कृषि (Agriculture)

  कृषि(Agriculture)

  •  एग्रीकल्चर शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्दों – ‘एगर/एग्री’ (ager/agri), अर्थात् ‘मृदा (Soil)’ तथा ‘कल्चर (culture)‘, अर्थात् ‘कृषि’ (Cultivation) से हुआ है। 

कृषि के प्रकार (Types of Agriculture)

  •  (i) निर्वाह कृषि (Subsistence Agriculture)
  • (ii) वाणिज्यिक कृषि 

 

निर्वाह कृषि (Subsistence Agriculture) 

  • जब कोई कृषक पारंपरिक रूप से निम्न स्तरीय प्रौद्योगिकी और अधिकाधिक पारिवारिक श्रम का उपयोग करके अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये कृषि करता है तो उसे ‘निर्वाह कृषि’ कहते हैं।
  • निर्वाह कृषि को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है- 

(i) गहन निर्वाह कृषि (intensive subsistence agriculture)

(ii) आदिम निर्वाह कृषि (primitive subsistence agriculture)

 

कृषिगत फसलों का वर्गीकरण 

  • खाद्यान्न फसलें- चावल, गेहूँ, मक्का, जौ, दाल, आदि। 
  • नकदी फसलें- मसाले, तिलहन, फल, गन्ना, तंबाकू आदि।
  • बागानी फसलें- कॉफी, चाय, कोको, रबर, नारियल आदि। 
  • रेशेदार फसलें– कपास, जूट आदि। 
  • जंतु उत्पाद– सिल्क, ऊन, माँस, दुग्ध उत्पाद आदि।

 

गहन निर्वाह कृषि (Intensive Subsistence Agriculture) 

  • इसमें किसान एक छोटे भूखंड पर साधारण औज़ारों की सहायता से अधिक परिश्रम करके कृषि करता है। 
  • इसमें भूमि पर जनसंख्या का दबाव अधिक होता है। 
  • इस प्रकार की कृषि दक्षिणी, दक्षिणी-पूर्वी और पूर्वी एशिया के सघन जनसंख्या वाले मानसूनी प्रदेशों में अधिक प्रचलित है। 

 

आदिम निर्वाह कृषि (Primitive Subsistence Agriculture)

इसको भी पुनः दो वर्गों में विभाजित किया जाता है

  • (i) स्थानांतरणशील कृषि (Shifting Agriculture)
  • (ii) चलवासी पशुचारण (Nomadic  Herding) 

 

स्थानांतरणशील कृषि (Shifting Agriculture) 

  • इसे ‘झूम कृषि’, ‘कर्तन एवं दहन कृषि’ (Slash and Burn Agriculture) आदि नामों से जाना जाता है। 
  • इसमें वृक्षों को काटकर एवं जलाकर भूखंड को साफ किया जाता है तथा राख को मृदा में मिलाकर उस भूखंड पर कृषि की जाती है। 
  • जब मृदा में कार्बनिक तत्त्वों की कमी, निक्षालन (Leaching) तथा वनस्पतियों के बार-बार जलाने से भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है, तो उस भूखंड को छोड़ दिया जाता है और कृषक नए भूखंड पर कर्तन एवं दहन की क्रिया द्वारा कृषि करता है।
  •  स्थानांतरणशील कृषि अमेज़न बेसिन के सघन वन क्षेत्रों, उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और उत्तर-पूर्वी भारत के भागों में अधिक प्रचलित है। 

स्थानातरणशील कृषि के नाम

देश/स्थान

मिल्पा

मेक्सिको और मध्य अमेरिका

कोनुको

वेनेजुएला

रोका

ब्राजील 

मसोले

कॉन्गो एवं मध्य अफ्रीका

लदांग

इंडोनेशिया एवं मलेशिया 

रे 

वियतनाम

तुंग्या

म्यांमार

चेना

श्रीलंका

कैंगिन

फिलीपींस

 

नाम

भारत में स्थानातरणशील कृषि संबंधी राज्य

झूम

उत्तर-पूर्वी राज्यों 

(असम, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड)

