Data Communication and Networking

 Network

  • कम्प्यूटर नेटवर्क विभिन्न संचार माध्यमों द्वारा आपस में जुड़े दो या अधिक स्वतंत्र कम्प्यूटरों (Autonomous Computers) का समूह है जिसमें नेटवर्क से जुड़े कम्प्यूटर समान नियमों का अनुपालन कर आपस में डाटा व सूचनाओं का आदान-प्रदान तथा संसाधनों का साझा उपयोग करते हैं। 
  • कम्प्यूटर नेटवर्क का प्रयोग टेक्स्ट, ऑडियो तथा वीडियो डाटा को एक कम्प्यूटर से दूसरे कम्प्यूटर तक भेजने के लिए किया जाता है। 
  • इसमें किसी एक कम्प्यूटर का नेटवर्क पर नियंत्रण नहीं होता।

 

किसी नेटवर्क में संचार को स्थापित करने के लिए चार चीजों को आवश्यकता पड़ती है

  • (i) प्रेषक (Sender) 
  • (ii) माध्यम (Medium) 
  • (iii) प्राप्तकर्ता (Receiver) 
  • (iv) भेजने और प्राप्त करने की कार्य विधि (Protocol)

 

प्रोटोकॉल (Protocol)

  • नेटवर्क पर विभिन्न कम्प्यूटरों द्वारा संचार स्थापित करने तथा डाटा स्थानान्तरण को सुविधाजनक करने के लिए बनाए गए नियमों और प्रक्रियाओं (Rules and Procedures) का समूह प्रोटोकॉल कहलाता है।
  • नेटवर्क पर प्रयुक्त कुछ मुख्य प्रोटोकॉल हैं
    • TCP/IP — Transmission Control Protocol/Internet Protocol 
    • HTTP — HyperText Transfer Protocol
    • FTP — File Transfer Protocol 
    • SMTP – Simple Mail Transfer Protocol
  • पहला कम्प्यूटर नेटवर्क 1981 में तैयार किया गया जिसे ईथरनेट (Ethernet) कहा गया।

 

4. नोड (Nodes)

  • नेटवर्क से जुड़े विभिन्न कम्प्यूटरों का अंतिम बिंदु या टर्मिनल जो नेटवर्क के संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं, नोड कहलाता है। 
  • प्रत्येक नोड, एक प्रेषक तथा प्राप्तकर्ता, दोनों की तरह कार्य करता है। 

 

5. सर्वर (Server)

  • नेटवर्क के किसी एक नोड को संचार व्यवस्था बनाए रखने तथा साझा संसाधनों के उपयोग को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, जिसे सर्वर कहते हैं। 
  • यह नेटवर्क से जुड़े प्रत्येक कम्प्यूटर को विभिन्न सेवाएं प्रदान करता है। 

 

संचार की विधियां (Methods of Communication)

(i) सिम्प्लेक्स विधि (Simplex Method) :

  • डाटा व सूचनाओं का एक ही दिशा में संचारण होता है। इसमें सूचना प्राप्त होना सुनिश्चित नहीं होता है। 
  • जैसे- रेडियो का प्रसारण, कम्प्यूटर और की बोर्ड के बीच का संचार आदि।

(ii) (Half Duplex Method) : 

  • इसमें सूचनाओं का संचारण दोनों दिशाओं में किया जा सकता है, पर एक बार में एक ही दिशा में सूचनाएं जा सकती हैं। 
  • जैसे- टेलीफोन पर आवाज का आदान-प्रदान। 
  • इसके लिए दो तार की आवश्यकता पड़ती है।

 

(iii) (Full Duplex Method) : 

  • सूचना तथा डाटा को दोनों दिशाओं में एक साथ प्रेषित किया जा सकता है। 
  • इसमें चार तार की जरूरत पड़ती है।

 

बैंडविड्थ (Bandwidth)

  • डाटा के संचारण के समय माध्यम में उपलब्ध उच्चतम और निम्नतम आवृति (higher and lower frequency) की सीमा बैंडविड्थ कहलाती है। 
  • बैंडविड्थ जितना अधिक होगा, डाटा का संचारण उतना ही तीव्र होगा। 
  • बैंडविड्थ का आशय संचार माध्यम की सूचना वहन करने की क्षमता से होता है। 
  • एनालॉग सिग्नल के लिए बैंडविड्थ को हर्ट्ज (Hertz-Hz) में मापा जाता है।
  • कम्प्यूटर नेटवर्क के लिए बैंडविड्थ का तात्पर्य संचार माध्यम पर डाटा स्थनान्तरण की गति (Data Transfer Rate) से होता है। 
    • इसे बिट प्रति सेकेंड (Bits per Sec-bps) में मापा जाता है जिसे बॉड (Baud) भी कहते हैं। 
    • आजकल बैंडविड्थ Mbps (Megabits per Sec) या Gbps (Giga bits per sec) में मापते हैं। 
  • 1 मेगाबिट 1 मिलियन या 10 लाख बिट के बराबर होता है। 

 

बॉड (Baud) 

  • यह डाटा संचारण की गति को मापने की इकाई है। 
  • इसे बिट प्रति सेकेण्ड (bps-bit per second) भी कहा जाता है। 

 

ब्रॉडबैण्ड (Braud Band)

  • वह संचार माध्यम जिसमें डाटा स्थानान्तरण के लिए विशाल बैंडविड्थ वाला सिग्नल उपलब्ध होता है, ब्राडबैंड कहलाता है। 
  • इसमें डाटा स्थनान्तरण की गति तेज होती है तथा एक ही संचार माध्यम पर एक से अधिक चैनल के डाटा स्थानान्तरित किए जा सकते हैं। 
  • डीएसएल (DSL-Digital Subscriber Link), केबल टीवी तथा ऑप्टिकल फाइवर ब्राडबैंड सेवा उपलब्ध कराते हैं।
  • TRAI)Telecom Regulatory Authority of India) ने 512 किलोबिट प्रति सेकेंड (KBPS) से अधिक क्षमता वाले संचार माध्यमों को ब्राडबैण्ड की संज्ञा दी है।

 

बेसबैंड (Baseband)

  • वह संचार माध्यम जिसमें डाटा स्थानान्तरण के लिए कम बैंडविड्थ उपलब्ध होता है, बेस बैंड कहलाता है। 
  • इसमें किसी डाटा के स्थानान्तरण के लिए माध्यम के संपूर्ण बैंडविड्थ का प्रयोग किया जाता है। 
  • इसे नैरोबैंड (Narrow band) भी कहा जाता है। 

 

8.संचार के माध्यम (Medium of Communication)

  • डाटा और सूचनाओं के संचारण के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं

    • (i) युग्मतार (Twisted Pair Cable) 
    • (ii) को-एक्सियल केबल (Co-axial Cable) 
    • (iii) प्रकाशीय तंतु (Optical fibre cable) 
    • (iv) माइक्रोवेव (Microwave) 
    • (v) संचार उपग्रह (Communication Satellite)
    • (vi) इथरनेट केबल (Ethernet Cable) 

 

युग्मतार (Twisted Pair Cable)

  • इसमें तांबे के दो तार हाते हैं, जिन पर प्लास्टिक या टेफलॉन (Teflon) कुचालकों की परत चढ़ी रहती है। 
  • ये तार आपस में लिपटे रहते हैं और संतुलित माध्यम बनाते हैं जिससे केबल में शोर (noise) में कमी आती है। 
  • यह संकेतों को रिपिटर के बिना लंबी दूरी (1 किमी.) तक ले जाने में सक्षम है।

 

को-एक्सियल केबल (Co-axial Cable)

