Astronomy and Space Technology

  • Post author:
  • Post category:Blog
  • Reading time:34 mins read

खगोलिकी या खगोल विज्ञान (Astronomy ) : आकाशीय पिण्डों, उनकी बनावट, परिमाण और गति का अध्ययन करनेवाला विज्ञान खगोलिकी या खगोल विज्ञान कहलाता है । 

विश्व या ब्रह्मांड (Universe or Cosmos) :

  • पृथ्वी, अंतरिक्ष तथा उसमें उपस्थित सभी खगोलीय पिण्डों (आकाशगंगा या मंदाकिनी, तारें आदि) को समग्र रूप से विश्व या ब्रह्मांड कहते हैं ।
  • ब्रह्मांड से संबंधित अध्ययन को ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) कहते हैं ।
  • विश्व की रचना खरबों आकाशगंगाओं या मंदाकिनियों (Galaxies) से हुई है।
  • प्रत्येक आकाशगंगा में खरबों तारें (Stars ) हैं ।
  • तारों का अपना-अपना परिवार हो सकता है, जैसे सौर परिवार में पृथ्वी सहित 8 ग्रह हैं ।

प्रसिद्ध खगोलवेत्ता और उनका योगदान (Famous Astronomists & Their Contributions)

टॉलेमी का भूकेंद्री सिद्धांत (Ptolemy’s Geocentric Theory ) :

  • 140 ई० में यूनानी खगोलविद् टॉलेमी ने भूकेंद्री सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
  • भूकेंद्री सिद्धांतपृथ्वी विश्व के केन्द्र में स्थित है तथा सूर्य और अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं । 

कोपरनिकस का सूर्यकेंद्री सिद्धांत (Copernicus’s Heliocentric Theory):

  • वर्ष 1543 ई० में पोलैण्ड के खगोलविद् कोपरनिकस ने सूर्यकेन्द्री सिद्धांत का प्रतिपादन किया ।
  • सूर्यकेन्द्री सिद्धांत :  विश्व के केन्द्र में सूर्य है न कि पृथ्वी तथा पृथ्वी सहित सभी अन्य ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं
  • ‘आधुनिक खगोलिकी का जनक’ (The Father of Modern Astronomy) : कोपरनिकस   

केप्लर का ग्रहीय गति के नियम (Kepler’s laws of Planetary Motion ) :

  • जोहानस केप्लर ने स्पष्ट किया कि सूर्य के चारों ओर चक्कर लगानेवाले ग्रहों का पथ दीर्घवृतीय या अण्डाकार (elliptical ) है । 

गैलीलियो (Galileo, 1564-1642 ) :

  • इतालवी खगोलवेत्ता गैलीलियो ने 1609 ई० में गैलीलियो ने अपवर्तक दूरबीन (Refractor Telescope) का आविष्कार किया।
  • गैलीलियो ने बृहस्पति ग्रह के चार उपग्रहों तथा सूर्य कलंक या सूर्य धब्बे (Sun Spots) का पता लगाया।
  • गैलीलियो ने  बताया कि सूर्य का निकटवर्ती तारा प्रॉक्सिमा सेंटॉरी (Proxima Centauri) है । 

न्यूटन (Newton, 1642-1727) :

  • ब्रिटिश भौतिकीवेत्ता आइजक न्यूटन ने वर्ष 1668 ई० में परावर्तक दूरबीन (Reflector Telescope) का आविष्कार किया । 

हर्शेल (Herschel ) :

  • वर्ष 1805 ई० में ब्रिटेन के खगोलवेत्ता हर्शेल ने दूरबीनों की सहायता से अंतरिक्ष का अध्ययन किया
  • विश्व केवल सौर मंडल तक सीमित नहीं है बल्कि यह सौर मंडल स्वयं आकाशगंगा नामक तारा निकाय का अंश मात्र है ।

हब्बल का आकाशगंगाओं के प्रतिसरण का नियम ( Hubble’s law of Recession of Galaxies):

  • अमेरिकी खगोलवेत्ता एडविन पी० हब्बल  ने वर्ष 1925 ई० में बताया कि विश्व में हमारी आकाशगंगा दुग्धमेखला (Milky way ) की तरह लाखों अन्य आकाशगंगाएँ हैं ।
  • 1929 में हब्बल ने साबित किया कि आकाशगंगाएँ अंतरिक्ष में स्थिर नहीं हैं, बल्कि वे एक-दूसरे से दूर होती जा रही हैं
    • जैसे-जैसे उनकी दूरी बढ़ती जाती है उनके भागने की गति भी तीव्र होती जाती है ।
    • इसे आकाशगंगाओं के प्रतिसरण का नियम (The law of Recession of Galaxies) कहते हैं ।
  • हब्बल के मत से खगोलवेत्ता आइजक एसीमोव सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि हब्बल के निरुपण के अनुसार यदि दूरी के साथ प्रतिसरण की गति बढ़ती जाएगी तो 125 करोड़ प्रकाश वर्ष की दूरी पर आकाशगंगाएँ इस तेजी से प्रतिसरण करेंगी कि उन्हें देख पाना हमारे लिए संभव नहीं होगा ।

डॉप्लर विस्थापन (Doppler Shifts) :

  • आकाशगंगाएँ दूर भाग रही है और विश्व का लगातार विस्तार हो रहा है । यह डॉप्लर प्रभाव (Doppler Effect ) द्वारा ज्ञात किया गया है।
  • आकाशगंगाओं से आनेवाले प्रकाश के स्पेक्ट्रम में रक्त विस्थापन (Red shift ) की घटना ( अर्थात् प्रकाश की तरंगदैर्घ्य लाल रंग के प्रकाश की ओर विस्थापित हो जाती है ) प्रत्यक्ष देखी गई है ।
  • स्पेक्ट्रम में रक्त विस्थापन बतलाता है कि प्रेक्षित आकाशगंगा ( observed galaxy) पृथ्वी से दूर भाग रही है ।
  • यदि स्पेक्ट्रम में बैंगनी विस्थापन ( Violet shift) हो तो प्रेक्षित आकाशगंगा पृथ्वी के पास आ रही है
  • ये विस्थापन डाप्लर विस्थापन कहलाते हैं । 

जार्ज लेमेत्रे का विश्व उत्पति का ‘महा विस्फोट सिद्धांत’ (Georges Lemiatre’s ‘Big Bang Theory’ of Origin of Universe) :

  • 1927  में बेल्जियम के  जार्ज लेमेतुरे (Abbe Georges Lemaitre) ने विश्व उत्पति का महा विस्फोट सिद्धांत (Big (Great ) Bang (→explosion) Theory] प्रतिपादित किया ।
  • इस सिद्धांत के अनुसार करोड़ों वर्ष पूर्व अंतरिक्ष में एक अत्यंत भयंकर विस्फोट हुआ जिसमें से प्रारंभिक पदार्थ  मुख्यतः Photon तथा Leptoquark Gluonइधर-उधर छिटक गया और उसी से आकाशगंगाएँ बनी जो अभी तक भाग रही हैं ।
  • विश्व की उत्पति का यह सिद्धांत सबसे अधिक मान्य है । –

