जनसांख्यिकीय सिद्धांत और जनगणना Demographic Theory and Census

 जनसंख्या

  • जनसंख्या संबंधित सिद्धांत
    • माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत
    • जनसंख्या का अनुकूलतम सिद्धांत
    • जनांकिकीय संक्रमण का सिद्धांत
  • जनसंख्या से संबंधित पारिभाषिक शब्द
    • अशोधित जन्म दर
    • शोधित जन्म दर
    • अशोधित मृत्यु दर
    • जनसंख्या वृद्धि दर
    • लिंगानुपात
    • शिशु मृत्यु दर
    • बाल मृत्यु दर
    • साक्षरता अनुपात
    • कुपोषण की दर
    • मातृ मृत्यु दर
    • प्रजनन काल
    • संपूर्ण प्रजनन दर
    • जनसंख्या घनत्व
    • युगल संरक्षण दर
    • कार्यशील जनसंख्या एवं जनांकिकीय लाभांश
    • आश्रितता अनुपात
  • बेकर प्रजनन वक्र
  • भारत की जनसंख्या नीति
    • राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000
  • जनसंख्या पिरामिड
  • भारत में जनगणना
  • सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना-2011
  • भारत की जनगणना – 2011 के प्रमुख आँकड़े
  • अभ्यास प्रश्न

एक निश्चित भूभाग जैसे कि गांव, शहर ,जिला ,राज्य ,देश या महाद्वीप में निवास करने वाले लोगों की कुल संख्या ही जनसंख्या कहलाती है


माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत

(Malthusian Theory of Population)

  • ब्रिटेन के अर्थशास्त्री थॉमस माल्थस ने 1798 में अपनी एक पुस्तक ‘एन एसे ऑन द प्रिंसिपल ऑफ पॉपुलेशन’ के माध्यम से ‘जनसंख्या का सिद्धांत’ प्रस्तुत किया। 
  • मॉल्थस का सिद्धांत किसी देश की खाद्यान्न वृद्धि दर एवं जनसंख्या वृद्धि दर के बीच संबंध स्थापित करता है। 
  • माल्थस के अनुसार किसी देश की जनसंख्या वृद्धि दर ज्यामितीय दर या गुणोत्तर श्रेणी (Geometric Progression) अर्थात् 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64 आदि से बढ़ती है, जबकि खाद्यान्न वृद्धि दर अंकगणितीय दर या समानांतर श्रेणी (Arithmetic Progression) अर्थात् 1, 2, 3, 4, 5 आदि से बढ़ती है। 
  • परिणामतः एक निश्चित समय के बाद जनसंख्या अत्यधिक हो जाती है और उसकी अपेक्षा खाद्यान्न कम हो जाता है अर्थात् जनाधिक्य की समस्या पैदा होती है।
  • माल्थस के अनुसार जनाधिक्य की समस्या के समाधान के दो उपाय हैं- 
    • पहला उपाय : प्राकृतिक या नैसर्गिक  
    • दूसरा उपाय : कृत्रिम 
  • माल्थस ने बाढ़, सूखा, महामारी, भूकंप, युद्ध को जनसंख्या नियंत्रण का प्राकृतिक उपाय कहा है, जिन्हें प्रकृति अपनाती है; जबकि कृत्रिम उपाय के तहत देर से विवाह करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना आदि शामिल हैं, जिन्हें मानव अपनाता है। 
  • माल्थस के अनुसार जनसंख्या नियंत्रण के नैसर्गिक उपाय बहुत अधिक कष्टदायी होते हैं और यदि मानव इन कष्टों से बचना चाहता है तो उसे जनसंख्या नियंत्रण के कृत्रिम उपायों को स्वयं अपना लेना चाहिये।

जनसंख्या का अनुकूलतम सिद्धांत

(The Optimum Theory of Population)

इस सिद्धांत के अनुसार जनसंख्या वृद्धि हमेशा हानिकारक नहीं होती क्योंकि जनसंख्या किसी भी देश का मानवीय संसाधन है। अतः किसी भी देश के प्राकृतिक एवं भौतिक संसाधनों के अनुसार मानवीय संसाधनों का भी एक आदर्श स्तर होना चाहिये, जिसे ‘अनुकूलतम जनसंख्या कहते हैं।