  • इसमें केंद्रीय ठोस चालक के चारों ओर चालक तार की जाली जिसे शील्ड (Shield) भी कहते हैं, रहती है तथा दोनों के बीच प्लास्टिक का कुचालक रहता है। 
  • तार की जाली भी कुचालक से ढकी रहती है। संकेतों का संचारण केंद्रीय ठोस तार से होता है जबकि शील्ड अर्थ (earth) से जड़ा रहता है। 
  • इसमें संकेतों की हानि अपेक्षाकृत कम होती है। 
  • इसकी बैंडविड्थ अधिक होती है तथा यह संकेतों को अधिक दूरी तक ले जा सकता है। 
  • इसका उपयोग केबल टीवी (Cable TV) नेटवर्क में भी किया जाता है। 
  • को-एक्सियल केबल का बैंडविड्थ 10 Mbps तक हो सकता है। अतः केबल टीवी के द्वारा ब्राडबैंड इंटरनेट सेवा प्रदान की जा सकती है। 
  • केबल मॉडेम (Cable Modem) का प्रयोग कर इसमें टीवी प्रसारण देखने के साथ-साथ इंटरनेट सेवा का उपयोग किया जा सकता है। 

 

प्रकाशीय तंतु (Optical Fibre Cable)

  • इसमें ग्लास या प्लास्टिक या सिलिका (Silica) का बना अत्यंत पतला तंतु होता है जो एलइडी (LED) या लेजर डायोड (Laser diode) द्वारा उत्पन्न संकेत युक्त प्रकाश (Light Signals) को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है। 
  • प्रकाश को पनः संकेतों में बदलने के लिए फोटो डायोड (Photo diode) का इस्तेमाल किया जाता है। 
  • यह प्रकाश के पूर्ण आंतरिक परावर्तन (Total Internal Reflection) के आधार पर कार्य करता है। 
  • इसके संचरण में ऊर्जा की खपत अत्यंत कम होती है। 
  • यह रेडियो आवृत्ति (Radio frequency) अवरोधों से मुक्त होता है। अतः इसके साथ रिपीटर या एम्प्लीफायर की जरूरत नहीं होती। 
  • ऑप्टिकल फाइबर डिजिटल डाटा के स्थानान्तरण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। 
  • ऑप्टिकल फाइबर के साथ मॉडेम का प्रयोग नहीं करना पड़ता है। 
  • ऑप्टिकल फाइबर में डाटा स्थानान्तरण के लिए टाइम डिवीजन मल्टीप्लेक्सिंग (Time Division Multiplexing) का प्रयोग किया जाता है।
  • इसमें शोर (Noise) अत्यंत कम, बैंडविड्थ अधिक, गति तीव्र तथा संकेतों की हानि निम्नतम होती है। ये लंबी दूरी के संचार के लिए उपयुक्त हैं। पर इसको लगाने और रख-रखाव का खर्च अधिक आता है।

एफटीटीएच (FTTH- Fibre to the Home) : 

  • इंटरनेट सेवा प्रदाता द्वारा ऑप्टिकल फाइबर केबल का प्रयोग कर उच्च गति की ब्राडबैंड इंटरनेट सुविधा प्रदान करने की व्यवस्था है। 
  • FTTH में ऑप्टिकल फाइबर केबल को उपयोगकर्ता के घर या ऑफिस तक पहुंचाया जाता है। 
  • इससे 100 Mbps की गति वाली इंटरनेट सेवा प्राप्त की जा सकती है। 

 

माइक्रोवेव (Microwave)

  • इसमें अति उच्च आवृत्ति (2 से 40 GHz) वाले विद्युत चुंबकीय तरंगों के संप्रेषण से संचार स्थापित किया जाता है। 
  • उच्च आवृत्ति होने के कारण इसमें कम लंबाई के पाराबोलिक (Parabolic) ऐंटीना का प्रयोग किया जाता है।
  • चूंकि, उच्च आवृत्ति की तरगें किसी बाधा को पार नहीं कर सकती, अतः प्रेषक और प्राप्तकर्ता, दोनों के एंटीना सीधी रेखा (Line of Sight) में होनी चाहिए। 
  • माइक्रोवेव में प्रत्येक 25-30 किमी. के बीच एक रिपिटर स्थापित करना पड़ता है। 
  • टेलीविजन प्रोग्राम का प्रसारण इसी माध्यम से किया जाता है। 

 

संचार उपग्रह (Communication Satellite)

  • कृत्रिम संचार उपग्रह फोन, टीवी और कम्प्यूटर के लिए संचार का बेहतर माध्यम उपलब्ध कराता है। 
  • यह सुदूर प्रदेशों तथा विश्व के किसी भी कोने में संचार उपलब्ध कराने में सक्षम है। 
  • संचार उपग्रह दो आवृत्तियों पर कार्य करता है
    • सी बैंड (C-Band)-4-6GHz 
    • के-यू बैंड (Ku-Band)-11-14GHz 

(1 GHz) = 109 Hz)

  • इसमें 6 या 14 GHz आवृत्ति को उपग्रह की ओर भेजा जाता है। उपग्रह पर स्थित ट्रांसपोण्डर (Transponder) इसे संवर्धित (Amplify) कर 4 या 11 GHz की आवृत्ति से वापस भेज देता है। 
  • आवृत्तियों में यह अंतर संकेतों को आपस में मिलने (Interference) से रोकने के लिए होता है।
  • संचार व्यवस्था के लिए भूस्थैतिक उपग्रह (Geo-Synchronous Satellite) का उपयोग किया जाता है। 
  • भूस्थैतिक उपग्रह भूमध्य रेखा पर पृथ्वी की सतह से 36,000 किलोमीटर दूर स्थापित किया जाता है। 
  • कक्षा में उपग्रह की गति पृथ्वी की घूर्णन गति के अनुपात में होती है जिससे उपग्रह पृथ्वी पर स्थित किसी बिंदु के सापेक्ष सदा एक ही स्थान पर मालूम पड़ता है।
  • उपग्रह के संचार को आसान बनाने के लिए एंटीना का आकार छोटा (1 से 2 मी. व्यास) किया गया जिसे VSAT (Very Small Aperture Terminal) कहा गया।

 

रेडियो ट्रांसमिशन (Radio Transmission)

  • माइक्रोवेव, सेटेलाइट या अन्य बेतार तकनीक (Wireless Technology) द्वारा डाटा स्थानान्तरण को रेडियो ट्रांसमिशन (Radio Transmission) कहा जाता है। 
    • इसमें प्रेषक तथा प्राप्तकर्ता का तार द्वारा आपस में जुड़ा होना आवश्यक नहीं है। 
    • अतः बेतार तकनीक का प्रयोग कर दूर-दराज और दुर्गम क्षेत्रों तक आसानी से डाटा स्थानान्तरण किया जा सकता है।

इथरनेट केबल (Ethernet Cable)

  • कम्प्यूटर व नेटवर्क डिवाइस जैसे- मॉडम, टेलीफोन, (Router) आदि को आपस में इथरनेट केबल से जोड़ा जाता है। 
  • यह इथरनेट प्रोटोकाल का प्रयोग करता है। 
  • इसकी सहायता से स्थानी नेटवर्क (LAN) भी बनाया जा सकता है। 
  • एक इथरनेट केबल 100 मीटर तक कार्य करता है, पर इसे नेटवर्क ब्रिज (Network Bridge की सहायता से बढ़ाया भी जा सकता है।

 

  • उपग्रह के जरिये संचार स्थापित करने पर एक व्यक्ति की आवाज दूरस्थ व्यक्ति को 270 मिली सेकेण्ड बाद सुनाई देती है। इस कारण, उपग्रह द्वारा संचार स्थापित करने में कुल 540 मिली सेकेंड से अधिक की देरी हो सकती है। 
  • पूरी दुनिया को संचार प्रदान करने के लिए कम से कम तीन भूस्थैतिक उपग्रहों की जरूरत पड़ती है। 

 

मॉडुलेशन (Modulation) 

