1857 का विद्रोह
- झारखण्ड में 1857 के विद्रोह की शुरूआत – 12 जून, 1857 को , रोहिणी गाँव (देवघर) से,
- यह गाँव अजय नदी के किनारे अवस्थित है।
- मेजर मैक्डोनाल्ड के नेतृत्व में पदस्थापित 32वीं रेजिमेंट के सैनिकों द्वारा
- लेफ्टिनेंट नॉर्मन लेस्ली की हत्या के बाद यह विद्रोह प्रारंभ हुआ।
- मेजर मैकडोनाल्ड तथा सर्जन डॉ. ग्रांट घायल हो गये।
- इमाम खाँ नामक व्यक्ति पहचाने गए हमलावरों पर मुकदमा चलाकर उन्हें फाँसी दी गयी
- रेजीमेंट का मुख्यालय रोहिणी से भागलपुर स्थानांतरित कर दिया गया।
- विद्रोह का प्रसार
- हजारीबाग व रामगढ़ (30 जुलाई)
- राँची (2 अगस्त)
- सिंहभूम (3 सितंबर)
- पलामू (26 सितंबर)
- हजारीबाग में विद्रोह का प्रसार
- 25 जुलाई, 1857 को दानापुर रेजिमेंट के सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया।
- इसकी सूचना पाकर हजारीबाग स्थित रामगढ़ बटालियन के सैनिक उत्साहित हो गए तथा 30 जुलाई, 1857 को इन्होनें भी विद्रोह कर दिया।
- रामगढ़ बटालियन का मुख्यालय राँची में अवस्थित था।
- मेजर सिम्पसन (उपायुक्त) सहित विभिन्न अंग्रेज अधिकारी कलकत्ता भाग गए।
- रामगढ़ के राजा शम्भू नारायण सिंह द्वारा विद्रोह की सूचना गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग को भेजी गयी।
- विद्रोहियों ने जेल से कैदियों को भी छुड़ा लिया तथा संबलपुर के सुरेन्द्र शाही के नेतृत्व में ये कैदी राँची की ओर चले गये।
- राँची के कमिश्नर ने विद्रोह को दबाने हेतु लेफ्टिनेंट ग्राहम के नेतृत्व में सैनिकों के एक दल को रामगढ़ भेजा
- परंतु रामगढ़ के जमादार माधव सिंह एवं डोरंडा के सूबेदार नादिर अली खाँ व सूबेदार जयमंगल पाण्डेय ने विद्रोह कर दिया
- लेफ्टिनेंट ग्राहम अपनी जान बचाने हेतु भाग गया।
- 25 जुलाई, 1857 को दानापुर रेजिमेंट के सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया।
- राँची में विद्रोह का प्रसार
- 2 अगस्त, 1857 को हजारीबाग के विद्रोही सैनिक राँची आ गये
- जमादार माधव सिंह, सूबेदार नादिर अली व जयमंगल पाण्डेय के नेतृत्व में यहाँ के सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया।
- इन सैनिकों ने राँची में अधिकारियों की कोठियाँ जला दी
- गोस्सनर चर्च को तोप के गोले से उड़ा दिया तथा जेल से कैदियों को छुड़ा लिया।
- राँची के कमिश्नर डाल्टन की सलाह पर अगस्त में पूरे छोटानागपुर में मार्शल कानून लागू कर दिया गया।
- विद्रोहियों ने बढ़कागढ़ के नागवंशी ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव (विद्रोहियों के नेता) के नेतृत्व में डोरंडा स्थित अंग्रेज अधिकारियों के सभी बंगले व कचहरी को जला दिया तथा खजाना लूट लिया।
- इन्होनें जेल से सभी कैदियों को भी छुड़ा लिया।
- इसमें साथ दिया
- पाण्डेय गणपत राय (विद्रोहियों के सेनापति)
- टिकैत उमरांव सिंह
- शेख भिखारी
- रामरूप सिंह
- जगन्नाथ शाही