एलन संडेज का स्पंदमान या दोलायमान विश्व सिद्धांत (Pulsating or Oscillating Universe Theory) :

  • इस सिद्धांत के अनुसार, यह विश्व करोड़ों वर्षों के अंतराल में क्रमशः फैलता और सिकुड़ता रहा है
  • आज से लगभग 120 करोड़ वर्ष पूर्व एक भयंकर विस्फोट हुआ था और तब से विश्व विस्तृत होता जा रहा है । यह प्रसार 290 करोड़ वर्ष तक चलता रहेगा
  • जिसके बाद गुरुत्वाकर्षण इनके अधिक विस्तार पर रोक लगा देगा । उसके पश्चात् इसका सिकुड़न प्रारंभ हो जाएगा अर्थात् यह अपने अंदर ही सिमट जाएगा। इस प्रक्रिया को अंतः विस्फोट ( Implosion) कहते हैं ।
  • यह प्रक्रिया करीब 410 करोड़ वर्ष तक चलती रहेगी । जब यह अत्यधिक संपीडित या घनीभूत हो जाएगा तब एक बार फिर विस्फोट होगा । 

खगोलीय या आकाशीय पिण्ड (Celestial Bodies) : आंकाश में दिखायी देनेवाले पिण्डों जैसे आकाशगंगा, तारा, ग्रह, उपग्रह, धूमकेतु आदि को खगोलीय पिण्ड कहते हैं। 

आकाशगंगा या मंदाकिनी (Galaxy) :

  • आकाशगंगा या मंदाकिनी (Galaxy ) :  तारों के समूह हैं जो गुरुत्वाकर्षण के कारण एक-दूसरे से बंधे हुए हैं ।
  • इनकी विशालता के कारण इन्हें प्रायद्वीपीय ब्रह्मांड कहा जाता है ।
  • प्रत्येक आकाशगंगा में तारों के अतिरिक्त गैसें तथा धुल भी होती हैं ।
  • आकाशगंगा का 98% भाग तारों से तथा शेष 2% गैसों या धूल से बना है ।
  • संरचना के आधार पर आकाशगंगा तीन प्रकार के होते हैं—
    • सर्पिल ( Spiral) – 80%
      • हमारी आकाशगंगादुग्धमेखला (Milkyway)—एक सर्पिल संरचनावाली आकाशगंगा है ।
      • यह दुग्धमेखला चौबीस आकाशगंगाओं के एक समूह का सदस्य है जो स्थानीय समूह (Local group) कहलाता है । 
      • दुग्धमेखला के बाद सबसे निकटतम आकाशगंगा एण्ड्रोमेडा है ।
    • दीर्घवृतीय (Elliptical) – 17%
    • अनियमित ( Irregular)- 3%

तारामंडल (Constellation ) :

  • तारों के समूह ही तारामंडल कहते हैं ।
  • प्रमुख तारामंडल हैं –
    • सप्तर्षि या सप्तऋषि (Ursa Major – Great Bear)
    • ध्रुव मत्स्य (Ursa Minor – Little Bear)
    • ओरिऑन (Orion-Great Hunter )
    • ड्रैको (Draco-Dragon)
    • सिग्नस (Cygnus – Swan )
    • हरकुलीज (Hercules)
    • हाइड्रा (Hydra )
    • सेन्टॉरस (Centaurus)
  • अभी तक 89 तारामंडलों की पहचान की गई है।
  • इनमें सबसे बड़ा तारामंडल सेन्टॉरस (Centaurus) है जिनमें 94 तारे हैं । 

तारे या नक्षत्र (Stars ) :

  • तारे  जिनके पास अपना प्रकाश ( या चमक) होता है, जैसे सूर्य एक तारा है ।
  • भार के अनुपात में तारों में 70% हाइड्रोजन, 28% हीलियम, 1-5 कार्बन, नाइट्रोजन व निऑन तथा 0-5 लौह व अन्य भारी तत्व होते हैं । 
  • तारे पैदा होते हैं, ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं व विकास करते हैं एवं अंत में स्वतः मर जाते हैं । 

तारे का जन्म तथा विकास (Birth & Evolution of Star) :

  • किसी तारे का जीवनचक्र हाइड्रोजन तथा हीलियम गैसों के संघनन से प्रारंभ होता है, जो अंततः छोटे-छोटे घने बादलों के रूप धारण कर लेते हैं ।
  • ये बादल स्वयं के गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ता चला जाता है और एक प्रक्रिया शुरु हो जाती है जो गैसों के इस विशाल बादल को तारों में परिवर्तित कर देती है । यह सिकुड़ता हुआ घना गैस पिण्ड आदि तारा या आद्य तारा (Proto Star) कहलाता है ।
  • हाइड्रोजन के नाभिक नाभिकीय संलयन ( nuclear fusion) अभिक्रिया द्वारा संलयित होकर हीलियम के नाभिक बनाने लगते हैं।

तारे के जीवन का अंतिम चरण (Final Stage of Star’s Life) :

  • जब तारे में हाइड्रोजन कम हो जाती है तो इसका बाहरी सतह फूलने लगता है और वह लाल हो जाता है
  • यह तारे के अंतिम समय की पहली निशानी है । ऐसे तारे को लाल दानव (Red Giant ) कहते हैं । 
  • लाल दानव तारा का भविष्य उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है ।
  • लाल दानव चरण के बाद तारे में दो स्थितियों में से कोई एक स्थिति आती है
    • वह श्वेत वामन तारे (White Dwarf Stars ) में बदलता है – प्रारंभिक द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के बराबर हो तो
    • न्यूट्रॉन तारे (Neutron Stars) में में बदलता है – तारे का प्रारंभिक द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से बहुत अधिक हो तो

(i) जब तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के बराबर हो :

  • इस स्थिति में तारे का बाह्य कवच ( shell) प्रसारित होकर अन्ततः लुप्त हो जाता है और केवल तारे का क्रोड ( core – तारे का केन्द्रीय भाग) बचा रहता है
  • तारे का आंतरिक ताप बढ़ने के फलस्वरूप हीलियम के नाभिक संलयित होने लगते हैं । हीलियम में संलयन के परिणामस्वरूप विमोचित ऊर्जा के कारण यह क्रोड़ किसी श्वेत वामन तारे (White Dwarf Stars) के समान चमकने लगता है ।
  • अन्तत ,यह कृष्ण वामन तारा (Black Dwarf Star) बन जाता है  । 

(ii) जब तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से बहुत अधिक हो :