  • कम्प्यूटर द्वारा उत्पन्न संकेत डिजिटल संकेत होते हैं। इन संकेतों की आवृत्ति कम होती है, अतः ये संकेत संचार माध्यम पर अधिक दूरी तय कर पाने में सक्षम नहीं होते। इन सूचना संकेतों को अधिक दूरी तक पहुंचाने के लिए उच्च आवृत्ति तरंगों का उपयोग किया जाता है जिन्हें वाहक तरंग (Carrier Frequency) कहा जाता है। 
  • संचार माध्यम पर भेजने से पहले डिजिटल सूचना संकेतों (Information Signals) को वाहक संकेत (Carrier Signal) पर अध्यारोपित (Superimpose) किया जाता है जिसे माडुलेशन कहते हैं। 
  • माडुलेशन में वाहक संकेत के एनालॉग गुणों को डिजिटल संकेत के आधार पर बदला जाता है। 
  • प्राप्तकर्ता द्वारा, माडुलेटेड संकेतों को पुनः सूचना संकेत में बदला जाता है जिसे डीमाडुलेशन (Demodulation) कहा जाता है। 
  • एनालॉग संकेतों के तीन गुण होते हैं
  • इन्हीं के आधार पर माडुलेशन की तीन विधियां हैं

(i) आयाम मॉडुलेशन (Amplitude Modulation) : 

  • इसमें बाइनरी संकेतों (0 और 1) के लिए दो आयाम निर्धारित किए जाते हैं।
  •  इसमें एनालॉग संकेतों के आयाम को डिजिटल संकेतों के अनुसार बदला जाता है, जबकि आवृत्ति और फेज नियत रहते हैं। 
  • टेलीविजन प्रसारण में चित्र संदेशों (Video Signals) का संचरण आयाम माडुलेशन (AM) द्वारा होता है।

 

(ii) आवृत्ति मॉडुलेशन (Frequency Modulation) : 

  • एनालॉग संकेतों की आवृत्ति को डिजिटल संकेतों (0 और 1) के अनुसार बदला जाता है जबकि आयाम और फेज नियत रहते हैं। 
  • रेडियो तथा टेलीविजन में ध्वनि संकेतों (Audio Signals) के प्रसारण में आवृत्ति माडुलेशन (FM) का प्रयोग होता है।

 

(iii) कला मॉडुलेशन (Phase Modulation) : 

  • इसमें एनालॉग संकेतों के कला (Phase) को डिजिटल संकेतो के अनुसार बदला जाता है जबकि आयाम और आवृत्ति नियत रहता है। 
  • कम्प्यूटर नेटवर्क में डाटा प्रेषण के लिए मुख्यतः कला माडुलेशन (Phase Modulation) का प्रयोग किया जाता है।

 

डाटा प्रेषण सेवा (Data Transmission Service)

(i) डायल-अप-लाइन (Dialup line) : 

  • इसे स्विच्ड लाइन (Switched line) भी कहते हैं तथा इसका उपयोग टेलीफोन की तरह नम्बर डायल कर संचार स्थापित करने में किया जाता है। 
  • इस व्यवस्था में जब इंटरनेट चालू रहता है तो फोन का प्रयोग बातचीत के लिए नहीं किया जा सकता। 
  • डायल अप सेवा में माडेम को टेलीफोन लाइन से जोड़ा जाता है। 
  • इसमें Serial Line Internet Protocol (SLIP) या Point to Point Protocol (PPP) का प्रयोग किया जाता है।

 

(ii) लीज्ड लाइन (Leased line) : 

  • इसे व्यक्तिगत या सीधी लाइन (Private or dedicated line) भी कहते हैं। 
  • इसमें दो दूरस्थ कम्प्यूटरों को एक खास लाइन से सीधे जोड़ा जाता है। 
  • इसका प्रयोग आवाज और डाटा (Voice and data) दोनों के लिए किया जा सकता है। 
  • इस सेवा का मूल्य लाइन की क्षमता, जिसे बॉड या बीपीएस (Baud or bps – bits per sec) में मापते हैं, और दूरी पर निर्भर करता है। 
  • इसका प्रयोग सामान्यतः बड़ी संस्थाओं द्वारा अधिक मात्रा में डाटा स्थानान्तरण के लिए किया जाता है। 
  • लोकल एरिया नेटवर्क (LAN) में कम्प्यूटर आपस में लीज्ड या डेडिकेटेड लाइन द्वारा ही जोड़े जाते हैं।

(iii) (ISDN-Integrated Services Digital Network): 

  • यह डिजिटल टेलीफोन व डाटा हस्तांतरण सेवा प्रदान करता है। 
  • चूंकि डाटा हस्तांतरण डिजिटल रूप में होता है, इसलिए इसमें मॉडेम की जरूरत नहीं रहती तथा शोर भी नगण्य होता है। 
  • इसमें डाटा व आवाज (Voice) के लिए अलग-अलग चैनल का प्रयोग किया जाता है। अतः इंटरनेट से जुड़े होने के बावजूद फोन पर सामान्य रूप से बात की जा सकती है। 
  • ISDN डायल अप लाइन का विकसित रूप है। 
  • यह एक टेलीफोन लाइन है जिसमें 64 Kbps के दो चैनल (कुल 128 Kbps) होते हैं। 
  • ISDN सेवा द्वारा किसी नेटवर्क के एक से अधिक उपयोगकर्ता एक ही लाइन का प्रयोग कर इंटरनेट से जुड़ सकते हैं। 

 

(iv) जीएसएम (GSM-Global Systemfor Mobile Communication) : 

  • यह मोबाइल फोन के संचालन के लिए सर्वाधिक प्रचलित मानक है जिसमें बिना फोन बदले अंतर्राष्ट्रीय रोमिंग (International Roaming) सुविधा प्रदान की जाती है। 
  • Short Message Service (SMS) के जरिए कम खर्च में छोटे टेक्स्ट आधारित संदेश भेजने का प्रारंभ जीएसएम मानक द्वारा ही किया गया है।
  • सब्सक्राइबर आइडेंटिटी माड्यूल (Subscriber Identity Module-SIM) कार्ड एक इलेक्ट्रानिक चिप है जो GSM तकनीक से जुड़े मोबाइल फोन पर प्रत्येक उपभोक्ता (Subscriber) की एक अलग पहचान स्थापित करता है। 
  • SIM कार्ड को फोन, टैबलेट या कम्प्यूटर से जोड़कर वायरलेस संचार स्थापित किया जा सकता है।

 

(v) सीडीएमए (CDMA-Code Division MultipleAccess): 

  • यह तीसरी पीढ़ी (3rd Generation-3G) मानक पर आधारित तकनीक है जिसका प्रयोग मोबाइल फोन संचालन में किया जाता है।

 

(vi) डिजिटल सब्सक्राइबर लिंक (DSL-Digital Subscriber Link) : 

  • इसमें टेलीफोन लाइनों का प्रयोग डिजिटल डाटा ट्रांसमिशन में किया जाता है। 
  • इसमें कम्प्यूटर सदा नेटवर्क से जुड़ा रहता है, अतः संपर्क स्थापित करने के लिए डायल करने की जरूरत नहीं पड़ती। 
  • इसमें नेटवर्क से जुड़ने के लिए डीएसएल माडेम का प्रयोग किया जाता है। 
  • इसमें एक साथ डाटा और आवाज दोनों को टेलीफोन लाइन पर भेजा जा सकता है।
  • ADSL-Asymetrical Digital Subscriber Link में डाटा भेजने (upload) और प्राप्त करने (Download) की गति अलग-अलग होती है। 
  • SDSL – Symetrical Digital Subscriber Link  में डाटा भेजने और प्राप्त करने की गति एकसमान होती है।

 

(vii) वायरलेस ब्राडबैंड (Wireless Broadband) : 