- दुखु
- विश्वनाथ शाहदेव (झारखण्ड में 1857 के विद्रोह के प्रेरक) ने मुक्तवाहिनी सेना की स्थापना की
- मुक्तवाहिनी सेना को 1857 के विद्रोह में बाबू कुंवर सिंह का मार्गदर्शन प्राप्त था जो बिहार में 1857 के विद्रोह को नेतृत्व प्रदान कर रहे थे।
- 2 अगस्त, 1857 को हजारीबाग के विद्रोही सैनिक राँची आ गये
- चतरा में विद्रोह का प्रसार
- राँची के बाद विद्रोही चतरा पहुँच गए जहाँ
- 2 अक्टूबर, 1857 को मेजर इंग्लिश, मेजर सिम्पसन, लेफ्टिनेंट अर्ल, सार्जेट डाइनन आदि के नेतृत्व वाले अंग्रेज सैनिकों व जयमंगल पाण्डेय के नेतृत्व वाले विद्रोहियों के बीच चतरा का ऐतिहासिक युद्ध हुआ।
- इस लड़ाई में सूबेदार नादिर अली खाँ घायल हो गए तथा जमादार माधव सिंह भाग गया।
- अंग्रेजों ने जमादार माधव सिंह पर 1,000 रुपये इनाम की घोषणा की।
- 3 अक्टूबर, 1857 को सूबेदार नादिर अली खाँ व जयमंगल पाण्डेय को गिरफ्तार कर लिया गया
- कमिश्नर सिम्पसन के आदेश पर 4 अक्टूबर को उन्हें चतरा के ‘पंसीहारी तालाब’ के निकट आम के पेड़ से लटकाकर फाँसी दे दी गयी।
- रांची का कमिश्नर डाल्टन ओरमांझी के 12 गाँवों के जमींदार उमराव सिंह एवं उसके दीवान शेख भिखारी का गिरफ्तार कर राँची ले आया
- 8 जनवरी, 1858 को टैगोर हिल के पास इन्हें फाँसी दे दी।
- इस फाँसी स्थल को ‘टुंगरी फाँसी’ के नाम से जाना जाता है।
- ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव एवं सेनापति पाण्डेय गणपत राय भागकर लोहरदगा के जंगलों में छिप गए तथा वहीं से अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध छापामार युद्ध करते रहे।
- बाद में विश्वनाथ दुबे तथा महेश नारायण शाही नामक व्यक्तियों की गद्दारी से कैप्टन ओक्स ने कैप्टन नेशन के साथ मिलकर विश्वनाथ शाहदेव एवं गणपत राय को गिरफ्तार कर लिया।
- 16 अप्रैल 1858 को विश्वनाथ शाहदेव और 21 अप्रैल 1858 को गणपत राय को राँची जिला स्कूल के मुख्य द्वार के समीप कदम्ब के पेड़ पर छोटानागपुर के आयुक्त कमिश्नर डाल्टन के आदेशानुसार फाँसी दे दी गई।
- 2 अक्टूबर, 1857 को मेजर इंग्लिश, मेजर सिम्पसन, लेफ्टिनेंट अर्ल, सार्जेट डाइनन आदि के नेतृत्व वाले अंग्रेज सैनिकों व जयमंगल पाण्डेय के नेतृत्व वाले विद्रोहियों के बीच चतरा का ऐतिहासिक युद्ध हुआ।
- राँची के बाद विद्रोही चतरा पहुँच गए जहाँ
मानभूम में विद्रोह का प्रसार
- 5 अगस्त, 1857 ई. को सैनिकों ने पुरूलिया में भी विद्रोह कर दिया जिससे घबराकर उपायुक्त जी. एन. ओकस समेत कई अंग्रेज अधिकारी रानीगंज भाग गये। इसके बाद विद्रोहियों ने पूरे जिले पर कब्जा कर भारी लूटपाट मचाया व कैदियों को जेल से छुड़ा कर राँची की ओर जाने लगे।
- मानभूम के संथाल भी इस विद्रोह में शामिल हो गये तथा आसपास के गाँवों में लूटपाट करने लगे। पुरुलिया के असिस्टेंट कमिश्नर ओक्स को सितंबर में वापस लौटने पर इसकी जानकारी मिली।
