने की जरूरत है। 
  • इसके लिए संबंधित क्षेत्र के लोगों को जागरूक तथा प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। 

 

तड़ित (लाइटनिंग) 

  • वर्षा के दिनों में चमकने वाली बिजली का जमीन पर गिरना तड़ित कहलाता है जिसके कारण झारखण्ड में प्रत्येक वर्ष अनेक लोगों की मृत्यु हो जाती है। साथ ही इस दुर्घटना में कई मवेशियों की भी मृत्यु हो जाती है। 
  • इस आपदा से राज्य के पलामू, चतरा, लातेहार, गुमला, राँची, गिरिडीह तथा कोडरमा जिला मुख्य रूप से प्रभावित हैं।
  •  राज्य के श्रीकृष्ण लोक प्रशासन संस्थान द्वारा इस समस्या से निपटने हेतु एक विशेष ट्रेनिंग माड्यूल का निर्माण किया गया है।
  •  इस समस्या से होनेवाली जानमाल की हानि को कम करने हेतु राज्य के लोगों को बचाव से संबंधित प्रशिक्षण दिये जाने की आवश्कता है जिसके तहत् वर्षा के समय घरों में रहना, पेड़ के नीचे नहीं खड़ा होना, बिजली एवं तार के खंबे से दूर रहना आदि शामिल हैं। 

 

खनन दुर्घटना 

  • झारखण्ड राज्य में देश के कुल खनिज का लगभग 40 प्रतिशत भंडार संचित है। 
  • राज्य की अर्थव्यवस्था में खनिजों का खनन एक प्रमुख गतिविधि है तथा इस दौरान प्राकृतिक तथा मानवीकृत दुर्घटनाएँ उत्पन्न होती हैं।
  • राज्य के कई कोयला खदानों में आग लगी हुई है तथा तीव्रता से इसका प्रसार हो रहा है। इनमें झरिया, रामगढ़ आदि प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं। 
  • खनन के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में खानों का धंसना, मजदूरों को खनन से निर्मित गड्ढे में गिर जाना तथा खनन दौरान होने वाले प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ प्रमुख हैं। 
  • खनन दुर्घटना से निपटने हेतु इन क्षेत्रों में कार्य करने वाले मजदूरों को प्रशिक्षित किए जाने के साथ-साथ खनन के धंसाव के समय त्वरित राहत प्रणाली को विकसित किए जाने की आवश्यकता है।
  •  साथ ही मजदूरों को खनन के दौरान उत्पन्न प्रदूषकों के प्रति जागरूक करते हुए मॉस्क के प्रयोग हेतु प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है। 

 

जंगलों में आग 

  • जंगलों में आग जलवायु का एक प्रमुख घटक है, जो राज्य के वनक्षेत्र के जलवायु को प्रभावित करने में अहम् भूमिका अदा करता है।
  •  झारखण्ड राज्य में वनों की बहुलता है तथा इसमें शुष्क पतझड़ वन सर्वाधिक पाये जाते हैं। इन वनों में ग्रीष्म ऋतु में कई कारणों से लगने वाली आग कई बार भयावह हो जाती है तथा यह आपदा का रूप ग्रहण कर लेती है। 
  • जंगलों में आग लगने का प्रमुख कारण हवाओं के कारण पेड़ों के टकराने से उत्पन्न आग, मानव द्वारा महुआ व वृक्ष की लकड़ियों के संग्रहण के दौरान रोशनी के लिए आग जलाना तथा पर्यटकों की लापरवाही के कारण जलती हुई माचिस की तीली का जंगलों में फेंका जाना महत्वपूर्ण हैं। 
  • मार्च तथा अप्रैल के महीने में जंगलों में रहने वाले लोग आग जलाकार रातों में तथा प्रातः काल महुआ चुनने का कार्य करते हैं तथा इनके जलाए हुए आग कई बार विस्तारित होकर जंगली आग का कारण बनते हैं।
  •  झारखण्ड राज्य के उत्तर-पश्चिमी तथा दक्षिणी पश्चिमी भाग में जंगल में सर्वाधिक आग लगने की घटना होती है। इनमें पलामू, लातेहार, गढ़वा, चतरा, हजारीबाग, सिमडेगा, गुमला आदि जिले शामिल हैं।
  •  जंगलों में लगने वाले आग को रोकने हेतु कानूनी, प्रशासनिक तथा जागरूकता के स्तर पर कार्य किया जाना आवश्यक है। 
  • इस संबंध में पर्यटन संबंधी कानूनों में कठोर प्रावधान तथा संग्राहकों के बीच जलाये हुए आग को बुझाने के संबंध में जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहिए। 
  • साथ ही प्रशासनिक स्तर पर ऐसे वृक्ष जो अधिक आयु के हो गये हैं, उन्हें काटकर उनके स्थान पर नये वृक्ष लगाने का कार्य किया जाना चाहिए। इसके तहत् जंगलों में फायर टावर बाँध का निर्माण तथा वनों का सड़कों  द्वारा विभाजन किए जाने की भी आवश्यकता है। 