  • रेडियो तरंगों की सहायता से बिना तार के तीव्र गति से डाटा स्थानान्तरण की विधि वायरलेस ब्राडबैंड कहलाती है। 
  • इसमें दो तकनीक Wi-Fi तथा Wi Max का प्रयोग किया जाता है।
  • Wi-Fi तकनीक द्वारा कम्प्यूटर, लैपटॉप, टेबलेट या स्मार्टफोन आदि को वायरलेस एक्सेस प्वाइंट (WAP) या WiFi Hotspot के जरिए कम्प्यूटर नेटवर्क से जोड़ा जाता है। 
  • इसमें 2.4 GHz या 5 GHz आवृत्ति की तरंगों का प्रयोग किया जाता है। 
  • इसमें, Wi-Fi Hotspot से 100 मीटर की दूरी तक इंटरनेट से जुड़ा जा सकता है। 
  • इसे वायरलेस लोकल एरिया नेटवर्क (Wireless LAN) भी कहा जाता है।
  • Wi Max (World Wide Inter Operability for Microwave Access) 50 किलोमीटर की दूरी तक तीव्र गति की वायरलेस इंटरनेट सेवा प्रदान करता है। 
  • इसका प्रयोग अलग-अलग स्थानों पर स्थित WiFi Hotspots को वायरलेस तकनीक द्वारा आपस में जोड़कर वायरलेस नेटवर्क बनाने के लिए किया जाता है।
  • Wi Max तकनीक द्वारा वायरलेस मेट्रोपोलिटन एरिया नेटवर्क (Wireless MAN) का निर्माण किया जाता है।
  • सेल्यूलर फोन का प्रयोग कर भी कम्प्यूटर को इंटरनेट से जोड़कर वायरलेस नेटवर्क की स्थापना की जा सकती है।
  • नोटबुक, नेटबुक तथा टैबलेट आदि में मोबाइल सिम डालने के लिए स्थान बना होता है जिसका प्रयोग कर सेल्यूलर टेलीफोन सेवा द्वारा नेटवर्क से जुड़ा जा सकता है तथा इंटरनेट का प्रयोग किया जा सकता है। 

 

सिंक्रनश तथा असिंक्रनश संचार (Synchronous and Asynchronous Transmission)

  • डाटा स्थानान्तरण की वह विधि जिसमें संकेतों को भेजने से पहले प्रेषक और प्राप्तकर्ता के बीच समन्वय आवश्यक है, Synchronous Transmission कहलाता है।
  •  टेलीफोन पर आवाज का आदान-प्रदान इसका उदाहरण है।
  • Asynchronous Transmission विधि में डाटा स्थानान्तरण के दौरान प्रेषक तथा प्राप्तकर्ता के बीच समन्वय स्थापित किया जाना आवश्यक नहीं होता, बल्कि प्राप्तकर्ता डाटा प्राप्त करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। कम्प्यूटर नेटवर्क में डाटा स्थानान्तरण के लिए अधिकांशतः इसी विधि का प्रयोग किया जाता है।

 

मल्टीप्लेक्सिंग (Multiplexing)

  • एक ही संचार माध्यम पर भिन्न-भिन्न डाटा संकेतों को सफलतापूर्वक भेजना मल्टीप्लेक्सिंग कहलाता है। 
  • इसमें दो या अधिक डिवाइस डाटा भेजने और प्राप्त करने के लिए एक ही संचार माध्यम का साझा उपयोग करते हैं।
  • किसी संचार माध्यम पर सामान्यतः एक बार में एक ही संकेत भेजा जा सकता है। लेकिन इससे संचार माध्यम का बेहतर उपयोग संभव नहीं हो पाता। 
  • मल्टीप्लेक्सिंग तकनीक द्वारा भिन्न-भिन्न डाटा संकेतों को मिलाकर एक वाहक संकेत (Carrier) बनाया जाता है, जिसे संचार माध्यम पर भेजा जाता है। 
  • दूरस्थ स्थान पर उन डाटा संकेतों को अलग-अलग कर सही प्राप्तकर्ता तक पहुंचाया जाता है, जिसे डीमल्टीप्लेक्सिंग (Demultiplexing) कहते हैं। 

 

स्विचिंग तकनीक (Switching Technique)

  • नेटवर्क से जुड़े सभी कम्प्यूटर उपलब्ध संचार माध्यमों का साझा उपयोग करते हैं। इसके लिए स्विचिंग तकनीक का प्रयोग किया जाता है। 
  • सामान्यतः, स्विचिंग के लिए तीन प्रकार के तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।
    • 1.सर्किट स्विचिंग (Circuit Switching)
    • 2. मैसेज स्विचिंग (Message Switching)
    • पैकेट स्विचिंग (Packet Switching)

 

1.सर्किट स्विचिंग (Circuit Switching) : 

  • इस तकनीक  में डाटा स्थानान्तरण से पहले उपयोगकर्ताओं के बीच सीधा संपर्क स्थापित किया जाता है। 
  • डाटा स्थानान्तरण समाप्त होने तक संचार माध्यम दोनों उपयोगकर्ताओं द्वारा व्यस्त रहता है तथा इसका उपयोग किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता। इसे Point to Point Communication कहते हैं। 
  • टेलीफोन पर बातचीत सर्किट स्विचिंग का उदाहरण है।

 

2. मैसेज स्विचिंग (Message Switching) : 

  • इसमें Store and Forward तकनीक का प्रयोग किया जाता है। 

  • किसी कम्प्यूटर द्वारा भेजा गया संदेश नेटवर्क नोड में स्टोर कर लिया जाता है। जब भी संचार माध्यम खाली होता है, संदेश (Message) को अगले नोड तक पहुंचा दिया जाता है। इस प्रकार, डाटा उपयोगकर्ता तक पहुंचता है। 

  • इसमें डाटा स्थानान्तरण में देरी होने की संभावना रहती है, पर डाटा स्थानान्तरण से पहले उपयोगकर्ता के बीच सीधा संपर्क स्थापित करने की आवश्यकता नहीं रहती।

 

3. पैकेट स्विचिंग (Packet Switching) : 

  • पैकेट स्विचिंग भी Store and Forward तकनीक पर आधारित है। 
  • इसमें पूरी सूचना को एक साथ नहीं भेजा जाता। 
  • सूचना या डाटा को निश्चित आकार के छोटे-छोटे पैकेट्स में बांटा जाता है। प्रत्येक पैकेट के सा भेजने और पाने वाले का पता (address), पैकेट का नंबर तथ आकार आदि सूचनाएं जोड़ी जाती हैं। 
  • इन पैकेट्स को उपलब्ब संचार माध्यमों में से किसी एक या अधिक माध्यम द्वारा उपयोगक तक पहुंचाया जाता है। 
  • चूंकि डाटा पैकेट्स अलग-अलग माध्यम द्वारा भेजे जा सकते हैं, अतः संभव है कि ये पैकेट्स अलग-अल समय पर प्राप्तकर्ता तक पहंचे। 
  • अतः प्राप्तकर्ता इन पैकेट्स में पैकेट नंबर के अनुसार एकत्रित कर पूरी सूचना में बदलता है।
  • इंटरनेट मुख्यतः पैकेट स्विचिंग तकनीक का ही प्रयोग किया जाता है। 

 

Classification of Computer Network

(i) LAN-Local Area Network : 

  • विस्तार – लगभग 1 से 10 किमी. में आपस में जुड़े कम्प्यूटर का जाल
    • एक ऑफिस, फैक्टरी या विश्वविद्यालय कैम्पस में
    • लैन पर उस व्यक्ति या संस्था का पूरा नियंत्रण होता है। 
  • इसका आकार छोटा, डाटा स्थानांतरण की गति तेज तथा त्रुटियां कम होती हैं। 
  • Ethernet एक लोकप्रिय LAN तकनीक है। 
  • LAN में कम्प्यूटरों को जोड़ने के लिए Bus Topology तथा Co-axial cable का प्रयोग किया जाता है।

 

(ii) MAN- Metropolitan Area Network :

  • विस्तार – लगभग 100 किमी. त्रिज्या) में
    • उपयोग एक ही शहर में स्थित निजी या सार्वजनिक कम्प्यूटर को जोड़ने में
  • MAN का एक उदाहरणकेबल टेलीविजन
  • MAN का प्रयोग सीमित भौगोलिक क्षेत्र में स्थित LAN को आपस में जोड़ने के लिए भी किया जाता है।

 

(iii) WAN – Wide Area Network :