यदि किसी देश की जनसंख्या इस अनुकूलतम जनसंख्या से

कम है तो वहाँ पर जनसंख्या का बढ़ना उचित माना जाता है,वर्तमान में अधिकांश विकसित देशों की स्थिति यही है।

परंतु यदि जनसंख्या, अनुकूलतम जनसंख्या से अधिक है तो वहाँ जनसंख्या का बढ़ना खतरनाक होता है जैसा कि अधिकांश विकासशील देशों में देखा जा रहा है।

इस प्रकार जनसंख्या का अनुकूलतम सिद्धांत विकसित एवं

विकासशील देश दोनों की व्याख्या करता है।

किसी भी देश में अनुकूलतम जनसंख्या तब होती है, जब उस देश का प्रति व्यक्ति उत्पादन अधिकतम होता है।

प्रो. डाल्टन ने अनुकूलतम जनसंख्या को ज्ञात करने के लिये  सूत्र दिया है-

M=(A-O)/O

यहाँ

A = वास्तविक जनसंख्या

0 = अनुकूलतम जनसंख्या

M= समायोजन अभाव या असंतुलन की मात्रा

M = 0 अर्थात् अनुकूलतम जनसंख्या

M = 1 अर्थात्,जनाधिक्य

M less than 0 =,  अर्थात् जनाभाव

यदि ‘M’ का मान शून्य है तो इसका अर्थ है कि उस देश की

जनसंख्या अनुकूलतम जनसंख्या है और M का मान धनात्मक है तो उस देश की जनसंख्या, अनुकूलतम जनसंख्या से अधिक होगी एवं उस देश में जनाधिक्य की स्थिति होगी।

यदि M का मान ऋणात्मक है तो उस देश की जनसंख्या, अनुकूलतम जनसंख्या से कम होगी एवं उस देश में जनाभाव की स्थिति होगी।

नोट: अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत का उल्लेख सर्वप्रथम एडवर्ड बैस्ट ने 1815 में किया तथा हेनरी सिजविक ने 1907 में इस सिद्धांत को विकसित किया। एडविन कैनन ने इसके लिये ‘अनुकूलतम’ शब्द का प्रयोग किया।

जनांकिकीय संक्रमण का सिद्धांत

(The Theory of Demographic Transition)

जनांकिकीय संक्रमण के सिद्धांत का प्रतिपादन 1929 में डब्ल्यू. एम. थॉमसन ने किया, परंतु इसको व्यवस्थित तथा वैज्ञानिक रूप फ्रैंक नॉटेंस्टीन द्वारा वर्ष 1945 में दिया गया।

नोटेंस्टीन को जनांकिकी का जनक कहा जाता है।

सी.पी. ब्लेकर ने जनसंख्या परिवर्तन के आधार पर जनांकिकी संक्रमण के  पाँच चरण बताए-

कार्यशील जनसंख्या एवं जनांकिकीय लाभांश

(Working Age Population and Demographic Dividend)

कार्यशील जनसंख्या – एक निश्चित आयु-सीमा की जनसंख्या जो कि कार्य करने योग्य मानी जाती है और कार्य करना चाहती है ।

15-59 वर्ष के आयु वर्ग के लोग भारत में कार्यशील जनसंख्या में शामिल किये जाते हैं। (जनगणना-2011 के अनुसार )

विश्व बैंक के अनुसार 15-64 वर्ष के आयु वर्ग की जनसंख्या को कार्यशील जनसंख्या माना जाता है।

मानव पूंजी में कार्यशील जनसंख्या को ही शामिल किया जाता है।

किसी देश की जनसंख्या में कार्यशील जनसंख्या (15–59 वर्ष) के बढ़ते तथा आश्रित जनसंख्या के घटते अनुपात के कारण उत्पादन में वृद्धि को ‘जनांकिकी लाभांश’ कहा जाता है।

किसी देश की कार्यशील जनसंख्या को ‘जनसंख्या लाभांश’ इसीलिये कहा जाता है, क्योंकि उस देश का विकास उसकी कार्यशील जनसंख्या पर ही निर्भर होता है, परंतु ऐसा तभी