 

हाथियों का आक्रमण 

  • हाथी झारखण्ड का राजकीय पशु है तथा राज्य में इनकी संख्या काफी अधिक है। राज्य के पलामू, दुमका, सारंडा, हजारीबाग, दालमा आदि के जंगलों में सर्वाधिक हाथी पाये जाते हैं।
  •  राज्य में आये दिन जंगली हाथी के आक्रमण की घटनाएँ सुनने को मिलती हैं, जो बसाव क्षेत्र के जन-जीवन की एक प्रमुख समस्या है।
  •  हाथियों के आक्रमण का प्रमुख कारण इनके प्राकृतिक आवासों में मानव का हस्तक्षेप है। जंगलों में मानव हस्तक्षेप में वृद्धि के कारण जहाँ एक ओर हाथियों को ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँचने का रास्ता उपलब्ध हुआ है वहीं वनों के कटाव ने इन्हें अपने प्राकृतिक आवास से पलायन हेतु मजबूर किया है।
  • इसके अतिरिक्त सुगंधित महुआ फूलों की ओर आकर्षित होना हाथियों के आक्रमण का एक प्रमुख कारण है। 
  • हाथियों के आक्रमण की समस्या राज्य के खूटी, सिमडेगा, गुमला, लातेहार, पलामू, चतरा, हजारीबाग आदि जिले में पायी जाती है। 
  • हाथियों के आक्रमण से बचाव हेतु सर्वप्रथम लोगों को जागरूक किये जाने की आवश्कता है ताकि लोग हाथियों के प्राकृतिक आवासों में हस्तक्षेप करना बंद करें। 
  • हाथियों के आक्रमण के पश्चात् कई गाँवों में ढोल-नगाड़ों की आवाज, आग तथा मिर्च की गंध द्वारा उन्हें भगाने का प्रयास किया जाता है।

 

झारखण्ड में आपदा प्रबंधन 

  • किसी भी प्रकार की आपदा से निपटने हेतु तीन चरणों में निपटने की व्यवस्था की जाती है- आपदा पूर्व व्यवस्था, आपदा के दौरान व्यवस्था तथा आपदा के बाद व्यवस्था।
  •  भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया गया है। इसी परिप्रेक्ष्य में राज्य स्तर पर मुख्यमंत्रियोंकी अध्यक्षता में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण तथा जिला स्तर पर जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया गया है।

 

 झारखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (JSDMA)