  • विस्तार – कई देश, महाद्वीप या संपूर्ण विश्व में फैले कम्प्यूटरों का नेटवर्क
    • कम्प्यूटरों को सार्वजनिक टेलीफोन, लीज्ड टेलीफोन लाइन, optic Fibre cable या कृत्रिम संचार उपग्रह द्वारा आपस में जोड़ा जाता है।
  • इसमें गति कम रहती है तथा त्रुटियों की संभावना अधिक रहती है। 
  • इसे लॉग हॉल नेटवर्क (Long haul network) भी कहा जाता है। 
  • इंटरनेट भी WAN का एक उदाहरण है ।
  • भारत में WAN का उदाहरण – Indonet
    • कम्प्यूटर मेंटनेंस कारपोरेशन (CMC) द्वारा विकसित

 

(iv) PAN- Personal Area Network 

  • किसी व्यक्ति या संस्था के अधिकार क्षेत्र के भीतर कुछ दूरी (10 मीटर से 100 मीटर) तक कम्प्यूटर का अपने ही उपकरणों से स्थापित संचार पर्सनल एरिया नेटवर्क कहलाता है। 
  • इसका प्रयोग कर कम्प्यूटर को इंटरनेट से भी जोड़ा जा सकता है। 
  • यदि इन कम्प्यूटरों को जोड़ने के लिए वायरलेस तकनीक का प्रयोग किया जाता है, तो इसे वायरलेस पर्सनल एरिया नेटवर्क (WPAN) कहा जाता है।

 

(v) Campus Area Network :

  • किसी स्कूल, कालेज, यूनीवर्सिटी, संस्था या किसी अन्य बड़े कैंपस के भीतर स्थित कम्प्यूटरों का नेटवर्क कैंपस एरिया नेटवर्क (CAN) कहलाता है। 
  • इसमें उसी क्षेत्र के भीतर स्थित कई लैन को भी आपस में जोड़ा जाता है। 
  • कैंपस एरिया नेटवर्क का दायरा 1 से 5 किलोमीटर तक हो सकता है।

 

(vi) Wireless LAN :

  • वायरलेस तकनीक का प्रयोग कर बिना तार के एक छोटे भौगोलिक क्षेत्र में स्थापित कम्प्यूटरों का नेटवर्क वायरलेस लैन (W LAN) कहलाता है। 
  • इसमें कम्प्यटर या अन्य उपकरणों को तार से जोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती तथा सीमित क्षेत्र में गतिशील होने की आजादी रहती है। 
  • वायरलेस लैन के लिए WiFi तकनीक का प्रयोग प्रमुखता से किया जाता है। 
  • वायरलेस लैन को इंटरनेट से जोड़कर गतिमान रहते हुए इंटरनेट का प्रयोग किया जा सकता है। 
  • इसके लिए Wireless Network Interface Card (WNIC) का प्रयोग किया जाता है जिसके साथ लगा एंटीना डाटा स्थानान्तरित करता है।

 

Ethernet :

  • यह LAN में प्रयोग किया जाने वाला प्रोटोकाल है।
  • इसमें कम्प्यूटरों को आपस में तथा नेटवर्क के साथ cable का प्रयोग कर जोड़ा जाता है। 
  • इथरनेट का विकास बॉब मेटकॉफ (Bob Metcalfe) द्वारा 1973 में किया गया था। 

 

भारत सरकार द्वारा स्थापित कम्प्यूटर नेटवर्क

(Computer Networks by Government of India)

1. राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र नेटवर्क (National Informatics Centre Network) : 

  • यह भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स तथा सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Electronics and Information Technology) के अधीन राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (National Informatics Centre) द्वारा विकसित नेटवर्क है। 
  • इसे निकनेट (NIC Net) भी कहा जाता है।
  • निकनेट द्वारा भारत भर के सभी राज्य मुख्यालयों तथा जिला मुख्यालयों को आपस में जोड़ा गया है। 
  • यह भारत सरकार के लिए National Backbone का निर्माण करता है । 
  • यह भारत सरकार के सभी वेबसाइटों के विकास व प्रबंधन का कार्य करता है।

 

2. राष्ट्रीय ज्ञान संजाल (National Knowledge Network) : 

  • यह नेटवर्क भारत भर के सभी शैक्षणिक तथा ज्ञान आधारित संस्थाओं को उच्च गति क्षमता (1 Gbps से अधिक) वाले संचार माध्मयों द्वारा आपस में जोडता है। 
  • यह भारत के लिए Knowledge Backbone का निर्माण करता है। 

 

3. राज्य वाइड एरिया नेटवर्क (State Wide Area Networks) : 

  • इसे स्वान (SWAN) भी कहा जाता है। 
  • यह भारत सरकार द्वारा e-governance प्लान के तहत स्थापित एक बैकबोन नेटवर्क है जिसमें सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यालय को जिला मुख्यालय होते हुए ब्लॉक स्तर तक उच्च गति क्षमता वाले संचार माध्यमों से जोड़ा गया है। 
  • इसमें संचार माध्यमों के लिए 2Mbps का न्यूनतम बैंडविड्थ निर्धारित है। 

 

4. शैक्षणिक एवं अनुसंधान नेटवर्क (Educational and Research Network) : 

  • इसे इरनेट (ERNet) भी कहा जाता है। 
  • यह दूर संचार व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा स्थापित कम्प्यूटर नेटवर्क है जो देश भर के प्रमुख शैक्षिक व अनुसंधान सस्थानों को आपस में जोड़ता है। 
  • इरनेट को भारत में सर्वप्रथम सीमित अर्थों में इंटरनेट सेवा प्रदान करने का श्रेय जाता है।

 

  • ARPANET-Advance Research Project Agency Network) विश्व का पहला वैन (WAN) है जिसे अमेरिकी रक्षा विभाग के लिए विकसित किया गया। 
  • ERNET-Education and Research Network) भारत में शिक्षा के लिए स्थापित वैन है।
  • NICNET-National Informatics Centre’s Net work) भारत के प्रत्येक जिले को जोड़ने वाला नेटवर्क है। 
  • स्विफ्ट (SWIFT) अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बैंकों को जोड़ने वाला वैन है। 

 

नेटवर्क टोपोलॉजी (Network Topology)

  • नेटवर्क टोपोलॉजी नेटवर्क के विभिन्न नोड या टर्मिनल्स को आपस में जोड़ने का तरीका है। यह नेटवर्क की भौतिक संरचना को बताता है।
  • मुख्य नेटवर्क टोपोलॉजी है
    • (i) स्टार (Star) 
    • (ii) बस (Bus) 
    • (iii) रिंग (Ring) 
    • (iv) ट्री (Tree)
    • (v) मेश (Mesh) 

 

स्टार टोपोलॉजी (Star Topology) : 

  • इसमें किसी एक नोड को होस्ट नोड या केन्द्रीय हब (Host node or Central Hub) का दर्जा दिया जाता है। 
  • अन्य कम्प्यूटर या नोड आपस में केंद्रीय हब द्वारा ही जुड़े रहते हैं। 
  • इसमें विभिन्न नोड या टर्मिनल आपस में सीधा संपर्क न करके होस्ट कम्प्यूटर द्वारा संपर्क स्थापित करते हैं। 
  • इसमें n नोड को आपस में जोड़ने के लिए n-1 संचार लाइनों की जरूरत पड़ती है।
  • लाभ : 
    • किसी एक नोड या केबल में त्रुटि से नेटवर्क का शेष हिस्सा अप्रभावित रहता है। 
    • नंया नोड जोडने का नेटवर्क पर प्रभाव नहीं पड़ता है। 
  • हानि : 
    • केंद्रीय हब में त्रुटि आने पर पूरा नेटवर्क प्रभावित होता है। 

 

बस टोपोलॉजी (Bus Topology)