संभव होगा जब कार्यशील जनसंख्या को मानव पूंजी में बदला जाए अर्थात् उनके शिक्षण-प्रशिक्षण एवं तकनीकी योग्यता को बढ़ाने पर बल दिया जाए।

वर्तमान में विश्व में सर्वाधिक कार्यशील जनसंख्या भारत में है और इससे मिलने वाले जनांकिकीय लाभांश को देखते हुए ही यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि जल्दी ही भारत, चीन को भी पीछे छोड़ देगा।

बेकर प्रजनन वक्र ( Beckers Fertility Curve)

वेकर प्रजनन वक्र प्रजनन तथा आर्थिक विकास, जिसे प्रति व्यक्ति आय के रूप में व्यक्त किया गया हो, के बीच संबंध को प्रदर्शित करता है।

प्रजननता के आर्थिक विश्लेषण के संस्थापक गैरी बेकर है।

वेकर प्रजनन वक्र सिद्धांत यह प्रदर्शित करता है कि आय का सकारात्मक प्रभाव प्रजनन पर महत्त्वपूर्ण रूप से पड़ता है।

यह वक्र यह प्रतिपादित करता है कि कुछ सीमा तक प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि प्रजननता में वृद्धि

लाएगी।

एक सीमा तक प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि के बाद प्रजननता

में कमी आती है और वह गिरती हुई दर में गिरेगी।

यह वक्र उल्टे U की तरह होता है।

coming

भारत की जनसंख्या नीति (Population Policy of India)

भारत में इस समय जनसंख्या विस्फोट की स्थिति है। देश में निरंतर बढ़ती जनसंख्या आर्थिक विकास के मार्ग में एक बाधक है। अतः इस पर नियंत्रण पाने के लिये एक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति आवश्यक है।

भारत ने 1952 में परिवार नियोजन कार्यक्रम की शुरुआत की ।

1961 – 62 में परिवार नियोजन  ‘परिवार कल्याण नियोजन कार्यक्रम’ बन गया।

वर्ष 1966 में परिवार नियोजन विभाग सृजित किया गया।

इस विभाग ने मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ, फैमिली प्लानिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट में कार्य करना शुरू किया।

इसी क्रम में भारत की पहली जनसंख्या नीति 1976 में घोषित की गई।

इस नीति में लड़कियों की विवाह योग न्यूनतम

उम्र सीमा को बढ़ाकर 15 से 18 वर्ष तथा लड़कों की 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष कर दी गई।

1976 की नीति के तहत संसद में प्रतिनिधित्व के प्रयोजनों के साथ, केंद्रीय सहायता के वितरण; करों के हस्तांतरण आदि के लिये जनसंख्या के आँकड़ों को वर्ष 2001 तक के लिये 1971 के स्तर को निश्चित कर दिया गया।

लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान, परिवार नियोजन को और प्रोत्साहन, ग्रामीण क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाने जैसे

महत्त्वपूर्ण कदम इस नीति के तहत उठाए गए।

आठवीं पंचवर्षीय योजना में जनसंख्या नियंत्रण के संबंध में विकेंद्रीकृत नियोजन तथा नियंत्रण की नीति अपनाई गई।

अक्तूबर 1997 में भारत सरकार ने प्रजनन और बाल

स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किया जो कि नौवीं पंचवर्षीय योजना का प्रमुख कार्यक्रम बना।

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति,2000

(National Population Policy, 2000)

फरवरी 2000 में घोषित राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के तहत मुख्यतः तात्कालिक, मध्यावधि तथा दीर्घकालीन लक्ष्यों की घोषणा की गई।

नीति के तात्कालिक उद्देश्य के तहत गर्भनिरोध की आवश्यकताओं की पूर्ति, स्वास्थ्य सुविधा संबंधी अवसंरचना एवं स्वास्थ्यकर्मियों की व्यवस्था के साथ आधारिक पुनरुत्पादनीय और शिशु स्वास्थ्य सुविधा

के लिये एकीकृत सेवा प्रदान करना आदि प्रमुख लक्ष्य हैं।

मध्यावधि लक्ष्यों के तहत कुल प्रजनन दर को 2010 तक प्रतिस्थापन स्तर अर्थात् 2.1 बच्चे प्रति माता तक लाना निर्धारित किया गया।