  • इस स्थिति में तारे का बाह्य कवच (shell) ध्वंस हो जाता है ।
  • इसके कारण आकाश बहुत दिनों तक जगमगा उठता है ।
  • ऐसे विस्फोटक तारे को नव तारा (Nova) या अधिनव तारा (Supernova) कहते हैं ।
  • अधिनव तारा विस्फोट से उत्पन्न  गैसें नये तारों के निर्माण हेतु कच्चे-पदार्थ (raw materials) प्रदान करते हैं ।
  • न्यूट्रॉन तारा (Neutron Star) : अधिनव तारा विस्फोट के पश्चात् केवल तारे का केन्द्रीय भाग क्रोड (core) बच्चा रहता है जो निरंतर सिकुड़ता चला जाता है । अत्यधिक संघनित पदार्थ का यह पिंड न्यूट्रॉन तारा (Neutron Star) कहलाता है क्योंकि ये न्यूट्रॉनों से बने होते हैं ।
    • न्यूट्रॉन तारे का भविष्य भी उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है ।
    • भारी न्यूट्रॉन तारे में अत्यधिक मात्रा में द्रव्यमान अंततः एक ही बिन्दु पर संकुचित (pack) हो जाता है ।
    • ऐसे अत्यधिक घनत्व के पदार्थ युक्त पिण्ड को कृष्ण छिद्र (Black Hole) कहते हैं ।
    • कृष्ण छिद्र का गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र (gravitational field) इतना प्रबल होता है कि इससे किसी भी पदार्थ का यहाँ तक कि प्रकाश का भी पलायन नहीं हो सकता
    • इसीलिए कृष्ण छिद्र दिखायी नहीं देते हैं
    • कृष्ण छिद्र न तो कोई विकिरण उत्सर्जित करता है और न ही किसी विकिरण को परावर्तित करता है बल्कि यह सभी विकिरणों को अवशोषित कर लेता है ।

तारों का वर्गीकरण (Classification of Stars ) :

  • चमक के आधार पर –  3 वर्ग में विभाजित 
    • (a) तीव्र चमकीले तारे
    • (b) मध्यम चमकीले तारे (उदाहरण – सूर्य )
    • (c) कम चमकीले तारे
  • तारों का जीवनकाल उनके द्रव्यमान (mass) तथा चमक (brightness) पर निर्भर करता है ।
  • जो तारा जितना अधिक चमकीला होता है उसका जीवनकाल उतना ही कम होता है ।
  • वर्णक्रम के आधार पर –  7 वर्ग में विभाजित (O, B, A, F, G, K तथा M)
  • सूर्य एक G प्रकार का तारा है जिसके तीव्रतम प्रकाश की तरंगदैर्घ्य 550 नैनोमीटर है।

 

  • ध्रुव तारा (Pole Star ) : जो तारा हमेशा उत्तर दिशा में उत्तरी ध्रुव (North Pole) के ठीक ऊपर चमकता रहता है ।  यह ध्रुव मत्स्य (Ursa Minor-Little Bear) तारा समूह का एक सदस्य है । 
  • पृथ्वी से सबसे निकटतम तारासूर्य  
  • सूर्य के बाद सबसे निकटतम ताराप्रोक्सिमा सेन्टॉरी 
  • सूर्य, प्रोक्सिमा सेन्टॉरी के बाद सबसे निकटतम तारा – अल्फा सेन्टॉरी
  • सबसे चमकीला तारा – साइरस
  •  तारों की दूरियाँ प्रकाश वर्ष (Light Year) में मापी जाती हैं। (1 1y = 9.46 ×1015 Metre) 

सौर मंडल (Solar System)सूर्य के चारों ओर चक्कर लगानेवाले विभिन्न ग्रहों, क्षुद्रग्रहों, धूमकेतुओं, उल्काओं तथा अन्य आकाशीय पिण्डों के समूह या परिवार को सौर मंडल कहते हैं । 

  • सौर मंडल में सूर्य का द्रव्यमान 99.97% है ।  
  • ग्रहों के पास अपना प्रकाश नहीं होता है। ये सूर्य की किरणों को परावर्तित कर प्रकाशित होते हैं ।
  • जिन पिण्डों के पास अपना वातावरण (वायुमंडल) नहीं होता, उनसे प्रकाश का परावर्तन कम होता है और वे कम चमकते हैं । 
  • सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घवृतीय ( elliptical) पथ पर परिक्रमण करते हैं।
    • पूर्व से पश्चिम दिशा में परिक्रमण (दक्षिणावर्त्त (clockwise) दिशा में) : शुक्र  व अरुण 
    • पश्चिम से पूर्व दिशा में परिक्रमण ( वामावर्त्त (anticlockwise) दिशा में) : अन्य सभी ग्रह
  • यदि सूर्य न रहे तो ये सभी ग्रह अपने कक्ष ( orbit) के स्पर्शरेखीय (tangential) दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल के अभाव में तेजी से गायब हो जाएंगे।
  • पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव (North Pole) पूरे सौर मंडल के उत्तर दिशा को निर्धारित करता है ।
  • प्रायः सभी ग्रह अपने अक्ष (axis) से थोड़ा झुककर घुमते हुए सूर्य की परिक्रमा करते हैं । 
  • आन्तरिक ग्रह या पार्थिव ग्रह ( Inner Planets or Terrestial Planets) : बुध, शुक्र, पृथ्वी व मंगल
    •  सभी आंतरिक ग्रह चट्टानों व धातुओं से बने हैं ।  
  • वाह्य ग्रह या बृहस्पतीय ग्रह ( Outer Planets or Jovean Planets ) :  बृहस्पति, शनि, अरुण व वरुण
    •  ये प्रायः बहुत हाइड्रोजन, हीलियम, अमोनिया व मिथेन गैस से बने हैं।  

सूर्य (Sun) :