  • इसमें एक केबल, जिसे ट्रांसमिशन लाइन (Transmission line) कहा जाता है, के जरिये सारे नोड़ जुड़े रहते हैं। 
  • किसी एक स्टेशन द्वारा संचारित डाटा सभी नोड्स द्वारा ग्रहण किये जा सकते हैं। इस कारण इसे ब्रॉडकास्ट नेटवर्क (Broadcast Network) भी कहते हैं। 
  • डाटा को पैकेट में भेजा जाता है जिसमें विशेष एड्रेस रहता है। कम्प्यूटर नोड्स इस एड्रेस को पढ़कर अपने लिए बने डाटा को ग्रहण करते हैं। 
  • लैन (LAN) में मुख्यतः यही टोपोलॉजी प्रयोग की जाती है। 
  • बस टोपोलॉजी में सामान्यतः Ethernet प्रोटोकाल का प्रयोग किया जाता है।
  • लाभ : 
    • इसमें कम केबल की आवश्यकता पड़ती है। 
    • खर्च कम पड़ता है। 
    • किसी एक कम्प्यूटर में त्रुटि होने पर पूरा नेटवर्क प्रभावित नहीं होता। 
    • नया नोड जोड़ना आसान है।
  • हानि : 
    • ट्रांसमिशन लाइन में त्रुटि होने पर सारा नेटवर्क प्रभावित होता है। 
    • इसमें एक बार में केवल एक ही नोड डाटा संचारित कर सकता है। 
    • प्रत्येक नोड को विशेष हार्डवेयर की आवश्यकता पड़ती है। 

 

रिंग टोपोलॉजी (Ring Topology)

  • सभी नोड एक दूसरे से रिंग या लूप (Ring or Loop) में जुड़े होते हैं। 
  • बस टोपोलॉजी के दो अंत बिन्दुओं को जोड़ देने से रिंग टोपोलॉजी का निर्माण होता है। 
  • प्रत्येक नोड अपने निकटतम नोड से डाटा प्राप्त करता है। 
  • अगर वह डाटा उसके लिए है तो वह उसका उपयोग करता है, अन्यथा उसे अगले नोड को भेज देता है। 
  • प्रत्येक नोड के साथ रिपीटर (Repeater) लगा रहता है जो सूचनाओं को पुनः प्रेषित कर सकता है। 
  • इसमें सूचनाओं का संचरण एक ही दिशा में होता है। 
  • लाभ : 
    • केंद्रीय कम्प्यूटर की आवश्यकता नहीं पड़ती। 
    • दो कम्प्यूटरों के बीच केबल में त्रुटि से दूसरे मार्ग द्वारा संचार संभव हो पाता है।
  • हानि : 
    • संचार की गति नेटवर्क में लगे कम्प्यूटरों की संख्या तथा संरचना से प्रभावित होती है। 
    • किसी एक स्थान पर रिपीटर में त्रुटि होने पर पूरा नेटवर्क प्रभावित होता है। 
    • इसके संचालन में जटिल साफ्टवेयर की आवश्यकता होती है। 

 

मेश टोपोलॉजी (Mesh Topology) 

  • इस टोपोलॉजी में प्रत्येक नोड डाटा स्थानान्तरण करता है तथा डाटा संचार में सहायक होता है। 
  • इसमें कोई होस्ट या केंद्रीय कम्प्यूटर नहीं होता। 
  • मेश नेटवर्क टोपोलॉजी दो प्रकार का हो सकता है
    • पूर्ण मेश टोपोलॉजी 
    • आंशिक मेश टोपोलॉजी

 

पूर्ण मेश टोपोलॉजी (Full Mesh Topology)

  • पूर्ण मेश टोपोलॉजी (Full Mesh Topology) में प्रत्येक नोड नेटवर्क के अन्य सभी नोड से जुड़ा होता है। 
  • इस टोपोलॉजी का प्रयोग बैकबोन नेटवर्क के निर्माण में किया जाता है। 
  • प्रत्येक नोड अपना डाटा भेजने के अलावा दूसरे नोड से प्राप्त डाटा भी आगे भेजने में सक्षम होता है। 
  • आंशिक मेश टोपोलॉजी (Partial Mesh Topology) में कम से कम एक नोड नेटवर्क के प्रत्येक नोड से जुड़ा होता है जबकि अन्य नोड आपस में जुड़े हो सकते हैं या नहीं भी हो सकते।

लाभ : 

  • नेटवर्क के किसी नोड या संचार माध्यम में त्रुटि हो जाने पर भी डाटा स्थानान्तरण जारी रहता है। 
  • इसमें कई नोड एक साथ डाटा स्थानान्तरण कर सकते हैं, अतः इस टोपोलॉजी द्वारा भारी मात्रा में डाटा स्थानान्तरण किया जा सकता है। 
  • नेटवर्क में नया नोड जोड़ने से डाटा का संचरण प्रभावित नहीं होता।

हानि : 

  • इस टोपोलॉजी के निर्माण तथा रखरखाव का खर्च अधिक होता है। 
  • वायरलेस तकनीक द्वारा मेश टोपोलॉजी का निर्माण अपेक्षाकृत सरल होता है।

 

हाइब्रिड नेटवर्क (Hybrid Network)

  • विभिन्न टोपोलॉजी का मिश्रण प्रयोग में लाया जाता है जिसे हाइब्रिड नेटवर्क (Hybrid Network) कहा जाता है। 

 

इंटरनेटवर्किंग टूल (Internetworking Tool)

  • अलग-अलग प्रोटोकाल तथा टोपोलॉजी का उपयोग कर रहे दो या अधिक कम्प्यूटर नेटवर्क को विभिन्न संचार माध्यमों द्वारा आपस में जोड़ने तथा उनके बीच डाटा व सूचनाओं का आदानप्रदान संभव बनाने की प्रक्रिया इंटरनेटवर्किंग कहलाता है। 
  • इंटरनेटवर्किंग में प्रयुक्त विभिन्न हार्डवेयर उपकरण इंटरनेटवर्किंग टूल कहलाते हैं। ब्रिज, राउटर, गेटवे आदि इंटरनेटवर्किंग टूल के उदाहरण हैं।

 

हब (Hub) : 

  • विभिन्न हार्डवेयर उपकरणों को आपस में जोड़ने के लिए हब का प्रयोग किया जाता है। 
  • हब द्वारा दो या अधिक नेटवर्कों को आपस में जोड़ा जाता है ताकि वे डाटा का आदान-प्रदान कर सकें। 
  • हब में कई पोर्ट होते हैं। किसी एक पोर्ट पर आने वाला डाटा हब के प्रत्येक पोर्ट पर उपलब्ध होता है। इस प्रकार, हब डाटा को मार्ग प्रदान करता है।
  • वह हब जो डाटा स्थानान्तरण के लिए केवल मार्ग प्रदान करता है, Passive hub कहलाता है। 
  • यदि हब डाटा स्थानान्तरण के दौरान मार्ग प्रदान करने के अतिरिक्त डाटा को मॉनीटर भी करता है तो वह Intelligent hub कहलाता है। 
  • जो हब डाटा पैकेट पर अंकित पते की पहचान कर प्रत्येक पैकेट को उचित मार्ग पर प्रेषित करता है, Switching hub कहलाता है। 

 

स्विच (Switch) : 

  • स्विच एक हार्डवेयर उपकरण है, जो विभिन्न कम्प्यूटरों को नेटवर्क से जोड़ता है। 
  • स्विच किसी भी प्रोटोकॉल का प्रयोग कर रहे डाटा को छांट (Filter) कर सही मार्ग पर प्रेषित (Forward) करता है। 
  • इसके लिए वह नेटवर्क से जुड़े कम्प्यूटर के मैक एड्रेस (MAC – Media Access Control Address) का प्रयोग करता है। 

 

ब्रिज (Bridge) : 

  • यह एक हार्डवेयर उपकरण है जो समान प्रोटोकॉल का उपयोग कर रहे दो लैन (Local Area Network) को आपस में जोड़ता है। 
  • यह प्रत्येक डाटा पैकेट की जांच कर उन्हें उसी लैन को भेजता है जिसके लिए डाटा बना होता है। 
  • इस प्रकार, ब्रिज नेटवर्क में डाटा ट्रैफिक को नियंत्रित करता है।

 

नेटवर्क गेटवे (Network Gateway) :

  • यह अलगअलग प्रोटोकॉल का प्रयोग कर रहे दो नेटवर्क या लैन को आपस में जोड़ता है। 
  • नेटवर्क गेटवे का काम हार्डवेयर या साफ्टवेयर या दोनों के समन्वय से किया जाता है। 
  • इसे प्रोटोकॉल कनर्वटर (Protocol Converter) भी कहा जाता है।