  •  झारखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन 28 मई, 2010 को किया गया है। इस प्राधिकरण का गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 14 (1) के आलोक में किया गया है। 
  • इस धारा के तहत राज्य के राज्यपाल को एक राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन करने की शक्ति प्रदान की गयी है। 
  • राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है तथा इसमें अधिकतम नौ सदस्य हो सकते हैं। 
  • इस प्राधिकरण का प्रमुख उद्देश्य आपदा नियंत्रण हेतु भिन्न-भिन्न स्तरों पर योजना एवं रणनीति का निर्माण करना तथा आपदा के पश्चात् पुनर्निर्माण एवं सामान्य जन-जीवन की बहाली के लिए उपयुक्त परियोजना का निर्माण करना है। 
  • झारखण्ड राज्य में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की सहायता के लिए एक राज्य कार्यकारी समिति का गठन किया गया है। जिसके अध्यक्ष राज्य के मुख्य सचिव हैं।
  • यह समिति आपदा के संबंध में राष्ट्रीय नीति, राष्ट्रीय योजना और राज्य योजना के क्रियान्वयन एवं उनके बीच समन्वय स्थापित करता है। 
  • जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का मुख्य कार्य जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन के लिए योजना, समन्वय एव क्रियान्वयन हेतु कार्य करना है। 

झारखण्ड आपदा प्रबधंन योजना 

  • इस योजना के अंतर्गत अक्टूबर, 2004 में झारखण्ड राज्य आपदा विभाग का गठन किया गया है। जिसका प्रमुख कार्य आपदा से प्रभावित व्यक्तिों को त्वरित राहत पहुँचाना है।
  •  आपदा के दौरान राहत कार्य के समुचित संचालन हेतु एक राज्य आपदा कार्रवाई कोष का गठन किया गया है जिसमें 75 प्रतिशत हिस्सेदारी केन्द्र तथा 25 प्रतिशत राज्य सरकार की होती है। 
  • वर्ष 2009 में आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा राज्य आपदा प्रबंधन योजना तैयार की गई है।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत् राज्य एवं जिला स्तर पर सभी जिलों में आपातकालीन ऑपरेशन सेंटर का गठन किया जा रहा है तथा इसे वी-सैट उपग्रह से जोड़ा जा रहा है। 
  • वर्ष 2005 में देश में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 को लागू किया गया है। 
  • इस अधिनियम के अंतर्गत राज्य सरकारों को आपदा प्रबंधन योजनाओं को तैयार करने, आपदा से बचाव हेतु समुचित उपाय करने, विकास योनाओं में आपदाओं के निवारण अथवा रोकने के उपायों पर विचार करने, निधियों को आवंटित करने, चेतावनी प्रणाली स्थापित करने तथा आपदा प्रबंधन से संबंधित विभिन्न एजेंसियों की सहायता करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया है। 
  • आपदा के दौरान राहत एवं बचाव कार्य हेतु राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2006 में राष्ट्रीय आपदा कार्रवाई बल (NDRF) का गठन किया गया है।
  •  इसी प्रकार राज्यों द्वारा राज्य स्तर पर राज्य आपदा कार्रवाई बल (SDRF) का गठन किया जाता है। 
  • वर्ष 2005 से श्रीकृष्ण लोक प्रशासन संस्थान, राँची द्वारा आपदा केन्द्र प्रबंधन का संचालन किया जा रहा है जिसका प्रमुख कार्य आपदा के संबंधित विभिन्न पहलुओं के प्रति प्रशिक्षण प्रदान करना है। इस संस्थान को राज्य सरकार द्वारा प्रशिक्षण से संबंधित कार्यक्रमों के संचालन हेतु वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
  •  वर्ष 2015 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के सहयोग से राज्य में ‘विद्यालय सुरक्षा कार्यक्रम‘ का संचालन किया गया है। 
  • आपदा के समय दूर संवेदन, कार्टोग्राफी तथा अंतरिक्ष से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाओं को साझा करने हेतु सरकार द्वारा झारखण्ड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर की स्थापना की गयी है।

 

राज्य में आपदा की पूर्व जानकारी तथा इससे जुड़ी समस्याओं की जानकारी एवं उनके प्रभाव को न्यून करने हेतु ‘आपदा प्रबंधन ज्ञान-सह-प्रदर्शन केन्द्र’ (सृजन) विभाग का विकास किया जा रहा है जिसके लिए

शैक्षणिक एवं तकनीकी कार्यों का संचालन कर रहे हैं।

  •  मेकॉन, राँची औद्योगिक आपदा जोखिम प्रबंधन से संबंधित गविविधियों को संचालित करती है। 