  • हमारी आकाशगंगा – दुग्धमेखला के केन्द्र से सूर्य की अनुमानित दूरी 32,000 प्रकाश वर्ष है।
  • यह 250 किमी०/सेकण्ड की गति से आकाशगंगा — दुग्धमेखला के केन्द्र के चारों ओर परिक्रमा करता ।
  • इसका परिक्रमण काल 25 करोड़ वर्ष है। इस अवधि को ब्रह्मांड वर्ष (Cosmos Year) कहते हैं । 
  • सूर्य की संरचना (Structure of Sun ) : 
    • क्रोड (1 करोड़ 50 लाख C) – सबसे आंतरिक स्तर
    • संवाहक घेरा 
    • प्रकाश मंडल (6000°C) 
    • सौर वायुमंडल (The Solar Atmosphere) :
      • वर्ण मंडल ( 32400°C) 
      • किरीट या कोरोना (27 लाख °C) 
    • सूर्य कलंक या धब्बे 
  • क्रोड (Core) : सूर्य का सबसे आंतरिक स्तर क्रोड कहलाता है ।
    • क्रोड में नाभिकीय अभिक्रिया (nuclear reaction) के कारण हाइड्रोजन परमाणु के नाभिक मिलकर हीलियम परमाणु के नाभिक का निर्माण करते हैं जिससे बड़ी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है ।
  • संवाहक घेरा (Convective Layer) : क्रोड के ठीक ऊपर का स्तर संवाहक घेरा कहलाता है । इस स्तर द्वारा क्रोड में बने ऊर्जा का संवहन (convection) होता है । 
  • प्रकाश मंडल (Photosphere) : सूर्य का ऊपरी सतह जो दिखाई देता है प्रकाश मंडल कहलाता है। इसी सतह से किरणों का विकिरण होता है ।
    • इसी से सूर्य का व्यास ( diameter) निर्धारित होता है । 
  • वर्णमंडल (Chromosphere) : प्रकाशमंडल के ऊपर का स्तर रक्तिम वर्णमंडल होता है ।
    • यह स्तर मुख्य रूप से हाइड्रोजन गैस से बना होता है ।
    • यह पूर्ण सूर्यग्रहण के समय  दिखायी देता है। 
  • किरीट या कोरोना (Corona ) : वर्णमंडल स्तर के पीछे सूर्य का प्रभामंडल युक्त किरीट या कोरोना होता है ।
    • अंतरिक्ष में बहुत दूर तक फैला किरीट या कोरोना X – किरण विकीर्ण करने की क्षमता रखता है ।
    • यह स्तर भी सूर्यग्रहण के समय ही देखा जा सकता है।  
  • सूर्य कलंक या सूर्य धब्बे (Sun Spots) : सूर्य की सतह पर कुछ काले धब्बे दिखलाई देते हैं ।
    • ये वास्तव में धब्बे नहीं हैं बल्कि सूर्य के चारों ओर चलते हुए गैसों के खोल हैं,
    • जिनका तापमान आसपास के तापमान से 1500°C कम होता है, जिसके कारण ये धब्बेदार लगते हैं।
    • ये धब्बे एक या दो दिनों से लेकर दो-तीन महीनों तक दिखलाई देते हैं ।
    • जब सूर्य में धब्बा दिखलाई देता है, उस समय पृथ्वी पर चुम्बकीय झंझावात (magnetic stroms) उत्पन्न होते हैं।
    • इससे तार, रेडियो, टी०वी० आदि बिजली से चलनेवाली मशीनों में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है।
    • चुम्बक सूई की दिशा बदल जाती है तथा नाविकों को दिशाभ्रम हो जाता है।
    • सूर्य धब्बों का एक पूरा चक्र 22 वर्षों का होता है, जिसे सूर्य धब्बा चक्र (Sun Spots Cycle) कहते हैं ।
    • पहले 11 वर्षों तक यह धब्बा बढ़ता है । इसके बाद 11 वर्षों तक यह धब्बा घटता है ।
    • इस चक्र के कारण सूर्य के चुम्बकीय प्रदेश बदलते रहते हैं । 
  • परिक्रमण काल – 25 करोड़ वर्ष ( 250 किमी० / सेकण्ड की औसत चाल से लगभग एक वृतीय पथ में)
  • घूर्णन काल – 25 दिन – सूर्य का मध्य भाग; 35 दिन – सूर्य का ध्रुवीय भाग
  • व्यास – 13 लाख 92 हजार किमी० ( लगभग 14 लाख किमी०) (पृथ्वी के व्यास का 110 गुना )
  • आपेक्षिक द्रव्यमान – 3,32,776 (पृथ्वी के द्रव्यमान का लगभग 3 लाख गुना )
  • घनत्व – 1.41 ग्राम / सेमी3 
  • क्रोड तापमान – 1,50,00,000°C
  • रासायनिक बनावट – हाइड्रोजन (71%), हीलियम ( 26.5%), अन्य तत्व (2.5%)
  • जीवन काल – लगभग 10 अरब वर्ष ( 1010 वर्ष)

International Astronomical Union – IAU

  • स्थापना वर्ष — 1919 
  • प्राग सम्मेलन (2006 ई० में सौर मंडल में मौजूद पिण्डों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है ।  
  • ग्रहबुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण व वरुण
  • बौने ग्रह या प्लूटोन्सप्लूटो, चेरॉन, सेरेस व जेना (2003 यू०बी० 313)
  • लघु सौर मंडल पिण्डक्षुद्रग्रह, धूमकेतु या पुच्छल तारा, उल्का, उपग्रह व अन्य छोटे. खगोलीय पिण्ड

ग्रह ( Planets):

  • सूर्य की परिक्रमा करते हों
  • उनका द्रव्यमान कम-से-कम इतना हो कि अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण उसका आकार लगभग गोल हो गया हो
  • वह अपने पड़ोसी पिण्डों की कक्षा को नहीं लांघता हो । 
  • परम्परागत ग्रहों में छः ग्रह-  बुध , शुक्र , पृथ्वी , मंगल , बृहस्पति  व शनि
  • दो अन्य ग्रहों अरुण (Uranus) व वरुण (Neptune) की खोज दूरबीन ( Telescope) के आविष्कार के पश्चात् हुई ।
  • अरुण की खोज  – 1781  में,  विलियम हर्शल (William Herschel) ने की
  • वरुण की खोज –  1846 में जॉन गेले (John Galle) ने की ।

प्राग सम्मेलन : 

  • 15-24 अगस्त, 2006 को चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में एक सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसे प्राग सम्मेलन (Prague Summit) कहा गया ।
  • सम्मेलन में प्लूटो को खगोलविदों ने ग्रहों की बिरादरी से बेदखल कर दिया जिससे ग्रहों की संख्या 9 से घटकर 8 रह गई ।
  • प्लूटो को तीन अन्य खगोलीय पिण्डों चेरॉन (Cheron), सेरेस (Ceres) तथा जेना 2003 यू बी 313 (Xena – 2003 UB 313) के साथ बौने ग्रह ( Dwarf Planets) की श्रेणी में रखा गया है ।  

ग्रहों का क्रम (Order of Planets ) : 

  1. सूर्य से दूरी के अनुसार : बुध (Mercury), शुक्र (Venus), पृथ्वी (Earth), मंगल (Mars), बृहस्पति (Jupiter), शनि (Saturn), अरुण ( Uranus) व वरुण (Neptune ) 
  2. पृथ्वी से दूरी के अनुसार : शुक्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि, अरुण व वरुण 
  3. आकार के अनुसार : बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण, पृथ्वी, शुक्र, मंगल व बुध 

बुध (Mercury) :