 

रिपीटर (Repeater) : 

  • नेटवर्क में डाटा संकेतों को लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है जिससे डाटा संकेतों में ह्रास संभव है। 
  • लंबी दूरी तक डाटा संकेतों की विश्वसनीयता बनाए रखने तथा ट्रांसमिशन में हुए ह्रास से निपटने के लिए उन्हें परिवर्धित (Amplify) करना पड़ता है। 
  • रिपीटर एक हार्डवेयर है जो संचार माध्यम से डाटा संकेत लेकर उन्हें परिवर्धित करता है तथा पुनः संचार माध्यम पर भेजता है। इस प्रकार, रिपीटर नेटवर्क के दो भागों को आपस में जोड़ता है।

 

राउटर (Router) 

  • इंटरनेट पर डाटा संकेतों को पैकेट बनाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जाता है। 
  • डाटा पैकेट्स को सबसे छोटे तथा सबसे तेज (Shortest and Fastest)  मार्ग द्वारा निर्धारित पते तक पहुंचाने का काम राउटर करता है।
  • राउटर साफ्टवेयर की मदद से नेटवर्क पर भेजे गए डाटा पैकेट्स पर अंकित पते (address) की जांच करता है तथा उसे सही दिशा में प्रेषित करता है। इसके लिए राउटिंग टेबल (Routing table) का प्रयोग किया जाता है।
  • राउटर नेटवर्क गेटवे पर स्थापित किया जाता है तथा दो या अधिक नेटवर्क से जुड़ा होता है। 
  • यह अलग-अलग टोपोलॉजी, प्रोटोकॉल या संचार माध्यमों का प्रयोग करने वाले नेटवर्क के बीच डाटा स्थानान्तरण का कार्य करता है।
  •  राउटर हार्डवेयर या साफ्टवेयर या दोनों के मिश्रण से कार्य करता है।

 

नेटवर्क इंटरफेस कार्ड (NIC-Network Interface Card) : 

  • नेटवर्क इंटरफेस कार्ड प्रिंटेड सर्किट बोर्ड से बना हार्डवेयर डिवाइस है जिसे कम्प्यूटर के एक्सपैनशन स्लॉट में लगाया जाता है। 
  • इसमें नेटवर्क केबल जोड़ने के लिए जैक बना होता है। 
  • यह कम्प्यूटर तथा नेटवर्क के बीच संपर्क स्थापित करता है। 
  • नेटवर्क इंटरफेस कार्ड को लैन कार्ड (LAN Card) भी कहा जाता है। 
  • अलग-अलग नेटवर्क टोपोलॉजी तथा प्रोटोकाल के लिए नेटवर्क इंटरफेस कार्ड भी अलग-अलग होता है।
  •  प्रत्येक नेटवर्क इंटरफेस कार्ड का एक विशेष मैक एड्रेस (MAC Address – Media Access Control Address) होता है जो कार्ड के निर्माता कंपनी द्वारा दिया जाता है। 
  • नेटवर्क से जुड़ा प्रत्येक नोड अपने मैक एड्रेस से ही पहचाना जाता है।

 

बैकबोन नेटवर्क (Backbone Network) : 

  • बैकबोन कम्प्यूटर नेटवर्क संरचना का मुख्य संचार माध्यम होता है। 
  • बैकबोन नेटवर्क विभिन्न कम्प्यूटर नेटवर्क को आपस में जोड़ता है तथा उनके बीच डाटा स्थानान्तरण के लिए मार्ग उपलब्ध कराता है। 
  • विभिन्न लैन (LAN) को उस क्षेत्र के वैन (WAN) से बैकबोन ही जोड़ता है। 
  • यह विशाल क्षमता (Large Capacity), अधिक बैंडविड्थ (High Bandwidth) तथा अत्यंत उच्च गति (Very High Speed) वाला संचार माध्यम होता है। 
  • बैकबोन नेटवर्क का मुख्य बस (Bus) होता है जिसे डाटा का सुपर हाइवे (Super Highway) भी कहा जाता है।

 

मॉडेम (Modem)

  • यह Modulator-demodulator का संक्षिप्त रूप है। 
  • मॉडेम टेलीफोन लाइन के माध्यम सेकंप्यूटर को नेटवर्क से जोड़ता है। 
  • सामान्य टेलीफोन लाइन पर केवल एनालॉग (Analog) संकेत भेजा जा सकता है जबकि कम्प्यूटर डिजिटल (Digital) डाटा उत्पन्न करता है। 
  • माडेम कंप्यूटर द्वारा उत्पन्न डिजिटल डाटा को एनालॉग डाटा में बदलता है जिसे टेलीफोन लाइन पर भेजा जाता है। 
  • दूसरी तरफ, टेलीफोन लाइन पर प्राप्त एनालॉग डाटा को मॉडेम द्वारा डिजिटल डाटा में बदलकर कम्प्यूटर के उपयोग के लायक बनाया जाता है।

Modulation/Demodulation

  • डिजिटल डाटा को एनालॉग डाटा में बदलना Modulation कहलाता है जबकि एनालॉग डाटा को डिजिटल डाटा में बदलना Demodulation कहलाता है। 
  • मॉडेम की गति (speed) को बॉड (Baud) में मापा जाता है। 
  • नये संचार माध्यमों, जैसे—ISDN, DSL, केबल मॉडेम या फाइबर ऑप्टिक आदि, जिनमें डिजिटल डाटा को सीधे भेजा जा सकता है, के साथ मॉडेम के प्रयोग की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
  • मॉडेम को सिस्टम यूनिट के कम्युनिकेशन पोर्ट (Communication Port) से कम्प्यूटर तथा संचार माध्यम के बीच जोड़ा जाता है। 
  • मॉडेम प्रेषक (Sender) तथा प्राप्तकर्ता (Receiver) दोनों कम्प्यूटरों के साथ जोड़ा जाता है। 
  • व्यवसायिक तौर पर उपलब्ध माडेम का आविष्कार AT & T कम्पनी ने 1962 में किया था।

 

मॉडेम के प्रकार (Kinds of Modem) : 

वाह्य संरचना के आधार पर मॉडेम दो प्रकार के होते हैं

(i) आंतरिक मॉडेम (Internal Modem) : 

  • इसे सिस्टम यूनिट के अंदर स्थापित किया जाता है। 

(ii) वाह्य मॉडेम (External Modem) : 

  • इसे सिस्टम यूनिट के बाहर रखा जाता है। 

 

बेतार तकनीक (Wireless Technology)

  • केबल के खर्चीला होने तथा रख-रखाव की समस्या के कारण विभिन्न कम्प्यूटर को नेटवर्क से जोड़ने के लिए बेतार तकनीकी का प्रयोग किया जा रहा है। 
  • इसमें रेडियो तरंगों और अवरक्त किरणों (Infra red rays) का प्रयोग कर कम दूरी के लिए नेटवर्क स्थापित किया जाता है।

 

वाई-मैक्स (WiMAX- World wide Inter operability for Microwave Access)  

  • यह लंबी दूरी (50 किमी. तक) के लिए बेतार की सहायता से डाटा का संचरण संभव बनाता है। 
  • इसकी विशेषता संचार माध्यम का विशाल बैंड (ब्राडबैंड) है। 
  • Wi Max वायरलेस तकनीक द्वारा विभिन्न शहरों तथा राष्ट्रों के बीच इंटरनेट संपर्क स्थापित करता है तथा वायरलेस वाइड एरिया नेटवर्क (Wireless WAN) का निर्माण करता है। 
  • इसमें डाटा स्थानान्तरण की गति 1 Gbps तक हो सकती है। 
  • वाई-मैक्स 3.3 से 3.4 GHz के बीच कार्य करता है। 
  • यह एक दूरसंचार प्रोटोकाल है जिसका उपयोग ब्राडबैंड वायरलेस एक्सेस द्वारा मोबाइल इंटरनेट सुविधा प्रदान करने में किया जाता है। 

 