 

आपदा प्रबंधन ज्ञान-सह-सूचना प्रदर्शन केन्द्र (सृजन) 

  • इसकी स्थापना झारखण्ड आपदा प्रबंधन योजना के तहत की गयी है।
  •  इसका प्रमुख कार्य समुदाय एवं आम जनता को विभिन्न प्रकार के संभावित आपदाओं एवं उनसे होने वाली हानी के संबंध में जागरूक करना है। 
  • साथ ही इसके माध्यम से आपदा के प्रभावों को कम करने हेतु विभिन्न तकनीकों एवं उपकरणों से भी अवगत कराया जाता है।
  •  इन केन्द्रों का विकास विशेष आपदाओं यथा- बाढ़, सूखा, खनन आपदा, जंगलों में आग आदि के अनुरूप पर किया गया है।
  •  ये केन्द्र स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर सूचना प्रदान करने, संचार, प्रसार प्रविधियों तथा जागरूकता के प्रसार के उपकरण के रूप में कार्य करते हैं।

 

जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन (DDMA) 

  • जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन हेतु राज्य के सभी 24 जिलों में जिला दंडाधिकारी (District Magistrate) या जिला समाहर्ता (District Collector) या उपायुक्त (Deputy Commissioner) की अध्यक्षता में जिला आपदा प्रबंधन समिति का गठन किया गया है।
  •  अन्य सदस्यों में मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जल एवं सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता, पशु चिकित्सा पदाधिकारी और गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि सदस्य शामिल हैं। 
  • इस समिति का प्रमुख कार्य जिला की आवश्यकता के अनुसार जिला आपदा योजना तैयार करना तथा आपदा के दौरान इसका क्रियान्वयन करना है। 
  • यह समिति जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन टीम को प्रशिक्षित करने में मदद करती है तथा विभिन्न माध्यमों से आम जनता में आपदा से बचने के उपायों का प्रचार-प्रसार करती है। 

 

 

प्रखण्ड (ब्लॉक) स्तर पर आपदा प्रबंधन 

  • ब्लॉक स्तर पर एक आपदा प्रबंधन समिति का गठन किया जाता है जिसका अध्यक्ष प्रखण्ड विकास पदाधिकारी होता है। 
  • अन्य सदस्यों में समाज कल्याण पदाधिकारी, स्वास्थ्य अधिकारी, ग्रामीण जलापूर्ति अधिकारी, पुलिस अग्निशमन सेवाओं के अधिकारी, गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि तथा वरिष्ठ नागरिक शामिल होते हैं। 
  • यह समिति प्रखण्ड की जरूरतों के अनुरूप आपदा प्रबंधन की योजना का निर्माण तथा उसके क्रियान्वयन में जिला प्रशासन को मदद करती है। 
  • यह समिति आपदा से बचने हेतु आम लोगों को कृत्रिम तरीके से पूर्वाभ्यास (मॉक ड्रिल) कराती है तथा आम जनता के बीच आपदा से निपटने के उपायों का प्रचार-प्रसार करती है।

 

ग्राम स्तर पर आपदा प्रबंधन 

  • ग्राम स्तर पर एक आपदा प्रबंधन समिति का गठन किया जाता है जिसका अध्यक्ष ग्रामसभा का मुखिया होता है।
  • यह समिति गाँव के स्तर पर आपदा प्रबंधन की योजना के निर्माण तथा उसके क्रियान्वयन का कार्य करती है। 
  • यह समिति आपदा से बचने हेतु आम लोगों को कृत्रिम तरीके से पूर्वाभ्यास (मॉक ड्रिल) कराती है तथा आम जनता के आपदा से निपटने के उपायों का प्रचार-प्रसार करती है।

झारखण्ड में पर्यावरण संबंधी तथ्य Environmental facts in Jharkhand : SARKARI LIBRARY

जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को देखते हुए वैश्विक स्तर पर निम्न प्रयास किए गए हैं