  • यह सूर्य का निकटतम ग्रह है।
  • इसकी सूर्य से औसत दूरी 5 करोड़ 80 लाख किमी० है ।
  • यह सौर मंडल का सबसे छोटा ग्रह भी है
  • इसका व्यास लगभग 4,900 किमी० है ।
  • यह 88 दिन में सूर्य की परिक्रमा कर लेता है।
  • यह अपने दीर्घवृतीय कक्ष में 1,76,000 किमी० प्रति घंटे की गति से घूमता है ।
  • इसे अपनी धुरी पर एक चक्कर लगाने में 59 दिन लगता है ।
  • इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 0.056 गुना है।
  • इसका घनत्व 5.6 ग्राम प्रति घन सेमी ० है ।
  • इसका गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी का 3 /8  वाँ भाग है ।
  • बुध ग्रह पर वायुमंडल नहीं है ।
  • यहाँ दिन अतिशय गर्म और रातें बर्फीली होती हैं।
  • बुध का एक पूरा दिन पृथ्वी के 176 दिनों के बराबर अवधि का होता है
  • यहाँ पर एक कैलोरिस बेसिन (Caloris Basin) है ।
  • बुध ग्रह का कोई उपग्रह नहीं है ।

शुक्र (Venus) :

  • बुध के बाद यह सूर्य का निकटतम ग्रह है।
  • इसकी सूर्य से औसत दूरी 10 करोड़ 82 लाख किमी० है ।
  • यह आकार और भार में पृथ्वी के लगभग बराबर है।
    • इसलिए इसे पृथ्वी की बहिन (Earth’s Sister) तथा पृथ्वी का जुड़वाँ (Earth’s Twin ) भी कहा जाता है।
    • प्रातः पूर्वी आकाश में एवं सायं पश्चिमी आकाश में दिखायी पड़ने के कारण इसे क्रमशः भोर का तारा (Morning Star) तथा सांझ का तारा (Evening Star) भी कहते हैं । 
  • इसे अपनी धुरी पर एक चक्कर लगाने में 243 दिन लगता है।
  • यह अरुण ( Uranus) की भाँति पृथ्वी की विपरीत दिशा में अर्थात् पूर्व से पश्चिम दिशा में घूर्णन करता है ।
  • इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 0.815 गुना है।
  • इसका घनत्व 5.2 ग्राम प्रति घन सेमी ० है ।
  • शुक्र ग्रह गर्म और तपता हुआ ग्रह है ।
  • यह सूर्य और चन्द्रमा को छोड़कर सबसे चमकीला दिखायी देता है ।
  • इसके चारों ओर सल्फ्यूरिक एसिड के जमे हुए बादल हैं ।
  • शुक्र ग्रह का वायुमंडल लगभग 97% कार्बन डाईऑक्साइड से भरा हुआ है ।
  • शुक्र का वायुमंडलीय दाब पृथ्वी के वायुमंडलीय दाब से 90 गुना ज्यादा है | 
  • बुध ग्रह की भाँति शुक्र ग्रह का भी कोई उपग्रह नहीं है । 

पृथ्वी (Earth):

  • पृथ्वी शुक्र और मंगल के मध्य स्थित ग्रह है ।
  • यह सूर्य से दूरी के अनुसार तीसरा ग्रह है।
  • पृथ्वी की सूर्य से औसत दूरी 14 करोड़ 95 लाख 98 हजार 5 सौ किमी० [ = 1 Astronomical Unit —A.U.)] है ।
  • सूर्य से इसकी निकटतम दूरी (Perihelion) 14-73 करोड़ किमी० तथा अधिकतम दूरी (Aphelion) 15.2 करोड़ किमी० है ।
  • सूर्य से पृथ्वी तक प्रकाश पहुँचने में 8 मिनट 18 सेकण्ड (498 सेकण्ड) लगता है।
  • आकार के अनुसार यह पांचवाँ सबसे बड़ा तथा चौथा सबसे छोटा ग्रह है
  • इसका औसत व्यास लगभग 12,740 किमी० है ।
    •  विषुवत्रेखीय व्यास – 12,756 किमी०
    • ध्रुवीय व्यास  – 12, 714 किमी०
  • पृथ्वी की आकृति – गोलाकार है किन्तु यह ध्रुव पर कुछ चिपटा तथा विषुवत रेखा पर कुछ फुला हुआ है। पृथ्वी की इस लगभग गोलाकार आकृति को लध्वक्ष गोलाभ (Oblate Spheriod / Ellipsoid / Geoid) कहा जाता है ।
  • परिक्रमण (Revolution) या वार्षिक गति : यह सूर्य की परिक्रमा 1,07,160 किमी० प्रति घंटे की गति से 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 45-51 सेकण्ड (या 365.25636 दिन या 365 1⁄4 दिन में पूरी करती है ।
    • पृथ्वी अपने कक्ष (Orbit) पर  दीर्घवृतीय या अण्डाकार मार्ग (elliptical path) पर चक्कर काटती है।
    • पृथ्वी अपने कक्ष पर 66 1⁄2° झुकी हुई है।
    • परिक्रमण के कारण पृथ्वी पर ऋतु परिवर्तन होता है ।
    • यदि पृथ्वी अपने कक्ष पर परिक्रमण बंद कर दे तो पृथ्वी के आधा भाग पर सदैव एक ऋतु तथा शेष आधा भाग पर सदैव दूसरा ऋतु रहेगा ।
  • घूर्णन (Rotation) या दैनिक गति:
    • पृथ्वी अपने अक्ष या धुरी (axis) पर पश्चिम से पूर्व की ओर 1,610 किमी० प्रति घंटे की गति से 23 घंटे 56 मिनट 4.091 सेकण्ड में एक पूरा चक्कर काटती है।
    • पृथ्वी अपने अक्ष पर 23°26’59” (लगभग 23  1⁄2° ) अक्षांश झुकी हुई है।
    • घूर्णन के कारण पृथ्वी पर दिन-रात होते हैं।
    • यदि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन बंद कर दे तो पृथ्वी का आधा भाग सदैव प्रकाश में रहेगा तथा शेष आधा भाग सदैव अंधकार में ।
  • द्रव्यमान (Mass) व घनत्व (Density): पृथ्वी का द्रव्यमान 5.976 x 1024 किग्रा० है ।
  • पृथ्वी का घनत्व 5.52 ग्राम प्रति घन सेमी० है।
  • संरचना (Structure): पृथ्वी की आंतरिक संरचना सियाल (Sial), सीमा (Sima) और निफे (Nife) से हुई है।
  • पृथ्वी को नीला ग्रह (Blue Planet) भी कहा जाता है क्योंकि अंतरिक्ष से यह नीला दिखाई देता है। नीला दीखने का कारण जल है । 
  • वायुमंडल (Atmosphere): पृथ्वी के ऊपर वायुमंडल का आवरण है ।
    • वायुमंडल का 78.03% नाइट्रोजन से तथा 20.99% ऑक्सीजन से निर्मित है।
    • स्पष्ट है कि वायुमंडल का 99.02% भाग सिर्फ नाइट्रोजन व ऑक्सीजन से ही बना है।
    • वायुमंडल पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण पृथ्वी से बंधा हुआ है । 
  • उपग्रह (Satellite) : पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह चन्द्रमा (Moon) है । 

(iv) मंगल (Mars) :