जबकि दीर्घकालिक उद्देश्य (सतत् आर्थिक विकास, सामाजिक विकास तथा पर्यावरणीय संरक्षण के स्तर पर ) 2045 तक स्थिर जनसंख्या की स्थिति प्राप्त करना है।

इस नीति का अनुसरण करते हुए सरकार ने 84वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 लागू किया जिसके तहत लोकसभा और राज्यसभा में राज्यवार सीटों के आवंटन को 2026 तक के लिये निश्चित कर दिया गया।

वित्तीय वर्ष 2004-05 में ₹100 करोड़ के एक कॉरपस फंड के साथ जनसंख्या स्थिरता कोष का गठन स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संगठन के रूप में किया गया जिसका कार्य जनसंख्या स्थिरता हेतु लक्षित कार्यों की गतिविधियों को संचालित

करना है। मातृत्व मृत्यु दर को प्रति (एक लाख जीवित जन्मों पर 100 से कम स्तर तक लाना) शिशु मृत्यु दर को ( प्रति एक हज़ार जीवित जन्मों पर 30 से कम करना,) संक्रामक रोगों के ख़िलाफ़ बच्चों को सार्वभौमिक प्रतिरक्षण की व्यवस्था करना, बाल विवाह को रोकने तथा 20 वर्षों की आयु के बाद ही लड़कियों की शादी करने हेतु प्रोत्साहन देना आदि इस नीति के अन्य प्रमुख लक्ष्य हैं।

जनसंख्या पिरामिड (Population Pyramid )

जनसंख्या पिरामिड वह उपकरण है जिसका प्रयोग जनसांख्यिकी में समय के साथ हुए जनसंख्या में परिवर्तन के अध्ययन के लिये किया जाता है।

जनसंख्या पिरामिड जनसंख्या की आयु – लिंग संरचना का

प्रतिनिधित्व करता है जो कि समय के साथ जनसंख्या की जन्म और मृत्यु दर पर आधारित होता है ।

यह एक क्षैतिज मिश्रित बार ग्राफ है जिसमें क्षैतिज अक्ष जनसंख्या ( महिला एवं पुरुष) का प्रतिशत जबकि

ऊर्ध्वाधर अक्ष आयु वर्ग (सामान्यतः 5 वर्ष का अंतराल ) के आधार पर जनसंख्या को दर्शाता है।

इस पिरामिड में सबसे नीचे आधार पर सबसे कम आयु वर्ग की जनसंख्या होती है जो सबसे बड़ी होती है तथा क्रमशः

ऊपर जाने पर हर आयु वर्ग की जनसंख्या घटती जाती है। इस प्रकार उच्चतम आयु वर्ग की जनसंख्या आकार में सबसे कम होती है तथा सबसे ऊपर प्रदर्शित होती है।

जनसंख्या पिरामिड आयु तथा लिंगानुसार जनसंख्या का अध्ययन प्रस्तुत करता है।

पिरामिड का आधार बच्चों की संख्या दर्शाता है, जबकि ऊँचाई दीर्घजीविता को प्रदर्शित करती है ।

जनसंख्या पिरामिड का आकार आश्रितता अनुपात प्रदर्शित करता है।

इसकी सहायता से जन्म दर और मृत्यु दर के अंतर का अध्ययन किया जा सकता है।

सामान्यतया विकसित देशों में दीर्घ आयु के कारण जनसंख्या पिरामिड ऊँचा तथा आकार छोटा होगा। विकसित देशों में जीवन स्तर के उच्च होने तथा बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के कारण जनसंख्या

का पिरामिड ऊँचा होता है तथा आकृति आयताकार होती है।

विकासशील देशों में आश्रित बच्चों की अधिक संख्या के कारण आकार बड़ा तथा दीर्घायुता की कमी के कारण ऊँचाई कम होती है। यहाँ जनसंख्या पिरामिड शंकु के आकार का होगा।

भारत में जनगणना ( Census in India)

भारत में जनगणना की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान वायसराय लॉर्ड मेयो के काल में सन् 1872 में हुई।