  • सन 1979 में पहली बार स्वीट्जरलैंड के जेनेवा में जलवायु सम्मेलन का आयोजन किया गया। 
  • वर्ष 1990 में दूसरी बार जलवायु सम्मेलन का आयोजन किया गया। 
  • सन् 1985 में आस्ट्रिया के वियना में वियना कन्वेंशन का आयोजन किया गया जिसमें ओजोन क्षरण हेतु उत्तरदायी पदार्थो (क्लोरोफ्लोरो कार्बन एवं मिथाइल ब्रोमाइड) के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का विचार किया गया।
  • 16 सितम्बर, 1987 को कनाडा के मांट्रियल में क्लोरोफ्लोरो कार्बन पर प्रतिबंध लगाने हेत एक बाध्यकारी समझौता किया गया ताकि ओजोन क्षरण को रोका जा सके। 
  • इसी कारण 16 सितंबर को प्रतिवर्ष ओजोन संरक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता है। 
  • वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरो में पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन किया गया इसमें ‘यूनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज‘ का गठन किया गया।
  •  वर्ष 1994 से वैश्विक स्तर पर कोप सम्मेलन का आयोजन प्रारंभ किया गया। 
  • वर्ष 1997 में जापान के क्योटो में कार्बन उत्सर्जन की कटौती को लेकर एक बाध्यकारी समझौता किया गया जिसे ‘क्योटो प्रोटोकॉल‘ के नाम से जाना जाता है। 
  • झारखण्ड राज्य में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की सहायता से एक राज्य जलवायु केन्द्र की स्थापना की गयी है। 
  • वर्ष 2013  मेंराज्य में जलवायु परिवर्तन पर झारखण्ड कार्य योजना’ (SAPCC) का प्रकाशन किया गया। इस रिपोर्ट के अनुसार राज्य का सरायकेला-खरसावां जिला सर्वाधिक संवेदनशील जिलाहै।

 

CCKN-IA

  • भारतीय कृषि में जलवायु परिवर्तन नॉलेज नेटवर्क (CCKN-IA) की शुरूआत वर्ष 2013 मेंकी गई  
  • इस पहल का प्रमुख उद्देश्य नवोन्मेष सूचना एवं संचार तकनीक आधारित प्लेटफार्म का प्रयोग करने की कृषि मंत्रालय के साथ सहयोग करना है। 
  • भारत में इसे झारखण्ड, महाराष्ट्र तथा ओडिसा तीन राज्यों में प्रारंभ किया गया है।

 

राज्य की कुल भूमि के 23 प्रतिशत भाग पर कृषि कार्य किया जाता है। राज्य की कृषि मूलतः मानसूनी जलवायु पर आधारित है। 

 

  • भारत के 15 कृषि जलवायु प्रदेशों में तीन कृषि जलवायु प्रदेश झारखण्ड राज्य में स्थित हैं। 
  1. मध्य एवं उत्तरी-पूर्वी पठारी उप-कृषि जलवायु प्रदेश, 
  2. पश्चिमी पठारी उप-कृषि जलवायु प्रदेश तथा 
  3. दक्षिणी-पूर्वी पठारी उप-कृषि जलवायु प्रदेश 

 

 

  •  झारखण्ड राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग 17 प्रतिशत है तथा राज्य की 70 प्रतिशत जनसंख्या अपनी आजीविका हेतु कृषि पर निर्भर है। 
  • राज्य में औसत वार्षिक वर्षा 1149.3 मिमी. है जिसका 83 प्रतिशत दक्षिणी-पश्चिमी मानसून से प्राप्त होता है। 

 

6.5 प्रतिशत वर्षा की प्राप्ति लौटते हुए मानसून से, 4 प्रतिशत पश्चिमी विक्षोभ के कारण तथा शेष 6.5 प्रतिशत मानसून पूर्व की वर्षा द्वारा प्राप्त होती है।

  •  पिछले 100 वर्षों में झारखण्ड क्षेत्र में 150 मिमी. वर्षा की मात्रा में कमी आयी है जो जलवायु परिवर्तन का परिणाम है। 