बेवर या डहिया

मध्य प्रदेश

पोडु/पेंडा

आंध्र प्रदेश

कुमारी 

पश्चिमी घाट

कोमान/पामाडाबी

ओडिशा

वालरे/वाल्टरे 

दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान

खिल

हिमालयन क्षेत्र 

कुरुवा

झारखंड

पामलू

मणिपुर 

दीपा

छत्तीसगढ़ का बस्तर जिला, 

अंडमान  निकोबार द्वीप समूह

 

चलवासी पशुचारण (Nomadic  Herding) 

  • चलवासी पशुचारण में पशुचारक अपने पशुओं के साथ चारे और  पानी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं। 
  • चलवासी पशुचारण सहारा के अर्द्धशुष्क एवं शुष्क जलवायु प्रदेशों, मध्य एशिया और भारत के राजस्थान तथा जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है। 

 

वाणिज्यिक कृषि (Commercial Agriculture) 

  • जब किसी फसल का उत्पादन बाज़ार में विक्रय हेतु किया जाता है तो उसे ‘वाणिज्यिक कृषि’ कहते हैं। 
  • इसमें विस्तृत कृषि क्षेत्र पर अधिकांश कार्य मशीनों के द्वारा किया जाता है। साथ ही इसमें अधिक पूंजी का निवेश भी किया जाता है। 
  • वाणिज्यिक कृषि को मुख्यतः तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है
  1. वाणिज्यिक अनाज कृषि (Commercial Grain Agriculture)
  2. मिश्रित कृषि (Mixed Agriculture)
  3. रोपण कृषि  (Plantation Agriculture)

 

वाणिज्यिक अनाज कृषि (Commercial Grain Agriculture) 

  • जब किसी खाद्यान्न फसल का उत्पादन वाणिज्यिक उद्देश्य (बाज़ार में बेचने के लिये) से किया जाता है तो उसे ‘वाणिज्यिक अनाज कृषि’ कहते हैं।
  •  इसमें किसी एक ही फसल को एक विस्तृत कृषि भूखंड पर उगाया जाता है, जैसे- गेहूँ, मक्का इत्यादि। 
  • इस प्रकार की कृषि के क्षेत्र यूरेशिया के स्टेपी, उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी, अर्जेंटीना के पंपास, दक्षिण अफ्रीका के वेल्ड, ऑस्ट्रेलिया के डाउंस एवं न्यूज़ीलैंड के केंटरबरी मैदानों आदि में विस्तृत रूप से की जाती है। 

 

मिश्रित कृषि (Mixed Agriculture) 

  • इसमें कृषि भूखंड का उपयोग कई कार्यों, जैसे- भोजन के लिये फसल उगाने, चारे की फसलें उगाने और पशुपालन के लिये किया जाता है।
  •  इस कृषि में खेतों का आकार मध्यम होता है। 
  • इस प्रकार की कृषि पश्चिमी यूरोप, उत्तर-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, अर्जेंटीना, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण अफ्रीका में अधिक होती है। 

 

रोपण कृषि (Plantation Agriculture) 

  • इसमें बड़े पैमाने पर श्रम एवं पूंजी के साथ-साथ परिवहन जाल के विकास की भी अनिवार्यता होती है। 
  • इस प्रकार की कृषि मुख्यतः विश्व के उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में की जाती है। 
  • रोपण कृषि में चाय, कहवा, काजू, रबड़, केला, कपास एवं गन्ना आदि की एकल फसलें प्रमुखता से उगाई जाती हैं। 
  • रोपण कृषि, उद्योग और कृषि के बीच एक अंतरापृष्ठ (Interface) है।
  • इससे प्राप्त उत्पाद उद्योगों में कच्चे माल के रूप में प्रयोग होते हैं। 

 

 

कृषि संबंधी महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान 

सस्थान

मुख्यालय

खाद्य एवं कृषि संगठन 

Food and Agriculture Organization(FAO)

रोम (इटली) 

अंतर्राष्ट्रीय वानिकी अनुसंधान केंद्र

The Center for International Forestry Research (CIFOR)