  • यह सूर्य से दूरी के अनुसार चौथा ग्रह है ।
  • सूर्य से इसकी दूरी 22 करोड़ 80 लाख किमी० है ।
  • यह सौरमंडल का दूसरा छोटा ग्रह है
  • इसका व्यास 6,800 किमी० है । पृथ्वी का दूसरा पड़ोसी ग्रह है ।
  • सूर्य की परिक्रमा 686 दिन में पूरी करता है ।
  • चूँकि मंगल अपने कक्ष पर झुकी हुई है, अतः यहाँ ऋतुएँ भी होती हैं। यहाँ 6 महीने गर्मी और 6 महीने जाड़े का मौसम होता है ।
  • इसे अपने अक्ष या धुरी पर एक चक्कर लगाने में 24.7 घण्टा लगता है ।
  • इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 0.107 गुना है ।
  • इसका घनत्व 3.95 ग्राम प्रति घन सेमी० है ।
  • इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी के मात्र एक तिहाई के बराबर है ।
  • मंगल की भूमि बंजर है । इसका रंग इसके मिट्टी में लौह ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण लाल है । अतः इसे लाल ग्रह (Red Planet) भी कहते हैं ।
  • मंगल का सबसे ऊँचा पर्वत निक्स ओलम्पिया (Nix Olympia) है जो एवरेस्ट से तीन गुना ऊँचा है ।
  • मंगल पर सबसे बड़ा ज्वालामुखी आलम्पस मोन्स है ।
  • यहाँ पर चैनल भी पाया जाता है। इनमें से एक चैनल वैलेस मैरिनरिस (Valles Marineris) है ।
  • मंगल के चारों ओर एक पतला वायुमंडल पाया जाता है । वायुमंडलीय दाब बहुत कम है। वायुमंडल का 95% भाग कार्बन डाईऑक्साइड से बना है ।
  • मंगल ग्रह पर भेजे गए अन्य अंतरिक्ष अभियान : 1976 में वायकिंग यान , पाथ फाइंडर, मार्स ओडिसी, बीगल – 2 (2003), स्पिरिट व अपॉर्म्युनिटी (2004)।
  • फोबोस (Phobos) व डीमोस (Deimos) मंगल ग्रह के दो उपग्रह हैं।
  • डीमोस सौर मंडल का सबसे छोटा उपग्रह है

बृहस्पति (Jupiter) :

  • यह सूर्य से दूरी के अनुसार पांचवां ग्रह है।
  • सूर्य से इस ग्रह की दूरी 77 करोड़ 80 लाख किमी० है ।
  • यह सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह है ।
  • इसका व्यास 1 लाख 43 हजार किमी० है ।
  • यह सूर्य की परिक्रमा करने में 119 वर्ष लगाता है ।
  • इसे अपने अक्ष या धुरी पर एक चक्कर लगाने में 9-8 घंटा लगता है ।
  • यह सौर मंडल का सबसे भारी ग्रह है । इसका द्रव्यमान सौर मंडल के सभी ग्रहों का 71% है ।
  • इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 318 गुना है ।
  • इसका घनत्व 1.31 ग्राम प्रतिघन सेमी० है । इ
  • सका गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के 5 गुना अधिक है।
  • यह गैस व द्रव का बना गोला है जिसमें कोई ठोस धरातल नहीं है ।
  • यह हल्के पदार्थों से बना है जिसमें हाइड्रोजन अमोनिया, मिथेन और हीलियम की प्रधानता है ।
  • पायनियर (Pioneer) अंतरिक्ष अभियान द्वारा प्राप्त चित्रों के अनुसार बृहस्पति के विशालकाय लाल धब्बे (Great Red Sports) की जानकारी मिली है ।
  • वोयेजर 1 (Voyager – 1 ) के द्वारा बाद में पता लगा कि ये लाल धब्बे अशांत बादलों के घेरे में विशाल चक्र वात हैं । यहाँ पर धूल भरे वलय और ज्वालामुखी भी हैं । 
  • बृहस्पति के चारों ओर वायुमंडल का हजारों किलोमीटर मोटा आवरण पाया जाता है। इसका वायुमंडल अधिकांशतः हाइड्रोजन एवं हीलियम से बना है ।  
  • बृहस्पति के 67 उपग्रह हैं जिनमें गैनिमीड (Ganymede) सबसे बड़ा है।
    • यह सौर मंडल का भी सबसे बड़ा उपग्रह है।
  • अन्य उपग्रहों में आयो, यूरोपा, कैलिस्टो, आलमथिआ आदि प्रमुख हैं।

 

 शनि (Saturn) :

  • यह सूर्य से दूरी के अनुसार छठा ग्रह है।
  • सूर्य से इस ग्रह की दूरी 142 करोड़ 70 लाख किमी० है ।
  • यह आकार में बृहस्पति के बाद सौर मंडल का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है।
  • इसका व्यास 1 लाख 20 हजार किमी० है ।
  • यह सूर्य की परिक्रमा करने में 29.5 वर्ष लगाता है।
  • यह अपनी धुरी पर 10-2 घंटा में एक चक्कर लगाता है।
  • इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 95 गुना अधिक है।
  • शनि ग्रह का घनत्व सौर मंडल के ग्रहों में सबसे कम है ।
    • इसका घनत्व मात्र 0.70 ग्राम प्रति घन सेमी० है और पानी में डाल दिये जाने पर यह तैरने लगेगा |
  • यह ग्रह गैस व द्रव से बना है। यहाँ ठोस धरातल का अभाव है ।
  • यह हल्के तत्वों से बना है जिसमें हाइड्रोजन व हीलियम प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त इसमें अमोनिया, मिथेन आदि हैं ।
  • इस ग्रह का तापमान -139°C है । 
  • इसका वायुमंडल अधिकांशतः हाइड्रोजन व हीलियम से बना है ।
  • शनि ग्रह के चारों ओर वलय ( Rings) पाये जाते हैं । इन वलयों की संख्या 10 है ।
  • आकाश में यह ग्रह पीले तारे के समान नजर आते हैं।
  • यह अंतिम ग्रह है जिसे नंगी आँखों से देखा जा सकता है । 
  • शनि के अभी तक 62 उपग्रह ज्ञात हैं : टाइटन ( Titan ), एटलस, मीमास, इंक्लेडस, टेथिस, डायोन, रिया, हाइपेरियोन और फोइबे
  • टाइटन ( Titan ) :
    • इसका सबसे बड़ा उपग्रह टाइटन ( Titan ) है ।
    • टाइटन की खोज क्रिस्टियान हाइगन्स (Christiaan Huygens) ने की।
    • टाइटन में नाइट्रोजन युक्त वायुमंडल पाया जाता है ।
    • यह सौर मंडल का एकमात्र उपग्रह है जहाँ घना वायुमंडल पाया जाता है । इस वायुमंडल की उपस्थिति से जीवन के लक्षण का पता चलता है । लेकिन यहाँ पर जीवन का अस्तित्व नहीं मिलता ।  