 

झारखण्ड में पर्यावरण संरक्षण 

 झारखण्ड राज्य अपनी जलवायु तथा जैव-विविधता हेतु राष्ट्रीय स्तर पर प्रख्यात है। राज्य के जंगलों में विभिन्न प्रकार के पेड़, औषधीय पौधे, जड़ी-बूटी तथा फल-फूल के वृक्ष-पौधे पाये जाते हैं। 

 

  • राज्य के नेतरहाट, पिठोरिया घाटी, सारंडा के जंगल, पारसनाथ पहाड़ी, दालमा पहाड़ी, हजारीबाग के वन, पलामू के वन आदि जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत संपन्न हैं।

 

 पिछले वर्षों में लगातार बढ़ते प्रदूषण ने राज्य की जैव विविधता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। राज्य में जानवरों की विलुप्त होती प्रजातियाँ तथा महत्वपूर्ण पेड़-पौधों की संख्या में कमी इसके उदाहरण हैं।

राज्य में विकास कार्यक्रमों को गति देने हेतु उद्योगों की स्थापना, सड़कों का निर्माण, कृषि कार्य का विस्तार आदि के कारण वृक्षों की व्यापक पैमाने पर कटाई की जा रही है। परिणामतः पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ जैव विविधता का भी हास हुआ है। राज्य में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा प्राकृतिक संसाधनों, वन्य-जीव तथा जैव विविधता के संरक्षण हेतु तमाम प्रयास किए जा रहे हैं।

 

 विभाग द्वारा इस हेतु व्यापक पैमाने पर वनरोपण, वन संरक्षण हेतु जागरूकता अभियान तथा प्रदूषण को नियंत्रित करने हेतु विधिक उपाय किए जा रहे हैं। पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न होने के कारण विलुप्त होने वाले जीव-जंतुओं में गिद्धों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है। 

राज्य में गिद्ध की तीन प्रजातियाँ 

  1. जिप्स बेंगलेंसिस, 
  2. जिप्स इंडिकस तथा 
  3. आजिप्शियन पायी जाती है। 

इनकी विलुप्ति का प्रमुख कारण डाईक्लोफेनेक नामक दर्द निवारक दवा है, जिसका प्रयोग पशुओं के इलाज में किया जाता है। साथ ही गिद्धों के प्राकृतिक आवास मुख्यतः पेड़ों की कटाई भी इनकी संख्या में कमी का एक महत्वपूर्ण कारक है।

 

राज्य में वनाच्छादित क्षेत्रों की वृद्धि हेतु वर्ष 2015 मे ‘मुख्यमंत्री जन वन योजना की शुरूआत की गई है। इसके माध्यम से निजी भूमि पर वृक्षारोपण हेतु लोगों को प्रोत्साहित किया जाता है। इस योजना के तहत लोगों को प्रोत्साहन राशि के रूप में वृक्षारोपण एवं उसके रख-रखाव पर हुए व्यय का 50 प्रतिशत हिस्से की प्रतिपूर्ति वन विभागद्वारा की जाती है। 

 

राज्य सरकार द्वारा इको-फ्रेंडली तरीकों को प्रोत्साहित करने हेतु ‘इको-टूरिज्म नीति को अधिसूचित किया गया है। इसके तहत राज्य सरकार द्वारा प्रथम चरण में साहेबगंज में फॉसिल पार्क, गिरिडीह में पारसनाथ, हजारीबाग में कैनहरी हिल, देवघर में त्रिकुट पर्वत, कोडरमा में तिलैया डैम, पलामू में व्याघ्र परियोजना, लातेहार में नेतरहाट तथा जमशेदपुर में दालमा गज अभ्यारण्य को विकसित किया जा रहा है। 

 

साथ ही राज्य में इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने हेतु स्थानीय गाँवों में लोगों को नेचर गाइडके रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आय में भी वृद्धि की जा सके।

 