- ओक्स ने विद्रोहियों को नियंत्रित करने हेतु पंचेत के राजा नीलमणि सिंह से मदद मांगी। परंतु नीलमणि सिंह सरकार की मदद करने के बजाय संथालों को ही भड़काने लगा।
- ओक्स ने कैप्टेन माउंट गोमरी के नेतृत्व में सैनिकों का एक दल संथालों को नियंत्रित करने हेतु भेजा तथा संथालों पर कार्रवाई के बाद अक्टूबर तक पुरूलिया में शांति स्थापित हो गयी।
- पुलिस कार्रवाई के बाद संथाल विद्रोही मानभूम से हजारीबाग की ओर चले गये। इसी बीच नवंबर में राजा नीलमणि सिंह को अंग्रेजों ने गिरफ्तार करके अलीपुर जेल भेज दिया जिसके बाद मानभूम में विद्रोह समाप्त हो गया।
सिंहभूम में विद्रोह का प्रसार
- सिंहभूम में यह विद्रोह भगवान सिंह एवं रामनाथ सिंह ने प्रारंभ किया गया, परंतु संपूर्ण सिंहभूम क्षेत्र में क्रांतिकारियों का नेतृत्व राजा अर्जुन सिंह ने किया।
- 3 सितंबर, 1857 को चाईबासा के सैनिकों ने भगवान सिंह एवं रामनाथ सिंह के नेतृत्व में विद्रोह करके सरकारी खजाने को लूट लिया तथा कैदियों को जेल से छुड़ा लिया।
- सिंहभूम का असिस्टेंट कमिश्नर मेजर शिशमोर विद्रोह के प्रारंभ होने से पूर्व ही अंग्रेज समर्थक सरायकेला नरेश चक्रधर सिंह को चाईबासा का दायित्व सौंपकर कलकत्ता भाग गया।
- लूटपाट करने के बाद विद्रोही राँची की ओर रवाना हो गये, परंतु संजय नदी के पास सरायकेला नरेश चक्रधर सिंह एवं खरसावां नरेश हरि सिंह ने विद्रोहियों को रोक दिया।
- इस स्थिति में अंग्रेज विरोधी पोरहाट नरेश अर्जुन सिंह ने विद्रोहियों की सहायता करने का निर्णय लिया तथा अपने दीवान जग्गू की सहायता से विद्रोहियों को 7 सितंबर, 1857 को संजय नदी पार करवाया।
- अर्जुन सिंह के प्रति विद्रोहियों के मन में शंका थी जिसके बाद अर्जुन सिंह द्वारा पौरी देवी को साक्षी मानकर विश्वासघात नहीं करने की कसम खाने पर विद्रोहियों ने अर्जुन सिंह को नेतृत्व सौंपना स्वीकार कर लिया।
- 13 सितंबर, 1857 को आर. सी. बर्च ने सिंहभूम के नये जिलाधीश के रूप में कार्यभार संभाला तथा 16 सितंबर, 1857 को कैप्टन ओक्स की सेना ने चाईबासा शहर पर अधिकार कर लिया।
- आर. सी. बर्च ने अर्जुन सिंह को चाईबासा आकर आत्मसमर्पण करने का संदेश भेजा जिसे अस्वीकृत करते हुए अर्जुन सिंह ने स्वयं को ‘सिंहभूम का राजा’ घोषित कर दिया। बर्च द्वारा अर्जुन सिंह को बागी करार देते हुए उसके राज्य पर कब्जा करने तथा उसकी गिरफ्तारी पर 1,000 रुपये इनाम की घोषणा की गयी।
- अर्जुन सिंह राँची के कमिश्नर डाल्टन के समक्ष आत्मसमर्पण करना स्वीकार करते हुए अपने समर्थकों के साथ राँची आ गया। परंतु 17 अक्टूबर, 1857 को अर्जुन सिंह के साथ राँची पहुँचे विद्रोहियों को कमिश्नर डाल्टन के आदेशानुसार गिरफ्तार करके जेल में बंद कर दिया गया।
- इन गिरफ्तार सैनिकों पर कोर्ट मार्शल चलाकर उनकी सजा तय की गयी तथा 20 अक्टूबर, 1857 को ‘शहीद चौक’ के पास फांसी की सजा प्राप्त विद्रोहियों को फांसी पर लटका दिया गया।