 अरुण (Uranus) :

  • इस ग्रह की खोज 1781 ई० में सर विलियम हर्शेल (William Herschel) ने की ।
  • अरुण को प्रथम आधुनिक ग्रह कहा जाता है। 
  • सूर्य से दूरी के अनुसार यह सातवां ग्रह है।
  • सूर्य से इसकी दूरी 286 करोड़ 90 लाख किमी० है ।
  • यह आकार में सौर मंडल का तीसरा सबसे बड़ा ग्रह है ।
  • इसका व्यास 52,000 किमी० है ।
  • यह सूर्य की परिक्रमा करने में 84 वर्ष लगाता है ।
  • अपने धुरी के लम्ब के साथ 90° झुके रहने के कारण यह एकमात्र ऐसा ग्रह है जो एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक अपनी परिक्रमा कक्ष में सूर्य के सामने रहता है और पहियों की तरह घूमता है। इसीलिए इसे लेटा हुआ ग्रह कहा जाता है ।
  • यह अपने अक्ष या धुरी पर 10.8 घंटा में एक चक्कर लगाता है ।
  • इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 14.5 गुना है ।
  • इसका घनत्व 1.21 ग्राम प्रति घन सेमी० है ।
  • इस ग्रह पर ठोस धरातल का अभाव है।
  • इसके सतह का तापमान -197°C है । 
  • इसमें मिथेन गैस की प्रधानता है जिसके कारण दूरबीन से देखने पर यह हरे रंग का नजर आता है ।
  • शनि की भाँति इस ग्रह के चारों और धुंधले वलय (rings) हैं। वलय की संख्या 9 है।
  • इस ग्रह के 27 उपग्रह हैं जिनमें ऐरियल, अम्ब्रियल, टिटेनिया, ओबेरोन, मिराण्डा आदि प्रमुख हैं । 

 वरुण (Neptune ) :

  • इस ग्रह की खोज 1846 ई० में जर्मन खगोलवेत्ता जॉन गेले (John Galle) ने की।
  • सूर्य से दूरी के अनुसार यह आठवां एवं अंतिम ग्रह है।
  • सूर्य से इसकी दूरी 450 करोड़ 5 लाख किमी० है ।
  • यह आकार में सौर मंडल का चौथा सबसे बड़ा ग्रह है।
  • इसका व्यास 49,000 किमी० है ।
  •  सूर्य की परिक्रमा करने में 165 वर्ष लगाता है।
    • यह सूर्य की परिक्रमा सबसे ज्यादा समय में करनेवाला ग्रह है 
  • यह अपनी धुरी पर 15.8 घंटा में एक चक्कर लगाता है।
  • इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 17.2 गुना है।
  • इसका घनत्व 1.67 ग्राम प्रति घन सेमी० है ।
  • यह सबसे ठंढा ग्रह है  
  • इसके वायुमंडल में हाइड्रोजन गैस अधिक मात्रा में पाया जाता है। इसके साथ ही कुछ मात्रा में मिथेन गैस भी पाया जाता है ।
  • इसका रंग पीतमिश्रित हरा ( पीलापन लिये हुए हरा ) है ।
  • शनि, अरुण की भाँति इस ग्रह के चारों ओर धुंधले वलय (rings) हैं ।
    • इन वलयों की संख्या 5 है।  
  • वरूण के 14 उपग्रह हैं । जिनमें प्रमुख हैं— ट्रिटोन (Triton) व नेरेइड (Nereid ) । 

बौने ग्रह या प्लूटोन्स (Dwarf Planets or Plutones) :

  • बौने ग्रह या प्लूटोन्स  का अर्थ :  प्लूटो जैसे अन्य पिण्ड ।
  • बौने ग्रह या प्लूटोन्स के अन्तर्गत प्लूटो, चेरॉन, सेरेस एवं जेना (2003 यू बी 313) को शामिल किया गया है । 

प्लूटो या यम या कुबेर (Pluto ) :

  • International Astronomical Union — IAU ने 2006 में प्राग (Prague) में संपन्न 26वीं महासभा में प्लूटो की ग्रह के रूप में मान्यता समाप्त कर दी है ।
  • क्यूपर बेल्ट में स्थित प्लूटो की खोज 1930 ई० में क्लाड टामवो ने की थी ।
  • प्लूटो का ग्रह का दर्जा समाप्त कर उसे बौने ग्रह (Dwarf Planets) की श्रेणी में रखा गया है। 
  • सूर्य से प्लूटो की दूरी 589 करोड़ किमी० है ।
  • इसका व्यास 2,300 किमी० है ।
  • यह सूर्य की परिक्रमा करने में 248 वर्ष लगाता है ।
  • प्लूटो की कक्षा ( orbit) वरुण (Neptune) की कक्षा को काटती है ।
  • यह अपनी धुरी पर 6.4  दिन में एक चक्कर लगाता है।
  • इसका घनत्व 2-03 ग्राम प्रति घन सेमी० है ।
  • यह पानी और मिथेन का जमा हुआ बर्फ का गोला है ।
  • इसके सतह का तापमान -220°C है । यह अत्यधिक ठंडा बौना ग्रह है । 

चेरॉन (Cheron) :

  • पहले इसे प्लूटो का एकमात्र उपग्रह स्वीकार किया जाता था। लेकिन प्राग सम्मेलन 2006 के निर्णयानुसार इसे बौने ग्रह की श्रेणी में डाल दिया गया है।  

सेरेस (Ceres) :

  • इसे 1801 में इटली के खगोलविद पियाजी द्वारा खोजा गया था । 

Xena – 2003 UB 313) :

  • IAU के नुसार यह एक बौना ग्रह या प्लूटोन्स है। इस पिंड को इरीस (136199 ) नाम दिया गया है । 

लघु सौरमंडलीय पिण्ड ( Small Solar System Bodies): अंतर्राष्ट्रीय खगोलशास्त्रीय संघ (IAU) के अनुसार यह सौरमंडलीय पिण्डों की तीसरी श्रेणी है। इसके तहत क्षुद्रग्रह, धूमकेतु या पुच्छलतारा, उल्का, उपग्रह व अन्य छोटे खगोलीय पिण्डों को शामिल किया गया है । 

क्षुद्रग्रह या ग्रहिकाएँ ( Asteroids) :

  • इन्हें लघु ग्रह, अवांतर ग्रह (टूटे हुए ग्रह) आदि नामों से भी जाना जाता है।
  • सूर्य की परिक्रमा करनेवाले विभिन्न आकारों के चट्टानी मलवे ( rocky debris) जो मुख्यतः बृहस्पति और मंगल की कक्षाओं के मध्य की  की पट्टी में विचरण करते हैं, क्षुद्रग्रह कहलाते हैं।
  • अंतरिक्ष में करीब 40,000 क्षुद्रग्रह हैं ।
  • चिरॉन (Chiron) नामक क्षुद्रग्रह शनि तथा अरुण ( Uranus) के बीच चक्कर लगाती है ।
  • ये बड़े ग्रहों के टुकड़े हैं जो किसी समय टूटकर इनसे अलग हो गये ।
  • फोर वेस्टा (Four Vesta) एकमात्र ऐसा क्षुद्रग्रह है जिसे नंगी आँखों से देखा जा सकता है।
  • कुछ अन्य बड़े क्षुद्रग्रह आटेन (Aten), पलास (Pallas), हाइजिया (Hygeia) आदि हैं । 