परंतु प्रथम विधिवत् जनगणना 1881 में लॉर्ड रिपन के शासनकाल में आरंभ हुई।

प्रथम विधिवत् जनगणना- 1881 के समय जनगणना आयुक्त डब्ल्यू. सी. प्लोडन थे। इसके बाद से हर दस वर्षों पर जनगणना की शुरुआत हुई।

स्वतंत्र भारत की प्रथम जनगणना 1951 में संपन्न हुई जिसमें नाम, जन्म स्थान, लिंग, आयु आदि से संबंधित 14 प्रश्न पूछे गए थे।

भारत में जनगणना संपन्न कराने की ज़िम्मेदारी गृह मंत्रालय के अंतर्गत महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त के कार्यालय की होती है।

जनसंख्या वृद्धि दर की दृष्टि से भारतीय जनसंख्या को मुख्यतः चार चरणों में विभक्त किया जाता है-

1891–1921 : जनसंख्या की स्थिर या मंद वृद्धि अवस्था

1921-1951 : जनसंख्या की अल्प वृद्धि या सतत् वृद्धि अवस्था

1951–1981 : जनसंख्या की तीव्र वृद्धि अवस्था

1981 से वर्तमान : जनसंख्या वृद्धि दर में कमी के साथ तीव्र

वृद्धि अवस्था

1891 से 1921 के दौरान भारत में जन्म दर तथा मृत्यु दर दोनों ही उच्च स्तर पर थीं एवं दोनों की दरों में नाममात्र का अंतर था । इसी क्रम में पहली बार 1921 की जनगणना में जनसंख्या वृद्धि दर ऋणात्मक रही। इसलिये वर्ष 1921 को जनसंख्या का ‘महान विभाजन वर्ष’ कहा जाता है।

1961 से 1971 के दौरान भारत की जनसंख्या वृद्धि दर अब तक की सर्वाधिक (24.80% ) दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर के रूप में दर्ज की गई।

जनगणना 2011, भारत की 15वीं राष्ट्रीय जनगणना तथा स्वतंत्र भारत की 7वीं जनगणना है।

जनगणना 2011 का नारा था, ‘हमारी जनगणना, हमारा भविष्य’ ।

सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना 2011

(Socio-Economic and Caste Census-2011)

पहली बार जाति आधारित जनगणना वर्ष 1931 में की गई थी।

सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना 2011 स्वतंत्रता के पश्चात् पहली सामाजिक-आर्थिक एवं जाति आधारित जनगणना है।

इसकी शुरुआत 29 जून, 2011 को पश्चिमी त्रिपुरा में ‘संखोला ग्राम’ से की गई।

सामान्य जनगणना जहाँ गृह मंत्रालय के अंतर्गत जनगणना आयुक्त के तत्त्वावधान में होती है, वहीं सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना ग्रामीण विकास मंत्रालय एवं योजना आयोग (वर्तमान में नीति आयोग) द्वारा संपन्न की गई

सामाजिक – आर्थिक और जातिगत जनगणना-2011 के अनुसार देश में शहरी व ग्रामीण कुल मिलाकर 24.49 करोड़ परिवार हैं । जिनमें ग्रामीण परिवारों की कुल संख्या 17.97 करोड़ तथा कुल शहरी परिवारों की संख्या 6.52 करोड़ है।

देश के ग्रामीण परिवारों का लगभग 21.56 प्रतिशत (3.87 करोड़ परिवार) अनुसूचित जाति/जनजाति का है।

कुल ग्रामीण परिवारों का 30.10 प्रतिशत (5.41 करोड़ परिवार ) कृषि कार्य करता है।

भारत की जनगणना-2011 के प्रमुख आँकड़े

(Key figures of India’s Census-2011)

भारत की कुल जनसंख्या – 1,21,05,69,573

पुरुषों की कुल जनसंख्या – 58,74, 47,730(51.47%)

महिलाओं की कुल जनसंख्या – 62,31,21,843(48.53%)

नोट:

भारत की कुल जनसंख्या में 0-6 वर्ष के 13.59 प्रतिशत लोग हैं, जबकि 6 वर्ष से ऊपर के लोग 86.41 प्रतिशत हैं।