बोगोर (इंडोनेशिया)

विश्व मौसम विज्ञान संगठन 

world meteorological organization

(WMO)

जेनेवा (स्विट्ज़रलैंड)

अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान 

International Rice Research Institute

(IRRI)

मनीला (फिलीपींस)

 

 

कृषि के अन्य प्रकार 

गहन कृषि (Intensive Agriculture) 

  • जब कृषि भूमि की प्रत्येक इकाई पर अधिक मात्रा में पूंजी एवं श्रम का उपयोग करके एक निश्चित समयावधि में फसलों का अधिकतम संभव उत्पादन किया जाता है तो उसे ‘गहन कृषि’ कहते हैं। 
  • इस प्रकार की कृषि उन क्षेत्रों में अधिक होती है, जहाँ कृषि भूमि की उपलब्धता कम तथा जनसंख्या का दबाव अधिक होता है। 
  • गहन कृषि में रासायनिक उर्वरकों, उन्नत बीजों, कीटनाशक दवाओं, सिंचाई, फसल परिवर्तन आदि की अधिक आवश्यकता पड़ती है।

 

पशुपालन कृषि (Ranching) 

  • जब किसी प्राकृतिक वनस्पति क्षेत्र पर विभिन्न प्रकार के पशुओं को चराया जाता है तो उसे ‘पशुपालन कृषि’ कहते हैं। 
  • इस कृषि में फसलों का उत्पादन नहीं किया जाता है। 
  • पशुपालन कृषि अधिकांशतः उन देशों में की जाती है, जहाँ प्राकृतिक चारागाहों की अनुकूलतम स्थिति होती है। 
  • पशुपालन कृषि मुख्यतः ऑस्ट्रेलिया, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, तिब्बत तथा भारत के पर्वतीय या पठारी क्षेत्रों में अधिक की जाती है। 

 

सहकारी कृषि (Co-operative Agriculture) 

  • इस पद्धति में किसान परस्पर लाभ के उद्देश्य से स्वेच्छापूर्वक अपनी भूमि, श्रम और पूंजी को एकत्रित करके सामूहिक रूप से खेती करते हैं। 
  • इसका उद्देश्य खेती के छोटे व बिखरे होने की समस्या का समाधान तथा उपविभाजन से जनित समस्याओं का निराकरण कर किसान श्रमिकों और छोटे किसानों के साथ न्याय करना है। 
  • इसके अलावा संविदा कृषि, निगमित कृषि, जीरो फार्मिंग आदि अन्य महत्त्वपूर्ण कृषि के प्रकार हैं। 

 

कृषि विधि एवं तकनीक 

परती छोडना 

  • एक ही कृषि भूखंड पर लगातार कृषि करने से मिट्टी की उर्वरता घट जाती है।
  • अतः मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने के लिये कृषि भूखंड को कुछ समय या अवधि (सामान्यतः 3 से 4 वर्षों तक) के लिये खाली (परती) छोड़ दिया जाता है ताकि भूमि अपनी प्राकृतिक उर्वरता को पुनः प्राप्त कर सके।

 

चक्रीय कृषि 

  • कृषि भूखंड को परती छोड़ने के बजाय जब उस पर विभिन्न फसलें चक्रीय क्रम में उगाई जाती हैं तो उसे ‘चक्रीय कृषि’ कहते हैं। 
  • चक्रीय कृषि से मिट्टी की उर्वरता तथा पोषक तत्त्वों की कमी नहीं होती है और मिट्टी में पोषक तत्त्वों का संतुलन बना रहता है। 
  • चक्रीय कृषि में फलीदार पौधों मुख्यतः दलहनी फसलों को प्रमुखता से उगाया जाता है, क्योंकि इनके द्वारा मिट्टी में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता रहता है। 

 

मिश्रित शस्यन

  •  मिश्रित कृषि में किसी एक ही कृषि भूखंड पर विभिन्न प्रकार की फसलों को मिश्रित करके उगाया जाता है, ताकि एक फसल द्वारा पोषक तत्त्वों का उपयोग तथा दूसरी द्वारा उत्पादन होता रहे।
  • इससे मिट्टी में पोषक तत्त्वों का संतुलन बना रहता है।
  • मिश्रित कृषि में कृषि क्रियाओं के साथ-साथ पशुपालन भी किया जाता है। 