WLL-Wireless Local Loop 

  • यह  बेतार तकनीक है जिसमें बड़ा बैंडविड्थ तथा उच्चगति के डाटा संचरण के साथ टेलीफोन की सुविधा भी प्रदान की जाती है। 

 

ब्लूटूथ (Bluetooth): 

  • यह एक वायरलेस तकनीक मानक (Wireless Technology Standard) है, जिसके द्वारा छोटे वेबलेंथ की रेडियो तरंगों का प्रयोग कर कम दूरी (100 मीटर तक) के लिए डाटा का आदान-प्रदान संभव बनाया जा सकता है। 
  • ब्लूटूथ तकनीक में 2.4 GHz से 2.8 GHz के बीच के रेडियो तरंगों का प्रयोग किया जाता है। 
  • इसकी सहायता से कम्प्यूटर के विभिन्न उपकरणों जैसे-माउस, की-बोर्ड, प्रिंटर, हेडसेट, मॉडेम आदि को बिना तार के आपस में जोड़ा जाता है तथा कम दूरी पर स्थित कम्प्यूटरों को आपस में जोड़कर Wireless Personal Area Network भी बनाया जा सकता है।
  • इस तकनीक द्वारा मोबाइल फोन की सहायता से कम्प्यूटर को इंटरनेट से जोड़कर उपयोग किया जा सकता है। 
  • ब्लूटूथ डिवाइस को कम्प्यूटर के यूएसबी पोर्ट (USB Port) से जोड़ा जाता है। 
  • ब्लूटूथ तकनीक को RS-232 डाटा केबल के विकल्प के रूप में प्रयोग किया जाता है।

 

वाई-फाई (Wi-Fi) : 

  • यह एक वायरलेस तकनीक मानक है जिसका उपयोग वायरलेस लोकल एरिया नेटवर्क (Wireless LAN) तैयार करने में किया जाता है। 
  • इसके द्वारा कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन तथा अन्य उपकरणों को बेतार तकनीक द्वार 100 मीटर की दूरी तक आपस में तथा इंटरनेट से जोड़ा जाता है।
  • वाई-फाई एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन वाई-फाई एलायंस (Wi-Fi Alliance) का ट्रेडमार्क है।

 

वायरलेस एक्सेस प्वाइंट (Wireless Access Point) : 

  • यह एक डिवाइस है जो विभिन्न उपकरणों को वाई-फाई या ब्लूटूथ मानकों का प्रयोग कर वायरलेस नेटवर्क से जोड़ता है। 
  • इसके लिए रेडियो ट्रांसमीटर तथा रिसीवर का प्रयोग किया जाता है। परंतु वायरलेस एक्सेस प्वाइंट का दूसरा छोर राउटर के सहारे नेटवर्क बैकबोन से जुड़ा हो सकता है। 
  • वायरलेस एक्सेस प्वाइंट को हॉटस्पॉट (Hot Spot) भी कहा जाता है। 
  • हॉटस्पॉट वह स्थान है जहां से वायरलेस नेटवर्क द्वारा इंटरनेट सेवा प्रदान की जाती है।

 

4G तकनीक

  • 4th  Generation वायरलेस ब्राडबैंड मोबाइल तकनीक उच्च गति से संचार प्रदान करने वाला तकनीकी मानक है। 
  • इसे 4G तकनीक भी कहते हैं। 
  • इसमें Frequency Division मल्टीप्लेक्सिंग तथा LTE (Long Term Evolution) तकनीक का प्रयोग किया जाता है। 
  • डाटा भेजने तथा प्राप्त करने के लिए यह इंटरनेट आधारित TCP/IP प्रोटोकॉल का प्रयोग करता है। 
  • बातचीत (Voice data) के लिए इसमें VoLTE (Voice over Long Term Evolution) तकनीक का प्रयोग किया जाता है।

 

वायरलेस एप्लिकेशन प्रोटोकाल (Wireless Application Protocol) : 

  • यह एक अंतर्राष्ट्रीय मानक है जिसका उपयोग मोबाइल फोन के द्वारा इंटरनेट से जुड़ने तथा इंटरनेट पर उपलब्ध सेवाओं के लिए किया जाता है। 
  • वायरलेस अप्लिकेशन प्रोटोकॉल सॉफ्टवेयर का प्रयोग GSM (Global System for Mobile Communication) तथा CDMA (Code Division Multiple Access)  मोबाइल फोन की इन दोनों तकनीकों में किया जाता है। 
  • इस प्रोटोकाल में मोबाइल फोन पर इंटरनेट डाटा प्राप्त करने के लिए वायरलेस मार्कअप लैग्वेज (Wireless Markup Language) का प्रयोग किया जाता है। 

 

लाई-फाई (Li-Fi-Light Fidelity) : 

  • यह उच्च गति से संचार प्रदान करने वाला बेतार (Wireless) संचार तकनीक मानक है जो डाटा भेजने और प्राप्त करने के लिए Visible Light Communication का उपयोग करता है। 
  • इसमें डाटा भेजने के लिए Light Emitting Diode (LED) तथा प्राप्त करने के लिए Photo Diode का प्रयोग किया जाता है। 

 

आरएस 232 (RS-232-Recomended Standard 232)

  • यह सीरियल बाइनरी डाटा तथा संकेतों को कम दूरी तक तार के द्वारा स्थानान्तरित करने के लिए बनाया गया मानक है। 
  • यह कम्प्यूटर के सीरियल पोर्ट से जोड़ा जाता है। 
  • यह पर्सनल कम्प्यूटर में मॉडेम, प्रिंटर, माउस आदि पेरीफेरल डिवाइसेस को जोड़ने का काम करता है। 

 

वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (Virtual Private Network) 

  • यह एक व्यक्तिगत नेटवर्क है जिसमें नेटवर्क के कुछ उपकरणों के बीच संचार इंटरनेट के माध्यम से स्थापित किया जाता है जबकि शेष उपकरण विशेषीकृत लाइनों द्वारा जुड़े होते हैं। 
  • इसमें सूचना की गोपनीयता बनाये रखने के लिए कोडिंग तकनीक (Encryption) का प्रयोग किया जाता है।

 

इंट्रानेट (Intranet)

  • इंट्रानेट वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क का एक उदाहरण है।
  • इंट्रानेट इंटरनेट का निजी (Private) रूप है।
  • इंट्रानेट निजी या संस्थागत उपयोग के लिए किसी ऑफिस या संस्था के भीतर स्थापित कम्प्यूटर नेटवर्क है जो सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए इंटरनेट प्रोटोकॉल (TCP/IP) तकनीक का उपयोग करता है।
  • केवल संस्था के सदस्य या कर्मचारी ही इंट्रानेट की सुविधाओं का उपयोग कर सकते हैं। 
  • गेटवे, फायरवाल या कोडिंग तकनीक का प्रयोग कर किसी अनधिकृत व्यक्ति को इंट्रानेट का उपयोग करने से वंचित रखा जाता है। 

 

एक्स्ट्रानेट (Extranet) : 

  • इंट्रानेट की तरह ही एक्स्ट्रानेट भी निजी या संस्थागत उपयोग के लिए स्थापित एक कम्प्यूटर नेटवर्क है जो इंटरनेट प्रोटोकॉल का उपयोग करता है। 
  • एक्स्ट्रानेट में संस्था के सदस्य व कर्मचारियों के अतिरिक्त अन्य उपयोगकर्ताओं को भी एक सीमा तक नेटवर्क व डाटा के उपयोग की अनुमति दी जाती है। 
  • एक्स्ट्रानेट का प्रयोग करने के लिए उपयोगकर्ता को एक विशेष Username तथा Password प्रदान किया जाता है।
  • किसी व्यवसायिक बैंक का निजी नेटवर्क एक्स्ट्रानेट का उदाहरण है। 
  • कोई भी उपभोक्ता Username तथा Password का उपयोग कर इंटरनेट के जरिए बैंक के नेटवर्क में घुस सकता है तथा अपनी व्यक्तिगत जानकारियां देख सकता है। 
    • लेकिन वह अपनी व्यक्तिगत जानकारी के अलावा और कोई सूचना प्राप्त (access) नहीं कर सकता।

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