 

धूमकेतु या पुच्छलतारा ( Comets) :

  • Comet का अर्थ :  लंबे बाल/पूँछ वाला तारा।
  • यह धूमकेतु की सामान्य रूप से दिखाई पड़नेवाली संरचना है। 
  • उसकी पूँछ सूर्य के नजदीक आने पर ही दिखाई पड़ती है ।
  • धूमकेतु : बर्फ व धूलकणों का बना होता है । यह बर्फ, मिथेन, अमोनिया, कार्बन डाईऑक्साइड, जल इत्यादि के जमने से बना होता है ।
  • धूमकेतु सूर्य के चारों ओर एक दीर्घवृत्तीय ( elliptical) कक्षा में घूमता रहता है ।
  • धूमकेतु की पूँछ (tail) का फैलाव सदैव सूर्य के विपरीत दिशा में रहता है तथा सिर (head or coma) सूर्य की ओर रहता है ।
  • सर्वप्रथम एडमण्ड हेली ने यह सिद्ध किया कि धूमकेतु काफी लंबे अंतराल के बाद आते हैं
  • हेली धूमकेतु (Halley’s Comet) एक प्रमुख धूमकेतु है जो कि अंतिम बार 1986 में दिखायी दिया था। यह धूमकेतु 75-81 वर्ष ( लगभग 76 वर्ष) बाद दिखाई देता है । अब यह 2062 में दिखायी पड़ेगा । 
  • धूमकेतु की पूँछ में एक खतरनाक रसायन सायनोजेन (CN) होता है । । 

उल्का (Meteor )/उल्कापिण्ड (Meteorite) :

  • रात्रि के समय आकाश में अत्यंत चमकीले पदार्थ तेजी के साथ पृथ्वी की ओर गिरते नजर आते हैं ।
  • ये क्षुद्रग्रह व अन्य आकाशीय पिण्डों के टुकड़े होते हैं जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं तो हवा के घर्षण से इसका ताप बढ़ता जाता है और ये जलकर नष्ट हो जाते हैं ।
  • यह टूटते हुए तारों की शक्ल में नजर आते हैं । इसे ही उल्का कहते हैं।
  • कुछ उल्काएँ वायुमंडल में पूरी तरह से नहीं जल पाती है और बचा हुआ पिण्ड पृथ्वी के धरातल पर आकर गिर पड़ता है इसे उल्कापिण्ड (Meteorite) कहते हैं । 

उपग्रह (Satellites) :

  • वे आकाशीय पिण्ड जो अपने-अपने ग्रहों की परिक्रमा करते हैं उपग्रह कहलाते हैं।
  • इनमें भी अपना प्रकाश नहीं होता है और ये अपने ग्रह के साथ सूर्य की भी परिक्रमा करते हैं ।
  • ग्रहों के समान उपग्रहों का परिक्रमण पथ भी दीर्घवृतीय या अण्डाकार ( elliptical ) होता है ।
  • उपग्रह ग्रहों की अपेक्षा छोटे होते हैं।
  • अधिकतर उपग्रह उसी दिशा में अपने ग्रहों की परिक्रमा करते हैं जिस दिशा में वह ग्रह सूर्य की परिक्रमा करता है ।लेकिन कुछ उपग्रह ऐसे भी हैं जिनका मार्ग विपरीत दिशा में है ।
  • दो ग्रहों बुध तथा शुक्र का कोई उपग्रह नहीं हैं ।
  • सौरमंडल में जितने ज्ञात उपग्रह हैं उनमें गैनीमीड (Gaynmede) सबसे बड़ा तथा डीमोस (Deimos) सबसे छोटा है । 
  • पृथ्वी (1 उपग्रह ) :  चन्द्रमा (Moon)
  • मंगल (2  उपग्रह )  : फोबोस एवं डीमोस
  • बृहस्पति ( उपग्रह )  : गैनीमीड, इओ, यूरोपा, कैलिस्टो, लो
  • शनि (1 उपग्रह )  : टाइटन, येपेटस, रिया, डियोन, टीथिस, एटलस, लापेटस, हेलेन, प्रोमेस, फोइबे
  • अरुण (1 उपग्रह )  : मिरण्डा, एरिअल, अम्ब्रीएल, टाइटेनिया, ओबेरॉन, बेलिण्डा, आफेलिया
  • वरुण (1 उपग्रह )  : ट्रिटोन तथा नेरेइड 

चन्द्रमा (Moon) :

  • चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है।
  • चन्द्रमा पृथ्वी के व्यास के लगभग एक चौथाई के बराबर है ।
  • चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति के छठे भाग के बराबर (1/6) है ।
  • चन्द्रमा पृथ्वी का निकटतम खगोलीय पिण्ड है ।
  • चन्द्रमा की पृथ्वी से औसत दूरी 382 हजार किमी० है ।
  • चन्द्रमा की पृथ्वी से निकटतम दूरी ( Perigee) 364 हजार किमी० तथा अधिकतम दूरी (Apogee) 406 हजार किमी० है ।
  • चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर 27.3 दिन (27 दिन 7 घंटे 43 मिनट 11.47 सेकण्ड ) में और इतने ही समय में अपनी धुरी पर भी एक चक्कर लगाता है ।
  • चन्द्रमा के परिक्रमण काल व घूर्णन काल समान होने के कारण हमें इसका केवल एक ही सतह दिखायी देता है और यही सतह हमेशा सूर्य के सामने रहता है ।
  • इसका पिछला भाग हमेशा अंधकार में डूबा रहता है जिसे शांति का सागर (Sea of Tranquility) कहते हैं ।
  • इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 0-012 भाग है।
  • इसका घनत्व 3.4 ग्राम प्रति घन सेमी० है ।
  • पृथ्वी और चन्द्रमा एक ही प्रकार की चट्टानों से बने हैं । इसी से अनुमान लगाया जाता है कि चन्द्रमा की उत्पत्ति पृथ्वी के ही एक भाग के टूट जाने से हुई है ।
  • चन्द्रमा पर जल नहीं है । चन्द्रमा पर जलरहित क्षेत्र (waterless area) को तूफान का महासागर (Ocean of Storms) कहा जाता है ।
  • चन्द्रमा पर सबसे ऊँचा स्थान लिबनिट्ज पर्वत (Libnitz mountain ) है जो चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित है और 35,000 फीट ऊँचा है।