 

द्विफसली कृषि 

  • इसमें चक्रीय विधि द्वारा एक ही वर्ष में दो फसलों का उत्पादन किया जाता है।
  • द्विफसली कृषि का उद्देश्य मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखना होता है, इसलिये इसमें एक फसल नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने वाली होती है, ऐसी कृषि पर्याप्त सिंचाई वाले या वर्षा वाले क्षेत्रों में होती है।
  • नोट: युग्म पैदावार का आशय विभिन्न मौसमों में दो फसल उत्पादन से है।

 

रिले कृषि 

  • इस विधि के अंतर्गत पहली फसल को काटने से पर्व ही इसके मध्य उपस्थित रिक्त स्थानों में दूसरी फसल लगा दी जाती है एवं प्रथम फसल के कटने का इंतज़ार नहीं किया जाता था कि द्विफसली पद्धति में किया जाता हैं।

 

विश्व के प्रमुख फसलों के शीर्ष 

उत्पादक एवं निर्यातक राष्ट्र

फसल

उत्पादक राष्ट्र

निर्यातक राष्ट्र

चावल

  1. चीन
  2. भारत
  3. इंडोनेशिया
  1. भारत 
  2. थाईलैंड 
  3. वियतनाम

चाय

 

  1. चीन 
  2. भारत 
  3. केन्या
  1. चीन 
  2. श्रीलंका
  3. केन्या 

(अन्य स्रोतों में क्रम में अंतर मिलता है।) 

कॉफी

  1. ब्राज़ील
  2.  वियतनाम 
  3. कोलंबिया
  1. ब्राज़ील 
  2. वियतनाम 
  3. कोलंबिया

रबर

 

  1. थाईलैंड
  2. इंडोनेशिया 
  3. वियतनाम
  1. थाइलैंड 
  2. इंडोनेशिया 
  3. वियतनाम

गेहूँ

 

  1. चीन
  2. भारत
  3. रूस
  1. रूस
  2. कनाडा 
  3. यू.एस.ए

 

 

विश्व के प्रमुख फसल उत्पादक क्षेत्र

चावल

देश

उत्पादक क्षेत्र

भारत

असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश इत्यादि।

चीन 

जेचवान क्षेत्र, यांग्त्ज़ी व सिक्यांग नदी घाटी क्षेत्र इत्यादि। 

इंडोनेशिया

सुलावेसी (सेलेबस), सुमात्रा, जावा इत्यादि।

यू.एस.ए.

डकोटा, मोंटाना, मिन्नीसोटा, कंसास, ओक्लाहोमा, कैलिफोर्निया इत्यादि।

 

गेहूँ

देश

उत्पादक क्षेत्र

रूस

कैस्पियन सागर के तटीय क्षेत्र, साइबेरिया का स्टेपीज क्षेत्र इत्यादि। 

चीन

मेकॉन्ग, यांग्त्ज़ी, सीक्यांग नदी घाटी आदि।

 

मक्का

देश

उत्पादक क्षेत्र

यू.एस.ए.

ओहियो से नेब्रास्का तथा, से मिनीसोटा, से मिस्सौरी (मक्का पेटी) 

ब्राज़ील

साओ पोलो, रियोग्रांडे आदि।

 

चाय

देश

उत्पादक क्षेत्र

चीन

जेचवान बेसिन, सीक्यांग घाटी आदि।

श्रीलंका

कैंडी बेसिन

केन्या

लीमुरू क्षेत्र

 

कपास

देश

उत्पादक क्षेत्र

चीन

वांग्हो घाटी, यांग्त्ज़ी घाटी, व्हीहो घाटी आदि।

यू.एस.ए.

अलाबामा, टेनेसी, उत्तरी व दक्षिणी कैरोलीना, मिसीसिपी घाटी क्षेत्र आदि।