राज्य सरकार ने सूखे की समस्या से निपटने हेतु मनरेगा के तहत डोभा निर्माण कार्य प्रारंभ किया है, जिसमें वर्षा जल को संचित किया जा सकेगा। इस कार्य हेतु वर्ष 2016-17 के बजट में 200 करोड़ रूपये का विशेष प्रावधान किया गया है। पूरे राज्य में इस वित्तीय वर्ष में 6 लाख डोभा निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

 

  • राज्य सरकार द्वारा ठोस कचरा प्रबंधन हेतु राँची, पाकुड़, धनबाद तथा चाकुलिया में पीपीपी मोड पर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट योजना को मंजूरी प्रदान की गई है।
  • वन अधिकार अधिनियम के तहत वनों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति तथा वनवासी को वन भूमि का पट्टावितरित किया जा रहा है। यह पट्टा 2006 से पूर्व से वनों में रह रहे वनवासियों को प्रदान किया जाएगा। 

राज्य के शहरी क्षेत्रों में मनोरंजन पार्क का निर्माण कराया जा रहा है तथा इसके माध्यम से शहरी क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण व जलवायु परिवर्तन के विभिन्न पहलुओं से लोगों को परिचित कराकर उनमें इन विषयों के प्रति जागरूकता का प्रसार किया जा रहा है। 

 

राज्य में अधिकाधिक लोगों को लाह की खेती से संबद्ध करने की सरकार की योजना है। इसके लिए लाह के उत्पादन एवं इस पर आधारित स्वरोजगार हेतु राज्य के कई जिलों यथा- राँची, खूटी, पश्चिमी सिंहभूम, सिमडेगा, गुमला, लातेहार, पलामू आदि का चयन किया गया है। इन जिलों में वन प्रबधन समिति तथा स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से लाह की खेती को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।

 

जापान की हिताची कंपनीको राज्य में ठोस कचरा पर आधारित बिजली उत्पादन हेतु संयंत्र लगाने हेतु सहमति प्रदान की गई है। 

  • राँची नगर निगम द्वारा सफाई व्यवस्था का कार्य अगले 25 वर्षों के लिए निजी कंपनी एस्सेल इंफ्रा’को सौंपा गया है।

 भारत सरकार द्वारा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के नियंत्रण हेतु आठ मिशनों की घोषणा की गई है। 

  • इस हेत राज्य सरकार ने विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय बनाने के लिए ‘झारखण्ड राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य इकाई की स्थापना करने का निर्णय लिया है।

 

 झारखण्ड राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य इकाई राज्य में पर्यावरण संतुलन को बनाए रखते हुए आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन तथा जीविका के साधनों की उपलब्धता पर बल दे रहा है। यह इकाई राज्य में जलवायु परिवर्तन से संबंधित मुद्दों को ध्यान में रखते हुए कार्य करेगी।

  • राज्य में तापमान एवं वर्षा में परिवर्तनशीलता के कारण कृषि तथा अन्य क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक राज्य में 2020 से 2050 के बीच राज्य में ग्रीष्म ऋतु में अधिकतम तापमान 2-3 डिग्री तक तथा शीत ऋतु में 4-5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने की संभावना है।  
  • राज्य में प्रदूषण नियंत्रण तथा इससे संबंधित मामलों पर नियंत्रण रखने हेतु झारखण्ड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) की स्थापना 2001 में की गई है। 

 

यह एक नियामक निकाय है, जो उद्योगों को पर्यावरण सरंक्षण हेतु उच्च तकनीकों के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करता है। 

  • राज्य सरकार द्वारा वर्ष2012 में झारखण्ड ऊर्जा नीतिकी घोषणा की गई है जिसका मुख्य उद्देश्य गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के विकास को प्रोत्साहित करना है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के विकास को प्रोत्साहित करने हेतु राज्य में 2001में ‘झारखण्ड नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी’ (JREDA – Jharkhand Renewable Energy Development Agency)का गठन किया गया
  • राज्य सरकार द्वारा जल संसाधनों के उचित प्रबंधन हेतु वर्ष 2011में झारखण्ड राज्य जल नीतिलागू की गई है।