- अर्जुन सिंह विद्रोहियों की फांसी से अत्यंत दुखी हो गया तथा पोरहाट आकर फिर से अंग्रेजों के विरूद्ध अभियान प्रारंभ कर दिया।
- 20 नवंबर, 1857 को अंग्रेज अधिकारी कैप्टन हेल ने चक्रधरपुर पर कब्जा कर लिया तथा अर्जुन सिंह के दीवान जग्गू को गिरफ्तार कर उसी दिन फांसी पर लटका दिया।
- 21 नवंबर, 1857 को आर. सी. बर्च ने पोरहाट पर कब्जा करके राजा अर्जुन सिंह के महल को जला दिया। परंतु अर्जुन सिंह यहाँ से बचकर भाग गया।
- अर्जुन सिंह ने अंग्रेजों के विरूद्ध अपना अभियान तेज कर दिया। उसने पहले मुण्डा-मानकी को तथा दिसंबर, 1857 तक लगभग सभी-जनजातियों को अपने साथ विद्रोह में शामिल कर लिया।
- इसके बाद विद्रोहियों ने जमकर उत्पात मचाना शुरू कर दिया तथा आसपास के बाजारों को लूटने के अलावा अंग्रेजी सैनिकों पर हमला करने लगे। विद्रोहियों के ऐसे ही एक हमले में कई अंग्रेज अधिकारी घायल हो गये जिसके बाद कर्नल फास्टर ने विद्रोहियों को दबाने हेतु शेखावती बटालियन को रानीगंज से चाईबासा भेजा।
- 17 जनवरी, 1858 को चाईबासा पहुँचने पर शेखावती बटालियन ने चक्रधरपुर को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया तथा कई विद्रोहियों को मार दिया।
- अंग्रेजों के दमनपूर्वक किए गए कार्रवाई से विद्रोह को कमजोर पड़ गया। लगभग एक वर्ष तक विद्रोह को शांत देख अर्जुन सिंह ने मयूरभंज के राजा (अर्जुन सिंह के ससुर) की सलाह पर राँची के कमिश्नर डाल्टन के समक्ष 16 फरवरी, 1859 को आत्मसमर्पण कर दिया।
पलामू में विद्रोह का प्रसार
- भोगता जनजाति के नीलांबर-पीतांबर (दोनों भाई थे) ने पलामू क्षेत्र में 1857 के विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया।
- इन्होनें चेरो, खरवार तथा भोगता को एकत्र कर सैन्य दल का गठन किया तथा स्वयं को स्वतंत्र शासक के रूप में घोषित कर दिया।
- चकला के भवानी बख्श राय के नेतृत्व में 26 सितंबर, 1857 को चेरो जनजाति के लोग इस विद्रोह में शामिल हो गये।
- विद्रोहियों ने 21 अक्टूबर, 1857 ई. को शाहपुर पर धावा बोल दिया तथा अंतिम चेरो राजा चूड़ामन राय की विधवा से चार तो छीन कर ले गये।
- विद्रोहियों ने इस विद्रोह के दौरान शाहपुर थाना एवं लेस्लीगंज थाना के साथ-साथ चैनपुर गढ़ पर भी भीषण हमला किया परंतु चैनपुर गढ़ का रघुवर दयाल सिंह इस हमले से बचने में सफल रहा।
- विद्रोह की खबर मिलने पर 5 नवंबर, 1857 लेफ्टिनेंट ग्राहम एक सैन्य दल के साथ लेस्लीगंज तथा 7 नवंबर 1857 को चैनपुर पहुँचा। परन्तु विद्रोहियों द्वारा घेरे जाने के बाद ग्राहम वहाँ से जान बचाकर भाग गया।
- विद्रोहियों ने इसके बाद रंकागढ़ एवं 27 नवंबर, 1857 को बंगाल कोल कंपनी के राजहरा कोयला खान पर धावा बोल दिया।
- विद्रोहियों का प्रभाव बढ़ने पर लेफ्टिनेंट ग्राहम की सहायता के लिए 8 दिसंबर, 1857 को मेजर काटर के नेतृत्व में एक सैन्य दल को सासाराम से शाहपुर भेजा गया जहां मेजर काटर ने एक विद्रोही नेता देवी बाणा राय को गिरफ्तार कर लिया।
- राँची के कमिश्नर डाल्टन के आदेश पर ले. ग्राहम की सहायता हेतु एक सैन्य टुकड़ी के साथ मेजर मेकडोनेल पलामू पहुंचा जिसके परिणामस्वरूप विद्रोहियों को पलामू किला से भागना पड़ा।
- 3 फरवरी, 1858 को कमिश्नर डाल्टन खुद पलामू आया तथा 6 फरवरी, 1858 को वापस लौटा। डाल्टन के आदेश पर विभिन्न स्थानों (पलामू किला. लेस्लीगंज. हरणामांड गाँव बाघमारा घाट आदि) से विद्रोहियों को खदेड़ने पर जोर दिया गया।
- नवंबर, 1858 में सीधा सिंह और राम बहादुर सिंह के नेतृत्व में विद्रोहियों की संख्या 1000 से अधिक हो गया जिसके बाद विद्रोहियों ने पलामू पर पुनः नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया।
- जनवरी, 1859 तक विद्रोहियों ने पुनः पलामू पर नियंत्रण स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली । इसके लिए विद्रोहियों ने गुरिल्ला युद्ध का प्रयोग किया।
- लेफ्टिनेंट की सहायता के लिए जनवरी, 1859 में कैप्टेन नेशन को भेजा गया जिसके बाद विद्रोहियों के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई प्रारंभ की गयी तथा इसमें चेरो जागीरदारों का भी सहयोग लिया गया। इसके परिणामस्वरूप भोगता प्रदेश से नीलांबर-पीतांबर को भागना पड़ा।
- चेरो जागीरदारों द्वारा अंग्रेजों का साथ देने के कारण भोगता कमजोर पड़ने लगे जिसका फायदा उठाकर अंग्रेजों ने नीलांबर-पीतांबर को पकड़ने का भरपूर प्रयास किया। साथ ही इनको पकड़वाने पर जागीर व इनाम देने की भी घोषणा की गयी।
- अंग्रेजों ने एक गुप्तचर की सूचना पर नीलांबर-पीतांबर को एक गुप्त स्थान पर भोजन करते समय चारों ओर से घेर लिया तथा उन्हें आत्मसमर्पण हेतु विवश कर दिया।
- 28 मार्च, 1859 को नीलांबर-पीतांबर को लेस्लीगंज (पलामू) में एक आम के पेड़ पर फाँसी दे दी गई।
अन्य तथ्य
- 1857 के विद्रोह के दौरान नागवंशी राजा जगन्नाथ शाहदेव, पाण्डेय गणपत राय को पकड़वाने वाले विश्वनाथ दुबे तथा नारायण शाही, जगतपाल सिंह (पिठोरिया), जनक सिंह, शिवचरण राय (नावागढ़), कुंवर भिखारी सिंह (मनिका) आदि प्रमुख थे।
- अंग्रेजों की सहायता हेतु ‘रायबहादुर’ की उपाधि प्रदान की गयी।
- किशनु दयाल सिंह (रंका)
- रघुवर दयाल सिंह (चैनपुर) को
- अंग्रेजी सेना में शामिल कुछ भारतीय सैनिकों को उनकी सेवा हेतु ‘ऑर्डर ऑफ मेरिट’ दिया गया।
- चतरा की लड़ाई में शामिल
- सूबेदार शेख पंचकौड़ी
- हवलदार आरजू
- नायक तारा
- चतरा की लड़ाई में शामिल
- ‘विक्टोरिया क्रॉस’ से सम्मानित
- लफ्टिनेंट डौंट
- सार्जेन्ट डाइनन (मरणोपरांत)
- सैन्य व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए छोटानागपुर के कोल, संथाल आदि लोगों को सेना में शामिल किया गया।
- रामगढ़ बटालियन में गोरखा एवं सिक्खों के साथ-साथ दुसाधों की भी भर्ती की जाने लगी।
